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24 मई 2014

वास्तविकता को समझने की जरुरत...2

3 टिप्‍पणियां:
जब समाज में मानवीय मूल्यों के विपरीत कुछ भी देखता हूँ तो एक पीड़ा का अनुभव होता है, एक टीस मन में पैदा होती है. एक दर्द उठता है और फिर जीवन की वास्तविकता को समझने का सिलसिला शुरू होता है.
गतांक से आगे......!!! जब हम मानवीय मूल्यों की बात करते हैं तो हम बहुत बृहत् परिप्रेक्ष्य को सामने रखकर विचार करते हैं. मानवीय मूल्य शब्द सिर्फ मानव का मानव के प्रति प्रेम का, सम्मान का ही परिचायक नहीं है. बल्कि मानवीय मूल्य शब्द मानव के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर जीव के प्रति, प्रकृति के प्रति और इन प्राकृतिक संसाधनों के प्रति मानव द्वारा किये गए व्यवहार का परिचायक भी है. मनुष्य को संवेदनशील प्राणी कहा जाता है, लेकिन उसकी संवेदना का दायरा जब व्यक्तिगत लाभों के इर्द गिर्द घूमता है तो फिर उसके मनुष्य होने के भाव तिरोहित हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने लाभ के विषय में ही सोचता है, वह अपने हर कर्म में, हर फैसले में, अपने हर सम्बन्ध में सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ और अपने हितों को ही तरजीह देता है. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है. दुनिया भर के सम्यक परिप्रेक्ष्य पर अगर हम नजर डालें तो हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि आज के मनुष्य ने अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किस कदर मानवीय मूल्यों को ताक पर रखा है. यह बात भी दीगर है कि आज मनुष्य अपनी लिप्साओं के कारण मनुष्य के ही खून का प्यासा बना फिरता है और दूसरी और उसने समाज में ऐसी व्यवस्थाएं कायम की हैं कि उनके बल पर वह किसी दूसरे व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक शोषण करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है. ऐसी स्थिति में मानवीय मूल्यों पर बहुत गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हो जाते हैं और समय रहते अगर इन प्रश्नों का समाधान न किया जाए तो फिर यह समाज के लिए तो घटक होते ही हैं, लेकिन मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी यह खतरा बने रहते हैं. 

मनुष्य जब तक वास्तविकता को समझने की तरफ कदम नहीं बढाता तब तक उसके सामने भ्रम बने रहते हैं और जब तक यह भ्रम बने रहते हैं तब तक वह अपने आप को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ समझता रहता है और इस भाव के साथ जिन्दगी जीता है कि वह जो कुछ भी करेगा वह सही ही होगा. लेकिन इस बात के दूसरे पहलू की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता. जाए भी कैसे, उसके सामने बचपन से ऐसा वातावरण तैयार किया है कि उसे हर हाल में श्रेष्ठ बने रहना है. हर हाल में दूसरे से आगे निकलना है, चाहे उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े, लेकिन खुद को श्रेष्ठ बनाना उसके जीवन का मंतव्य है. एक स्थिति में यह बात सही भी लगती है, क्योँकि मनुष्य कर्म योनि है और उसे हर हाल में कर्म के माध्यम से खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करना है, क्योँकि जब एक मनुष्य अपने बल पर बिना किसी स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा के श्रेष्ठ कर्म कर्ता है तो उस कर्म का लाभ मानव को तो मिलता ही है साथ ही साथ ऐसा वातावरण बनता है कि बाकी लोग भी उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं और वैसे कर्म में प्रवृत होते हैं. जिससे सबको सकून मिलता है, शांति मिलती है और ऐसे कर्म करने वाले दुनिया भर के प्राणियों के लिए आदर्श साबित होते हैं. 

मनुष्य का मनुष्य के लिए आदर्श स्थापित होना बहुत गहराई से सोचने को विवश करता है. आखिर क्या
ऐसा कोई मनुष्य अपने जीवन रहते कर जाता है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक साबित होता है. उसके वचन, कर्म, जीवन को जीने का सलीका, मानवता के लिए किये गए उसके कार्य सब कुछ इतना आदर्श होता है कि आम मनुष्य अपने आप को बौना समझने लगता है, और हो भी क्योँ न, क्योँकि जिस व्यक्ति के विषय में हम सोच रहे हैं वह मनुष्य अपने जीते जी मानवता के उन आदर्शों को जीने में कामयाब हुआ है जिसके विषय में हम सोच भी नहीं सकते हैं. ऐसी स्थिति में हम उस व्यक्ति के जीवन का आकलन करते हैं, उसके विचारों और कर्म को समझने की कोशिश करते हैं उसने जीवन में जो कुछ अर्जित किया, जिस तरह से किया उसे समझने का प्रयास करते हैं तो भी हम जीवन को किसी हद तक बेहतर तरीके से जी सकते हैं. लेकिन यह सब तब ही संभव हो पायेगा जब हमारा चिन्तन और हमारा दृष्टिकोण मानवीय मूल्यों के अनुरूप होगा. वर्ना बिना किसी उद्देश्य के  जीवन तो हर कोई जी कर यहाँ से रुखसत होता ही है. 

जीवन और मृत्यु हर प्राणी के जीवन के दो किनारे हैं. मनुष्य को इस धरा पर रहने वाले प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. इस सर्वश्रेष्ठता के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, कई तरह के सिद्धांत, कई तरह की अवधारणायें आज तक मनुष्य की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए प्रचलन में आई हैं. सैद्धांतिक तौर पर बेशक मनुष्य को कितना भी श्रेष्ठ क्योँ न कहा गया हो लेकिन उसे खुद को व्यावहारिक तौर पर श्रेष्ठ सिद्ध करना है, और जब तक वह ऐसा नहीं कर पाता तब तक लिखने और कहने को चाहे कुछ भी कहा जाए लेकिन यह सब वास्तविकता से दूर ही होगा, और इसे एक तरह से मनुष्य की हार भी कहा जा सकता है. क्योँकि अपने विषय में जो धारणा उसने बनाई है वह उसकी अनुपालना में ही सक्षम नहीं है. ऐसी स्थिति को हम मनुष्य की हार न कहें तो क्या कहें? इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें वास्तविकता को समझने की जरूरत है, क्योँकि यह इसलिए जरुरी है कि जब हम वास्तविकता को सामने रखकर अपने मंतव्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे तो बेशक हम शत-प्रतिशत सफल न हो पायें, लेकिन आंशिक रूप से भी सफल हो पाते हैं तो यह हमारे लिए सबसे सुखद होगा. 

आज दुनिया ने तकनीकी और भौतिक रूप से बहुत विकास कर लिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे पहले हुए युगों में भी मनुष्य ने इससे कहीं अधिक विकास तकनीकी रूप से किया है, अपनी सुख सुविधाओं के साधनों के साथ-साथ उसने कई अन्य वैज्ञानिक और अध्यात्मिक प्रयोग मनुष्य के जीवन और प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए किये हैं. लेकिन उसे जितनी भी सफलता मिली है उसे उसने अपने जीवन का, कर्म का हिस्सा बनाया है और आज हमारे सामने वह सब आदर्श के रूप में हैं. लेकिन आज हम देखते हैं कि मनुष्य में भौतिकता की एक लिप्सा सी है और इसी लिप्सा के चलते वह वास्तविकताओं से दूर हटकर अपने जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है. एक ऐसा जीवन जिसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ भौतिकता को हासिल करना है और उसके बल पर वह सुख और शांति की तलाश में है, लेकिन भौतिक चकाचौंध में वह यह भूल गया है कि सुख और शांति भौतिकता को अपनाने से नहीं आने वाली, अगर इन्हें जीवन का हिस्सा बनाना है तो उसे वास्तविकता को समझना होगा. शेष अगले अंक में.....!!!        

19 मई 2014

वास्तविकता को समझने की जरुरत...1

3 टिप्‍पणियां:
दुनिया जिस रफ़्तार से बदल रही है वह हमारे लिए एक अद्भुत सत्य है. भौतिक संसाधनों का जिस तरीके से फैलाव आज हम दुनिया में देख रहे हैं वह मनुष्य की प्रगति का सूचक है. इस पड़ाव पर पहुँचने के लिए मनुष्य ने अपने जीवन के सभी साधनों को समर्पित किया है. मनुष्य के आज तक के इतिहास पर अगर हम एक निगाह डालें तो हमें यह आसानी से समझ आयेगा कि मनुष्य ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही प्रकृति के रहस्यों को समझने की चेष्टा की है और अपने जीवन को साधन सम्पन्न बनाने के लिए निरंतर प्रयास किया है. उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती जीवन को समझने की भी रही है. भौतिक साधनों की पूर्ति, उनका उत्पादन, जीवन में उनकी महत्ता और प्रयोग, विज्ञान और तकनीक के माध्यम से प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के अलावा मनुष्य के चिन्तन का विषय इस जीवन के पार झाँकने का भी रहा है, और उसने उसे जीवन की वास्तविकता को समझना कहा है.

जीवन की इस वास्तविकता को समझने के चक्कर में उसने कई अवधारणाओं को जन्म दिया. कई सिद्धांत
बनाए, कई मार्गों का निर्माण किया, कई पद्धतियाँ विकसित की और अंततः जिस लक्ष्य को उसने निर्धारित किया उसे उसने मोक्ष (जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्ति) की संज्ञा दी. ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीवन में चाहे कुछ भी कर ले लेकिन मोक्ष के रास्ते पर चलना उसके लिए अनिवार्य हो गया. ऐसी स्थिति में समाज में उसके लिए कुछ नियम और कायदे बनाये गए. अब दुनिया को अलग-अलग तरीके से विश्लेषित किया जाने लगा. सनातन धर्म से लेकर आज तक जितने भी धर्म, जितनी भी विचारधाराएँ, जितनी भी दार्शनिक अभिव्यक्तियाँ हमारे सामने हैं उन सभी को जब हम गहराई से विश्लेषित करते हैं तो पाते हैं कि इन सभी का लक्ष्य मनुष्य को मोक्ष की तरफ ले जाने का रहा है, और अगर मनुष्य को इस दिशा में बढ़ना होता है तो उसे इस दुनिया और इसके भौतिक साधनों का त्याग करना होगा. बौद्ध और जैन धर्म में हम इस पराकाष्ठा को देख सकते हैं. जहाँ एक साधक के लिए न तो भौतिक जगत के मायने हैं और न ही उन्हें इस जगत से कोई ख़ास सरोकार है. उनके लिए समाज के कोई ख़ास मायने नहीं, शारीरिक सुख सुविधाओं का कोई ज्यादा मोल नहीं. धन संचय का कोई ख़ास स्थान नहीं बस जीवन को चलाने के लिए जो आवश्यक है उससे ही उन्हें जीवन चलाना है और इस जीवन के पार जो कुछ है उसे पाने का प्रयास इस जीवन के रहते हुए करना है. 

इस सबको करने के लिए मनुष्य की एक ख़ास मानसिकता तैयार की जाती है, उसे ऐसा वातावरण प्रदान किया जाता है और अंततः वह इस दिशा में सर्वस्व अर्पित करते हुए आगे बढ़ता है. मोक्ष को प्राप्त करने की दिशा में अनेक प्रयास वह करता है और जीवन के रहते हुए वह इस शरीर को, इसकी मूलभूत आवश्यकताओं को और अपनी इच्छाओं की परवाह किये वगैर आगे बढ़ता है और यही सोचता है कि इस जीवन के न रहने के बाद उसे जो कुछ भी मिलेगा वह उसके लिए सुखद होगा और वहां पहुँच कर वह उन सभी तमाम सुख सुविधाओं का उपभोग करेगा जो मनुष्य जन्म में उसकी साधना और तपस्या के बल पर उसे मिलेंगी. कमोबेश हर धर्म के मूल में यह बात प्रचलित है और इसलिए कुछ लोग जन्म के बाद ही उस दिशा में बढ़ते हैं और अपने जीवन को किसी ख़ास विचारधारा, जीवन पद्धति, फिर किसी गुरु के हवाले करके अपने आप को मोक्ष के हकदार मान बैठते हैं और उनके जीवन की हर गतिविधि, हर कर्म उसी अनुरूप होता है, यदा-कदा वह अपने गुरु के माध्यम से ईश्वर  साक्षात्कार की बात भी करते हैं और खुद को आनन्द से सराबोर कहते हुए दूसरों को भी इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देते हैं, और जो उनका गुरु होता है वह किसी मनुष्य के उससे जोड़ने और जुड़ने को सबसे बड़ा कर्म मानता है. 

यह क्रम न जाने कब से चला आ रहा है और संसार के लोग इन सब गतिविधियों में न जाने कब से शामिल हैं और आज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो ऐसी संस्थाओं और मोक्ष की प्राप्ति करने और करवाने वालों की बाढ़ सी आ गयी है. हर चौराहे पर एक ऐसी दुकान जरुर होगी जहाँ से आप अपने मोक्ष जाने का रास्ता पूछ सकते हैं और उस दुकान के नियमित ग्राहक बनकर आप अपनी आने वाली सात पीढ़ियों का कल्याण कर सकते हैं. बस इसी चक्कर में लोग दिन रात भाग दौड़ कर रहे हैं और उनका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस बात को पहुंचाने का रहता है कि जिस तरह से हमने अपने मोक्ष का रास्ता पक्का कर लिया है उसी तरह तुम भी अपने मोक्ष का रास्ता पक्का कर लो. यह दुनिया कुछ भी नहीं है, जो कुछ इस दुनिया में है वह सब तो यहीं रह जाएगा, हम क्या लाये थे और क्या हमें लेकर जाना है. बस हम अच्छे कर्म करें और आगे के रास्ते को सुगम बना लें. नहीं तो आगे का मार्ग बहुत कठिन है, वहां बहुत यातनाएं मिलती है और उन यातनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए एक विशेष प्रकार का साहित्य तैयार किया गया है, जिसके उदहारण देकर व्यक्ति को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि इस जीवन के बाद का मार्ग कैसा है और तुम्हें वहां से बचने के लिए क्या-क्या करना है. तुम उस मार्ग पर जाओ ही नहीं इसके इंतजाम तुम्हें इस जीवन में रहते हुए करने होंगे. ऐसे माहौल में व्यक्ति अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसे कामों में लगता है जिसका उसके जीवन से कोई खास सरोकार नहीं होता. वह अपने अगले जीवन को सुखद बनाने के चक्कर में इस जीवन को ही स्वाहा कर देता है. 

ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए. यह एक बड़ा प्रश्न है. हमारे समाज की व्यवस्था ही कुछ ऐसी बन गयी है कि अब हमें इन सब भ्रमों से निकलने के रास्ते तलाशने चाहिए. हालाँकि व्यक्तिगत रूप से न तो मैं किसी विचारधारा का विरोध करता हूँ और न ही मुझे ऐसा करने का कोई अधिकार है. लेकिन जब समाज में मानवीय मूल्यों के विपरीत कुछ भी देखता हूँ तो एक पीड़ा का अनुभव होता है, एक टीस मन में पैदा होती है. एक दर्द उठता है और फिर जीवन की वास्तविकता को समझने का सिलसिला शुरू होता है .....शेष अगले अंकों में ....!!!!                                                               

29 अप्रैल 2013

मात्र देह नहीं है नारी...3

13 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे इतिहास चाहे नारी के विषय में कुछ भी कहता है लेकिन हमें वर्तमान को देखने की जरुरत है, और यह भी सच है कि आज अगर हम सही और तर्कपूर्ण निर्णय ले पाएंगे तो निश्चित रूप से हमारा इतिहास गौरव करने लायक होगा. हमें इस बात को भी समझना होगा कि इतिहास के निर्माण में वर्तमान का बड़ा योगदान है. यह बात भी काबिलेगौर है कि इतिहास हमें वर्तमान को समझने की दृष्टि देता है और वर्तमान एक तरफ तो इतिहास बनाता है और वहीँ दूसरी तरफ भविष्य की सारी नींव वर्तमान पर ही टिकी होती है. कुछ परम्परावादी आज भी इतिहास के दुहाई देते हैं और इतिहास को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखना अच्छा लेकिन वर्तमान को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखना अखरता है. क्योँकि हर काल की अपनी कुछ व्यवस्थाएं होती हैं और उन व्यवस्थाओं का प्रभाव मानव जीवन पर सीधे तौर पर पड़ता है इसलिए हमें बहुत सजग रहने की आवश्यकता है.

नारी के वर्तमान जीवन और स्थितियों की बात करें तो हमारे सामने स्थिति संतोषजनक नहीं है. हम बेशक उसे चमक दमक के साथ देख रहे हैं, तथ्यों और आंकड़ों पर गौर करें तो कुछ-कुछ स्थिति ऐसी ही दिखती है. लेकिन जो सोच हमारी नारी के प्रति होनी चाहिए थी या हम जो दावे कर रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है . हम जो कुछ कह रहे हैं वैसा कर नहीं नहीं रहे हैं, और जैसा कर रहे हैं वह दिल को द्रवित कर देने वाला है. इसलिए हमें क्षण-क्षण पर अपने आप को विश्लेषित करने की आवश्यकता है. अगर हम ऐसा कर पायेंगे तो निश्चित रूप से भविष्य को सुनहरा बना सकते हैं लेकिन यह सिर्फ एक कल्पना ही की जा सकती है. 

पिछले कुछ वर्षों से नारी की स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर बहुत सी बातें की जा रही हैं. लेकिन स्थिति यह है कि हम जिस स्तर पर थे उस स्तर से भी नीचे गिर रहे हैं और आये दिन कहीं तेज़ाब फेंका जा रहा है, कहीं सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है, कहीं पर उसका वर्षों तक शारीरिक शोषण किया जा रहा है और भी ना जाने ऐसे कई नकारात्मक पहलू हैं जो हमारे सामने उभरकर आये हैं. जिस देश की संसद में बलात्कार और शारीरिक शोषण को लेकर बहस हो रही हो उस देश कि स्थिति क्या हो सकती है, लेकिन यह बात भी गौर करने योग्य है कि यह बात सिर्फ भारत की ही नहीं है विश्व में ज्यादातर देशों में नारी की यही स्थिति है और दिनों दिन उसे हम देह ही समझने की कोशिश में है इसलिए तो उसके साथ हर पल अमानवीय व्यवहार हो रहा है और पूरा विश्व अँधेरे की गर्त की तरफ बढ़ रहा है और हम दुहाई दे रहे हैं कि हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं. यह कैसा विकास ? जिसमें मानव ही सुरक्षित न हो. बहुत गंभीरता से सोचता हूँ तो कुछ ऐसे पहलू सामने आते हैं जिनके बारे में सोचकार यह लगता है कि दुनिया का भविष्य अंधकारमय है.

नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं. एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती. अगर एक है तो
दूसरा भी है और दोनों में से किसे श्रेष्ठ कहें यह बड़ा बचकाना सा विश्लेषण होगा. लेकिन दुनिया के इतिहास पर नजर दौड़ा कर देखें तो ऐसा कभी लगा ही नहीं कि नारी और पुरुष को सामान दृष्टि से देखा गया हो. पुरुष की सोच हमेशा वर्चस्ववादी रही है और उसे अपने श्रेष्ठ होने का हमेशा भान रहा है, लेकिन मुझे आज तक इस सवाल का जबाब नहीं मिल पाया कि आखिर पुरुष अपनी श्रेष्ठता किस आधार पर निर्धारित करता है? हाँ यह भी सत्य है कि इतिहास में कुछ काल ऐसा रहा है जब नारी को पुरषों से श्रेष्ठ दर्जा दिया गया है, लेकिन यह बहुत अल्पकाल के ही हुआ है. फिर भी प्रश्न यह नहीं है कि इतिहास में क्या हुआ है और क्या होना चाहिए, प्रश्न तो यह है कि किस आधार पर नारी और पुरुष की श्रेष्ठता का निर्धारण किया जाता है और क्योँ? लेकिन जहाँ तक मेरी समझ है वह यही कि नारी और पुरुष में श्रेष्ठता का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और यही वास्तविक स्थिति भी है.  

यह तो बात कहने भर में सही लगती है लेकिन मैंने देखा है कि हम (कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) लड़की के जन्म होने पर उतने खुश नहीं होते जितने की लड़के जन्म पर. हर कोई जब विवाह करता है तो उसे यही चाह होती है कि उसकी पहली संतान लड़का ही हो और यह भाव नारी में भी देखा गया है, लड़के के पैदा होने की चाह में कई बार हम अपनी पारिवारिक स्थिति तक को भी दावं पर लगा देते हैं. विवाह का मतलब तो सिर्फ इतना ही था कि हम वंश को आगे बढ़ाएं और वह लड़के और लड़की के सवाल पर नहीं टिका है. लेकिन स्थिति इसके उलट है, जब हम आज तक मानसिक रूप से इस पहलू को ही नहीं समझ पाए तो फिर जो कुछ भी हम कह रहे हैं वह कहाँ तक सत्य है. इस प्रश्न का हल हर कोई अपने तरीके से खोजेगा लेकिन वास्तविक हल कोई नहीं होगा. लड़के के जन्म पर अति उत्साहित होना और लड़की के जन्म पर वह ख़ुशी न होना यह नारी को देह समझने से ही तो जुडा है. जबकि संवेदनात्मक धरातल पर दोनों में कोई अंतर नहीं.   शेष अगले अंकों में

25 अक्टूबर 2012

पुतले और वास्तविकता

18 टिप्‍पणियां:
यह संसार एक मेला है , यहाँ जो भी आता है अपना समय बिता कर चला जाता है आने - जाने का यह क्रम आदि काल से चला आ रहा है . पूरी कायनात को जब हम देखते हैं तो यह ही महसूस होता है कि इस जहां में कुछ भी नित्य नहीं है , शाश्वत नहीं है . अगर कहीं  कुछ शाश्वत है तो उसे हम ईश्वर की संज्ञा से अभिहित करते हैं . जो नित्य रहने वाला है , तीनो कालों में जो एक जैसा है , जिस पर किसी का भी प्रभाव नहीं होता , जिसकी सत्ता जड़ और चेतन दोनों में समायी है , जो सदा एक रस रहने वाला है , ऐसी ना जाने कितनी उपमाएं इस शाश्वत सत्ता के साथ जोड़ी जाती हैं और यह क्रम अनवरत रूप से इस संसार में चला रहता है . विश्व का कोई भी देश हो किसी न किसी रूप में वहां की जनता इस अदृश्य सत्ता के प्रति नतमस्तक रहती है , और उसी को जीवन का आधार मानती है . जहाँ तक भारतवर्ष  का सम्बन्ध है यह तो सृष्टि के प्रारंभ से ही ऋषि मुनियों की धरती रहा है   सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञानसे आलोकित करने वाले देश के रूप में इसे ख्याति प्राप्त है . लेकिन परिवर्तन की मार इस पर भी पड़ी है और यह भी प्रकृति के कोप आधार बनता रहा है . कभी मनुष्य के कारण तो कभी प्रकृति के कारण, फिर भी इस देश की सभ्यता और संस्कृति आज तक पूरे विश्व के लोगों का पथ प्रदर्शन करती रही है और आने वाले समय में ??? इस देश की अगर यही हालत रही तो इस देश की सभ्यता और संस्कृति पर कई तरह के प्रश्नचिन्ह खड़े हो सकते हैं और आज जो हम अपने अतीत की दुहाई देते फिरते हैं वह भी हमसे नहीं हो पायेगा . तब  हम मात्र राम - रावण करते रह जायेंगे और , पुतलों के जलने की ख़ुशी में अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को गवां देंगे , और इस धुन में यह भी भूल जायेंगे कि हम भी पुतले हैं और संभवतः पुतलों का कोई संसार नहीं होता , कोई अस्तित्व नहीं होता .  

आजकल पुतला जलाना एक प्रथा बन चुका है .जब भी कोई किसी नियम को तोड़ता है , या मानवीय  भावनाओं के खिलाफ कोई व्यक्ति कार्य करता है तो हम उसका पुतला जलाते हैं . लेकिन उस पुतला जलाने का किसी पर क्या असर होता है , यह मेरी समझ से बाहर है . पुतला जला लेने के बाद मैंने आज तक किसी के जीवन और चरित्र को बदलते हुए नहीं देखा और जो लोग पुतला जलाने में शामिल होते हैं संभवतः किसी न किसी तरह से वह भी उस व्यवस्था का हिस्सा होते हैं . ऐसी स्थिति में पुतला जलाना मात्र मनोरंजन ही होता है , और आज तक मैं यही देखता आया हूँ . लेकिन बड़ी गंभीरता से सोचता हूँ तो पुतला जलाने का आशय तो कुछ और है और जिस उद्देश्य से हम पुतला जला रहे हैं वह कुछ और है , यहाँ पर पुतला जलाना हमारे सामने एक विरोधाभास पैदा करता है , लेकिन हमारे पास कोई अवकाश नहीं कि हम उस विरोधाभास को दूर कर सकें और सही और वास्तविक परिप्रेक्ष्यों में इन चीजों को देख सकें . आज हमारे सामने जो स्थितियां हैं उनके मद्देनजर हमें सभी चीजों के वास्तविक मूल्यों को टटोलने की जरुरत है . उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक महता को समझने की हमें महती आवश्यकता है , जो आशय इन सभी परम्पराओं और मान्यताओं का है उसी सही परिप्रेश्य में उद्घाटित करने की जिम्मेवारी हमारी ही है और संभवतः हम उस जिम्मेवारी का निर्वाह सही ढंग से नहीं कर रहे हैं , जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरनाक साबित होगा . 

राम और रावण धर्म और अधर्म के प्रतीक नहीं , बल्कि धर्म और प्रतिधर्म के प्रतीक हैं . राम बेशक हमारी आस्था के केंद्रबिंदु हैं , जीवन की प्रेरणा के स्रोत हैं , मानवीय मूल्यों के रक्षक हैं और भी ना जाने क्या - क्या ? लेकिन रावण ? ? इसका तो नाम लेना भी हम बड़ा कष्टकारी समझते हैं . रावण के लिए हमारे जहन में सम्मान नहीं , अपमान है . वह निकृष्ट है , दुराचारी है , व्यभिचारी है . यह रावण के जीवन का एक पहलू है . लेकिन इसके अलावा रावण हमारे सामने क्या है ? यह सोचने का विषय है . अगर हम राम को ईश्वर का रूप या ईश्वर ही कह दें तो भी इस बात पर गहनता से विचार करना होगा कि रावण में ऐसी क्या अद्भुत बात थी जिसे मारने के लिए ईश्वर को इस संसार में अवतार लेना पड़ा .  इतिहास के गर्भ में हमें इस प्रश्न का उत्तर जरुर खोजना चाहिए . राम और रावण को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में हम शायद नहीं देख पाए . हमारी एकांगी दृष्टि और सोच ने राम और रावण दोनों के व्यक्तित्वों को समझने का अवसर नहीं दिया . आज जिस रूप में राम और रावण हमारे सामने हैं , उससे तो यही लगता है कि हम इन दोनों के जीवन मकसद को सही परिप्रेक्ष्यों में नहीं समझ पाए . 

आज जिस रूप में राम और रावण हमारे सामने हैं . वह काव्य की कल्पना के आधार पर हैं , इतिहास के आधार पर नहीं ,और शायद यही भूल हम आज तक करते आये हैं . इतिहास के आधार पर हमने इनके व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया ही नहीं और न ही करने की जरुरत समझी . भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनेकों पक्ष हैं जो राम और रावण के माध्यम से अभिव्यक्त हुए हैं . उस काल की स्थितियां और परिवेश भी कई रोचक जानकारियों से भरा रहा है . यह भी इन दोनों के  माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है  .   हम तकनीकी रूप से कितने सक्षम थे, इस बात का अंदाजा भी हमें इस काल के इतिहास को देखने से पता चल सकेगा  और कई ऐसे अनछुए पहलू हैं जो मात्र राम और रावण के माध्यम से ही हमारे सामने आ पायेंगे , लेकिन इसके लिए हमें अपनी एकांगी दृष्टि , कपोल कल्पना को छोड़कर इतिहास के गर्भ में झांकना होगा और मंथन करने पर जो कुछ हमें हासिल होगा, उसे समाज के साथ सांझा करना होगा . राम और रावण मात्र पुतलों का खेल नहीं, यह जीवन की विविध संस्कृतियों को समझने जैसा है , जीवन को वास्तविकता से जोड़ने जैसा है .

12 अक्टूबर 2012

साँसों के सफ़र का उत्सव

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भारतीय संस्कृति में उत्सव का बड़ा महत्व है. उत्सव शब्द सुनते ही हमारे जहन में एक रोमांच सा भर जाता हैमन ख़ुशी की कल्पना से झूम उठता हैऔर ऐसा लगने लगता है जैसे सारा वातावरण खुशियों से सराबोर होउत्सव मात्र हंसी-ख़ुशीनाच-गान या खेल का नहीं होताउत्सव तो जीवन की नैसर्गिकता का होता हैजहाँ हम साकार और निराकार को इकमिक महसूस करते हैं. वास्तविकता में उत्सव अपने में एक बृहत् अर्थ समाये हुए हैयह तो उस हर चीज का होता हैजहाँ लोग अपने पराये के भेद भूल जाते हैंदेशों की सरहदें यहाँ कोई मायने नहीं रखतीभाषायी भिन्नता यहाँ कोई अड़चन पैदा नहीं करती और किसी प्रकार का कोई मानसिक द्वंद्व यहाँ नहीं रहताअगर कुछ रहता है तोवह एक उत्सव! बस एक उत्सव,  उसके सिवा कुछ भी नहीं , और अगर हम साँसों के इस सफर को उत्सव में तब्दील कर पायें तो जीवन की महता बढ़ जायेजीवन कालजयी हो जाये.
हम उत्सव तो मनाते हैं सबकी ख़ुशी के लिएदूसरों की ख़ुशी में खुद को शामिल करना उत्सव की चरम सीमा है .जब किसी समारोह में लोगों को एक दुसरे से मिलते हुए देखता हूँ तो मन ख़ुशी से भर जाता है. उनका परस्पर सौहार्द भरा मिलन और मुस्कराहट भरा स्वागत एक आनंद देता है.  लेकिन दूसरे ही पल हमारी मानसिक दीवारें हमें घेर लेती हैंहमारी संकीर्णता हम पर हावी हो जाती हैतब सब कुछ ऐसा लगनेलगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं होयहाँ कोई ख़ुशी थी ही नहींकोई प्रेम नहीं था. एकदम भिन्न वातावरण और ऐसे वातावरण में  हमारे लिए उत्सव एक औपचारिकता बन जाता हैकुछ मजबूरी को निभाने जैसामात्र कुछ करने जैसा.  बस कर लिया या करना है उससे आगे कोई ख्याल नहीं फिर हम जुड़ ही नहीं पाए उत्सव से तो वास्तविक खुशी कहाँआनंद कहाँजब हम वास्तविक रूप से उत्सव से जुड़ ही नहीं पाए तो आनंद की बात कहीं दूर हैऔर जब हम आनंद और खुशी को समझ ही नहीं पाए तो फिर जीवन के उत्सव होने की बात कहीं दूर है. जीवन एक उत्सव है यह सोचना भी बेमानी होगीएक कपोल कल्पना जैसे
इस धरा पर जब कोई नवजात जन्म लेता है तो सब उत्सव मनाते हैं. माँ को सबसे अधिक ख़ुशी होती है. पिता का हृदय भी आनंद से भर जाता है. दादा-दादीनाना-नानीचाचा-चाची ना जाने कितने रिश्ते उससे जुड़ जाते हैं. सिर्फ यह रिश्ते ही नहीं बल्कि समाज की कई ओर चीजें  भी उससे जुड़ जाती हैंफिर धीरे-धीरे उस नवजात का जीवन क्रम शुरू होता है. वह जीवन के सफ़र की ओर अग्रसर होता है. कई बार नहींबल्कि हर बार यह सुना जाता है कि बचपन बड़ा सुहाना होता है. लेकिन सबका बचपन सुहाना हो ऐसा सम्भव नहीं. यहाँ तो दरिन्दगी इतनी बढ़ चुकी है कि हम नवजात को जन्म से पहले  ही मार रहे हैं. जो जन्म लेकर इस धरा पर जीवन यापन कर रहे हैं वह भी कहाँ सुरक्षित हैं? हर कोई इस धरा पर परेशानियां झेल रहा है. हर किसी को जीवन में कुछ खोने का डर बना रहता है. जो कि काफी हद तक स्वाभाविक भी है ओर मानवीय वयवहार के अनुकूल भी. लेकिन मुश्किल वहां पर खड़ी हो जाती है जब हम मोहवश किसी को अपना मान लेते हैं, ओर उसके खोने का डर हमें हमेशा सताए रखता है. जीवन  में मोह और नासमझी हमारे जीवन उत्सव से हमें परेशानियों की और अग्रसर करते हैं. ऐसे हालात में हमारे जीवन में उत्सव का महत्व कम होता चला जाता है और एक दिन हम ऐसे मोड़ पर पहुँचते हैं जहाँ उत्सव कहीं पीछे छुट जाता है और मजबूरियाँ और औपचारिकताएँ जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. फिर जीवन-जीवन नहीं रहता तो उत्सव-उत्सव कहाँ रहेगा? 
मानव इस धरा पर एक ऐसा प्राणी है जो काफी हद तक प्रकृति को अपने अनुकूल कर सकता है. आज तक उसने ऐसे प्रयास किये भी हैं. उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है और उसी सफलता के आधार  पर वह अपने प्रयासों को जारी रखे हुए है. उसके इन प्रयासों के पीछे हमारे शास्त्रों की यह मान्यता भी कहीं सटीक बैठती है कि इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी कायनात है वह सब भोग योनियाँ हैं और मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म योनि प्राप्त है. जिसे बुद्धि और विवेक की सौगात ईश्वर द्वारा प्रदत है. ईश्वर ने जिसे अपने प्रतिरूप के रूप में जन्म दिया हैइसलिए वह सर्वश्रेष्ठ है. परमात्मा ने जो कुछ भी मानव को दिया है उसके आधार पर उसे श्रेष्ठ कहा जाये, किसी हद तक इस बात को माना जा सकता है. लेकिन यह एक पैमाना नहीं है जीवन की श्रेष्ठता का. यह जीवन की श्रेष्ठता का एक पहलू हो सकता है. जीवन की श्रेष्ठता के तो अनेक आयाम हैं. अगर हम उन्हें पूरी तरह से भी जीवन में अपना लें तो भी कहीं पर कोई कमी रह जाएगी. फिर भी अगर हम जीवन में कुछ करने के लिए प्रयासरत हैं तो कुछ न कुछ तो हमारे हाथ लगेगा ही. बस यही समझ है जो हमें जीवन की श्रेष्ठता की और ले जाती है. अगर हम जीवन में श्रेष्ठता के मानक भी छू पाएंगे तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. जीवन में नए मानक बनाना तो विरलों के हाथ में होता है. ऐसे इनसान तो ब्रह्माण्ड में कभी-कभी ही पैदा होते हैं और ऐसे इनसानों के व्यक्तित्व और विचारों की चमक इनती तेज होती है जो हजारों वर्षों तक फीकी नहीं पड़ती. लेकिन अफ़सोस कि ऐसे इनसानों की संख्या को आज हम अँगुलियों पर गिन सकते हैं , जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्मों से इतिहास की धारा को बदला है और हमारे लिए जीवन के नए और उदात मानक अख्तियार किये हैं. आये दिन जनसंख्या बढ़ने के नए-नए आंकड़े तो आते रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता के आंकड़े कोई नहीं बना सकता. आज हम जिन इनसानों को महान होने का दर्जा देते हैं वह किसी एक क्षेत्र में सिद्धहस्त थे. उसी कारण हम उन्हें महान की संज्ञा से अभिहित करते हैं. सम्पूर्ण इनसान तो आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ और ना ही होने की सम्भावना है. लेकिन इनसान कितना नासमझ है कि उसे अगर कहीं कोई छोटी सी उपलब्धि हासिल हो जाती है तो वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और यही आभासी श्रेष्ठता का पहलू उसे जीवन में अभिमान की तरफ अग्रसर करता है. किसी उपलब्धि पर अभिमान को तरजीह देना और किसी को अपने से निम्न समझना अंधकार की तरफ बढ़ना है. जीवन में सब कुछ हासिल करके विनम्र बने रहें तो हम जरुर प्रकाश की तरफ अग्रसर होंगे और यही जीवन का मंतव्य भी है. 
सुकरात को विश्व में एक एक निर्भीक दार्शनिक के रूप में ख्याति प्राप्त है. लेकिन जैसे-जैसे सुकरात की प्रसिद्धि बढती जाती है तो वह खुद को अज्ञानी घोषित करता जाता है. जिस व्यक्ति (सुकारत) को पहले अपनी प्रसिद्धि पर गर्व होता था उसने ही अन्तिम समय में कहा था कि "मैं जीवन में कुछ सीख नहीं पायामुझे कुछ पता नहींमैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूँ".  सुकरात का खुद को सबसे बड़ा अज्ञानी कहना यह दर्शाता है कि उन्होंने जगत का सबसे बड़ा ज्ञान हासिल कर लिया. हमारे जीवन की जितनी भी उपलब्धियां हैं, उन्हें ऐसे भी अभिव्यक्त किया जा सकता है.  जैसे हम एक सागर के किनारे खड़े हों तो हमारी दृष्टि कितनी दूर तक देख पाएगी और हम उस सागर से क्या समेट पाएंगे हो सकता है हम जो समेटें वह हमारे किसी काम का न हो लेकिन हम समेट रहे हैं इस भ्रम में कि मैंने सबसे ज्यादा समेट लिया है. मेरी क्षमता हर किसी से कहीं अधिक है.  लेकिन जब वास्तविकता सामने आ गयी कि मैं चाहे जितने भी यतन कर लूं मैं इस सागर को खुद में नहीं समेट सकता तो फिर जितना भी समेटा है वही सुख का कारण है. लेकिन जो घटित होता है वह इसके विपरीत होता है. उसका कारण भी हम ही होते हैं. क्योँकि हमें जिस दिशा कि तरफ बढ़ना होता है उस दिशा कि तरफ हम बढ़ते नहीं तो फिर उलटी दिशा में चलकर व्यक्ति कहाँ मंजिल तक पहुँच पायेगा. जब वह मंजिल तक पहुंचेगा ही नहीं तो फिर जीवन का उत्सव कहाँ फिर वह ख़ुशी कहाँ और सच तो यह है कि जिन चीजों में हम ख़ुशी ढूंढते हैं वही कहीं हमारे लिए दुःख का कारण भी बन जाती है. हम जीवन को उत्सव तभी बना पाएंगे  जब जीवन कि वास्तविकता से जुड़ जायेंगे.
मेरे जन्मदिन के इस अवसर पर आपने मुझे जो शुभकामनाएं प्रेषित की उसके लिए आप सबका तहे दिल से आभारी हूँ. आपका यह प्रेम मुझे अनवरत मिलता रहेयही कामना है. आपके प्रेम और सहयोग से यह जीवन उत्सव बन जाए और साँसों का यह सफ़र आसानी से तय हो जाये तो जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए.