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17 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...4

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गत अंक से आगे.....आम जनमानस बोली में ही अपने भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता है, उसके जीवन का हर पहलू बोली के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ अभिव्यक्त होता है. हम अगर भाषा का गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि भाषा में प्रयुक्त कुछ शब्द भाव सम्प्रेषण में बाधक होते हैं. इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि संसार की अधिकतर भाषाओं में प्रयोग होने वाले शब्द आसपास की बोलियों से लिए गए होते हैं, लेकिन बोली में अधिकतर शब्द मौलिक और भाव के बिलकुल निकट होते हैं. इसलिए भाषा के बजाय बोली भाव सम्प्रेषण के लिए ज्यादा सहज है, सार्थक है और स्वीकार्य भी. भाषा और बोली के सम्बन्ध में कई आयाम हमारे सामने हैं और दुनिया में जितने भी शोध आज तक हुए हैं वह यह बताते हैं कि मौलिक सृजन की मंजिल हमेशा बोली के रास्ते पर चलकर ही तय होती है. बेशक अन्त में उसे भाषा ही कहा जाता है.
हम यहाँ भाषा और बोली के अन्तर्सम्बन्धों पर विचार करने के बजाय इस पहलू पर विचार करने की कोशिश करेंगे कि हम किस (भाषा/बोली) माध्यम से बच्चों को शिक्षा देने का प्रयास करें, जिससे कि वह अधिक से अधिक मौलिक सृजन कर सकें. हम अधिकतर यही मानते हैं कि भाषा तो सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम है, लेकिन हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भाषा मात्र अभिव्यक्ति का ही माध्यम नहीं, वह हमारे सृजन और चिन्तन का भी आधार है. इसलिए हम जिस भाषा या बोली के करीब हैं, वही हमारे चिन्तन और सृजन के आधार को पुष्ट करती है. यह भी एक तथ्य है कि मनुष्य जिस भाषा को अपने बचपन में सीखता है वह उसी भाषा/बोली के माध्यम से ही सोचता है. जब सोच का आधार बचपन में सीखी हुई भाषा है तो स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति और सृजन के लिए भी वह उपयुक्त होगी.  
एक अवोध बालक बोलना अपने परिवेश से सीखता है, लेकिन जब हम उसे शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करते हैं तो हम उसे किसी अन्य भाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रयास करते हैं. दुनिया में यह चलन कम है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में अगर बात की जाए तो यहाँ अनेक बोलियाँ हैं, फिर क्षेत्रीय भाषाएँ हैं और फिर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय भाषाएं. अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हमारे देश में अंग्रेजी का प्रचलन जोरों पर है. हर किसी माँ-बाप की इच्छा है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करे, साथ ही उनका यह भी प्रयास है कि वह किसी अच्छे से निजी विद्यालय में पढ़े. जिससे कि उसे एक बेहतर काम मिल सके और उसका जीवनयापन बेहतर तरीके से हो सके.
बाजारवाद के इस दौर में व्यक्ति को एक मशीन की तरह प्रयोग किया जा रहा है, और व्यक्ति की विवशता यह है कि वह न चाहते हुए भी इसके लिए खुद को प्रस्तुत कर रहा है. बाजारवाद व्यक्ति को भविष्य का एक सुनहरा सपना दिखाता है और हर व्यक्ति से यह अपेक्षा करता है कि वह उसके मत से सहमत होते हुए खुद को उसके साथ चलने के लिए सहमत कर ले, अगर कोई सहमत नहीं है तो उसे बाजारवाद विवशता से अपनी और मोड़ने की कोशिश करता है. ऐसे में सबसे पहले जिस पहलू पर वह मार देता है वह है, मनुष्य की भाषा और उसका रहन-सहन. मनुष्य में जब यह परिवर्तन हो जाते हैं तो वह सहज ही बाजारवाद के हाथों की कठपुतली बन जाता है. इसका सबसे बड़ा असर मनुष्य की बोली और स्थानीयता पर होता है. बाजारवाद बोली, स्थानीयता और परम्परा को पिछड़े होने की निशानी मानता है, जब व्यक्ति को यह बोध हो जाता है कि अपनी बोली-स्थानीयता और अपनी परम्पराओं का पालन करना पिछड़े होने की निशानी है तो वह जल्द से जल्द इनका त्याग करने की कोशिश करता है. जैसे ही व्यक्ति इस और आकृष्ट होता है तो वह अपनी बोली-वेशभूषा-रहन सहन आदि का त्याग करते हुए आधुनिक होने का सपना देखता है. लेकिन सच तो यह है कि व्यक्ति की आधुनिकता उसके पहरावे और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने में नहीं है, वह उसके विचारों से झलकनी चाहिए.
आज जहाँ पूरी शिक्षा व्यवस्था बाजारवाद के हाथों संचालित हो रही है तो ऐसे में हम कैसे यह तय करें कि हम अपने बच्चे को किस भाषा माध्यम से शिक्षा दें कि वह एक बेहतर सृजक बन सके, एक अच्छा विचारक बन सके. उसके जहन में मौलिक चिन्तन का बीज बोने के लिए जरुरी है कि उसे हम उस भाषा से जोड़ें जो आगे चलकर उसे अभिव्यक्ति और चिन्तन के बेहतर अवसर उपलब्ध करवा सके. इन सब पहलूओं को जब हम ध्यान में रखते है तो हम पाते हैं कि व्यक्ति जिस परिवेश में अपने जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में रहता है, वह उसी हिसाब से अपनी अभिव्यक्ति के विषय और क्षेत्र को चुनता है. इसलिए जरुरी है कि हम भावी पीढ़ियों को ऐसा वातावरण प्रदान कर सकें जिससे वह अपनी प्राकृतिक क्षमताओं का बेहतर से बेहतर प्रयोग कर सके और इसके लिए जरुरी है अपने आसपास एक सकारात्मक वातावरण तैयार करें. जिससे इस देश में पलने वाला हर एक बच्चा जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके. वह देश और दुनिया को कुछ बेहतर देन देते हुए अपने जीवन के सफर को तय कर सके. हम भी यह कोशिश करें कि हम अपने बच्चों को भाषा और बोली के प्रति सजग करते हुए उन्हें अपनी सभ्यता-संस्कृति से जोड़ते हुए आगे बढ़ें.

11 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...3

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे.....मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में अपने परिवेश से शब्दों के उच्चारण सीखता है. अधिकतर यह देखा गया है कि बच्चा सबसे पहले ‘माँ’ शब्द का ही उच्चारण करता है. फिर धीरे-धीरे वह अपनी जरुरत और सुविधा के हिसाब से शब्दों को सीखता है और उनका प्रयोग करता है. अगर हम बच्चों के शब्द भण्डार का अध्ययन करें तो हमें यह बात भी मालूम होगी कि बच्चों के पास प्रारम्भिक समय में सिर्फ वही शब्द होते हैं जो उनके भाव को अभिव्यक्त करने में सहायक होते हैं. यह भी एक तथ्य है कि उसके आसपास अन्य व्यक्तियों द्वारा जैसे शब्दों का उच्चारण अधिक होता है, वह भी वैसे ही शब्दों को बोलना शुरू करता है. जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बीतती जाती है, शब्द और शब्दों से सम्बन्धित अर्थ उसे ज्ञात होते जाते हैं. मनुष्य की भाषा सीखने की प्रारम्भिक प्रक्रिया बड़ी रोचक है. प्रारम्भ में जहाँ मनुष्य सिर्फ शब्दों का उच्चारण करता है, वहीं समय के साथ-साथ वह शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को जानते हुए शब्द का प्रयोग करता है. व्यगोत्स्की ने इस तथ्य की और ध्यान दिलाते हुए लिखा है कि ‘बचपन में सम्प्रेषण और बोधन के विकास के अध्ययन इस निष्कर्ष की और ले जाते हैं कि वास्तविक सम्प्रेष्ण को अर्थ की आवश्यकता होती है, अर्थ अर्थात सामान्यीकरण सम्प्रेषण की वैसी ही अपरिहार्यता है जैसी कि संकेत’. व्यगोत्स्की के इस मत से स्पष्ट होता है कि बच्चे जिस शब्द को सीखते हैं उसमें निहित अर्थ की समझ विकसित होने पर वह उस शब्द के प्रति ज्यादा सजग हो जाते हैं. जैसे-जैसे उन्हें शब्दों के वास्तविक अर्थ का बोध होता है वैसे-वैसे वह शब्दों को ग्रहण करते जाते हैं. इसके साथ ही जिन शब्दों से उन्हें उनके भाव का बोध होता है वह उन शब्दों के प्रयोग के प्रति सहज होते जाते हैं. इस तरह से मनुष्य की भाषा सीखने की प्रक्रिया शुरू होती है और वह ताउम्र भाषा से जुडा रहता है.
भाषा सीखने और उसके प्रयोग में मनुष्य की सोच बहुत मायने रखती है. यह अध्ययन बड़ा ही रोचक होगा कि एक बच्चा जब किसी शब्द को सीखता है तो वह उस शब्द को सीखते तथा उच्चारित करते वक़्त किस तरह की प्रक्रिया से गुजरता है. हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुएं भी शब्दों के माध्यम से ही हमें परिचित होती हैं. हालाँकि वह वस्तुएं हमें दृष्टव्य होती हैं, लेकिन हम उन वस्तुओं के चित्र को अपने जहन में तब ही महसूस कर पाते हैं जब शब्द के माध्यम से हमें उनका बोध होता है. संभवतः बोली और भाषा के बीच में हम बोध को अगर महत्वपूर्ण पहलू माने तो हमें भाषा और बोली के महत्व को समझने में भी आसानी होगी. बोली हमारे भाव के बहुत करीब होती है, लेकिन भाषा भाव से कहीं दूर. इसलिए कोई भी व्यक्ति जब बोली में अपने भाव को अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है तो वह सहजता से हर भाव को अभिव्यक्त करता है. लेकिन भाषा के माध्यम से वह अभिव्यक्ति की उस ऊंचाई कोई नहीं छू पाता.
बोली मनुष्य की अभिव्यक्ति का आधार है. दुनिया में हुए अधिकतर शोध इस तथ्य की और संकेत करते हैं कि मनुष्य की सोचने की प्रक्रिया उस भाषा के माध्यम से नियन्त्रित होती हैं जिसे मनुष्य अपने बचपन में सीखता है. इस सन्दर्भ में इतालबी लेखक लुइगी मैंगलो का कथन दृष्टव्य है. वह लिखते हैं कि ‘मानव व्यक्तित्व में दो परतें होती हैं, उपरी वाली परत बाह्य घावों के समान होती है. इतालवी, फ्रेंच और लैटिन शब्द, इसके नीचे वाली परत आंतरिक, ऐसे घावों के समान होती है जो भरने पर अपने निशान छोड़ जाते हैं. यह हैं बोलियों के शब्द. जब हम इन निशानों को छूते हैं तो एक दृश्यमान शृंखलात्मक प्रतिक्रया प्रारम्भ होती है. इसे उन लोगों को समझाना बहुत मुश्किल है जिनकी कोई बोली नहीं होती. यह एक समझे हुए तथ्य का कभी नष्ट न होने वाला केन्द्र है. यह इन्द्रियों के तन्तुओं से जुड़ा होता है. बोली का शब्द हमेशा यथार्थ पर टिका होता है, क्योंकि यह दोनों एक ही होते हैं. इन्हें कारण देने से पहले ही हम पहचान लेते हैं. यह कभी गायब नहीं होते चाहे इन्हें हमें दूसरी भाषा में भी कारण या तर्क क्यों न सिखा दिया जाए. इससे स्पष्ट होता है कि बोली का आधार मानवीय भाव की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बोली ताउम्र मनुष्य की अभिव्यक्ति का आधार रहती है, जबकि भाषा के सन्दर्भ में यह तथ्य सटीक नहीं बैठता है. मैंगलो के कथन से एक और बात भी स्पष्ट होती है कि बोली के शब्द और अर्थ यथार्थ के धरातल पर आधारित होते हैं, जबकि भाषा में अधिकतर शब्द हमें अवास्तविक सत्ता का बोध करवाते हैं.
भाषा और बोली के सम्बन्धों को समझते हुए हमें एक और बात भी स्पष्ट हुई कि बोली का आधार अनुभव और बोध के वास्तविक धरातल पर अवस्थित है, क्योंकि बोली का सम्बन्ध मनुष्य की सोच और अनुभव से जुडा है. जबकि भाषा को हम सीखते हैं, अगर बहुत देर तक हम किसी भाषा का प्रयोग नहीं करते तो हम उसके शब्द और शब्दों से सम्बन्धित अर्थों को भूलते जाते हैं. इसलिए मनुष्य को बोली प्रकृति प्रदत्त वरदान है, और वही उसकी अभिव्यक्ति का आधार भी है. अब यहाँ यह भी प्रश्न उठता है कि जब बोली मनुष्य के अनुभव और बोध के बिलकुल करीब होती है तो फिर भाषा की क्या आवश्यकता है? यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है. दूसरा यह भी कि जब संसार में मनुष्य को भाव की अभिव्यक्ति के लिए बोली की ही आवश्यकता है तो फिर भाषा को सीखने की क्या जरुरत है? हमें बोली और भाषा के सम्बन्धों पर भी विचार कर लेना चाहिए. सामान्यतः भाषा-विज्ञान और व्याकरण में हमें यह समझाया जाता है कि जिसके माध्यम से साहित्य रचा जाता है उसे हम भाषा कहते हैं. लेकिन जब हम गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि साहित्य की जिनती भी विधाएं और प्रकार शिष्ट साहित्य में उपलब्ध होते हैं, उससे अधिक और विविध प्रकार बोली में भी देखने को मिलते हैं, और वह हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए हैं. उन्हें सहजने के लिए न तो किसी लेखक की जरुरत है और न ही किसी प्रकार के खास प्रयत्न की. बोली में रचित साहित्य पीढ़ी दर पीढ़ी अपना अस्तित्व कायम किये हुए है. यह हुआ इस ही कारण है कि बोली में जो कुछ भी रचा गया है वह हमारे भाव और संवेदना के सबसे ज्यादा निकट है. इसलिए लोक में भाषा के बजाय बोली को ज्यादा तरजीह दी जाती है. शेष अगले अंक में...!!

06 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...2

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे...भावों की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीव जन्तु भी कुछ ध्वनि संकेतों का प्रयोग करते हैं. हालाँकि हम उनके ध्वनि संकेतों को समझ नहीं पाते, लेकिन सामान्य व्यवहार में देखा गया है कि वह ऐसा करते हैं. जीवन की हर स्थिति में वह भी अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. जो पशु-पक्षी-जन्तु मनुष्य के साथ-साथ जीवन जीते हैं, उनके हाव-भाव से तो यही प्रतीत होता है कि वह भी भावों की अभिव्यक्ति के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं. जैसे कभी आप प्रयोग करके देखें कि गाय ने जब किसी बच्चे को जन्म दिया हो, उसके बच्चे को जब कोई हानि पहुंचाने की कोशिश करता है या जब कोई उसे उससे दूर करने की कोशिश करता है तो वह इस तरह का व्यवहार करती है कि हमें उसकी सम्वेदना और बच्चे के प्रति उसका प्यार समझ आता है. कई बार हम जंगलों में भी देखते हैं कि अगर किसी जन्तु को कोई तकलीफ होती है तो उस क्षेत्र में रहने वाले सभी जीव-जन्तु वहां इकठ्ठा हो जाते हैं, कई बार तो दृश्य इतना सुखद और सम्वेदनात्मक होता है कि जो जीव किसी दूसरे के आहार का आधार है, उसे तकलीफ की स्थिति में वह भी हानि नहीं पहुंचाते. ऐसे दृश्य देखने के बाद कई बार मनुष्य के व्यवहार के विषय में सोचना पड़ जाता है कि किसी विकट स्थिति में कई बार मनुष्य दूसरे मनुष्य का गलत फायदा उठाने की कोशिश करता है. लेकिन ऐसी स्थिति में पशु ऐसा कम ही करते देखे गए हैं. कुल मिलाकर यही समझने का प्रयास में कर रहा हूँ कि प्रकृति में विचरण करने वाले अधिकतर चेतन जीव अपना भावों को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं, मनुष्य भी उनमें से एक है.
मनुष्य के व्यवहार और भाव अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में अगर हम भाषा का अध्ययन करने का प्रयास करते हैं तो एक रोचक सा संसार हमारे सामने उपस्थित हो जाता है. मनुष्य की भाषा और अभिव्यक्ति का प्रभाव उसके पूरे जीवन पर देखा जा सकता है. मैं कई बार सोचता हूँ कि मनुष्य के पास अगर भाषा नहीं होती तो मनुष्य की स्थिति क्या होती? भाषा विहीन मनुष्य क्या वह सब कुछ हासिल कर लेता, जो वह आज तक करता आया है या जो वह आज कर रहा है. संभवतः वह ऐसा नहीं कर पाता. क्योँकि मनुष्य ने किसी भी क्षेत्र में जो कुछ हासिल किया है उसका आधार भाषा रही है. भाषा के बिना मनुष्य की प्रगति सम्भव नहीं होती. इसलिए भाषा मात्र भावों की अभिव्यक्ति के लिए ही जरुरी नहीं है, भाषा का उद्देश्य व्यापक है. इस संसार में भाषा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. मनुष्य के महान अविष्कारों में भाषा का आविष्कार एक महान आविष्कार कहा जाना चाहिए और भाषा को सदा-सदा के लिए सुरक्षित और जन-मन तक पहुंचाने के लिए किया गया लिपि का आविष्कार भी कोई महत्वपूर्ण नहीं है. समग्र रूप से हम यह कह सकते हैं कि भाषा और लिपि का आविष्कार इस संसार में अब तक हुए अविष्कारों में सबसे महत्वपूर्ण हैं, अगर यह आविष्कार नहीं होते तो शायद जितने भी आविष्कार आज तक हमें किये हैं, उनका कोई भी बजूद नहीं होता.
भाषा और लिपि का आविष्कार मनुष्य की चिरंतन सोच का नतीजा है. लेकिन हम यह भी देखते हैं कि इस संसार में भाषाएँ अधिक हैं और लिपियाँ कम. यह एक अलग बहस का बिन्दु हो सकता है. लेकिन हम यहाँ इस तथ्य को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते कि लिपि के आविष्कार से पहले मनुष्य ने भाषा का आविष्कार किया है. आज भी हम दुनिया में यह देख सकते हैं कि कई भाषाएँ ऐसी हैं जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं, लेकिन उस भाषा में लिखित कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. जो ध्वनि संकेत पीढ़ी दर पीढ़ी किसी समुदाय, जाति और क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच में प्रचलित रहे हैं, वह उनकी भावाभिव्यक्ति का आधार हैं. सामान्य स्थिति में हम उसे बोली कहते हैं.
बोली के विषय में व्याकरण और भाषा विज्ञान में कुछ परिभाषाएं पढने को मिल जाती हैं. लेकिन इन परिभाषाओं का उपयोग हम भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग में करते हैं. भाषा वैज्ञानिकों और वैयाकरणों ने भाषा और बोली के अन्तर पर विचार करने की कोशिश की है. लेकिन यहाँ हम यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य अपनी भावाभिव्यक्ति और संवाद के लिए जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग करता है वह उसके लिए कितना महत्वपूर्ण हैं. हम देखते हैं कि मनुष्य जन्म लेने के साथ ही जिन ध्वनि संकेतों के माध्यम से अपने भावों को दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, उसे हम मातृभाषा कहते हैं. दुनिया के तमाम मनुष्य सबसे पहले माँ से सीखी हुई या ग्रहण की हुई भाषा में ही अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. इससे के बात और भी समझ आती है कि मनुष्य जन्म से भाषा विहीन होता है, लेकिन धरती पर जन्म लेने के बाद वह जिस परिवेश में पलता है वह वहां की भाषा सीख करके उसके माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है. इसलिए दुनिया भर में किये गए शोध से यह बात भी सामने आई है कि मनुष्य जिस भाषा को अपनी माँ से सीखता है वह ताउम्र उसी भाषा में सोचता है, बेशक वह भाव को किसी और भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है, लेकिन सोच के स्तर पर वह उसी भाषा या बोली में सोचता है जो उसने अपनी माँ से सीखी हो, जिस हम मातृभाषा की संज्ञा से अभिहित करते हैं. 
मातृभाषा को सामान्य शब्दों में माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में परिभाषित किया जा सकता है. ऐसे ध्वनि संकेत जिन्हें हम माँ से सीखते हैं, उन्हें मातृभाषा की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है. एक नवजात अपने घर-परिवार से ही भाषा की प्रथम शिक्षा पाता है. लेकिन भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग के प्रारम्भिक बिन्दु क्या हैं? यह जानना बड़ा रोचक है. दुनिया के तमाम देशों के मनुष्य अपने भावों की अभिव्यक्ति भाषा या बोली के माध्यम से करते हैं. जहाँ तक बोली का विषय है उसे हम मातृभाषा भी कह सकते हैं. मातृभाषा को हमें माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में प्रयोग करना चाहिए, कुछ लोग मातृभाषा शब्द को किसी देश विशेष की भाषा के सन्दर्भ में भी प्रयोग करते हैं. लेकिन मैं जहाँ तक समझता हूँ कि इस शब्द का बेहतर प्रयोग माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में ही किया जाना चाहिए, जिस सामान्य तौर पर हम बोली कहते हैं. बोली और भाषा में बुनियादी तो नहीं लेकिन व्यवहारिक अन्तर जरुर हैं. उनके विषय में किसी और रूप में भी चर्चा की जा सकती है. लेकिन यहाँ सरसरी और कुछ हद तक व्यवहारिक समझ के लिए हमें यह समझना जरुरी है कि भाषा शिक्षण ज्यादा जरुरी है या भाषा प्रयोग. लेकिन जहाँ तक अनुभव रहा है मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में बोली को सीखता है. शेष बिन्दु अगले अंक में...!!

01 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...1

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इस ब्रह्माण्ड को जब हम समझने का प्रयास करते हैं तो हम यह पाते हैं कि इसकी गति निश्चित है. जितनी भी जड़ और चेतन प्रकृति है वह अपनी समय और सीमा के अनुसार कार्य कर रही है. विज्ञान ने अब तक जितना भी इस ब्रह्माण्ड के विषय में जाना है उससे तो यही सिद्ध होता है कि इस ब्रह्माण्ड का आधार विज्ञान है. जिनती भी जड़ और चेतन सत्ता है वह सब नियम से बंधी हुई है, और उसी नियम के अनुरूप वह कार्य कर रही है. अगर कहीं पर थोड़ी सी भी असंतुलन की स्थिति पैदा होती है तो प्रकृति उसे संतुलित करने का प्रयास करती है, और कई बार प्रकृति का यह प्रयास किसी के लिए नुकसानजनक होता है तो कई बार यह किसी के लिए लाभदायक हो जाता है. लेकिन बहुत गहराई में जाकर देखते हैं तो इस प्रकृति की उत्पति से लेकर आज तक यह नियमों में बंधी हुई प्रतीत होती है, वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं ने जो मत और निष्कर्ष हमारे सामने रखे हैं उससे भी यही प्रतीत होता है कि यह सृष्टि एक ख़ास नियम के तहत निर्मित हुई है और समय के साथ-साथ इसमें बदलाव हुए हैं और यह बदलाव निरन्तर जारी हैं. लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा कि इस सृष्टि का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है. लेकिन कब? इसके विषय में कोई अनुमान नहीं लगा सकता.
इस पूरी जड़ और चेतन सत्ता के बीच में अनेक जीव-जन्तु हैं, वनस्पतियां हैं. लेकिन मनुष्य का जहाँ तक प्रश्न है वह भी इसी प्रकृति का एक हिस्सा है. इस धरा पर रहने वाले अधिकतर जीव सुख और दुःख की अभिव्यक्ति लगभग एक से तरीके से करते हैं. हमारे देश में तो यह भी मान्यता रही है कि निद्रा-भोजन-भोग और भय की अभिव्यक्ति पशु और पुरुष में समान रूप से होती है. जीव-जन्तुओं के रहन-सहन और व्यवहार से कई बार यह प्रतीत होता है कि वह भी एक ख़ास मकसद से क्रिया-प्रतिक्रया करते हैं. इसलिए जितना भी उपलब्ध ज्ञान मनुष्य के पास है वह उस आधार पर इस तथ्य को उद्घाटित करने का प्रयास करता है कि मनुष्य के आसपास रहने वाले जीव-जन्तु और वनस्पति भी अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं, और वह भी अपने सुख-दुःख, हर्ष-शोक को उसी तरह अभिव्यक्ति करते हैं जैसे कि मनुष्य करता है. वह भी साथ रहना पसंद करते है, उन्हें भी अपने को नुकसान पहुँचाने वाले से डर लगता है, वह भी उससे बचने का प्रयास करते हैं. उनके लिए भी जीवन का मोल है. ऐसे बहुत से तत्व और पहलू हैं जो इस धरा के प्राणियों में समान रूप से पाए जाते हैं, फिर भी मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो इन सबसे श्रेष्ठ है. लेकिन इतना तो मनुष्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि वह भी इस प्रकृति का हिस्सा है, वह भी इस प्रक्रति की ही उपज है और उस पर भी प्रकृति के सभी नियम समान रूप से लागू होते हैं और उन नियमों का पालन करना मनुष्य का कर्तव्य है, वर्ना प्रकृति उसे कई बार अवहेलना का दंड दे देती है और यह कई बार हुआ भी है.
हम थोड़ी सी कल्पना इस सृष्टि के प्रारम्भ के विषय में करें, जब यह संसार उत्पन्न हुआ होगा! कैसी अवस्था रही होगी उस समय की? यह जानना बड़ा रोचक है. लेकिन बहुत सी जानकारियां होने के बाबजूद भी कोई अन्तिम प्रमाण और तथ्य हम प्रस्तुत नहीं कर सकते, लेकिन फिर भी कुछ सिद्धान्तों और स्थापनाओं को समझते हुए सृष्टि की उत्पत्ति और उसकी गति के विषय में जाना जा सकता है और ऐसा प्रयास चिरकाल से होता भी रहा है. आज भी प्रकृति के रहस्यों को जानने के प्रयास निरन्तर जारी है. इन सब प्रयासों के विषय में हमें जिस माध्यम से जानकारी मिलती है उसे हम ‘साहित्य’ कहते हैं. साहित्य जिस माध्यम से हमारे पास उपलब्ध होता है उसे हम ‘भाषा’ कहते हैं, और भाषा का पठन-पाठन जिस माध्यम से किया जाता है उसे ‘लिपि’ कहा जाता है. लेकिन ऐसा भी हम देखते हैं कि मनुष्य जब पैदा होता है तो वह अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा का सहारा लेता है.
किसी नवजात को जब हम देखते हैं तो वह भी अपने मनोभावों को अभिव्यक्ति देता है, वह सबसे पहले रोता है जब उसके पास शब्द नहीं होते, धीरे-धीरे वह शब्दों के माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्त करता है. मनुष्य की भाषा और उसके सीखने की प्रक्रिया पर भी बहुत अनुसंधान हुए हैं, और इस दिशा में निरन्तर प्रयास जारी हैं कि आखिर एक बच्चा भाषा को किस तरह से सीखता है और उसके सीखने की प्रक्रिया क्या है? मैं यहाँ उन सिद्धान्तों की चर्चा करने के बजाय कुछ मौलिक और अनुभवजन्य बातों को आपसे साझा करने का प्रयास करूँगा. वैसे यह भी कितना रोचक विषय है कि एक बच्चा जिस परिवेश में पलता है वह उसी तरह की भाषा बोलता है. भाषा-विज्ञान और व्याकरण की दृष्टि में भाषा की कुछ परिभाषाएं तय की गयी है, उसके अनुसार एक बच्चा अपने भावों की अभिव्यक्ति के लिए जिस भाषा को अपनी माँ से सीखता है उसे ‘बोली’ कहा जाता है. पूरे संसार में यह बात देखने को मिलती है कि जो व्यक्ति जिस परिवेश में पैदा होता है वह उसी परिवेश की ‘बोली’ को अपने भावों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग करता है. यहाँ यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा कि भाषा-भाव-सम्वेदना और विचार का एक दूसरे के साथ क्या सम्बन्ध है और यह किस तरह से अभिव्यक्त होते हैं.
शब्द और भाव की स्थिति क्या है? मनुष्य किस तरह से इनका प्रयोग करता है? भाषा किस तरह से मनुष्य और मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है? मनुष्य की सोच और भाषा का क्या सम्बन्ध है? क्या मनुष्य जो सोचता है, वही अभिव्यक्त करता है? मानवीय व्यवहार के ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिन पर भाषा के दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है. हमें इस पहलू पर भी विचार करना होगा कि अगर मनुष्य भाषा-विहीन होता तो वह क्या करता? या ऐसे भी सोचा जा सकता है कि भाषा-विहीन मनुष्य का व्यवहार कैसा होगा. भाषा और मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन का पहलू बड़ा रोचक है. लेकिन यह सैद्धांतिक विमर्श की मांग करता है. मैं यहाँ सिर्फ दो-तीन बिन्दुओं पर विचार के अभिव्यक्त करने की कोशिश करूँगा, और उसमें मुख्य बिन्दु यही है कि अभिव्यक्ति किस भाषा में बेहतर हो सकती है. सीखी हुई भाषा में या जिसे हमें सहज में सीखा है. बाकी बिन्दु अगले अंक में...!!!

07 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...2

3 टिप्‍पणियां:
यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है वह तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है, चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. गतांक से आगे....!!!!  

भाषा सीखना और उसे प्रयोग करना यह दोनों अलग-अलग बातें हैं. जरुरी नहीं कि हम कोई भाषा सीखें और उसका प्रयोग करें, क्योँकि संवाद का सीधा सा नियम है कि जब हम किसी से किसी भी भाषा में बात करें तो सामने वाले को भी वह भाव समझ आना चाहिए, भाव को समझने के लिए भाषा की जानकारी जरुरी है, और भाषा की जानकारी के लिए शब्दों की समझ होनी जरुरी है, शब्द को समझने के लिए उसके अर्थ के विषय में जानकरी होनी चाहिए. यह नियम वाचक और श्रोता दोनों के लिए लागू होता है. तब कहीं हम कह सकते हैं कि एक सार्थक संवाद हुआ, वर्ना अगर हम समझ में न आने वाली भाषा में अपनी भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्त करते रहें तो वैसी भाषा की कोई सार्थकता नहीं है. भाषा तो वही सार्थक है जो आम जन की समझ में आ जाये और इसके साथ-साथ विचार भी वही सार्थक है जो अपने हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्त किया गया हो, या ऐसा भी कह सकते हैं जिसमें व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि का भाव निहीत हो. वर्ना भाषा का एक पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि हम आम जन की समझ में आने वाली भाषा में बहुत निकृष्ट और दोयम दर्जे के विचार अभिव्यक्त करें तो भी भाषा की कोई सार्थकता नहीं होगी. 

एक दृष्टि से अगर हम देखें तो ऐसा भी कह सकते हैं कि व्यक्ति का व्यवहार भाषा का आधार है, और इसी बात का
दूसरा पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि भाषा व्यक्ति के व्यवहार की परिचायक है. मैं दूसरे पक्ष से ज्यादा इतेफाक रखता हूँ. क्योँकि भाषा पर व्यक्ति के व्यवहार का किसी हद तक कोई फर्क नहीं पड़ता, हां एक स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भाषा को प्रभावित कर सकता है, जहाँ पर सामूहिक रूप से शब्दों का प्रयोग उनके वास्तविक सन्दर्भों की अपेक्षा किन्हीं अन्य सन्दर्भों के लिए किया जाय. लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों में घटित होती है और निश्चित रूप से इसका प्रभाव भाषा पर पड़ता है. एक दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि जब कोई सामाजिक रूप से प्रसिद्ध व्यक्ति किसी विशेष ‘शब्द’ का प्रयोग उसके विशेष अर्थ के सन्दर्भ में न करके किसी और सन्दर्भ में करता है तो भी व्यक्ति का उस शब्द के प्रति किये गए व्यव्हार का प्रभाव भाषा पर पड़ता है. लेकिन यह सब कुछ छुट-पुट रूप से घटित होता है, और ऐसी स्थिति भी वर्षों में एक-आध बार आती है और किसी विशेष शब्द आदि के लिए. वर्ना भाषा के विषय में तो कहा जाता है कि यह बहता नीर है इसलिए इसे हम किसी ख़ास सांचे में बाँध कर नहीं रख सकते, और यह भाषा के विकास की दृष्टि से संभव भी नहीं है. जो भाषा जितनी समृद्ध होती है उसमें अनेक भाषाओँ के शब्दों को समेटने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है. इसी तरह जो व्यक्ति भाषा के व्यवहार के प्रति सजग होता है वह भी अपने प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा के लिए उतना ही लचीला रवैया अपनाता है और भाषा को अपने व्यवहार और व्यक्तित्व का अंग मानते हुए उसके विकास में सहायक बनता है.  

अगर हम यह मानकर चलते हैं कि किसी भाषा के प्रयोग करने वालों के कारण उस भाषा का स्वरूप निर्धारित होता है तो हमें इस बात की भी समझ होनी चाहिए कि उन्हीं प्रयोग करने वालों पर ही भाषा का सारा कार्य-व्यापार निर्भर करता है.  ऐसी स्थिति में हम यह भी कह सकते हैं भाषा ही व्यक्तित्व है और व्यक्तित्व ही भाषा. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भाषा और लिपि कोई एक हो सकती है, लेकिन जब हम उसके प्रयोक्ता पर ध्यान देते हैं तो हमें भाषा के अलग–अलग रुप नजर आते हैं. जब हम किसी अध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं और उससे संवाद करते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, किसी राजनितिक व्यक्ति से मुलाकात में हमारी शब्द और हाव-भाव अलग होते हैं. किसी सामाजिक समारोह में जब हम मिलते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, इसी तरह से हम किसी अपराधी के लिए अलग शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, संत के अलग, साहित्य से जुड़े व्यक्ति के लिए, समाज सेवक के लिए अलग. इस तरह से जितने प्रकार के व्यक्तित्व हमारे सामने से गुजरते हैं उनके लिए हम वैसे ही शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि भाषा का व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है. जब हम व्यक्तित्व के अनुकूल शब्दों का प्रयोग करते हैं तो भाषा की खूबसूरती और भी बढ़ जाती हैं, शब्द भाषा को एक नया आयाम देते हैं और जो व्यक्ति-व्यक्तित्व के अनुकूल भाषा का प्रयोग करने में सक्षम होता है, वह सबसे ज्यादा प्रिय भी होता है और दूसरी तरफ अपने व्यक्तित्व के अनुसार शब्दों का प्रयोग जो भी व्यक्ति करता है वह उसके व्यक्तित्व को और अधिक प्रिय बनाता है. शब्दों के प्रयोग के प्रति अगर हम सजग हैं तो हमारे सामाजिक सम्बन्ध कभी भी नहीं बिगड़ सकते, सामाजिक ही नहीं किसी भी प्रकार के सम्बन्धों को बनाये रखने का मुख्य आधार शब्द ही हैं. हमारा व्यक्तित्व, हमरा व्यवहार सब कुछ शब्दों के माध्यम से निर्धारित होता है और यह जीवन की एक महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि आधारभूत कड़ी है. 

आज की परिस्थितियों पर अगर हम दृष्टिपात करते हैं तो यह बात हम समझ सकते हैं कि आज शब्दों के प्रति हम लापरवाह हो गए हैं. हालाँकि सूचना तकनीक के आने से व्यक्ति के संवाद की संभावनाओं में अकल्पनीय उन्नति हुई है. लेकिन जितनी यह उन्नति हुई है उतना ही हमारा शब्दों के प्रति नजरिया बदला है. आज का दौर सोशल नेटवर्किंग का दौर है. ऐसी स्थिति में हमें अपनी भाषा और शब्दों के प्रति सजगता को अपनाने की ज्यादा आवश्यकता है. लेकिन कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि उन्हें कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं इसलिए वह किसी भी प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं, लेकिन अगर वह दूसरे दृष्टिकोण से देखते तो यह भी सोच सकते थे कि इन शब्दों के माध्यम से ही उनके व्यक्तित्व का परिक्षण होगा तो निश्चित रूप से वह कभी भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते, कम से कम गाली जैसे शब्दों का तो नहीं. किसी भी विषय के लिए हमें अपने विरोध और असहमति को प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन उस असहमति को हम अगर भद्दे शब्दों के माध्यम से जताएंगे तो संभवतः कोई लाभ होने वाला नहीं है और दूसरी तरफ हमारा व्यक्तित्व भी धूमिल हो रहा है. यह वही शब्द हैं जिनके माध्यम से हम प्रभावशाली और प्रभावहीन दोनों बन सकते हैं.    

04 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...1

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अपने आस-पास ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में नजर दौड़ाकर देखता हूँ तो सम्पूर्ण क्रियाएं मुझे शब्दों की ही अभिव्यक्ति लगती हैं. लेकिन इससे और आगे बढ़ते हुए देखता हूँ तो सब कुछ मुझे ‘शब्द’ ही नजर आता है. कहीं गहरे में उतरकर देखता हूँ तो मुझे वह अवधारणा साकार होती हुई नजर आती है कि ‘शब्द ही ब्रह्म है’. जिस तरह से ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह प्रकृति के विभिन्न रूपों के माध्यम से अपने बजूद का अहसास करवाता है, उसी प्रकार शब्द भी सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह भी विभिन्न क्रियाओं के घटित होने पर अपने बजूद का अहसास करवाता है. इससे यह बात जाहिर होती है कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति भी शब्द के माध्यम से होती है. शब्द बेशक अक्षरों से बने होते हैं, अक्षर के मूल में ध्वनि निहीत रहती है. किसी हद तक भाषा, ध्वनि, अक्षर और उसके स्वरूप के विषय में विचार करना व्याकरणिक और भाषा वैज्ञानिक चिन्तन का हिस्सा है. लेकिन यह पक्ष किसी हद तक भाषा के बाह्य स्वरूप से सम्बन्ध रखते हैं. भाषा का मुख्य कार्य तो भावनाओं की अभिव्यक्ति करना है, विचारों को किसी दूसरे तक संप्रेषित करना है और यह भाषा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि भाषा का जन्म ही इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है. जहाँ तक व्याकरण और भाषा विज्ञान का सम्बन्ध है, यह भाषा को व्यवस्थित करने और उसके प्रयोग के कुछ नियमों का पालन करना हमें सिखाते हैं, और जहाँ तक साहित्य का सम्बन्ध है, यह भाषा को स्थाई और मानक रूप देने के साथ-साथ भाषा की समृद्धि, उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि के साथ-साथ आम जन में उसके प्रयोग के लिए सहायक होता है. साहित्य भाषा के विकास के विभिन्न पड़ावों की जानकारी के साथ-साथ किसी विशेष काल में चिन्तन और मनन के विषयों की जानकारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में भी सहायक है. 

भाषा का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ साहित्य की रचना में ही योगदान देना नहीं है, या साहित्य का मुख्य उद्देश्य भी भाषा को सुरक्षित करना नहीं है. साहित्य और भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ समाज और संस्कृति से भी गहरे से जुडा हुआ है. हालाँकि जब हम भाषा और साहित्य के सम्बन्धों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि इन दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. लेकिन किसी और दृष्टि से विचार करें तो ऐसा लगता है कि यह दोनों अपना अलग-अलग मकसद और अलग बजूद भी रखते हैं और इन दोनों की पूर्ति अनेक माध्यमों से होती भी रहती है. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, वह सब चीजों का मूल आधार है. भाषा के बिना हम किसी भी चीज की कल्पना नहीं कर सकते. मनुष्य के आज तक के सब प्रकार के विकास में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, और मनुष्य के आज तक के अविष्कारों में भाषा सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार है. अगर भाषा नहीं होती तो दुनिया का स्वरूप कैसा होता? मनुष्य ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगत का स्वरूप और हाल कैसा होता? यह सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. हमारे लिए भाषा कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा हम कभी नहीं लगा सकते. लेकिन जब हम कहीं किसी विकट स्थिति का सामना करते हैं और वहां पर हम सब कुछ होते हुए भी भाषा हीन हो जाते हैं तो तब हमें पता चलता है कि जीवन में भाषा के मायने क्या हैं? भाषा हमारे जीवन के विकास और उसके विभिन्न आयामों का एक अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हम कभी भी भाषा की अनदेखी नहीं कर सकते, और हम हमेशा उसे अपनाए हुए अपने विकास क्रम को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं. 

मानव सदियों से अपने भावों, विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा का सहारा लेता आया है और आज तक वह उसी डगर पर चलते हुए अपने जीवन को चला रहा है. भाषा की महता सम्पूर्ण जगत के लिए आज से पहले, आज और आज के बाद भी बनी रहेगी. इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि जब तक इस जगत में जीव के जीवन और क्रिया के चिन्ह रहेंगे तब तक वह अपने आप को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश करता रहेगा और यह उसके लिए जरुरी भी है. क्योँकि अभिव्यक्ति के बिना उसकी कोई क्रिया संपन्न नहीं होती, और बिना क्रिया के उसका जीवन नहीं चलता. उसके जीवन को चलाने में जितनी महता क्रिया की है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भाषा है. आज जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं यह हमारे विकास के विभिन्न पडावों से अर्जित अनुभव और उपलब्धियों की व्यवस्था है. निश्चित रूप से इसमें भाषा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. भाषा के बिना हम अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि आज इस धरा पर मनुष्य के अनुभव कैसे रहे हैं और उन अनुभवों का क्या कुछ अभी तक निष्कर्ष निकल पाया है. मनुष्य और भाषा के सन्दर्भ में अगर विचार करें तो हम पाते हैं कि बिना भाषा के मनुष्य की कोई महता नहीं और उसके बजूद का कोई अता-पता नहीं. इसलिए जब भी हम इतिहास को देखने, समझने की कोशिश करते हैं तो यह सब क्रियाएं सिर्फ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती हैं. 

भाषा के अध्ययन और उसकी उपयोगिता के अनेक पक्ष हो सकते हैं. लेकिन भाषा का मुख्य कार्य व्यापार विचारों और भावनाओं का सम्प्रेष्ण है. इसका सीधा सा सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार से है. व्यक्ति अपने आप अभिव्यक्त नहीं होता, बल्कि वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है. उसकी भावनाएं, उसके विचार, उसकी सोच सब कुछ इन शब्दों के माध्यम से अभियक्ति पाता है. इसलिए कोई नवजात जब इस धरा पर जन्म लेता है तो सबसे पहले वह अभिव्यक्ति करना ही सीखता है. अपने भावों और अपनी जरूरतों को वह भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है. यह भी कितना अद्भुत है कि जिस माहौल और जिस भाषा के लोगों के बीच कोई नवजात जन्म लेता है तो वह वही भाषा बोलता है, और उसी के अनुरूप अपनी अभिव्यक्ति करता है. उस भाषा को हम उसकी मातृ भाषा कहते हैं और यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. शेष अगले अंकों में ....!!!!

08 फ़रवरी 2013

पुस्तकें और पाठक .. 1

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संवाद स्थापित करना प्राणी की अनिवार्य और महत्वपूर्ण आवश्यकता है. अगर हम यह कल्पना करें कि जब संवाद स्थापित करने के साधन नहीं थे तो जीवन कैसा रहा होगा ? संवाद करना सिर्फ मनुष्य की ही नहीं, प्राणी मात्र की आवश्यकता है. हर एक प्राणी अपने भाव को प्रकट करता है और उसे प्रकट करने के लिए वह किसी ख़ास शैली का प्रयोग करता है. संवाद प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से स्थापित किया जा सकता है. संवाद स्थापित करने के लिए लिखित, मौखिक और सांकेतिक विधियां मुख्य रूप से प्रयोग में लायी जाती रही हैं. हालाँकि इनकी कोई सीमा नहीं निर्धारित की जा सकती, लेकिन यह तीन विधियां प्रारंभ से प्रचलन में रही हैं और जीवन रहते तक इनकी महता बनी रहेगी. जहाँ पर हम प्रत्यक्ष संवाद करते हैं वहां हमारे सामने मौखिक विकल्प ज्यादा रहता है या फिर लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से हम संवाद स्थापित कर सकते हैं. लेकिन जहाँ हम लोगों के सामने जाकर अपनी बात नहीं रख पाते तो वहां हम लिखकर या संकेत रूप में अपने भावों को प्रकट करते हैं, और आधुनिक युग में तो हम संवाद स्थापित करने के लिए सुचना तकनीक के अनेक साधनों का प्रयोग करते हैं.
गर हम यह कहें कि जो कुछ भी हम देख रहे हैं उसमें संवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. मानव जीवन के इतिहास का एक नहीं बल्कि अनेक पहलू संवाद के बिना अधूरे हैं, इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि संवाद के बिना उनकी कल्पना करना बेमानी जैसा होगा. संवाद करने की इस उत्कट इच्छा ने मानव को भाषा दी, लिपि दी और फिर आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह एक तरह से संवाद स्थापित करने का ही हिस्सा है. सूचना तकनीक के साधनों का विकास भी एक पड़ाव है संवाद स्थापित करने के और इसने सब कुछ बदल दिया है. मनुष्य ने जब लिखित रूप से संवाद करने की कोशिश की तो फिर अनेक साधनों का विकास किया. एक तरफ उसने लिपि का अविष्कार अपनी भाषा को सुरक्षित करने के लिए किया तो दूसरी तरफ कागज़, कलम और स्याही का आविष्कार उसे सुरक्षित रूप प्रदान किया. अपने विचारों को सहेजने के लिए उसने फिर की शैलियों का प्रयोग किया और उन विचारों को जिस माध्यम से दुनिया तक पहुंचाया उसे हमने पुस्तक की संज्ञा से अभिहित किया. आज हम देखते हैं कि एक रचनाकार अपने भावों को, विचारों को पुस्तकों के माध्यम से दुनिया के कोने - कोने तक सहजता से पहुंचा सकता है, यही नहीं हम हजारों वर्षों पुराने दस्तावेजों के माध्यम से अपने अतीत को जान सकते हैं और यह भी बड़ा रोचक है कि भविष्य की योजनायें बनाने में भी कहीं न कहीं पुस्तकों की भूमिका महत्वपूर्ण है. यह आज भी है, कल भी थी और भविष्य में भी बनी रहेगी.
क पुस्तक जो हमारी नजरों के सामने से गुजरती है, आज जिस रूप में वह हमारे सामने है उसके विकास की कहानी बड़ी रोचक है और ना जाने उसके कितने पड़ाव हैं. यह भी हो सकता है कि उसके विकास के कुछ पडावों को हम विस्मृत कर गए हों. लेकिन एक पुस्तक विकास का सिर्फ एक आयाम लेकर ही हमारे सामने नहीं आती बल्कि अनेक आयामों का प्रकटीकरण वह अपने माध्यम से करती है. संवाद स्थापित करने के लिए भाषा, भाषा को सहेजने के लिए लिपि, लिपि को मानक रूप देने के लिए ध्वनि चिन्ह और उसे व्यवस्थित करने के लिए व्याकरण इसी प्रकार यह शृंखला आगे बढती जाती है. एक तरफ तो यह अगर दूसरी तरफ देखें तो भाषा को जिन  माध्यमों से सहेजा गया उनमें कहीं पर पत्थरों/ शिलाओं का योगदान रहा तो कहीं बांस का, फिर हमने भोजपत्रों, धातुपत्रों  पर लिखना शुरू किया आगे चलकर कागज़ का अविष्कार हुआ, हाथ से लिखने से लेकर बड़ी- बड़ी मशीनों माध्यम से यह काम होना आदि बहुत से आयाम हैं जो इस पुस्तक के इतिहास से जुड़े हैं. इस दिशा में हम निरंतर विकास कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. इन सब पर लिखने के लिए स्याही के रूप में अनेक द्रव्यों का प्रयोग आदि काल से होता रहा है . हालाँकि यह विषय एक स्वतन्त्र विश्लेषण की अपेक्षा रखता है और निकट भविष्य में इस पर भी आपसे अपने अनुभव सांझा करने का प्रयास रहेगा. 
क पुस्तक के पाठक तक पहुँचने के आयामों की कहानी बड़ी रोचक और गतिशील है और उस पुस्तक के माध्यम से व्यक्ति की जीवन में परिवर्तन बड़ा अद्भुत है. यह किसी चमत्कार से कम नहीं. यूं देखने में तो पुस्तक निर्जीव लगती है लेकिन अगर उसकी अंतरात्मा को हम समझ पाए तो वह हमारे लिए जीवन से कहीं बढ़कर है . पुस्तक की महता का कोई पैमाना शायद आज तक निश्चित नहीं हो पाया है कि वह कितनी महत्वपूर्ण है, लेकिन एक संकेत देता चलूँ कि आज जिन रचनाकारों के सामने हम नतमस्तक होते हैं उन चिंतन और व्यक्तित्व अगर किसी माध्यम से हमारे सामने आया है तो वह हैं 'पुस्तकें' ....!

29 अप्रैल 2012

'बाबा' मुझे 'निर्मल' कर दो .. 1

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भारतीय संस्कृति में "बाबा" शब्द एक अहम् स्थान रखता है. बाबा शब्द फ़ारसी भाषा का शब्द है और इस शब्द को साधू संतों के लिए आदरसूचक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है. बाबा शब्द जहन में आते ही एक ऐसे व्यक्ति का चित्र मानस पटल पर उभरता है जो तप और त्याग की मूर्ति होसाधनाअराधना और तपस्या के बल पर हासिल अध्यात्मिक शक्ति को जो जन कल्याण के लिए प्रयोग करता हो. उसके जीवन का प्रत्येक पल दीन और दुखियों की सेवा के लिए समर्पित होजिसका जीवन स्वयं में आदर्श हो उसके पास बैठने मात्र से ही सकून और शांति का अनुभव होऐसी बहुत सी बातें हैं जो "बाबा" शब्द के साथ जुडी हुई हैं और जब जिज्ञासु संसार की तपती हवाओं को सहन नहीं कर पाता है तो वह किसी ऐसे संत/ गुरु / बाबा  की तलाश में होता है  जो उसे सकून प्रदान करते हुएजीवन में मार्गदर्शन देते हुए उसके जीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा देसंसार में कर्म करते हुए किस तरह से निर्लिप्त भाव को अपनाया जा सकता है इसकी महता से उसे वाकिफ करवाएऔर ऐसे बाबा/संत या गुरु को पाकर जीव धन्य हो जाता है उसका जीवन लोगों के लिए अनुकरणीय होता जाता है. वह जीव भी स्वयं जीवन में सुख और ख़ुशी का अनुभव करते हुए अपने जीवन की यात्रा को तय करता है.
क भक्त की पुकार है ‘बाबा मुझे निर्मल कर दो’ लेकिन बाबा खुद ही मल (स्थूल) और मैल (स्थूल और सूक्ष्म) से मुक्त नहीं तो वह दूसरों को कैसे इससे मुक्ति दिलाएगा, "मल" से मुक्ति कोई आसान नहींऔर निर्मल होना तो और भी कठिन हैकठिन ही नहीं असंभव भी है. जब तक जीवन है व्यक्ति स्थूल और सूक्षम रूप से मल से जुड़ा है निर्मल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. हाँ हमारे यहाँ चिंतन के स्तर पर निर्मल होने की भाव सदा रहा है और निश्चित रूप से यह होता भी रहा है. चिंतन के स्तर पर व्यक्ति निर्मल हो सकता है और हमारे अध्यात्म में इसे सदा महता दी जाती रही हैआज हम जिस ऊंचाई पर खुद को महसूस करते हैं उसमें हमारे चिंतन का बहुत बड़ा हाथ है. क्योँकि व्यक्ति संसार में रहता है और संसार में रहते हुए उसे कई प्रकार की स्थितियों से जूझना पड़ता है और अगर व्यक्ति मानसिक रूप से उन स्थितियों का गुलाम बन जाता है तो फिर जीवन की नैसर्गिकता से वह पीछे हट जाता है और जीवन के वास्तविक अनुभवों को अनुभूत नहीं कर पाता. निश्चित रूप से भावनात्मक रूप से निर्मल होना ऐसी स्थिति में उसके लिए कारगर होता है जो उसे नवजीवन प्रदान करता है. हमारे जीवन दर्शन में इस भाव को बनाये रखने के लिए गुरु को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है और उसे ही ब्रह्माविष्णु और महेश की संज्ञा से नवाजा गया है. गुरु जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की और ले जाएउसके अज्ञान को मिटाकर उसे ज्ञान प्रदान करे और उसे जीवन में कर्म की महता समझाते हुए कर्म करने की प्रेरणा दे. गुरु के विषय में ऐसा बहुत कुछ कहा जा सकता है और अगर ऐसा गुरु हमें जीवन में मिल जाता है तो निश्चित रूप से जीवन धन्य हो जाता है.
जकल निर्मल बाबा प्रकरण हर जगह छाया हैप्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या साइबर मीडिया सभी जगह निर्मल बाबा की निर्मलता को बखूबी अभिव्यक्त किया जा रहा है और यह सब यहाँ पर होता रहा है. हमारा जीवन दर्शन आज बहुत सतही बन चुका हैजीवन के प्रति भौतिकवादी नज़रिये ने हमारे पास से हमारा वह सब कुछ छीन लिया है जिसकी भरपाई अब शायद ही हो सके और ऐसे हालात में हम कुछ स्वार्थपरक लोगों के चक्कर में पड़कर अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को ही नहीं बल्कि पूरे जीवन को ही बर्बाद कर रहे हैं. कई बार यह प्रश्न मुझे बहुत पीड़ा देता है कि भारत जैसे देश में यह सब कुछ हो रहा हैऔर यहाँ का आम जनमानस इन सब कुरीतियों का शिकार होता जा रहा है. हमारी संस्कृति और सभ्यता दिन प्रतिदिन अपनी महता खोती जा रही है और उसके लिए कोई और जिम्मेवार नहीं बल्कि हम ही जिम्मेवार है. लेकिन व्यक्ति का क्या है अपना दोष दूसरों पर मढ़ कर अपना पल्लू साफ़ करना उसकी फितरत में है. कुछ लोग यहाँ समाज सेवक होने के नाम पर लोगों को लूट रहे हैं तो कुछ कृपा के नाम परकुछ योग और आयुर्वेद के नाम पर तो कुछ किसी विशेष जातिधर्मविचारधारा और भाषा के हिमायती बनकर. लेकिन सबका लक्ष्य है आम व्यक्ति को लूटना उसे अपने पथ से भ्रमित करना और इसमें दोष किसका है ???  यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है ?? आज एक निर्मल बाबा के लिए सभी विरोध प्रकट कर रहे हैंयह होना भी चाहिए लेकिन मुझे तो कदम - कदम पर ऐसे बाबा नजर आते हैं जो हमारे देश के लोगों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं....! शेष अगले अंकों में.....!