01 जुलाई 2011

अक्षर साधना

ध्वनि क्या है? अक्षर क्या है? शब्द क्या है? हमारा भाषा विज्ञान और व्याकरण हमें इनकी  परिभाषाओं से अवगत करवाते हैं. लेकिन वास्तविकता में हम उसकी मूल अस्मिता के विषय में नहीं जानते कि अक्षर की भी कोई मूल अस्मिता होती है. लेकिन जैसे ही हम अक्षरों के विषय में सोचते हैं तो एक रोचक सा संसार हमारे सामने उपस्थित होता है. हम जितनी गहराई से अक्षर को समझते हैं उतनी ही हम उसकी महत्ता को समझते हैं और फिर उतना ही वह अक्षर हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है. क्या वास्तविकता में ऐसा है कि अक्षर की भी कोई महत्ता, अस्मिता है? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, और इसका हल हमारी बुद्धि के सापेक्ष पक्ष की ही खोज हो सकता है.

अब बात करते हैं कि ध्वनि क्या है ? आम तौर पर "आवाज" को हम व्याकरणिक या भाषा वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से ध्वनि कहते हैं. अध्यात्म या योग में इसके लिए "नाद" शब्द का प्रयोग किया जाता है लेकिन "योग" में जिस ध्वनि के लिए "नाद" शब्द का प्रयोग किया जाता है वह हमारे अंतर्मन की ध्वनि है, उसे हम महसूस कर सकते हैं, लेकिन किसी भी परिस्थिति में अभिव्यक्त नहीं. जिसे हमने साधना के बल पर महसूस किया है, उसे अभिव्यक्त कैसे करेंगे. उसे महसूस करने के लिए हमने साधना की और इस साधना के लिए एक ख़ास प्रक्रिया की आवशयकता होती है. इडा , पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के माध्यम से सांस को केन्द्रित कर, नियंत्रित कर ध्यान के माध्यम से इस "नाद" को सुना जाता है, महसूस किया जाता है, और जहाँ तक "योग" का सम्बन्ध है "वह है दो चीजों का मिलन"....लेकिन यह कैसी चीजें होनी चाहिए....किस तरह का मिलन और उसकी चरम सीमा क्या है? योग को परिभाषित करते हुए महाऋषि पतंजलि अपने महाभाष्य में लिखते हैं "चितवृतिनिरोधयोगः" अर्थात हमारे चित में, हमारे अंतःकरण में जो वृतियां है उनका निरोध करना उन्हें एक सापेक्ष दिशा की तरफ ले जाना और अंतःकरण में उठने वाले हर नकारात्मक भाव का शमन करते हुए चित्त  को (आत्मा को परमात्मा से) जोड़ना ही योग है. लेकिन इस जुड़ाव के लिए भी कोई ना कोई माध्यम तो चाहिए ही, और वह माध्यम ‘अक्षर’ ही है. 

अक्षर का एक पक्ष है यह भी है जब हम साधना करते हैं तो किसी न किसी अक्षर की रटन करते हैं....लेकिन जब तक वह अक्षर रटन रहता है तब तक वह प्रभावकारी नहीं होता उसे प्रभावकारी बनाने के लिए उसके मूल तत्व और उसके मूल भाव को समझते हुए उसके साथ संवेदनात्मक रूप से जुड़ना होता है, तब कहीं वह अक्षर प्रभावकारी होता है वर्ना हम जितनी भी साधना कर लें, तप कर लें, जप कर लें सब अनिष्ट ही रहेगा. अगर साधना में सफलता को प्राप्त करना है तो अक्षर को समझना होगा और संसार की तमाम ताकतें इसी ‘अक्षर’ में निहीत हैं.

वास्तविकता में ध्वनि को चिन्हित करने के लिए अक्षर का निर्माण हुआ है और उस ध्वनि के हर भाव को हर संवेग को उस अक्षर ने खुद में समाहित किया है. जिसके कारण हम खुद को सहजता से अभिव्यक्त कर पाते हैं. हम जितनी ध्वनि को महत्ता देते हैं उससे ज्यादा कहीं अक्षर की महत्ता हैअक्षर अपने में मूर्त है वह चेतना का प्रतिबिम्ब है. हमारी भावनात्मक और संवेदनात्मक चेतना उस अक्षर में निहित है. जिस तरह हम ध्वनि को ना तो तोड़ सकते हैं, ना मरोड़ सकते हैं, उसी तरह हम उसमें कुछ जोड़ भी नहीं सकते हैं.  ‘ध्वनि तो ध्वनि’ है बस उसे हम सुन सकते हैं और अगर संवेदनशील हैं तो महसूस कर सकते हैं, वर्ना हमारे लिए ध्वनि के कोई मायने नहीं. इसी तरह ‘अक्षर तो अक्षर’ है. उसने ध्वनि का वरण अपने में किया हुआ है. ध्वनि जब स्वतन्त्र थी तब भी उसकी महत्ता थी. लेकिन अक्षर ने उसे खुद में समाहित करके उसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया. इसलिए अक्षर ज्यादा  महत्वपूर्ण हो गया. उसे हम देख सकते हैं, उच्चारित कर सकते हैं. लेकिन सुनने के रूप में तो वह ध्वनि ही है. हाँ यह बात अलग है कि यहाँ अक्षर साधना बन गया ‘योग’ बन गया, जिसने दो को जोड़ दिया. अगर सुनने वाला नहीं होगा तो कहने वाला क्या करेगा, और अगर कहने वाला नहीं होगा तो सुनने वाला क्या करेगा, जब दोनों का समन्वय हो जाता है दोनों एक दूसरे में पूरी तरह से समाहित हो जाते हैं तो वहीँ ‘योग’ हो जाता है.

अक्षरों से शब्द बनते हैं. लेकिन अक्षर के मूल में भी ध्वनि रहती है और शब्द के मूल में अक्षर. अब शब्द  ज्यादा प्रभावकारी हो गया. क्योँकि उसने कई अक्षरों को अपने में समाहित कर लिया और खुद अक्षर को मूर्त रूप देते हुए अक्षर को प्रभावकारी बना दिया. ध्वनि को सहेजने के लिए अक्षर बना, अक्षर को सहजने के लिए शब्द बना और अब शब्द ने अर्थ को ध्वनित करना शुरू कर दिया उसने अर्थ रूपी प्राण को पा लिया, और शब्द ने जब अर्थ और संवेदना को अपने में धारण कर लिया तो उसकी शक्ति और स्वरूप में परिवर्तन आ गया. अब शब्द बेजान नहीं उसमें जान है. ध्वनि रूपी तत्व नें शब्द रूपी शरीर धारण किया और और अर्थ रूपी आत्मा ने उसे जीवन दे दिया और अर्थ को पाकर शब्द की  सत्ता बदल गयी और अक्षर का महत्व बढ़ गया. इसी अक्षर ने फिर शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले. मानव को मानव से ही नहीं बल्कि ईश्वर से जुड़ने की शक्ति प्रदान की. पूरी सृष्टि हालाँकि अक्षर पर निर्धारित है लेकिन यह अभिव्यक्त शब्द के माध्यम से होती है. शब्द  साकार और अर्थ निराकार. जैसे "शरीर के बिना आत्मा का और आत्मा के बिना शरीर का महत्व" यही बात "शब्द और अर्थ" पर भी लागू होती है. दोनों का महत्व  समान है यह बात अलग है कि शब्द की महता उसके अर्थ के कारण है. लेकिन इसे भी हमें स्वीकारना होगा कि शब्द अपने आप  में एक ईकाई है, जो हमारी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है.

वर्तमान परिदृश्य पर अगर दृष्टिपात करें तो ऐसा लगता है कि हम शब्दों के प्रति नासमझ हो गए हैं. शब्द के प्रति हमारा रुझान कम हो गया है. हम उसे महसूस नहीं करते बस उसे कहते हैं और कह कर भूल जाते हैं. लेकिन अगर हमारे मन, वचन और कर्म में एकरूपता है तो हमारा व्यक्तित्व संसार के लिए अनुकरणीय हो जायेगा. हमारा कहा हुआ हर शब्द एक ब्रह्मअस्त्र की भांति काम करेगा. हम अगर किसी के लिए दुआ करेंगे तो वह भी कबूल होगी. लेकिन आज जब देखता हूँ कि हमारे घरों में शब्दों का स्वरूप बदल गया है तो संवेदना कहाँ रहेगी, वह भावना ही कहाँ जो एक शब्द के उच्चारण से पैदा होती है. आज माँ को माँ या माता नहीं बल्कि मम्मा या ‘Mom’ शब्द से ज्यादा उच्चारित किया जाता है. नमस्ते या नमस्कार की जगह ‘गुड मोर्निंग’ Good Morning ने ले ली है. यह शब्द सिर्फ संकेत मात्र है, अगर ऐसे शब्दों को गिनवाना शुरू करूँ तो संख्या काफी हो जाएगी. कभी-कभी लगता है कि हम खुद को भूल गए हैं. अगर हम इन व्यावहारिक शब्दों के मूल को देखें तो यह गहरे अर्थ ध्वनित करते हैं. जैसे अगर कोई अनजान व्यक्ति भी हमें बेटा कह कर पुकारे तो हममें उसके प्रति एक अपनापन सा पैदा हो जाता है, और सिर्फ शब्दों के माध्यम से हम एक दुसरे के साथ बंधे रहते हैं. जीवन का कोई भी क्षेत्र हो जन्म  से लेकर अंतिम सांस तक अक्षर हमारा साथी है. काश हम इसे साध पाते और अपने जीवन, घर, परिवार, समाज, देश और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनुकरणीय और सुखमय संसार का निर्माण कर पाते.
इस आलेख को आप आदरणीय अर्चना चावजी की कर्णप्रिय आवाज में यहाँ सुन सकते हैं. 

49 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

अक्षर को सहजने के लिए शब्द बना और अब शब्द ने जब अर्थ और संवेदना को अपने में धारण कर लिया तो उसकी शक्ति और स्वरूप में परिवर्तन आ गया ...यह एक महज आलेख ही नहीं इस रूप में ज्ञान का भण्‍डार समाहित है इस प्रस्‍तुति में ..बहुत-बहुत बधाई आपको ।

वन्दना ने कहा…

एक सारगर्भित आलेख्…………अद्भुत जानकारी।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

badiya jaankari

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत गंभीर और सार्थक आलेख.... आपके अंतिम अनुच्छेद से पूरी तरह सहमत....

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (02.07.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

shikha varshney ने कहा…

बहुत गंभीर और जानकारी परक सार्थक लेखन कर डाला आज तो.बधाई और आभार.

mahendra srivastava ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी के साथ लिखा गया ये लेख। प्रस्तुती का अंदाज भी निराला है।

संध्या शर्मा ने कहा…

"अब शब्द बेजान नहीं उसमें जान है . ध्वनि रूपी तत्व नें शब्द रूपी शरीर धारण किया और और अर्थ रूपी आत्मा ने उसे जीवन दे दिया और अर्थ को पाकर शब्द कि सत्ता बदल गयी और अक्षर का महत्व बढ़ गया............."

सत्य वचन....... आपकी हर एक बात अक्षरशः सही है... शब्द साकार और अर्थ निराकार .... गूढ़ ज्ञान है इन सभी बातों में साथ ही साथ एक गंभीर विषय पर गंभीर और सार्थक चिंतन.........जितनी प्रशंसा की जाये कम है... बहुत - बहुत आभार आपका

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gahan gyaan ...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

अति सूक्ष्म विषय पर गहन चिंतन , अभी एक कविता पढ़ी थी डॉमोनिका शर्मा की " शब्द:" पर

Archana ने कहा…

अद्भुत चिंतन...........शब्द-अर्थ,साकार-निराकार,शरीर-आत्मा....जड़-चेतन....और अंतिम पंक्ति में सबका सार ---माँ-बेटा.....

Deepak Saini ने कहा…

सार्थक आलेख

sushma 'आहुति' ने कहा…

sarthak lekh....

सुबीर रावत ने कहा…

'नाद' को इतने सुन्दर ढंग से परिभाषित किया है आपने. 'योग' शब्द का अर्थ भी आत्मा और परमात्मा का मिलन ही है, अर्थात ध्यान को केन्द्रित कर उस ऊँचाई तक पहुंचना कि आत्मा परमात्मा में लीन हो जाय. स्वामी विवेकानंद जी ने 'राजयोग' में विस्तार से वर्णन किया है. बाल योगेश्वर की एक पत्रिका प्रकाशित होती है- शब्द ब्रह्म ....... परन्तु आपका लिखा एक एक शब्द दिल की गहराई में उतरता है.
आप भी उस ऊँचाई को प्राप्त करें, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ.

मुसाफिर क्या बेईमान ने कहा…

ध्वनि, अक्षर, शब्द, प्रकाश, प्राचीन काल मे चित्रकारी द्वारा समझना, इशारों से मानना, ये सभी माध्यम है उस प्रेम का, जो हमें दिल से समझ आता है,
वर्ना आज की मशीनी युग मे इन माध्यम को प्रदूषित मान कर साउंड प्रूफ, काले शीशो द्वारा
जीवन को एक घुटन भरा बना देतें है और जीते जाते है, विकार भरे जीवन मे.
केवल भाई बहुत ही सार्थक शब्द कहें है आज.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शब्द ब्रम्ह है।

सतीश सक्सेना ने कहा…

अधिकतर नयी जानकारी है , शुभकामनायें केवल राम जी !

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

नई जानकारी देता सार्थक चिंतन...... आभार

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

गूंगे के पास ध्वनि नहीं पर अक्षर तो होंगे!

Dr Varsha Singh ने कहा…

जीवन का कोई भी क्षेत्र हो जन्म से लेकर अंतिम सांस तक अक्षर हमारा साथी है .

शाश्वत सत्य....

Era Tak ने कहा…

words are god..always be selective while choosing ur words...never waste words..Kewal ji..nice write up..Keep on writing...Regards..Era

Sunil Kumar ने कहा…

सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक पोस्ट आभार .

Rahul Singh ने कहा…

क्‍या अस्मिता के साथ 'मूल' विशेषण उपयुक्‍त है. कबीर के रूप में हमारे शेखर जी दिखे, अच्‍छा लगा.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

भावनाओं को स्वर तो अक्षर ही देते हैं रूप/भाषा कोई भी हो। सुन्दर आलेख!

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

ज्ञानवर्द्धक लेख...धन्यवाद और बधाई

मनोज कुमार ने कहा…

इस सारगर्भित आलेख द्वारा आपने जो संदेश दिया है वह बहुत ही सराहनीय है।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ek aalekh bata raha hai ki aapki jaankari kitni gahri hai...:)
sach me kewal bhai...bahut mehnat karte ho aap jab kuch likhte ho to..ye najar aa raha hai...!
aur haan arun jee kee tarah man bhi puri tarah sahmat hoon...aapke last stenga me..:)

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

अक्षरों से शब्द बनते हैं . लेकिन अक्षर के मूल में भी ध्वनि रहती है और शब्द के मूल में अक्षर .

गहन मीमांसा...

Dr K K Yadav ने कहा…

kya sabdo ko dundha hn kewal jiii

Ravi Rajbhar ने कहा…

Bahut hi gyanvardhank prastuti..
bahut- bahut badhai aapko...!

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय केवल रामजी
आपकी संपादन करने की कुशलता सराहनीय है!
बहुत गंभीर और सार्थक आलेख.

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

निस्संदेह ऎसी पोस्ट सिर्फ आप ही लिख सकते है!
और बहुत-बहुत बधाई आपको!

Ankur jain ने कहा…

सच शब्द सृष्टि के निर्माता है तो ये सृष्टि तबाह भी कर सकते हैं इनका प्रयोग बहुत सोच-समझ के होना चाहिए...बेहद जानकारी भरा आलेख...

Rakesh Kumar ने कहा…

'अक्षर ब्रह्म योग' भगवदगीता का आठवां अध्याय है.गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के शुरू में ही प्रार्थना करते हैं
'वर्णानां अर्थसंघानाम रसानां छंद सामपि
मंगलानां च कर्तारौ,वन्दे वाणी विनायाको'
इसकी विवेचना मैंने अपनी पोस्ट'वन्दे वाणी विनायकौ' में की है.
अक्षर के ऊपर ही विज्ञान की आज की 'स्ट्रिंग थ्योरी'
आधारित है ,जिसके अनुसार अक्षर से ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है.
सुन्दर आलेख के लिए बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सारगर्भित लेख ...

Gopal Mishra ने कहा…

very informative...kafi mehnat ki hai aapne,,,,thanks.

Rajiv ने कहा…

"अक्षर का एक पक्ष है यह भी है जब हम साधना करते हैं तो किसी न किसी अक्षर की रटन करते हैं ..लेकिन जब तक वह अक्षर रटन रहता है तब तक वह प्रभावकारी नहीं होता उसे प्रभावकारी बनाने के लिए उसके मूल तत्व और उसके मूल भाव को समझते हुए उसके साथ संवेदनात्मक रूप से जुड़ना होता है , तब कहीं वह अक्षर प्रभावकारी होता है"
केवल जी,
आपने तो जीवन और साहित्य दोनों की परिभाषा सामने रख दी.अद्भुत लेखन.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

नि:शब्द कर दिया आपने.विचारों को अभिव्यक्त करना चाह रहा हूँ किंतु शब्द नहीं मिल पा रहे हैं.मानव ने प्रगति पथ पर चलते हुये अक्षर और शब्दों का सृजन ध्वनियों को मूर्त रूप देने हेतु कर लिया किंतु अभी भी बहुत सी ध्वनियाँ शब्दों में ढाली नहीं जा सकी क्योंकि ये अंतर्मन के भावोंवश जनित होकर कंठ से निकलतीहैं.
पीड़ा,रुदन,आर्तनाद,प्रेमातिरेक,भावावेश,उत्साह,नैराश्य ,पंछियों के कलरव,पशुओं की ध्वनियाँ केवल नाम से जानी जाती हैं,शब्द बद्ध नहीं हो सकती.सारगर्भित लेख द्वारा अंतिम पंक्तियों में गहरा संदेश दिया है.

निर्मला कपिला ने कहा…

रोचक और सार्थक जानकारी। धन्यवाद।

एस.एम.मासूम ने कहा…

केवल जी बहुत ही बेहतरीन लेख़ है. आप की लेखनी का कमाल.

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

dhvani akshar aur shabd ke sambandh ka rochak vivran...sahi kaha shabd apne aarth kho rahe hai ya kahe ham hi apne se door ho rahe hai...

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट कल होगा यहाँ...........
नयी पुरानी हलचल

Amrita Tanmay ने कहा…

अक्षर साधना ..प्रासंगिक बढि़या प्रस्‍तुति.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत विस्तृत एवं सार्थक आलेख....

Anand Dwivedi ने कहा…

बहुत गहराई तक जाकर और पूरी दक्षता के साथ इस पूरे विषय का विवेचन प्रस्तुत किया है केवल जी आपने ...विषय पर आपकी पकड़ भी प्रसंसनीय ढंग से मुखरित हुई है बधाई आपको.

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

आदरणीय केवल राम जी -हार्दिक अभिवादन बहुत ही सारगर्भित लेख आप का -सार्थक जानकारियों से परिपूर्ण -संगीत , ध्वनि, नाद , अक्षर, आदि से परिचय करता बहुत ही अच्छी जानकारी -बधाई हो सुन्दर लेख जन जीवन के लिए
आप से निवेदन है की कुछ शब्द , मन्त्र , ध्वनि आदि का उल्लेख करें और उन से होने वाले लाभ भी बताएं जिस से जन मानस और लाभान्वित हो सकें -
आभार आप का
शुक्ल भ्रमर ५
समय मिले तो हमारे अन्य ब्लॉग पर भी पधारें कभी -लिंक हैं,

बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

http://surenrashuklabhramar5satyam.blogspot.com,

रस रंग भ्रमर का

http://surendrashukla-bhramar.blogspot.com,

भ्रमर की माधुरी

http://surendrashuklabhramar.blogspot.com,

भ्रमर का दर्द और दर्पण

http://surenrashuklabhramar.blogspot.com

shukl bhramar5

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

गहन विश्लेष्णात्मक लेख...
अक्षर ..........आत्मिक जुड़ाव

shilpa mehta ने कहा…

अक्षर - अ + क्षर -जिनका क्षय न हो

ब्रह्म को भी अक्षर कहा गया है, ध्वनी के चिन्ह भी अक्षर कहलाते हैं | परन्तु ध्वनि के चिन्ह ब्रह्म तक सिर्फ "रटन" मात्र से नहीं पहुंचाते - उन ध्वनियों के अर्थ को घोल कर पी जाना है - आत्मसात कर लेना है | अक्षर में घुल मिल जाना है - तब यात्रा हो पाती है ...

dheerendra ने कहा…

केवल राम जी,
मेरी पोस्ट पर आने के लिए आभार,..
अक्षर साधना पोस्ट पर गया बहुत ही
सुंदर लगा आपका आलेख,बढ़िया समीक्षा
की शब्दों की,लाजबाब पोस्ट.....