गत अंक से आगे...भावों की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीव जन्तु भी कुछ
ध्वनि संकेतों का प्रयोग करते हैं. हालाँकि हम उनके ध्वनि संकेतों को समझ नहीं
पाते, लेकिन सामान्य व्यवहार में देखा गया है कि वह ऐसा करते हैं. जीवन की हर
स्थिति में वह भी अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. जो पशु-पक्षी-जन्तु मनुष्य के
साथ-साथ जीवन जीते हैं, उनके हाव-भाव से तो यही प्रतीत होता है कि वह भी भावों की
अभिव्यक्ति के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं. जैसे कभी आप प्रयोग करके
देखें कि गाय ने जब किसी बच्चे को जन्म दिया हो, उसके बच्चे को जब कोई हानि
पहुंचाने की कोशिश करता है या जब कोई उसे उससे दूर करने की कोशिश करता है तो वह इस
तरह का व्यवहार करती है कि हमें उसकी सम्वेदना और बच्चे के प्रति उसका प्यार समझ
आता है.
कई बार हम जंगलों में भी देखते हैं कि अगर किसी जन्तु को कोई तकलीफ
होती है तो उस क्षेत्र में रहने वाले सभी जीव-जन्तु वहां इकठ्ठा हो जाते हैं, कई
बार तो दृश्य इतना सुखद और सम्वेदनात्मक होता है कि जो जीव किसी दूसरे के आहार का
आधार है, उसे तकलीफ की स्थिति में वह भी हानि नहीं पहुंचाते. ऐसे दृश्य देखने के
बाद कई बार मनुष्य के व्यवहार के विषय में सोचना पड़ जाता है कि किसी विकट स्थिति
में कई बार मनुष्य दूसरे मनुष्य का गलत फायदा उठाने की कोशिश करता है. लेकिन ऐसी
स्थिति में पशु ऐसा कम ही करते देखे गए हैं. कुल मिलाकर यही समझने का प्रयास में कर
रहा हूँ कि प्रकृति में विचरण करने वाले अधिकतर चेतन जीव अपना भावों को अभिव्यक्त
करने के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं, मनुष्य भी उनमें से एक है.
मनुष्य
के व्यवहार और भाव अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में अगर हम भाषा का अध्ययन करने का
प्रयास करते हैं तो एक रोचक सा संसार हमारे सामने उपस्थित हो जाता है. मनुष्य की
भाषा और अभिव्यक्ति का प्रभाव उसके पूरे जीवन पर देखा जा सकता है. मैं कई बार
सोचता हूँ कि मनुष्य के पास अगर भाषा नहीं होती तो मनुष्य की स्थिति क्या होती?
भाषा विहीन मनुष्य क्या वह सब कुछ हासिल कर लेता, जो वह आज तक करता आया है या जो
वह आज कर रहा है. संभवतः वह ऐसा नहीं कर पाता. क्योँकि मनुष्य ने किसी भी क्षेत्र
में जो कुछ हासिल किया है उसका आधार भाषा रही है. भाषा के बिना मनुष्य की प्रगति
सम्भव नहीं होती. इसलिए भाषा मात्र भावों की अभिव्यक्ति के लिए ही जरुरी नहीं है,
भाषा का उद्देश्य व्यापक है. इस संसार में भाषा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है.
मनुष्य के महान अविष्कारों में भाषा का आविष्कार एक महान आविष्कार कहा जाना चाहिए
और भाषा को सदा-सदा के लिए सुरक्षित और जन-मन तक पहुंचाने के लिए किया गया लिपि का
आविष्कार भी कोई महत्वपूर्ण नहीं है. समग्र रूप से हम यह कह सकते हैं कि भाषा और
लिपि का आविष्कार इस संसार में अब तक हुए अविष्कारों में सबसे महत्वपूर्ण हैं, अगर
यह आविष्कार नहीं होते तो शायद जितने भी आविष्कार आज तक हमें किये हैं, उनका कोई
भी बजूद नहीं होता.
भाषा
और लिपि का आविष्कार मनुष्य की चिरंतन सोच का नतीजा है. लेकिन हम यह भी देखते हैं
कि इस संसार में भाषाएँ अधिक हैं और लिपियाँ कम. यह एक अलग बहस का बिन्दु हो सकता
है. लेकिन हम यहाँ इस तथ्य को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते कि लिपि के आविष्कार से
पहले मनुष्य ने भाषा का आविष्कार किया है. आज भी हम दुनिया में यह देख सकते हैं कि
कई भाषाएँ ऐसी हैं जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं, लेकिन उस भाषा में लिखित
कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. जो ध्वनि संकेत पीढ़ी दर पीढ़ी किसी समुदाय, जाति और
क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच में प्रचलित रहे हैं, वह उनकी भावाभिव्यक्ति
का आधार हैं. सामान्य स्थिति में हम उसे बोली कहते हैं.
बोली
के विषय में व्याकरण और भाषा विज्ञान में कुछ परिभाषाएं पढने को मिल जाती हैं.
लेकिन इन परिभाषाओं का उपयोग हम भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग में करते हैं. भाषा
वैज्ञानिकों और वैयाकरणों ने भाषा और बोली के अन्तर पर विचार करने की कोशिश की है.
लेकिन यहाँ हम यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य अपनी भावाभिव्यक्ति और
संवाद के लिए जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग करता है वह उसके लिए कितना महत्वपूर्ण
हैं. हम देखते हैं कि मनुष्य जन्म लेने के साथ ही जिन ध्वनि संकेतों के माध्यम से अपने
भावों को दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, उसे हम मातृभाषा कहते हैं.
दुनिया के तमाम मनुष्य सबसे पहले माँ से सीखी हुई या ग्रहण की हुई भाषा में ही अपने
भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. इससे के बात और भी समझ आती है कि मनुष्य जन्म से
भाषा विहीन होता है, लेकिन धरती पर जन्म लेने के बाद वह जिस परिवेश में पलता है वह
वहां की भाषा सीख करके उसके माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है. इसलिए
दुनिया भर में किये गए शोध से यह बात भी सामने आई है कि मनुष्य जिस भाषा को अपनी
माँ से सीखता है वह ताउम्र उसी भाषा में सोचता है, बेशक वह भाव को किसी और भाषा के
माध्यम से अभिव्यक्त करता है, लेकिन सोच के स्तर पर वह उसी भाषा या बोली में सोचता
है जो उसने अपनी माँ से सीखी हो, जिस हम मातृभाषा की संज्ञा से अभिहित करते हैं.
मातृभाषा
को सामान्य शब्दों में माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में परिभाषित किया जा सकता
है. ऐसे ध्वनि संकेत जिन्हें हम माँ से सीखते हैं, उन्हें मातृभाषा की संज्ञा से
अभिहित किया जा सकता है. एक नवजात अपने घर-परिवार से ही भाषा की प्रथम शिक्षा पाता
है. लेकिन भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग के प्रारम्भिक बिन्दु क्या हैं? यह जानना
बड़ा रोचक है. दुनिया के तमाम देशों के मनुष्य अपने भावों की अभिव्यक्ति भाषा या
बोली के माध्यम से करते हैं. जहाँ तक बोली का विषय है उसे हम मातृभाषा भी कह सकते
हैं. मातृभाषा को हमें माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में प्रयोग करना चाहिए,
कुछ लोग मातृभाषा शब्द को किसी देश विशेष की भाषा के सन्दर्भ में भी प्रयोग करते
हैं. लेकिन मैं जहाँ तक समझता हूँ कि इस शब्द का बेहतर प्रयोग माँ से सीखी हुई
भाषा के सन्दर्भ में ही किया जाना चाहिए, जिस सामान्य तौर पर हम बोली कहते हैं.
बोली और भाषा में बुनियादी तो नहीं लेकिन व्यवहारिक अन्तर जरुर हैं. उनके विषय में
किसी और रूप में भी चर्चा की जा सकती है. लेकिन यहाँ सरसरी और कुछ हद तक व्यवहारिक
समझ के लिए हमें यह समझना जरुरी है कि भाषा शिक्षण ज्यादा जरुरी है या भाषा प्रयोग.
लेकिन जहाँ तक अनुभव रहा है मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में बोली को सीखता
है. शेष बिन्दु अगले अंक में...!!


