Language लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Language लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

11 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...3

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे.....मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में अपने परिवेश से शब्दों के उच्चारण सीखता है. अधिकतर यह देखा गया है कि बच्चा सबसे पहले ‘माँ’ शब्द का ही उच्चारण करता है. फिर धीरे-धीरे वह अपनी जरुरत और सुविधा के हिसाब से शब्दों को सीखता है और उनका प्रयोग करता है. अगर हम बच्चों के शब्द भण्डार का अध्ययन करें तो हमें यह बात भी मालूम होगी कि बच्चों के पास प्रारम्भिक समय में सिर्फ वही शब्द होते हैं जो उनके भाव को अभिव्यक्त करने में सहायक होते हैं. यह भी एक तथ्य है कि उसके आसपास अन्य व्यक्तियों द्वारा जैसे शब्दों का उच्चारण अधिक होता है, वह भी वैसे ही शब्दों को बोलना शुरू करता है. जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बीतती जाती है, शब्द और शब्दों से सम्बन्धित अर्थ उसे ज्ञात होते जाते हैं. मनुष्य की भाषा सीखने की प्रारम्भिक प्रक्रिया बड़ी रोचक है. प्रारम्भ में जहाँ मनुष्य सिर्फ शब्दों का उच्चारण करता है, वहीं समय के साथ-साथ वह शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को जानते हुए शब्द का प्रयोग करता है. व्यगोत्स्की ने इस तथ्य की और ध्यान दिलाते हुए लिखा है कि ‘बचपन में सम्प्रेषण और बोधन के विकास के अध्ययन इस निष्कर्ष की और ले जाते हैं कि वास्तविक सम्प्रेष्ण को अर्थ की आवश्यकता होती है, अर्थ अर्थात सामान्यीकरण सम्प्रेषण की वैसी ही अपरिहार्यता है जैसी कि संकेत’. व्यगोत्स्की के इस मत से स्पष्ट होता है कि बच्चे जिस शब्द को सीखते हैं उसमें निहित अर्थ की समझ विकसित होने पर वह उस शब्द के प्रति ज्यादा सजग हो जाते हैं. जैसे-जैसे उन्हें शब्दों के वास्तविक अर्थ का बोध होता है वैसे-वैसे वह शब्दों को ग्रहण करते जाते हैं. इसके साथ ही जिन शब्दों से उन्हें उनके भाव का बोध होता है वह उन शब्दों के प्रयोग के प्रति सहज होते जाते हैं. इस तरह से मनुष्य की भाषा सीखने की प्रक्रिया शुरू होती है और वह ताउम्र भाषा से जुडा रहता है.
भाषा सीखने और उसके प्रयोग में मनुष्य की सोच बहुत मायने रखती है. यह अध्ययन बड़ा ही रोचक होगा कि एक बच्चा जब किसी शब्द को सीखता है तो वह उस शब्द को सीखते तथा उच्चारित करते वक़्त किस तरह की प्रक्रिया से गुजरता है. हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुएं भी शब्दों के माध्यम से ही हमें परिचित होती हैं. हालाँकि वह वस्तुएं हमें दृष्टव्य होती हैं, लेकिन हम उन वस्तुओं के चित्र को अपने जहन में तब ही महसूस कर पाते हैं जब शब्द के माध्यम से हमें उनका बोध होता है. संभवतः बोली और भाषा के बीच में हम बोध को अगर महत्वपूर्ण पहलू माने तो हमें भाषा और बोली के महत्व को समझने में भी आसानी होगी. बोली हमारे भाव के बहुत करीब होती है, लेकिन भाषा भाव से कहीं दूर. इसलिए कोई भी व्यक्ति जब बोली में अपने भाव को अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है तो वह सहजता से हर भाव को अभिव्यक्त करता है. लेकिन भाषा के माध्यम से वह अभिव्यक्ति की उस ऊंचाई कोई नहीं छू पाता.
बोली मनुष्य की अभिव्यक्ति का आधार है. दुनिया में हुए अधिकतर शोध इस तथ्य की और संकेत करते हैं कि मनुष्य की सोचने की प्रक्रिया उस भाषा के माध्यम से नियन्त्रित होती हैं जिसे मनुष्य अपने बचपन में सीखता है. इस सन्दर्भ में इतालबी लेखक लुइगी मैंगलो का कथन दृष्टव्य है. वह लिखते हैं कि ‘मानव व्यक्तित्व में दो परतें होती हैं, उपरी वाली परत बाह्य घावों के समान होती है. इतालवी, फ्रेंच और लैटिन शब्द, इसके नीचे वाली परत आंतरिक, ऐसे घावों के समान होती है जो भरने पर अपने निशान छोड़ जाते हैं. यह हैं बोलियों के शब्द. जब हम इन निशानों को छूते हैं तो एक दृश्यमान शृंखलात्मक प्रतिक्रया प्रारम्भ होती है. इसे उन लोगों को समझाना बहुत मुश्किल है जिनकी कोई बोली नहीं होती. यह एक समझे हुए तथ्य का कभी नष्ट न होने वाला केन्द्र है. यह इन्द्रियों के तन्तुओं से जुड़ा होता है. बोली का शब्द हमेशा यथार्थ पर टिका होता है, क्योंकि यह दोनों एक ही होते हैं. इन्हें कारण देने से पहले ही हम पहचान लेते हैं. यह कभी गायब नहीं होते चाहे इन्हें हमें दूसरी भाषा में भी कारण या तर्क क्यों न सिखा दिया जाए. इससे स्पष्ट होता है कि बोली का आधार मानवीय भाव की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बोली ताउम्र मनुष्य की अभिव्यक्ति का आधार रहती है, जबकि भाषा के सन्दर्भ में यह तथ्य सटीक नहीं बैठता है. मैंगलो के कथन से एक और बात भी स्पष्ट होती है कि बोली के शब्द और अर्थ यथार्थ के धरातल पर आधारित होते हैं, जबकि भाषा में अधिकतर शब्द हमें अवास्तविक सत्ता का बोध करवाते हैं.
भाषा और बोली के सम्बन्धों को समझते हुए हमें एक और बात भी स्पष्ट हुई कि बोली का आधार अनुभव और बोध के वास्तविक धरातल पर अवस्थित है, क्योंकि बोली का सम्बन्ध मनुष्य की सोच और अनुभव से जुडा है. जबकि भाषा को हम सीखते हैं, अगर बहुत देर तक हम किसी भाषा का प्रयोग नहीं करते तो हम उसके शब्द और शब्दों से सम्बन्धित अर्थों को भूलते जाते हैं. इसलिए मनुष्य को बोली प्रकृति प्रदत्त वरदान है, और वही उसकी अभिव्यक्ति का आधार भी है. अब यहाँ यह भी प्रश्न उठता है कि जब बोली मनुष्य के अनुभव और बोध के बिलकुल करीब होती है तो फिर भाषा की क्या आवश्यकता है? यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है. दूसरा यह भी कि जब संसार में मनुष्य को भाव की अभिव्यक्ति के लिए बोली की ही आवश्यकता है तो फिर भाषा को सीखने की क्या जरुरत है? हमें बोली और भाषा के सम्बन्धों पर भी विचार कर लेना चाहिए. सामान्यतः भाषा-विज्ञान और व्याकरण में हमें यह समझाया जाता है कि जिसके माध्यम से साहित्य रचा जाता है उसे हम भाषा कहते हैं. लेकिन जब हम गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि साहित्य की जिनती भी विधाएं और प्रकार शिष्ट साहित्य में उपलब्ध होते हैं, उससे अधिक और विविध प्रकार बोली में भी देखने को मिलते हैं, और वह हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए हैं. उन्हें सहजने के लिए न तो किसी लेखक की जरुरत है और न ही किसी प्रकार के खास प्रयत्न की. बोली में रचित साहित्य पीढ़ी दर पीढ़ी अपना अस्तित्व कायम किये हुए है. यह हुआ इस ही कारण है कि बोली में जो कुछ भी रचा गया है वह हमारे भाव और संवेदना के सबसे ज्यादा निकट है. इसलिए लोक में भाषा के बजाय बोली को ज्यादा तरजीह दी जाती है. शेष अगले अंक में...!!

07 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...2

3 टिप्‍पणियां:
यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है वह तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है, चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. गतांक से आगे....!!!!  

भाषा सीखना और उसे प्रयोग करना यह दोनों अलग-अलग बातें हैं. जरुरी नहीं कि हम कोई भाषा सीखें और उसका प्रयोग करें, क्योँकि संवाद का सीधा सा नियम है कि जब हम किसी से किसी भी भाषा में बात करें तो सामने वाले को भी वह भाव समझ आना चाहिए, भाव को समझने के लिए भाषा की जानकारी जरुरी है, और भाषा की जानकारी के लिए शब्दों की समझ होनी जरुरी है, शब्द को समझने के लिए उसके अर्थ के विषय में जानकरी होनी चाहिए. यह नियम वाचक और श्रोता दोनों के लिए लागू होता है. तब कहीं हम कह सकते हैं कि एक सार्थक संवाद हुआ, वर्ना अगर हम समझ में न आने वाली भाषा में अपनी भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्त करते रहें तो वैसी भाषा की कोई सार्थकता नहीं है. भाषा तो वही सार्थक है जो आम जन की समझ में आ जाये और इसके साथ-साथ विचार भी वही सार्थक है जो अपने हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्त किया गया हो, या ऐसा भी कह सकते हैं जिसमें व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि का भाव निहीत हो. वर्ना भाषा का एक पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि हम आम जन की समझ में आने वाली भाषा में बहुत निकृष्ट और दोयम दर्जे के विचार अभिव्यक्त करें तो भी भाषा की कोई सार्थकता नहीं होगी. 

एक दृष्टि से अगर हम देखें तो ऐसा भी कह सकते हैं कि व्यक्ति का व्यवहार भाषा का आधार है, और इसी बात का
दूसरा पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि भाषा व्यक्ति के व्यवहार की परिचायक है. मैं दूसरे पक्ष से ज्यादा इतेफाक रखता हूँ. क्योँकि भाषा पर व्यक्ति के व्यवहार का किसी हद तक कोई फर्क नहीं पड़ता, हां एक स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भाषा को प्रभावित कर सकता है, जहाँ पर सामूहिक रूप से शब्दों का प्रयोग उनके वास्तविक सन्दर्भों की अपेक्षा किन्हीं अन्य सन्दर्भों के लिए किया जाय. लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों में घटित होती है और निश्चित रूप से इसका प्रभाव भाषा पर पड़ता है. एक दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि जब कोई सामाजिक रूप से प्रसिद्ध व्यक्ति किसी विशेष ‘शब्द’ का प्रयोग उसके विशेष अर्थ के सन्दर्भ में न करके किसी और सन्दर्भ में करता है तो भी व्यक्ति का उस शब्द के प्रति किये गए व्यव्हार का प्रभाव भाषा पर पड़ता है. लेकिन यह सब कुछ छुट-पुट रूप से घटित होता है, और ऐसी स्थिति भी वर्षों में एक-आध बार आती है और किसी विशेष शब्द आदि के लिए. वर्ना भाषा के विषय में तो कहा जाता है कि यह बहता नीर है इसलिए इसे हम किसी ख़ास सांचे में बाँध कर नहीं रख सकते, और यह भाषा के विकास की दृष्टि से संभव भी नहीं है. जो भाषा जितनी समृद्ध होती है उसमें अनेक भाषाओँ के शब्दों को समेटने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है. इसी तरह जो व्यक्ति भाषा के व्यवहार के प्रति सजग होता है वह भी अपने प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा के लिए उतना ही लचीला रवैया अपनाता है और भाषा को अपने व्यवहार और व्यक्तित्व का अंग मानते हुए उसके विकास में सहायक बनता है.  

अगर हम यह मानकर चलते हैं कि किसी भाषा के प्रयोग करने वालों के कारण उस भाषा का स्वरूप निर्धारित होता है तो हमें इस बात की भी समझ होनी चाहिए कि उन्हीं प्रयोग करने वालों पर ही भाषा का सारा कार्य-व्यापार निर्भर करता है.  ऐसी स्थिति में हम यह भी कह सकते हैं भाषा ही व्यक्तित्व है और व्यक्तित्व ही भाषा. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भाषा और लिपि कोई एक हो सकती है, लेकिन जब हम उसके प्रयोक्ता पर ध्यान देते हैं तो हमें भाषा के अलग–अलग रुप नजर आते हैं. जब हम किसी अध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं और उससे संवाद करते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, किसी राजनितिक व्यक्ति से मुलाकात में हमारी शब्द और हाव-भाव अलग होते हैं. किसी सामाजिक समारोह में जब हम मिलते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, इसी तरह से हम किसी अपराधी के लिए अलग शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, संत के अलग, साहित्य से जुड़े व्यक्ति के लिए, समाज सेवक के लिए अलग. इस तरह से जितने प्रकार के व्यक्तित्व हमारे सामने से गुजरते हैं उनके लिए हम वैसे ही शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि भाषा का व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है. जब हम व्यक्तित्व के अनुकूल शब्दों का प्रयोग करते हैं तो भाषा की खूबसूरती और भी बढ़ जाती हैं, शब्द भाषा को एक नया आयाम देते हैं और जो व्यक्ति-व्यक्तित्व के अनुकूल भाषा का प्रयोग करने में सक्षम होता है, वह सबसे ज्यादा प्रिय भी होता है और दूसरी तरफ अपने व्यक्तित्व के अनुसार शब्दों का प्रयोग जो भी व्यक्ति करता है वह उसके व्यक्तित्व को और अधिक प्रिय बनाता है. शब्दों के प्रयोग के प्रति अगर हम सजग हैं तो हमारे सामाजिक सम्बन्ध कभी भी नहीं बिगड़ सकते, सामाजिक ही नहीं किसी भी प्रकार के सम्बन्धों को बनाये रखने का मुख्य आधार शब्द ही हैं. हमारा व्यक्तित्व, हमरा व्यवहार सब कुछ शब्दों के माध्यम से निर्धारित होता है और यह जीवन की एक महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि आधारभूत कड़ी है. 

आज की परिस्थितियों पर अगर हम दृष्टिपात करते हैं तो यह बात हम समझ सकते हैं कि आज शब्दों के प्रति हम लापरवाह हो गए हैं. हालाँकि सूचना तकनीक के आने से व्यक्ति के संवाद की संभावनाओं में अकल्पनीय उन्नति हुई है. लेकिन जितनी यह उन्नति हुई है उतना ही हमारा शब्दों के प्रति नजरिया बदला है. आज का दौर सोशल नेटवर्किंग का दौर है. ऐसी स्थिति में हमें अपनी भाषा और शब्दों के प्रति सजगता को अपनाने की ज्यादा आवश्यकता है. लेकिन कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि उन्हें कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं इसलिए वह किसी भी प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं, लेकिन अगर वह दूसरे दृष्टिकोण से देखते तो यह भी सोच सकते थे कि इन शब्दों के माध्यम से ही उनके व्यक्तित्व का परिक्षण होगा तो निश्चित रूप से वह कभी भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते, कम से कम गाली जैसे शब्दों का तो नहीं. किसी भी विषय के लिए हमें अपने विरोध और असहमति को प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन उस असहमति को हम अगर भद्दे शब्दों के माध्यम से जताएंगे तो संभवतः कोई लाभ होने वाला नहीं है और दूसरी तरफ हमारा व्यक्तित्व भी धूमिल हो रहा है. यह वही शब्द हैं जिनके माध्यम से हम प्रभावशाली और प्रभावहीन दोनों बन सकते हैं.    

04 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...1

5 टिप्‍पणियां:
अपने आस-पास ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में नजर दौड़ाकर देखता हूँ तो सम्पूर्ण क्रियाएं मुझे शब्दों की ही अभिव्यक्ति लगती हैं. लेकिन इससे और आगे बढ़ते हुए देखता हूँ तो सब कुछ मुझे ‘शब्द’ ही नजर आता है. कहीं गहरे में उतरकर देखता हूँ तो मुझे वह अवधारणा साकार होती हुई नजर आती है कि ‘शब्द ही ब्रह्म है’. जिस तरह से ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह प्रकृति के विभिन्न रूपों के माध्यम से अपने बजूद का अहसास करवाता है, उसी प्रकार शब्द भी सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह भी विभिन्न क्रियाओं के घटित होने पर अपने बजूद का अहसास करवाता है. इससे यह बात जाहिर होती है कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति भी शब्द के माध्यम से होती है. शब्द बेशक अक्षरों से बने होते हैं, अक्षर के मूल में ध्वनि निहीत रहती है. किसी हद तक भाषा, ध्वनि, अक्षर और उसके स्वरूप के विषय में विचार करना व्याकरणिक और भाषा वैज्ञानिक चिन्तन का हिस्सा है. लेकिन यह पक्ष किसी हद तक भाषा के बाह्य स्वरूप से सम्बन्ध रखते हैं. भाषा का मुख्य कार्य तो भावनाओं की अभिव्यक्ति करना है, विचारों को किसी दूसरे तक संप्रेषित करना है और यह भाषा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि भाषा का जन्म ही इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है. जहाँ तक व्याकरण और भाषा विज्ञान का सम्बन्ध है, यह भाषा को व्यवस्थित करने और उसके प्रयोग के कुछ नियमों का पालन करना हमें सिखाते हैं, और जहाँ तक साहित्य का सम्बन्ध है, यह भाषा को स्थाई और मानक रूप देने के साथ-साथ भाषा की समृद्धि, उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि के साथ-साथ आम जन में उसके प्रयोग के लिए सहायक होता है. साहित्य भाषा के विकास के विभिन्न पड़ावों की जानकारी के साथ-साथ किसी विशेष काल में चिन्तन और मनन के विषयों की जानकारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में भी सहायक है. 

भाषा का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ साहित्य की रचना में ही योगदान देना नहीं है, या साहित्य का मुख्य उद्देश्य भी भाषा को सुरक्षित करना नहीं है. साहित्य और भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ समाज और संस्कृति से भी गहरे से जुडा हुआ है. हालाँकि जब हम भाषा और साहित्य के सम्बन्धों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि इन दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. लेकिन किसी और दृष्टि से विचार करें तो ऐसा लगता है कि यह दोनों अपना अलग-अलग मकसद और अलग बजूद भी रखते हैं और इन दोनों की पूर्ति अनेक माध्यमों से होती भी रहती है. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, वह सब चीजों का मूल आधार है. भाषा के बिना हम किसी भी चीज की कल्पना नहीं कर सकते. मनुष्य के आज तक के सब प्रकार के विकास में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, और मनुष्य के आज तक के अविष्कारों में भाषा सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार है. अगर भाषा नहीं होती तो दुनिया का स्वरूप कैसा होता? मनुष्य ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगत का स्वरूप और हाल कैसा होता? यह सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. हमारे लिए भाषा कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा हम कभी नहीं लगा सकते. लेकिन जब हम कहीं किसी विकट स्थिति का सामना करते हैं और वहां पर हम सब कुछ होते हुए भी भाषा हीन हो जाते हैं तो तब हमें पता चलता है कि जीवन में भाषा के मायने क्या हैं? भाषा हमारे जीवन के विकास और उसके विभिन्न आयामों का एक अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हम कभी भी भाषा की अनदेखी नहीं कर सकते, और हम हमेशा उसे अपनाए हुए अपने विकास क्रम को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं. 

मानव सदियों से अपने भावों, विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा का सहारा लेता आया है और आज तक वह उसी डगर पर चलते हुए अपने जीवन को चला रहा है. भाषा की महता सम्पूर्ण जगत के लिए आज से पहले, आज और आज के बाद भी बनी रहेगी. इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि जब तक इस जगत में जीव के जीवन और क्रिया के चिन्ह रहेंगे तब तक वह अपने आप को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश करता रहेगा और यह उसके लिए जरुरी भी है. क्योँकि अभिव्यक्ति के बिना उसकी कोई क्रिया संपन्न नहीं होती, और बिना क्रिया के उसका जीवन नहीं चलता. उसके जीवन को चलाने में जितनी महता क्रिया की है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भाषा है. आज जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं यह हमारे विकास के विभिन्न पडावों से अर्जित अनुभव और उपलब्धियों की व्यवस्था है. निश्चित रूप से इसमें भाषा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. भाषा के बिना हम अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि आज इस धरा पर मनुष्य के अनुभव कैसे रहे हैं और उन अनुभवों का क्या कुछ अभी तक निष्कर्ष निकल पाया है. मनुष्य और भाषा के सन्दर्भ में अगर विचार करें तो हम पाते हैं कि बिना भाषा के मनुष्य की कोई महता नहीं और उसके बजूद का कोई अता-पता नहीं. इसलिए जब भी हम इतिहास को देखने, समझने की कोशिश करते हैं तो यह सब क्रियाएं सिर्फ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती हैं. 

भाषा के अध्ययन और उसकी उपयोगिता के अनेक पक्ष हो सकते हैं. लेकिन भाषा का मुख्य कार्य व्यापार विचारों और भावनाओं का सम्प्रेष्ण है. इसका सीधा सा सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार से है. व्यक्ति अपने आप अभिव्यक्त नहीं होता, बल्कि वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है. उसकी भावनाएं, उसके विचार, उसकी सोच सब कुछ इन शब्दों के माध्यम से अभियक्ति पाता है. इसलिए कोई नवजात जब इस धरा पर जन्म लेता है तो सबसे पहले वह अभिव्यक्ति करना ही सीखता है. अपने भावों और अपनी जरूरतों को वह भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है. यह भी कितना अद्भुत है कि जिस माहौल और जिस भाषा के लोगों के बीच कोई नवजात जन्म लेता है तो वह वही भाषा बोलता है, और उसी के अनुरूप अपनी अभिव्यक्ति करता है. उस भाषा को हम उसकी मातृ भाषा कहते हैं और यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. शेष अगले अंकों में ....!!!!