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01 जनवरी 2013

शुभकामना से शुभकर्म की ओर

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भारतीय जन जीवन को जब देखते हैं तो यहाँ पर शुभकामनाओं की बड़ी महता नजर आती है। सोने से लेकर जागने तकशाम से सुबह तकमृत्यु से जीवन तकजड़ से चेतन तकयुद्ध से शांति तकहार से जीत तकप्रकृति से परमात्मा तक। शुभकामनाओं का यह सिलसिला अनवरत रूप से चलता रहता है, और इसके अनेक पक्ष हैं। हमारे जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं जहाँ हम शुभकामनाओं की अपेक्षा नहीं करते या हम शुभकामना देने को आतुर नहीं होते। घर से किसी काम को निकलते वक़्त अगर कोई बुजुर्ग या उम्र में बड़ा सामने दिख जाये तो उसका आशीर्वाद लेना और उससे अपने लिए शुभकामना की कामना करना तो हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। जीवन में चाहे कैसा भी समय आये शुभकामना आगे बढ़ने का साहस देती है। हम तो यहाँ तक मानते हैं कि ‘जो बात दवा से नहीं होतीवो बात दुआ से होती है। जब कामिल मुर्शिद मिलता हैतो बात खुदा से होती हैकामिल मुर्शिद’ मतलब कि सच्चा गुरु जब मिलता है तो फिर जीवन में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहतीगुरु की दुआओं और आशीर्वाद से जीवन का हर मसला हल हो जाता है। क्योँकि गुरु एक भटके हुए इनसान को उसकी वास्तविक राह पर डाल देता है। जब किसी इनसान की दिशा बदल जाती है तो दशा स्वयं ही बदल जाती है। क्योँकि जब हम मंजिल की तरफ चलते हैं तो चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आयें हम अगर दृढ निश्चयी हैं तो जरुर पहुंचेंगे और जब हमने अपनी इच्छित मंजिल पा ली तो दशा का बदलना स्वाभाविक है। किसी अनुभवी और सच्चे इनसान का मार्गदर्शन जीवन की महता को अनमोल बना देता है तो वहीँ दूसरी तरफ अगर हम मंजिल से उलटे चलते हैं तो जीवन कौड़ियों से भी बदहाल हो जाता है।
शुभकामना और शुभकर्म दोनों का चोली-दामन का साथ है। हमारे जीवन दर्शन में मनवचन और कर्म से एक होने की बात की गयी है। जो व्यक्ति अपने जीवन रहते इस अवस्था को प्राप्त कर लेता हैउसका जीवन धन्य हो माना है। उसे संत (मतलब की सत्य से अंत तक जुड़ा रहने वाला) महात्माया ऋषि की उपाधि से विभूषित किया जाता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन और चरित्र का अनुसरण हर कोई करना चाहता है। ऐसा जीवन जो अनेक के लिए प्रेरक और पथप्रदर्शक होता है। हमारे चिन्तन में जीवन को संवारने की बात की गयी है। कोई भी ऐसा कर्म न हो जिससे खुद को या दूसरे किसी प्राणी को क्षति हो। हमारा जीवन दर्शन सामूहिकता और सामाजिकता को महत्व देता है। हमारी व्यक्तिगत उपलब्धियों का लाभ सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि जितने प्राणियों हम वह लाभ को दे सकते हैं उतनों तक पहुंचाने की कोशिश की बात यहाँ की जाती है, और हमेशा जहन में शुभ भाव सभी के लिए रखते हुए शुभकर्म की और बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है। इस देश के लोग ही हैं जो जो यह शुभकामना करते हुए सुने जाते हैं कि:
                                                             सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया:।
                                                             सर्वे भद्राणि पश्यन्तुमा कश्चित दु:ख भाग भवेत्।।
यानि की एक ऐसी शुभकामना जिसमें सभी के सुख की आशा की गयी होऔर हम तो ऐसे चिंतन का हिस्सा रहे हैं जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की कामना की जाती है। कोई एक देश और उस देश के प्राणी ही नहींबल्कि सार संसार ही अपना घर है। यह सब पढ़करसोच कर खुद पर गर्व होता है और ज्यादा ख़ुशी तो तब होती है कि यह मात्र कहनेलिखनेपढने की ही बातें नहीं हैं। बल्कि जिन्होंने इन्हें कहा हैलिखा है उनका जीवन ऐसी भावनाओं और कर्मों का जीवन्त उदाहरण रहा है। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होती कि हम एक महान देश भारत के नागरिक हैं। मनुष्य जन्म मिलना तो खुदा की सौगात है हीलेकिन भारत जैसे देश में जन्म मिलना यह खुदा की विशेष कृपा हैउसका एक उपहार है। जहाँ सबके भले की कामना ही नहीं की जाती बल्कि अगर किसी को कोई मौका मिलता है तो वह उस व्यक्ति के लिए काम करने से भी नहीं कतराता और बदले में किसी लाभ की कोई इच्छा किये बगैर सेवा भाव से कर्म करता है। इस देश में शुभकर्म और शुभकामना दोनों का महत्व है।
आज फिलहाल इतना ही....आप सबको नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं.

25 अक्टूबर 2012

पुतले और वास्तविकता

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यह संसार एक मेला है , यहाँ जो भी आता है अपना समय बिता कर चला जाता है आने - जाने का यह क्रम आदि काल से चला आ रहा है . पूरी कायनात को जब हम देखते हैं तो यह ही महसूस होता है कि इस जहां में कुछ भी नित्य नहीं है , शाश्वत नहीं है . अगर कहीं  कुछ शाश्वत है तो उसे हम ईश्वर की संज्ञा से अभिहित करते हैं . जो नित्य रहने वाला है , तीनो कालों में जो एक जैसा है , जिस पर किसी का भी प्रभाव नहीं होता , जिसकी सत्ता जड़ और चेतन दोनों में समायी है , जो सदा एक रस रहने वाला है , ऐसी ना जाने कितनी उपमाएं इस शाश्वत सत्ता के साथ जोड़ी जाती हैं और यह क्रम अनवरत रूप से इस संसार में चला रहता है . विश्व का कोई भी देश हो किसी न किसी रूप में वहां की जनता इस अदृश्य सत्ता के प्रति नतमस्तक रहती है , और उसी को जीवन का आधार मानती है . जहाँ तक भारतवर्ष  का सम्बन्ध है यह तो सृष्टि के प्रारंभ से ही ऋषि मुनियों की धरती रहा है   सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञानसे आलोकित करने वाले देश के रूप में इसे ख्याति प्राप्त है . लेकिन परिवर्तन की मार इस पर भी पड़ी है और यह भी प्रकृति के कोप आधार बनता रहा है . कभी मनुष्य के कारण तो कभी प्रकृति के कारण, फिर भी इस देश की सभ्यता और संस्कृति आज तक पूरे विश्व के लोगों का पथ प्रदर्शन करती रही है और आने वाले समय में ??? इस देश की अगर यही हालत रही तो इस देश की सभ्यता और संस्कृति पर कई तरह के प्रश्नचिन्ह खड़े हो सकते हैं और आज जो हम अपने अतीत की दुहाई देते फिरते हैं वह भी हमसे नहीं हो पायेगा . तब  हम मात्र राम - रावण करते रह जायेंगे और , पुतलों के जलने की ख़ुशी में अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को गवां देंगे , और इस धुन में यह भी भूल जायेंगे कि हम भी पुतले हैं और संभवतः पुतलों का कोई संसार नहीं होता , कोई अस्तित्व नहीं होता .  

आजकल पुतला जलाना एक प्रथा बन चुका है .जब भी कोई किसी नियम को तोड़ता है , या मानवीय  भावनाओं के खिलाफ कोई व्यक्ति कार्य करता है तो हम उसका पुतला जलाते हैं . लेकिन उस पुतला जलाने का किसी पर क्या असर होता है , यह मेरी समझ से बाहर है . पुतला जला लेने के बाद मैंने आज तक किसी के जीवन और चरित्र को बदलते हुए नहीं देखा और जो लोग पुतला जलाने में शामिल होते हैं संभवतः किसी न किसी तरह से वह भी उस व्यवस्था का हिस्सा होते हैं . ऐसी स्थिति में पुतला जलाना मात्र मनोरंजन ही होता है , और आज तक मैं यही देखता आया हूँ . लेकिन बड़ी गंभीरता से सोचता हूँ तो पुतला जलाने का आशय तो कुछ और है और जिस उद्देश्य से हम पुतला जला रहे हैं वह कुछ और है , यहाँ पर पुतला जलाना हमारे सामने एक विरोधाभास पैदा करता है , लेकिन हमारे पास कोई अवकाश नहीं कि हम उस विरोधाभास को दूर कर सकें और सही और वास्तविक परिप्रेक्ष्यों में इन चीजों को देख सकें . आज हमारे सामने जो स्थितियां हैं उनके मद्देनजर हमें सभी चीजों के वास्तविक मूल्यों को टटोलने की जरुरत है . उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक महता को समझने की हमें महती आवश्यकता है , जो आशय इन सभी परम्पराओं और मान्यताओं का है उसी सही परिप्रेश्य में उद्घाटित करने की जिम्मेवारी हमारी ही है और संभवतः हम उस जिम्मेवारी का निर्वाह सही ढंग से नहीं कर रहे हैं , जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरनाक साबित होगा . 

राम और रावण धर्म और अधर्म के प्रतीक नहीं , बल्कि धर्म और प्रतिधर्म के प्रतीक हैं . राम बेशक हमारी आस्था के केंद्रबिंदु हैं , जीवन की प्रेरणा के स्रोत हैं , मानवीय मूल्यों के रक्षक हैं और भी ना जाने क्या - क्या ? लेकिन रावण ? ? इसका तो नाम लेना भी हम बड़ा कष्टकारी समझते हैं . रावण के लिए हमारे जहन में सम्मान नहीं , अपमान है . वह निकृष्ट है , दुराचारी है , व्यभिचारी है . यह रावण के जीवन का एक पहलू है . लेकिन इसके अलावा रावण हमारे सामने क्या है ? यह सोचने का विषय है . अगर हम राम को ईश्वर का रूप या ईश्वर ही कह दें तो भी इस बात पर गहनता से विचार करना होगा कि रावण में ऐसी क्या अद्भुत बात थी जिसे मारने के लिए ईश्वर को इस संसार में अवतार लेना पड़ा .  इतिहास के गर्भ में हमें इस प्रश्न का उत्तर जरुर खोजना चाहिए . राम और रावण को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में हम शायद नहीं देख पाए . हमारी एकांगी दृष्टि और सोच ने राम और रावण दोनों के व्यक्तित्वों को समझने का अवसर नहीं दिया . आज जिस रूप में राम और रावण हमारे सामने हैं , उससे तो यही लगता है कि हम इन दोनों के जीवन मकसद को सही परिप्रेक्ष्यों में नहीं समझ पाए . 

आज जिस रूप में राम और रावण हमारे सामने हैं . वह काव्य की कल्पना के आधार पर हैं , इतिहास के आधार पर नहीं ,और शायद यही भूल हम आज तक करते आये हैं . इतिहास के आधार पर हमने इनके व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया ही नहीं और न ही करने की जरुरत समझी . भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनेकों पक्ष हैं जो राम और रावण के माध्यम से अभिव्यक्त हुए हैं . उस काल की स्थितियां और परिवेश भी कई रोचक जानकारियों से भरा रहा है . यह भी इन दोनों के  माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है  .   हम तकनीकी रूप से कितने सक्षम थे, इस बात का अंदाजा भी हमें इस काल के इतिहास को देखने से पता चल सकेगा  और कई ऐसे अनछुए पहलू हैं जो मात्र राम और रावण के माध्यम से ही हमारे सामने आ पायेंगे , लेकिन इसके लिए हमें अपनी एकांगी दृष्टि , कपोल कल्पना को छोड़कर इतिहास के गर्भ में झांकना होगा और मंथन करने पर जो कुछ हमें हासिल होगा, उसे समाज के साथ सांझा करना होगा . राम और रावण मात्र पुतलों का खेल नहीं, यह जीवन की विविध संस्कृतियों को समझने जैसा है , जीवन को वास्तविकता से जोड़ने जैसा है .

12 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...4

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गतांक से आगे.....रचनाकर्म में स्पष्टता का अपना महत्व है. हम कुछ भी सृजन कर रहे हैं लेकिन जितनी हमारी विषय और विचार के प्रति स्पष्टता होगी उतना ही हमारा सृजन बेहतर होगा. कालजयी सृजन निश्चित रूप से विषय के प्रति स्पष्टता का ही परिणाम होता है . पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से भरा सृजन कभी भी कालजयी नहीं हो सकता. ऐसा सृजन थोड़ी देर के लिए चर्चा का विषय तो बन सकता है. लेकिन एक सच्चे और समझदार पाठक के लिए उसके कोई मायने नहीं. कुछ एक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम यह सोच लें कि हमारा सृजन उत्तम है तो यह हमारे लिए भी भ्रम ही होगा. अच्छे चिंतन और बेहतर लेखन के परिणाम तो वर्षों बाद ही प्राप्त होते हैं. इसलिए बेशक हमें आलोचनाओं का सामना करना पड़े लेकिन सृजन के मूल्यों को बरकरार रखने के लिए हमें अगर यह भी सहना पड़े तो कोई हर्ज नहीं

बोधगम्यता : विषय प्रतिपादन में जितना महत्व स्पष्टता का है. उससे कहीं ज्यादा महत्व विषय की बोधगम्यता का है. विषय प्रतिपादन बहुत कठिन कार्य हो सकता है, जब विषय के प्रति सोच स्पष्ट न हो. लेकिन अगर हम किसी तरह विषय प्रतिपादन में सफल हो जाते हैं तो सबसे बड़ा मुद्दा उसकी बोधगम्यता का बना रहता है. हमारी दृष्टि विषय के प्रति मौलिक भी है, जानकारी भी हमें पूरी है और हम उस विषय के प्रति पूरी तरह से स्पष्ट भी हैं. लेकिन हमने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया है कि वह समझ से बाहर की वस्तु बना रहता है तो हमारे अच्छे तर्कों और तथ्यों का कोई लाभ पाठक को नहीं होने वाला. पाठक की अपनी समझ और सोच है किसी विषय के प्रति और उसी समझ और सोच के आधार पर वह आपके लेखन का मूल्यांकन करता है. इसलिए यह जरुरी है कि जब हम किसी विषय को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें तो उसके प्रत्येक पहलू पर गहराई से चिंतन करें. जब तक हम विषय की बोधगम्यता पर ध्यान नहीं दे पायेंगे तो अच्छे से अच्छे तर्क और तथ्य भी समझ के स्तर पर टेढ़ी खीर बने रहेंगे. कई बार यह देखने में आता है कि रचनाकार ने बहुत अच्छे विषय का चुनाव किया है, लेकिन उसकी विषय प्रतिपादन शैली इतनी असमंजस भरी होती है कि सब कुछ पढने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता. हालाँकि पाठक उस विषय में जानना चाहता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी वह समझ नहीं पाता कि क्या कहा गया है. हालाँकि तथ्य और तर्क वहां पर पूरी तरह से अभिव्यक्त किए गए होते हैं. मेरा अपना निजी अनुभव है कि कई अच्छे रचनाकारों की पुस्तकों को सिर्फ और सिर्फ बोधगम्यता की कमी के कारण ही नहीं पढ़ा गया. हालाँकि यह हो सकता है कि मेरे लिए जो कुछ कठिन रहा हो वह किसी के लिए सरल भी तो हो सकता है. लेकिन विषय को ग्राह्य बनाने में विषय की बोधगम्यता निश्चित रूप से महती भूमिका निभाती है और बोधगम्य विषय अपेक्षा से अधिक लाभ पाठक को दे जाता है.

विषय अनुकूल भाषा : भाषा भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है. भाव अव्यक्त रह जाता अगर भाषा नहीं होती. हालाँकि बहुत से माध्यम हैं भावों को अभिव्यक्त करने के, लेकिन भाषा से सशक्त माध्यम कोई नहीं हो सकता. मानव ने जितना भी विकास किया है उसमें भाषा की महता को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. विकास के हर एक मानक में भाषा की महता बहुत महत्वपूर्ण है. यह भी सच है कि आज भाषा ने विषय के अनुकूल अपना विकास किया है . हर विषय की अपनी शब्दावली है और उसी शब्दाबली के आधार पर उस विषय ने भी नए आयाम स्थापित किए हैं. विषय के प्रतिपादन में भाषा महती भूमिका निभाती है. जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जिसे भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. अनुभूति को अभिव्यक्त करना, दृश्य को अभिव्यक्त करना, सोच को अभिव्यक्त करना, समझ को अभिव्यक्त करना, भाषा के ना जाने कितने आयाम है अभिव्यक्ति के स्तर पर, और इन सभी आयामों ने भाषा को बहुत व्यापक विस्तार दिया है. जितनी-जितनी हमारी आवश्यकता और समझ बढ़ी भाषा ने उसी अनुरूप अपना विकास किया और यह निरंतर विकास की राह पर अग्रसर है. 

विश्व की प्रत्येक भाषा का मंतव्य तो स्वस्थ संवाद के माध्यम से जीवन को आनंदमय बनाना रहा है,
सभ्यता-संस्कृति का विकास करना रहा है और इन मंतव्यों को पूरा करने में हर भाषा सक्षम भी है. लेखन के स्तर पर जब हम भाषा की बात करते हैं तो इसका प्रयोग करना और भी सजगता का विषय बन जाता है. क्योँकि हम जो कुछ भी अनुभूत करते हैं वह अभिव्यक्त तो भाषा के माध्यम से ही होता है. भाषा के दृष्टिकोण से अगर हिंदी ब्लॉगिंग की बात करें तो यहाँ एक नयी शब्दावली का विकास होता नजर आ रहा है. लेकिन अभी तक इसको अंतिम स्वरूप मान लिया जाये यह कहना तर्कसंगत नहीं लगता. या कोई यह कह दे कि हिंदी ब्लॉगिंग अपनी शब्दावली में भावों को अभिव्यक्ति देती है तो यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी. हालाँकि इस दिशा में सम्भावना देखी जा सकती है, लेकिन भाषा का विकास या शब्दों का निर्माण करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है, यह एक विज्ञान है और विज्ञान हमेशा तर्क और तथ्य के आधार पर  कार्य करता हुआ किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है. लेकिन भाषा, विज्ञान से भी आगे की चीज है, विज्ञान से भी दो कदम आगे का आविष्कार है, इस कथन के पीछे मेरी यह मान्यता है कि भाषा अक्षरों से बनती बेशक है लेकिन उन अक्षरों के निर्माण और संयोजन से जो शब्द बनते हैं उनमें भाव और अनुभूति भी समाहित होती है. हिंदी भाषा में ऐसे अनेकों शब्द हैं जहाँ पर यह तथ्य पूरी तरह से उभरकर सामने आता है कि जब हम किसी भाव को अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं और हमने शब्द का उच्चारण कर दिया तो एक बिम्ब स्वतः ही उभर आता है जो कि भाषा के वैज्ञानिक पक्ष को उभार कर सामने लाता है. इसलिए किसी भी विषय को अभिव्यक्ति देते समय भाषा और शब्दों का चयन बहुत चुनौती भरा कार्य होता है . लेकिन जब हमें विषय पूरी तरह से स्पष्ट है तो फिर भाषा कोई चुनौती नहीं. जैसे कबीर द्वारा अपने उपदेशों के लिए प्रयुक्त की गयी भाषा के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है  कबीर वाणी के डिक्टेटर थे, भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था’ निश्चित रूप से कबीर ने अपने विषय को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाषा को सशक्त माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया. लेकिन ब्लॉगिंग में कई बार टिप्पणी या पोस्ट में अभद्र शब्दों का प्रयोग अखरता है, और जब कहीं भी ऐसा कुछ देखता हूँ तो उस व्यक्ति की भाषा के प्रति नासमझी पर दया का भाव पैदा हो जाता है.  

शैली की रोचकता : भाषा अगर भावों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है तो शैली उन भावों को रोचकता से पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम है. हालाँकि सामान्य तौर पर पाठक शैली पर ध्यान नहीं देते. लेकिन जैसे ही हम रचनाकार की शैली को पहचान जाते हैं तो उस रचनाकार को समझना हमारे लिए आसान होता है. भारतीय काव्यशास्त्र में शैली पर व्यापक चर्चा की गयी है और पाश्चात्य समीक्षा जगत में तो यह कहा जाता है कि ‘शैली ही व्यक्तित्व है’ यानि शैली के माध्यम से ही रचनाकार के विचार पाठक तक पहुंचते हैं और पाठक उन विचारों को शैली के माध्यम से ही समझने का प्रयास करता है. शैलियाँ के भी कई प्रकार हैं. जैसे वर्णात्मक, विवरणात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक आदि और इसी तरह निबंध में समास शैली, व्यास शैली, धारा प्रवाह शैली और तरंग आदि शैलियाँ  प्रयोग की जाती हैं. कविता का तो अपना एक अलग से शास्त्र है ही जहाँ पर कविता के सभी पक्षों पर विचार किया गया है. रस, अलंकार, रीतिध्वनि आदि पर बहुत व्यापक रूप से विचार किया गया है, और यह विचार रचना की शैली के रूप को समृद्ध करने के लिए किया गया है. हालाँकि भावों को किसी नियम या सीमा में बांधना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी अगर हम ऐसा प्रयास नहीं करेंगे तो सब कुछ बिखर जाएगा. ब्लॉगिंग में शैली का एक अपना महत्व है. हालाँकि यहाँ सब कुछ साहित्य के सिद्धांतों के अनुरूप रचा जा रहा है. इसलिए हर कोई ब्लॉगर होने के बजाये लेखक होने का भ्रम पाले है. लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है. 

लेखन और ब्लॉगिंग के सृजन में व्यापक अंतर है. ब्लॉगर अपने आप में सृजन से लेकर प्रकाशन और विज्ञापन तक एक संस्था है. लेकिन लेखक के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए निश्चित रूप से हमें ब्लॉगिंग और साहित्य सृजन के सम्बन्ध में ध्यान देना होगा. अगर हम इस अंतर को समझ जाते हैं तो निश्चित  रूप से किसी भी पोस्ट को शैली के स्तर पर रोचक बनाने का प्रयास कर सकते हैं. ब्लॉगिंग में ब्लॉगर किसी भी विषय को त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, लेकिन लेखन का अपना स्तर है. यहाँ पाठक की प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है और दूसरी तरफ साहित्य में ऐसा नहीं है. ब्लॉगिंग में हर कोई टिप्पणी करने की लालसा रखता है, लेकिन साहित्य में ऐसा प्रयास कोई-कोई ही करता है, और वहां की गयी समीक्षा निश्चित  रूप से बहुत उतरदायी भरा कार्य होता है. शैली की रोचकता निश्चित रूप से लेखक के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करती है और ब्लॉगिंग में ब्लॉगर की अंतरात्मा उसकी पोस्ट के माध्यम से अभिव्यक्त होती है. ब्लॉगिंग का स्वभाव ही है स्पष्ट, त्वरित और उन्मुक्त अभिव्यक्ति और निश्चित रूप से इस आधार पर देखें तो ब्लॉगिंग की शैली भिन्न होनी ही स्वाभाविक है. 

ब्लॉगिंग का अद्भुत संसार विविधताओं भरा है. किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं. मैंने एक छोटा सा प्रयास किया अपनी समझ के आधार पर...आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ और प्रोत्साहन इस दिशा में और गंभीरता से सोचने को प्रेरित करेगा...!

05 फ़रवरी 2012

उपलब्धि का आधार...2

25 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे...अब तो यह निश्चित हो गया कि उपलब्धि को हासिल करने के लिए साधन से महत्वपूर्ण है साध्य. साधक का लक्ष्य क्या है? जिसे वह हासिल करना चाह रहा है. उसके पीछे उसका मन्तव्य क्या हैउसकी भावना क्या है? जिसकी भावना जैसी होगी उसे उसके कर्म का वैसा ही फल मिलेगा. जाकी रही भावना जैसीप्रभु मूर्त तिन देखि तैसी. जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है. जैसे कि किसी भी जीव कि ह्त्या करना अपराध हैलेकिन किसी शत्रु को जब हम अपनी सीमा पर मारते हैं तो उसे क्या कहते हैंवहां एक भावना काम कर रही है. हालाँकि ऐसा किसी भी स्तर पर  होना तो नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया का दस्तूर है, संसार के नियम हैं और उन नियमों  के तहत हम जो कुछ भी हासिल कर रहे हैं वह किसी हद तक हमें प्रासंगिक लगता है. क्योँकि किसी ऐसे व्यक्ति का कर्म बाकी इनसानों के लिए चिन्ता का सबब बन सकता हैइसलिए हम उसे किनारे लगा देते हैं.
जीवन में कर्म से पहले भाव का महत्व है. भाव बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है हमारे जीवन मेंहमारे कर्म में और निश्चित रूप से हमारी उपलब्धि का कारण भी वही है. भाव हालाँकि किसी को दिखाई नहीं देतालेकिन वह कर्म के माध्यम से बाहर आता हैप्रकट होता है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कीमती मोतियों की माला एक साधारण से धागे में पिरोई जाती है. लेकिन वह धागा दिखाई नहीं देताऔर जब तक मोती उस धागे में बंधें हैं तब तक वह सुन्दर दिख रहे हैंउनकी कीमत है. हालाँकि मोती कीमती हैंऔर धागे की कीमत और मोतियों की कीमत में जमीन-आसमान का अन्तर हैलेकिन फिर भी मोतियों का संग पाकर धागा कीमती हो गया और जब तक धागा उन मोतियों में लगा है तब तक धागा भी उतना ही कीमती हैजितने की मोती. भाव का यही महत्व है. उपलब्धि का भी यही कारण है. अब थोडा सा पीछे झांकते हैं अपने इतिहास की तरफ . विवेकानंद ने एक बार कहा था ‘अगर आपके पास दुनिया को देने के लिए सर्वश्रेष्ठ विचार है तो उसे बेशक आप किसी पत्थर की शिला की गुफा में सोच रहे होअभिव्यक्त कर रहे होवह विचार बाहर आएगा और अपना प्रभाव जरुर छोड़ेगा’. यह विचार और भाव की शक्ति है.
जिस फूल को में देख रहा था, उस फूल ने मुझे एक भाव दिया. उसने मेरे जहन में करुणाप्रेमदयासमदृष्टि आदि भावों का संचार किया. लेकिन किसी व्यक्ति के जहन में ऐसे भावों का संचार यूं ही नहीं हो जाता. जिससे हम प्रेरित हो रहे हैं, उसमें वह भाव होना चाहिए. वह प्रेरक होना चाहिएऔर प्रेरणा भी ऐसी जिससे सभी प्रेरित हों. दुनिया में ऐसा तो बहुत बार देखने को मिलता है कि किसी विशेष व्यक्ति के व्यक्तित्व का अनुसरण कुछ विशेष लोग ही करते हैं, और कुछ के लिए वह आँखों की किरकिरी बना रहता है. लेकिन जब हम सम्पूर्ण मानवता के लिए दयाकरुणाप्रेमउदारतासहिष्णुता जैसे मानवीय भावों को धारण कर कार्य करते हैं तो हमारा जीवन सबके लिए प्रेरक बन जाता है उस फूल की तरह. जिसका किसी से कोई वैर नहीं,कोई द्वेष नहींजिसे किसी से नफरत नहीं. वह तो हर किसी की तरफ अपनी सुगन्धअपनी कोमलतासहजताशालीनता सब कुछ अर्पित कर रहा है. उसका यह निश्छल भाव ही उसकी उपयोगिता का निर्धारण करता है.
मानवीय धरातल पर अगर सोचें तो हम पाते हैं कि जीवन में हम सब कुछ बनने की चेष्ठा करते हैं और ऐसा प्रयास करना कोई बुरी बात नहीं है. मानवीय प्रगति के लिए यह आवश्यक भी हैआज जितना भी भौतिक विकास हम देख रहे हैं यह मानव की जिज्ञासा और उसके निरन्तर क्रियाशील रहने के कारण ही सम्भव हो पाया है. लेकिन इस भौतिक उन्नति ने हमसे बहुत कुछ छीन भी लियायहाँ तक कि हमारा सुख-चैन भी. आज जो त्राहि-त्राहि चारों और मची है उसके पीछे कारण अगर देखें तो इनसानी ही नजर आते हैंलेकिन इनसान है कि अपने बजूद को मिटाने पर ही तुला हैउसे अपने स्वार्थ के सिवा कुछ सूझता ही नहीं और जब ऐसी सोच इनसान की है तो फिर प्रगति तो कर लीलेकिन मूल लक्ष्य से भटक जाना सही नहीं. इसलिए आवश्यक है कि हम अपने परिवेश को देखेंवहां की विसंगतियों को महसूस करेंअच्छाइयों का प्रचार करें. बुराइयों का त्याग करें और इस धरती पर एक सुन्दर से वातावरण का निर्माण करने में अपनी भूमिका अदा करें. ताकि आने वाली पीढियां इस वातावरण को कायम रखकर एक अद्भुत प्रेम, अमनभाईचारे वाली दुनिया का निर्माण कर सके. ऐसी दुनिया में हर कोई हर किसी से प्यार करेगा उस फूल की तरह जैसा उसने मुझसे किया है.

30 जनवरी 2012

उपलब्धि का आधार...1

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कल दोपहर कुर्सी पर बैठा मैं किसी विचार में मगन था. अचानक मेरी नजर सामने खिल रहे फूलों के गमलों पर पड़ी. अनायास ही मेरे चेहरे पर रौनक छा गयी. लगभग 300 गमलों पर दृष्टिपात करने के बाद अचानक मेरी दृष्टि एक सुन्दर से खिले फूल पर टिक गयी. बहुत देर निहारा मैंने उसेउसकी सुन्दरताशालीनताभोलापन सब कुछ. एक जीवन्त अहसास कुछ देर ऐसा लगा कि मैं उस फूल में समा गया हूँ. बहुत आत्मीयता से उसने मुझे गले लगाया हैऔर अपना कोमल और निश्छल प्रेम अनवरत मुझ पर बरसा रहा हैकुछ पल तक मैं विस्मृत कर गया खुद को और शामिल हो गया उस फूल के माध्यम से इस अनन्त प्रकृति में और प्रकृति से परमात्मा में. मैंने शरीर की सत्ता से बाहर कई बार खुद को महसूस किया है और आज फिर उसकी पुनरावृति इस फूल के माध्यम से हुई. इतने में किसी ने मुझे कहा सर कैसे हैं?? मुझे सुना नहीं. उन्हें लगा कि शायद मुझे कोई समस्या हैइसलिए आत्मीयता से पास आये और कहने लगेसर आप ठीक तो हैं ना? एकाएक मेरा ध्यान भंग हुआ और मेरे चहरे को देखकर वह चुप हो गएबिना कुछ कहे वह वहां से चले गए और शाम को जब मुझे मिले तो अपनी अनुभूति बताने लगे और मुझे कहने लगे तुम सच में धन्य हो......बस इतना कह कर फिर रुक गए. मैंने कुछ जानना नहीं चाहा लेकिन जब वह कुछ बोलने लगे तो फिर रुके नहीं और मैं सुनता रहाऔर बार-बार मैं कृतज्ञ हो रहा था उस फूल के लिए. याद आया मुझे वह शे'र और सुना दिया उसे ‘क्या खूब है जीना फूलों काहँसते आते हैं और हँसते चले जाते हैं’. काश मैं भी यही सोचता इस जीवन के बारे में और करता वह सब कुछ जो उस फूल ने मुझे दिया है.
जीवन भी क्या है ? अभी मैंने अस्तित्व की तलाश पर भी कुछ लिखने का एक छोटा सा प्रयास किया और उस वक़्त में सोच भी इसी बारे में रहा था. लेकिन एक फूल ने जिस तरह मुझे अपने आगोश में लिया वह अनुभव जीवन में बहुत कुछ दे गया. उस फूल की उपलब्धि उसकी सुन्दरता नहींउसकी पंखुड़ियां नहींकिसी हद तक उसकी सुगन्ध भी नहीं. उसकी उपलब्धि का आधार है उसका अपनापनवह हमेशा हर परिस्थिति में मुस्कुराता हैउसके मन में किसी के लिए वैर नहींकोई विरोध नहींकोई ईर्ष्या नहीं. वह तो निश्छल रूप से लुटा रहा है खुद कोऔर वह किसी एक के लिए नहींबल्कि पूरी कायनात के लिए हैं. तितली भी उस पर बैठती है , भवंरा उस पर गुंजन करता हैव्यक्ति उसे ईश्वर के चरणों में समर्पित करके अपनी मनोकामना पूरी करता हैऔर फूल को देखिये हम उसे उसके बजूद से अलग करते हैं, लेकिन फिर भी वह हँसते-हँसते हमारी ख़ुशी में शामिल हो जाता है. यहाँ मुझे अज्ञेय जी द्वारा रचित कविता सत्य तो बहुत मिले एकदम आँखों के सामने घूम गयी और फिर एक बार मैं उस फूल के प्रति नतमस्तक हुआ.
हमारे जीवन में हमारी उपलब्धि का आधार क्या हैहम जीवन में किसे उपलब्धि मानते हैं. उपलब्ध और उपलब्धि में सिर्फ एक मात्रा का अन्तर है. ‘ की मात्रा उपलब्धि में है और उपलब्ध में नहीं. अंग्रेजी में इन दोनों के लिए जो शब्द प्रयोग किये जाते हैं एक को हम Achievement कहते हैं और दूसरे को Available  कहते हैं. जो आज उपलब्ध है कल वह समाप्त हो सकता हैफिर वह आ सकता है. लेकिन उपलब्धि के मामले में ऐसा नहीं. वह एक बार आती हैफिर आती हैफिर आती है लेकिन उसके रूप अलग अलग होते हैंवह निरंतरता बनाये रखती है. वह हमारे जीवन को मूल्यवान बनाती है. लेकिन एक सहज सा प्रश्न उठता है कि उपलब्धि का आधार क्या हो ? उसके मानक क्या हैं ? कौन सी हद है उपलब्धि की और कौन पात्र है उपलब्धि का ? अनायास ही यह प्रश्न उठ सकते हैं और इन प्रश्नों का उठना हमें अपनी वास्तविक उपलब्धि की तरफ अग्रसर करेगा.
बात मूल बिन्दु की करते हैं. वेदों से लेकर आज तक हमारे पास जितने भी ग्रन्थ हैं सबके निष्कर्ष लगभग एक जैसे हैं. अगर निष्कर्ष एक जैसे हैं तो निश्चित रूप से आधार भी एक जैसा होगा. हमें जो उपरी भिन्नताएं नजर आती हैंअगर हम भिन्नताओं के इस आधार को पहचान लें तो किसी हद तक  हम भी उपलब्धि के करीब पहुँच सकते हैं. उस फूल की तरह जिसे देखने मात्र से ही हमें ईश्वर का अहसास होने लगता हैहम खुद की अस्मिता को भूल कर उस फूल में खो जाते हैंहमारा खुद को भूलकर उस फूल के प्रेमपाश में बंध जाना उस फूल की उपलब्धि को निर्धारित करता हैऔर उस फूल में सिर्फ हम ही नहींबल्कि इस कायनात का हर जीव समा सकता है. अब हम खुद को ही देखेंइस इनसानी जन्म को कहा तो सर्वश्रेष्ठ जाता है. निश्चित रूप से यह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है. ईश्वर ने इसे अपने रूप में उतारा है और खुद जब ईश्वर ने धरती पर अवतार लिया तो मानव तन का ही सहारा लिया और दुनिया का मार्गदर्शन किया खासकर इनसानों का. उसे अवतरित होना पड़ा इनसानों को समझाने के लिएउन्हें जीवन की सार्थकता की पहचान करवाने के लिए. तैतरीय उपनिषद में इसे यूँ अभिव्यक्त किया गया है : 
                             यतो वा इमानि भूतानि जायन्तेयेन जातानि जीवन्तिI
                            यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तितद्विजिज्ञासस्वतद्ब्रह्मेतिI (तै०उ0 312)
 यह सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैंउत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, तथा अन्त में प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैंउसको जानने की इच्छा कर और वही ब्रह्म है. अब जब सृष्टि का आधार ही ब्रह्म है तो उसे जानना आवश्यक है और मानव जीवन का लक्ष्य भी वही है. यानि उपलब्धि का आधार ईश्वर है हम सब इससे पैदा हुए हैं और इसी में समायेंगे. शेष अगले अंकों में ....!

20 जनवरी 2012

अस्तित्व की तलाश .. 2

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गत अंक से आगे....आखिर क्या कारण है कि कुछ लोगों का अस्तित्व उनके ना होने पर भी बना रहता है और कुछ ऐसे भी हैं जो जीवन की दौड़ में जीते जी खो जाते हैं. वह साँसें तो ले रहे हैं, चल फिर तो रहे हैं. भोजनभोग और निद्रा सब कुछ कर रहे हैं. लेकिन फिर भी अधूरे हैं. उनके जीवन का कोई लक्ष्य नहींकोई आधार नहींकोई सोच नहीं. बस जी रहे हैं जिन्दगी एक अनजान की तरह जो खुद के साथ होते हुए भी खुद से नहीं मिल पाते, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता हैखैर यहाँ आज तक यही तो होता आया है. हमारे दर्शन में तो पहले ही स्पष्ट है कि "आये हैं सो जायेंगेराजा रंक फकीर.  एक सिंहासन चढ़ चलेएक बाँध जंजीर" जो जंजीरों में बंध गया उसने खुद को खो दिया. वह खुद को भूल गया. उसके जीवन का कोई मकसद नहीं रहा. लेकिन जिसने खुद से बात कर लीखुद की भावना को समझ लिया वह जीवन के मकसद के करीब पहुच गया. संभवतः उसने अपने अस्तित्व को पहचान लिया और सजग हो गयाजीवन के प्रति.
अब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इनसान खुद के अस्तित्व को कैसे पहचानेयह बड़ा जटिल प्रश्न हैऔर संभवतः इसका हल इतनी आसानी से निकलने वाला नहीं. जिनको इसका हल मिल गयाउनके जीवन की दुबिधा समाप्त हो गयी. लेकिन ऐसा आज तक बहुत कम लोगों के साथ हुआ है. अस्तित्व को तलाशना असाध्य वीणा को बजाने जैसा है. यहाँ सब बड़े-बड़े अहंकारी हार जाते हैं और जो खुद को उस किरीटी तरु को समर्पित कर देता है, वह वीणा बजाने में सफल हो जाता है. यही अस्तित्व है. हम किसी वाद्य यंत्र को देखते हैं. कहीं से क्या ऐसा प्रतीत होता है जो उसकी महता को बताता हो. देखने में वह वाद्य धातुलकड़ी या किसी से भी निर्मित होता है. लेकिन उस वाद्य का अस्तित्व तो उससे निसृत होने वाली मधुर ध्वनि से है और वह ध्वनि कोई अनाडी नहीं निकाल सकता. उसका स्पर्श करने से तो स्वर भंग हो जाता है. लेकिन जब कोई साधक उसे बजाता है तो उस निर्जीव सी वस्तु से निसृत स्वर हमें आनंद के सागर में डुबो देता है. अब वहां एक ऐसा वातावरण बना जिसने हमें सोचने पर विवश कर दिया. साधक का अस्तित्व स्वर से जुड़ गयाऔर वाद्य का अस्तित्व साधक से जुड़ गया. वाद्य से मधुर ध्वनि निसृत हो सकती है, लेकिन उसके लिए साधक चाहिएअब साधक मधुर ध्वनि से वातावरण को सहज बना सकता है, लेकिन उसे वाद्य चाहिए. दोनों का मकसद ध्वनि हो गया. साधक का भी और वाद्य का भी. जब तक दोनों का तालमेल बना रहा, दोनों का अस्तित्व बना रहाऔर जब किसी एक ने दुसरे की महता को कमतर आँका अस्तित्व तलाशने से महरूम हो गए. जीवन जीने के आनंद से वंचित हो गए. 
अस्तित्व के मामले में यही बात सभी पर लागू होती है. जिस तरह शरीर आत्मा के बगैरऔर आत्मा शरीर के बगैर कोई पहचान नहीं रखते. लेकिन आत्मा के लिए शरीर का होना ही काफी नहीं है और शरीर के लिए आत्मा का होना. दोनों की सत्ता एक दुसरे से भिन्न नहीं. दोनों का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. शरीर स्थूल है और आत्मा सूक्षमशरीर क्षणभंगुर है और आत्मा कालातीत. आत्मा परमात्मा का अंश है, तो शरीर प्रकृति का. लेकिन यह दोनों एक ही सत्ता के दो रूप हैं. किसी हद तक हम सोच सकते हैं कि आत्मा के कारण शरीर का अस्तित्व है और शरीर के कारण आत्मा का. लेकिन जिस अस्तित्व की बात में कर रहा हूँ यह अस्तित्व का अगला पड़ाव है , और जिसने इसकी पहचान कर ली वह सवंर गया.
हम खुद को नहीं खोज पातेक्योँकि हम खुद को जकड देते हैं कभी भाषा मेंकभी जाति मेंकभी धर्म मेंकभी मजहब मेंऔर कहीं संसारिक रिश्तेदारियों में. निभाने के तौर पर तो यह सब ठीक हैं, लेकिन हम खुद की पहचान इन्हें बना लें तो यह हमारे लिए सही नहीं होगा. हम अपना अस्तित्व इन्हें मान लें तो बड़ी भूल हो जायेगी. क्योँकि  "जो दीसे सगल विनासेज्यों बादल की छाहीं". जो कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है वह सब नष्ट होने वाला हैऔर जो खुद ही एक दिन नष्ट हो जायेगा उसे हम अपना अस्तित्व कैसे मान लेंगे. खुद के अस्तित्व को तलाशना है तो निर्लेप भाव से संसारिक दायित्वों को निभाते हुएआत्मा को परमात्मा में स्थापित करते हुए जीवन की यात्रा को तय करें. बिना किसी पूर्वाग्रह केतब हम पायेंगे कि इस सृष्टि में जो भी प्राणी हैं, वह हमसे गहरा रिश्ता रखते हैं और अगर हम ऐसा भाव बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो अपने अस्तित्व को स्थापित करते हुए हम उसे कायम रख पायेंगे

14 जनवरी 2012

अस्तित्व की तलाश .. 1

30 टिप्‍पणियां:
इस प्रकृति को जब भी भीतर की आँख से देखता हूँ तो बहुत कुछ अप्रत्याशित सा महसूस होता है , और जब इसके करीब जाकर इसको अपने पास महसूस करता हूँ तो भाव विभोर हो जाता हूँ . यह एक बार नहीं बल्कि कई बार होता है . इस अनुभूति का कोई निश्चित क्रम नहीं है . कोई समय नहीं है और कोई सीमा भी नहीं . सब कुछ अप्रत्याशित है . सब कुछ अनुभूति के स्तर पर घटित होता , अभिव्यक्त नहीं हो पाता , एक अनुभव बन जाता है जीवन के क्रम में . जीवन अनिश्चित है और इस अनुभव का जीवन में दखल भी अनिश्चित है . हर किसी के लिए एक सी प्रकृति में अनुभव अलग है . आज तक प्रकृति में भी परिवर्तन हुए हैं . लेकिन एक ही समय में , एक ही वातावरण में रहने वाले इंसानों के अनुभव अलग - अलग हैं , यह बहुत अद्भुत बात है . एक ही माता पिता से जन्म लेने वाले दो जुडवा बच्चों के अनुभव अलग हैं . सोच अलग है , व्यवहार अलग है . ऐसा बहुत कुछ अलग है जिसकी कल्पना करना हमारे मस्तिष्क से बाहर है , और यही है वह जिसे हम अस्तित्व कहते हैं . 

पूरी प्रकृति पांच तत्वों का मिश्रण है और चेतना का स्रोत एक ही है . लेकिन विविधता इतनी कि जितनी आँखें उतने नज़ारे , जितने मस्तिष्क उतने विचार , जितने ह्रदय उतनी भावनाएं , जितने मन उतनी इच्छाएं . सब कुछ अप्रत्याशित सा जान पड़ता है , और जब हम इस सब अप्रत्याशित को करीब से अनुभव करते हैं तो हम खुद को अद्भुत पाते हैं . खुद को धन्य पाते हैं . खुद को हम खुदा का तोहफा मानते हैं . लेकिन ऐसा अनुभव हमें जीवन में होता नहीं . क्योँकि हमारे पास समय नहीं . खुद के करीब आने का . खुद के भीतर झाँकने का . खुद से प्रेम करने का . खुद को महसूस करने का . लेकिन एक तलाश हम जिन्दगी में जरुर करते हैं . जिसे हम अस्तित्व कहते हैं . यह तलाश हम बचपन से जीवन के निर्वाण तक करते हैं . जन्म से मृत्यु तक करते , आत्मा से परमात्मा तक करते हैं . आशा से निराशा तक करते हैं . लेकिन हमारे हाथ क्या लगता है ? यह हमारी तलाश पर निर्भर करता है . हम खोजना क्या चाह रहे हैं ? हमारी आवश्यकता क्या है ? जिसने अपनी आवश्यकता को पहचान लिया , उसका लक्ष्य आसन हो गया . उसके सामने कठिनाईयां भी हैं , लेकिन दृढ निश्चयी है तो लक्ष्य तक जरुर पहुंचेगा ..और उसका लक्ष्य तक पहुंचना उसके अस्तित्व का बोध करवाता है .
अब प्रश्न उठता है कि अस्तित्व की तलाश जरुरी क्योँ है ? क्या बिना अस्तित्व के भी जिया जा सकता है ? अस्तित्व की तलाश व्यक्ति नहीं करता , ना ही उसे इसकी जरुरत है . लेकिन एक बात बहुत महत्वपूर्ण है वह यह कि अस्तित्व की तलाश उसका स्वभाव है . वह इसके बिना जी ही नहीं सकता . वह चाहता नहीं है कि वह अस्तित्व को तलाशे , लेकिन फिर भी स्वभाववश इस तरफ अग्रसर होता है . जिसने खुद के  इस स्वभाव को पहचान लिया वह अस्तित्व के लिए चिंतित तो नहीं लेकिन सजग जरुर होता है , और वहीँ से शुरू होता है जीवन की सार्थकता का सफ़र . हमारे धर्म ग्रन्थ इस विषय पर गहनता से प्रकाश डालते हैं . जीवन एक रोचक सफ़र है . अगर हम इसे जियें तो , एक ऐसा अनुभव है जिसका कोई सानी नहीं . लेकिन हम जीवन को जीते ही कहाँ हैं ? सबसे बड़ी भूल तो यहाँ होती है . हमारे पास साँसे होती हैं जिन्हें हम बिना लक्ष्य के जीते हैं और फिर विदा हो जाते हैं . हमारे जाने के बाद ना तो कोई हमारा अस्तित्व होता है और न कोई याद . यह क्रम चलता रहा है सदियों से . जिनका अस्तित्व है , जिन्हें हम याद करते हैं वह शरीर रूप में विद्यमान नहीं , लेकिन उनका अनुभव हमारे पास है . उन्होंने जो महसूस करने के बाद अभिव्यक्त किया वह हमारे पास है और जब तक वह हमारे पास है तव तक उनका अस्तित्व बना रहा है , और बना रहेगा .   
शेष अलगे अंकों में ........!                                                       

31 दिसंबर 2011

जब तुझे रुकना ही नहीं है तो

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समयसोचता हूँ तू किसी दिन अगर ठहर जाता तो मेरी सांसों का यह सफ़र भी थोड़ी देर के लिए विश्राम पाता और मैं करता तुझसे बातें तेरे साथ बिताये लम्हों कीऔर उस वक़्त मुझे लगता तू कहीं नहीं है और मैं भी कहीं नहीं. हम दोनों की एकात्मकता यह स्थापित करती कि जीवन और जगत संचालित हैं किसी अदृश्य सत्ता सेऔर वह अदृश्य सत्ता हम दोनों को बतला रही है जीवन के मायनें. तुम हमेशा उस अदृश्य सत्ता से निभा जाते होलेकिन मैं हमेशा तेरे अच्छे होने का इन्तजार करता रहता. तू अच्छा कब है और कब बुरा यह आज तक कोई नहीं जान पाया. लेकिन इस बात को सभी स्वीकार करते हैं कि वक़्त बड़ा बलवान होता है’. कई बार इस बात को सुनकर मेरे मन में भ्रम भी हुआलेकिन सच्चाई यही है. अब मैं भी यही मानता हूँ और आज तेरे सामने नतमस्तक हूँ. तुझे एक सीमा में बांधकर विदा करने के लिए. हालाँकि जो पैमाना हमने तुझे विदा करने के लिए तय किया है वह तो प्रकृति का बदलाब हैऋतुओं का रूपांतरण है और उस प्राकृतिक बदलाब में हमनें तुझे भी शामिल किया. चलो आज मानते हैं कि एक साल के रूप में तू हमसे विदा हो रहा है. लेकिन सच यह है कि यह सब सोच है और किसी हद तक यह सोच प्रासंगिक भी. ना जाने कब से यह सब चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगामेरी साँसों का सफ़र जब तक इस रूप में तेरे साथ है तब तक तो है हीऔर ना जाने कितने रूपों में रहा हैऔर ना जाने कब तक रहेगा. खैर बहुत हो चुकी बातें तुमसे और जितनी करूँगा काम तो आने वाली नहीं. जब तुझे रुकना ही नहीं है तो  मैं कैसे कहूँ कि तू ठहर जा.
याद आएगा तू मुझे  2011 के रूप में सांसों के अंतिम सफ़र तकजीवन की नियति तक. क्योँकि तुझसे बहुत अच्छी यादें जुडी हैं  मेरी वर्ष 2011 के रूप में. पता ही नहीं चला कि तू जीवन से कब जुदा हो गया. लेकिन जब पीछे मुड़कर देखा तो सच में तू मुझसे जुदा हो रहा है. अहसास हुआ मुझे आज तेरे होने काबहुत कुछ खोने और उससे ज्यादा कहीं पाने का. क्या-क्या नहीं दिया तूने मुझे पूरे   दिनों  मेंयह सब सोच कर रोमांचित हो रहा हूँ मैं और आने वाले वर्षों में जीवन जीने की प्रेरणा ले रहा हूँहालाँकि यह भी सच है कि जीवन और साँसों का सफ़र अनिश्चित हैलेकिन यह भी सही है कि साँसों के सफ़र के साथ ही जीवन का सफ़र भी जुड़ा रहेगा. बस यह बात अच्छी तरह से मेरे जहन में रहनी चाहिएफिर मैं किसी भी हालत में तुझे विस्मृत नहीं कर पाऊंगा और अगर मैंने तुझे कभी विस्मृत नहीं किया तो यह निश्चित है कि मेरे जीवन की सार्थकता किसी न किसी तरीके से सिद्ध ही हो जाएगी. क्योँकि मैंने जीवन में सफल लोगों से यही सुना है कि वक़्त की कद्र करोऔर यह भी सुना है कि जो वक़्त की कद्र करता है वक़्त उसकी कद्र करता हैइसलिए मुझे हमेशा तेरी कद्र का भान रहे . फिर भी वर्ष 2011 के रूप में तुझे अच्छी यादों के साथ विदा कर रहा हूँअब हम फिर वहीँ से शुरू करेंगे जहाँ से हमने तेरा साथ लिया थाजब तू आया था तो हमने खूब मस्ती की थी और तेरा स्वागत किया था हमने एक जनवरी 2011 के रूप में. आज फिर एक जनवरी है और उसे हम 2012 कहेंगे और सोचेंगे कि नया साल आया है और यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है और चलती रहेगी. हम जीवन को एक प्रक्रिया के तहत जीते हैं और वह प्रक्रिया दिन, महीनों और सालों के रूप में हमारे जीवन में घटित होती है. 
खैर अब समय तू वर्ष 2012 के रूप में हमारे सामने हैं. हर किसी की जिन्दगी का अपना मकसद है और हर कोई जीवन को सफल बनाने में लगा है. इसलिए जब तू 2012 के रूप में हम सबके साथ है तो कामना यही है कि हर किसी को सुमति प्राप्त हो और हर कोई संकीर्णताओं से उपर उठकर देशसमाज और मानवता के लिए कार्य करे. आज जो रूप मानव का हमारे सामने है उससे हमें राहत मिले. देश और दुनिया में जो अशांति फैली हुई है वह जितनी जल्दी हो सके समाप्त हो और इस सुंदर सी धरती का वातावरण और सुंदर हो जाए. पूरी कायनात खुदा का कुनबा है और इस में रहने वाला हर एक प्राणी खुदा की खुबसूरत कृति है. ऐसा वातावरण बने कि हम इस पूरी कायनात से प्रेम कर सकें. हमारी शुभकामनाएं तभी असर करेंगी जब हमारा आचरण और कर्म सही होगा. इसलिए खुद के जीवन और चरित्र को विश्लेषित करने का भी एक अवसर तू हमें प्रदान कर रहा है और हम ऐसा कर पायें. जब धरती पर सभी मानवीय मूल्यों को धारण कर जीवन जीयेंगे तब हमारा अपना जीवन तो सार्थक होगा ही औरों के लिए भी हम प्रेरणा और सुख का कारण बनेंगे. इसी कामना के साथ आप सभी को नववर्ष 2012 की हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आने वाला वर्ष हम सब की जिन्दगी में ढेर सारे सुखद अहसास लाये और हम सबका जीवन खुशियों से सराबोर हो. इन्हीं कामनाओं के साथवर्ष 2012  तेरा स्वागत है.