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12 अक्टूबर 2016

जीवन सफर का एक पड़ाव और समय की सीमा

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जीवन एक सफर है और शरीर इस सफर का एक पड़ाव. भारतीय दर्शन में निहित तत्व हमें इस पहलू की जानकारी बखूबी देता है. जीव और शरीर दोनों को अलग करके देखें तो भारतीय दर्शन की पक्की मान्यता है कि शरीर की यात्रा सीमित है और जीव की यात्रा अनन्त है. जीव शरीरों में रहते हुए, शरीरों से कुछ समय के लिए बंधा हुआ प्रतीत जरुर होता है, लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं है. जीव सूक्ष्म है और शरीर सथूल, जीव चेतन है और शरीर जड़शरीर नाशवान हैउसकी यात्रा सीमित हैउसे एक दिन मिटना ही है. लेकिन जीव के विषय में यह मत प्रचलित है कि इसकी यात्रा अनन्त से उद्भूत और अनन्त में विलीन होने की यात्रा है. इस ब्रह्माण्ड में जितने भी प्राणी हैंसबके शरीर की एक सीमा हैलेकिन इन शरीरों में विचरण करने वाले जीव के विषय में मत प्रचलित है कि इसकी यात्रा इन शरीरों से होते हुए मनुष्य जन्म तक की यात्रा है. मनुष्य जीवन को इस यात्रा का आखिरी पड़ाव भी माना गया है (मानुष जन्म आखरी पौड़ी, तिलक गया ते बारी गयी). इसलिए मनुष्य जीवन को इस पूरी कायनात में श्रेष्ठ माना गया हैऔर इसे बहुत ऊँचा दर्जा दिया गया है.
मनुष्य जीवन को इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न होने वाले जीवों में श्रेष्ठ क्यों माना गया हैइस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है. हालाँकि हमारे धर्म-ग्रन्थसाधू-सन्तपीर-पैगम्बरऋषि-मुनि आदि इस विषय में हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि मनुष्य जीवन को श्रेष्ठ क्यों माना गया हैउनकी मान्यता है कि मनुष्य जन्म में जीव (आत्मा) इतना चेतन होता है कि वह अपने निज स्वरुप परम पिता परमात्मा को जानकार उसमें विलीन हो सकता है. जैसे ही कोई जीव ईश्वर का बोध हासिल करता है तो वह आवागमन के चक्कर से रहित हो जाता है और उसे जिस मकसद के लिए यह शरीर मिला था वह मकसद पूरा हो जाता है. अब यहाँ एक सवाल और भी उठता है कि मनुष्य ईश्वर की जानकारी कैसे हासिल कर सकता हैईश्वर को प्राप्त करने का माध्यम क्या हैउसे कब पाया जा सकता हैईश्वर वास्तव में है क्याऐसे अनेक प्रश्न हैं जिन पर वर्षों से विचार किया जाता रहा है. लेकिन इस धरती पर बसने वाले मनुष्यों में से अधिकतर आज तक ईश्वर के प्रति आस्थ्वान रहे हैंऔर अनेक ऐसे हैं जिन्होंने ईश्वर के बोध को हासिल करने के विषय में अपना मत दिया है. उसी आधार पर दुनिया भर में यह मान्यता प्रचलित है कि ईश्वर का कोई रूप-रंग-आकार नहीं है. वह निराकार हैसत्त-चित्त-आनन्द स्वरुप है. उसका कोई और ओर-छोर नहींकोई आदि-मध्य और अंत नहींवह देश और काल की सीमा से परे है. वह जाति-मजहब-वर्ण आदि से मुक्त है. इसलिए मनुष्य को भी ईश्वर से जुड़कर इन ईश्वरीय गुणों को अपनाने की सलाह दी जाती है और संसार इस दिशा में अग्रसर भी है. जैसा कि आज का वातावरण से इंगित भी होता है.
लेकिन अगर हम गहराई से विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि मनुष्य आज वास्तव में खुद से कहीं दूर चला गया है. वह भौतिक चका-चौंध में इस तरह से रम गया है कि उसे खुद के करीब जाने का कभी अवसर ही नहीं मिलता. वह जन्म से लेकर जीवन के रहते तक भौतिक चीजों को इकठ्ठा करने में ही अपना समय लगाता है और अंततः उसके हाथ क्या लगता हैइस बात से हम सभी भली-भांति परिचित हैं. लेकिन फिर भी संसार का आकर्षण ऐसा है कि मनुष्य सब-कुछ जानते समझते हुए भी इस और आकृष्ट होता चला जाता है और एक समय ऐसा आता है कि वह इसी में रम कर इसी का हो जाता है. मनुष्य का इस संसार की बेहतरी के लिए योगदान देना अलग बात है और इस संसार के वशीभूत होकर जीवन जीना अलग बात है. दोनों बातों के अन्तर को जब हम समझ जाते हैं तो जीवन के प्रति हमारा नजरिया ही बदल जाता है और हम फिर जीवन की सार्थकता के विषय में सोचना शुरू करते हैंऔर यही वह पड़ाव है जब हम संसार के कार्य करते हुए भी अपने जीवन के मूल लक्ष्य पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए आगे बढ़ते हैं.
इस शरीर की यात्रा कितनी हैयह हम में से कोई नहीं जानता. जहाँ तक जीवन का प्रश्न हैयह महीनों और सालों की यात्रा तय नहीं करताबल्कि इसकी यात्रा क्षणों में तय होती है. हम जब भी कोई निर्णय लेते हैं वह क्षण की ही उपलब्धि होती है. हमारी सफलता-असफलतासुख-दुःखलाभ-हानि सब क्षण की उपज हैं. यह बात अलग है कि इनका जीवन और जीवन के प्रति हमारे नजरिए से सीधा सम्बन्ध होता है. फिर भी विचारवान मनुष्य इन सब परिस्थितियों में विचलित नहीं होता. सुख में ज्यादा खुश महसूस नहीं करता और दुःख में ज्यादा रोना नहीं रोता. वह हमेशा एक सी अवस्था में रहने का प्रयास करता है. गीता में इसी अवस्था को ‘स्थितप्रज्ञ’ की अवस्था कहा गया है और मनुष्य से यह भी अपेक्षा की गयी है कि वह अपने जीवन में रहते हुए इस अवस्था को प्राप्त करेऔर हम सबका यह प्रयास भी होना चाहिए.
उपरोक्त बातों को केन्द्र में रखकर मैं भी जीवन के विषय में सोचने-समझने का प्रयास वर्षों से कर रहा हूँ. आज जब में जीवन के पैंतीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ तो बीते हुए पलों को विश्लेषित करने की बजाय आने वाले पलों के विषय में गम्भीरता से सोच रहा हूँ. हालाँकि बीते हुए पलों ने मुझे कुछ सीख दी हैअनुभव दिए हैंकुछ लक्ष्य दिए हैं. लेकिन अब जब मैं कुछ-कुछ जीवन के विषय में समझ रहा हूँ तो मुझे इस बात का बहुत गहराई से अनुभव हुआ है कि जीवन (शरीर) की यात्रा एक सामूहिक यात्रा हैलेकिन जीव या जिसे हम आत्मा कहते हैंउसकी यात्रा अकेली यात्रा है. आत्मा की यात्रा में हमारा कोई साथी नहींकोई सहयोगी नहींयह अकेले (जीव) की अकेली यात्रा है. लेकिन शरीर में रहते हुए जीवन की यात्रा सामूहिक सहयोग की यात्रा है. शरीर जब तक हैतब तक सांसारिक रिश्ते-नाते हैंसुख-दुःख हैंमतलब वह सब कुछ है जो हम इस दृश्यमान जगत में महसूस करते हैं. लेकिन इन सबमें हम वास्तविक आनन्द को नहीं खोज सकते. हम जीवन में जिस चीज को पाने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष करते हैंउस चीज की प्राप्ति के बाद हमें किसी और चीज की लालसा फिर से उत्पन्न होने लगती है और यह क्रम अनवरत चलता रहता है. लेकिन जब हम आत्मिक रूप से इस ईश्वर के साथ जुड़ जाते हैं तो फिर संसार हमें एक औपचारिकता मात्र लगता है. फिर जीवन का हर कर्म दूसरे की ख़ुशी के लिए किया जाता हैऔर ऐसा जीवन सही मायनों में जीवन कहलाता है. लेकिन यह होता तब है जब हम स्वार्थों से ऊपर उठकर जीवन को जीने की कोशिश करते हैं. वैसे जब से जीवन को समझना शुरू किया हैइसके ऐसे अनेक पहलू अनुभूत किये हैं कि सोच कर मन रोमांच से भर जाता हैऔर ऐसे भाव पैदा होते हैं कि दूसरों की ख़ुशी के लिए और कार्य किया जाए. कोशिश भी यही है और लक्ष्य भी यही है. देखते हैं अपने जीवन रहते हम कितना सफल हो पाते हैंयह भविष्य के गर्भ में हैलेकिन प्रयास जारी है.
जीवन की इस यात्रा में आप सबका सहयोग और प्रेरणा मेरे लिए हमेशा ऊर्जा का काम करते रहे हैं. पिछले छह वर्षों से मैं लगातार अंतर्जाल पर सक्रीय हूँयोगदान कितना हैयह तो नहीं कह सकता. लेकिन आप सबसे मैंने बहुत कुछ सीखा हैसमझा हैपाया है. जितना स्नेह और सम्मान मेरे अंतर्जाल के साथियों ने मुझे दिया हैउतना ही जीवन के अनेक पलों में साथी रहे बंधुओं ने दिया है. इस स्नेहसम्मान और प्रेरणा के लिए मैं हृदय से सबका आभारी हूँ.

12 अक्टूबर 2015

जन्मदिन और जीवन की प्रासंगिकता

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जीवन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है. मनुष्य जीवन के विषय में शायद तब भी कोई विचार नहीं करता जब वह बहुत गहरे संकट में होता है. यहाँ तक कि मनुष्य जब मृत्यु शैय्या पर होता है तब भी वह जीवन की प्रासंगिकता के विषय में नहीं, बल्कि अपनी बनी-बनायी दुनिया के विषय में सोचता है. उसका मन इस पहलू पर भी विचार करता है कि उसके न होने से कई लोगों का जीवन किस तरह से प्रभावित हो सकता है. मनुष्य जीवन भर कुछ ‘बेहतर’ करने की आशा से जीता है. लेकिन इस बेहतर में उसके अपने जीवन पहलू, उसकी अपनी जरूरतें, अपनी इच्छाएं और लालसाएं ज्यादा जुडी होती हैं. इन सबकी पूर्ति के लिए वह निरन्तर सोचता है, विचारता है और ऐसा प्रयास भी करता है कि उसे कम से कम समय में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो और वह अपना जीवन सुखपूर्वक जी सके. अधिकतर लोगों का जीवन के प्रति यही नजरिया होता है और वह इसी तरह जीवनयापन करते हुए आगे बढ़ते हैं.
जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा भी हो, हम जीवन में कुछ भी अर्जित करना चाहते हों. लेकिन एक बात तो तय है कि जीवन अपनी गति से चलता है. हम न तो उसकी समय सीमा बढ़ा सकते हैं और न ही यह हमारे वश में है कि हम उस गति को कम कर सकते हैं. जीवन तो साँसों के सफ़र का उत्सव है. साँसों की यह लड़ी जब तक चल रही है, तब तक जीवन है और जैसे ही इस लड़ी का क्रम टूटा जीवन-जीवन नहीं रह जाता. हम ‘काल’ से बंधे हुए हैं और ‘साँसों की पूंजी’ हमारे पास सीमित है. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं. क्योँकि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास यह अधिकार है कि वह अपने जीवन के लिए क्या लक्ष्य निर्धारित करता है और किस तरह से वह जीवन को जीता है. इसलिए अध्यात्म की भाषा में मनुष्य जीवन को ‘कर्म योनि’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है, और यह भी बताया जाता है कि मनुष्य जन्म इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त चर अचर प्रकृति में सर्वश्रेष्ठ है. इसकी सर्वश्रेष्ठता के कई पहलू हमारे सामने हैं और ऋषि-मुनियों, गुरु-पीर-पैगम्बरों ने मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठता के इन पहलूओं को हमारे सामने लाने का प्रयास भी किया है. साथ ही मनुष्य को यह भी निर्देश दिया है कि वह जीवन को किस तरह से जिए और किस तरह के लक्ष्य वह अपने लिए निर्धारित करे.
मनुष्य जीवन की महत्ता और उसके जीवन लक्ष्यों के निर्धारण पर लम्बे समय से विचार किया जाता रहा है. लेकिन अभी तक कोई ऐसा निष्कर्ष हमारे सामने नहीं है कि मनुष्य को जीवन सिर्फ इसी कार्य के मिला है. मनुष्य के जीवन के लक्ष्य देश, काल और समय के अनुसार बदलते रहे हैं. इसलिए हम देखते हैं कि पूरे विश्व में मानव जीवन के लक्ष्यों में एकरूपता देखने को नहीं मिलती. लेकिन एक बात तो तय है कि मनुष्य का जन्म और जीवन के विकास की प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक जैसी ही है. इसीलिए तो महापुरुषों ने एक नूर ते सब जग उपज्या  कह कर जीवन और जगत की एकरूपता को समझाने का प्रयास किया है. लेकिन फिर भी मनुष्य अपनी बुद्धि-विवेक और परिस्थिति के हिसाब से अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करता है. जीवन में उसके अपने लक्ष्य हैं और यह होने भी चाहिए. जहाँ तक दार्शनिकों और गुरु-पीर-पैगम्बरों का सवाल है वह तो मनुष्य को यह बात समझाने का प्रयास करते हैं कि मनुष्य को जीवन किस मकसद के लिए मिला है और उसी मकसद की और वह उसका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करते हैं. गुरु-पीर-पैगम्बर मनुष्य को जीवन जीने की पद्धति सिखाते रहे हैं और उसके जीवन में उच्च आदर्शों की स्थापना हेतु प्रेरित करते रहे हैं. लेकिन यहाँ यह जरुरी नहीं कि हर व्यक्ति गुरु-पीर-पैगम्बरों के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करे और उसी अनुसार अपने जीवन के लक्ष्य निर्धारित करे. यह सब कुछ मनुष्य की अपनी सोच पर निर्भर करता है और जहाँ तक जीवन लक्ष्य का प्रश्न है वह मनुष्य को अपनी सोच से ही निर्धारित करना होता है. दूसरों के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करते हुए मनुष्य कभी भी महानता की सीमा तक नहीं पहुँच सकता. हाँ इतना जरुर है कि वह अगर किसी आदर्श का अनुसरण करते हुए जीवन जी रहा है तो अपने मनुष्य होने का प्रमाण दे सकता है. मानवीय आदर्शों की स्थापना में उसका योगदान गिना जा सकता है. लेकिन यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि हम किसी का भी अनुसरण कर रहे हों वहां हम अपनी वुद्धि का जरुर प्रयोग करें. अगर हम ऐसा करते हैं तो हम अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व कायम कर सकते हैं.
जीवन और जीवन की प्रासंगिकता मनुष्य के सामने यक्ष प्रश्न की तरह है, और इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य को अपने विवेक से खोजने का प्रयास करना चाहिए. क्योँकि मनुष्य जीवन भर बाहर की दुनिया को विश्लेषित करने का प्रयास करता रहता है और यह होना भी चाहिए. लेकिन जितना वह बाहर की दुनिया पर ध्यान केन्द्रित करता है उतना ही वह अपने भीतर भी ध्यान केन्द्रित करे तो परिणाम उत्साहजनक हो सकते हैं. क्योँकि जीवन की वास्तविक यात्रा भीतर से शुरू होती है और उसका कोई अन्त नहीं है. मनुष्य भीतर से जितना बेहतर होगा बाहर की दुनिया वह उतनी ही बेहतर बनाने का प्रयास करेगा. हम व्यावहारिक जीवन में देखते हैं कि मनुष्य की सोच किस कदर उसके और उसके सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करती है. इसलिए जीवन में हर कर्म का महत्व अधिक बढ़ जाता है. हमारे जीवन की प्रासंगिकता का निर्धारण किसी जीवन के किसी एक पहलू से नहीं होता, इसके लिए हमें सतत अभ्यास करते हुए, मानवीय मूल्यों को जीवन में धारण करते हुए जीवन के सफ़र को तय करना होता है. अगर हम ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारे जन्म का लक्ष्य तय हो जाता है और जीवन की प्रासंगिकता का निर्धारण भी, लेकिन अन्तिम निर्णय फिर भी हमें अपने ही विवेक के अनुसार लेना होगा.

12 अक्टूबर 2013

जन्मदिन के बहाने

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जन्मदिन हर किसी की जिन्दगी का अहम् दिन होता है. जीवन में चाहे कैसी भी स्थिति हो हम इस अवसर पर खासे रोमांचित होते हैं और माता-पिता के साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद देते हैं. जीवन में माता-पिता हमारे लिए पूजनीय होते हैं और ईश्वर अराध्य, माता-पिता साधन होते हैं तो ईश्वर साध्य, माता-पिता साकार हैं तो ईश्वर निराकार, माता-पिता के बगैर हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, तो ईश्वर के बिना जीव की, ईश्वर और माता-पिता के गुणों और कर्मों का सम्बन्ध इतना गहरा है कि उसे एक दुसरे से अलग करना मुमकिन नहीं. इसलिए भारतीय संस्कृति में माता-पिता को ही ईश्वर की संज्ञा से अभिहित किया जाता रहा है. जीवन का कोई भी पक्ष हो हर पक्ष का शृंगार माता-पिता और ईश्वर के माध्यम से ही होता है, हम जीवन में किसी भी मुकाम तक पहुँच जाएँ लेकिन माता-पिता के लिए हम हमेशा बच्चे ही बने रहते हैं और इसी कारण हमें उनका प्रेम अनवरत मिलता रहता है और हमारा जीवन धन्य होता रहता है. 

जीवन के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं और अनेक विश्लेषण भी, लेकिन अभी तक जीवन के विषय में कोई 
एक सर्वसम्मत मत प्रचलन में हो, ऐसा नहीं है. संसार में जितने भी दर्शन, मत और विचार आये सब जीवन की व्याख्या अपने-अपने तरीके से करते हैं और अभी तक कर रहे हैं, लेकिन कोई किसी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता. जैसे हम जीवन के प्रति किसी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सके वैसे ही हम ईश्वर के प्रति भी एकरूप दृष्टिकोण नहीं बना पाए और इसीलिए हम जीवन और मृत्य के बीच में जूझते हुए आगे बढ़ रहे हैं. जिसे हम जीवन कह रहे हैं वह तो ठीक है, लेकिन जिसे हम मृत्यु कह रहे हैं वह कहीं एक पक्षीय है. क्योँकि हम जब इस कायनात को देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह पूरी सृष्टि पांच तत्वों से बनी हुई है और इस सृष्टि का संचालन-पालन करने वाला ईश्वर है और यह निराकार है, अजर है, अमर है, अविनाशी है, अखंड है तो फिर यह बात स्वाभाविक है कि ईश्वर का अंश जो शरीर में रहता है वह शरीर के न होने पर भी उसी स्थिति में रहता है, और जहाँ तक पांच तत्वों का सवाल है यह भी अपने-अपने मूल में मिलते हैं इसलिए मृत्यु का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता. अब यह एक कपोल कल्पना जैसा है कि मृत्यु के बाद जीवन समाप्त हो जाता है, हाँ यह बात तो सच है कि जिस रूप में यह हमारे सामने होता है, वह रूप मिटता जरुर है, लेकिन वह ही कहीं नव जीवन का आधार बनता है, इसलिए जितना सकारात्मक दृष्टिकोण हम जीवन के प्रति रखते हैं उतना ही सकारात्मक दृष्टिकोण हमें इसके न होने पर भी रखना चाहिए. जब तक जीवन है तब तक हम पूरे संसार के प्रति सकारात्मक बने रहें और यह तब ही हो सकता है जब हम जीवन की वास्तविकता को समझते हों.

वर्तमान परिवेश को जब हम गहराई से विश्लेषित करते हैं तो हम पाते हैं कि जीवन के प्रति अनेक प्रकार के विरोधाभास प्रचलित हैं और यही हमारे बीच विरोध का कारण हैं. इन्ही विरोधों के कारण हम एक दुसरे को भिन्न समझते हैं और यहीं से क्रम शुरू होता है मनुष्य का मनुष्य के प्रति वैर भाव का और यही वैर भाव हमें गहन अन्धकार की तरफ ले जाता है और हम इतने क्रूर होते हैं कि हम मनुष्य को मनुष्य समझते ही नहीं और इस हद तक गिर जाते हैं कि हम उसके शरीर से प्राणों तक को जुदा करते हैं. फिर ऐसी स्थिति में न तो हमारे जीवन का कोई लाभ है और न ही जन्मदिन की कोई महता. हम जन्मदिन मनाएं एक उत्सव की तरह और जीवन जिएँ एक महोत्सव की तरह तो जीवन और जन्मदिन दोनों की महता बनी रहेगी.....इस ख़ास अवसर पर शुभकामनाओं के लिए आप सबका तहे दिल से शुक्रिया.     

12 अक्टूबर 2012

साँसों के सफ़र का उत्सव

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भारतीय संस्कृति में उत्सव का बड़ा महत्व है. उत्सव शब्द सुनते ही हमारे जहन में एक रोमांच सा भर जाता हैमन ख़ुशी की कल्पना से झूम उठता हैऔर ऐसा लगने लगता है जैसे सारा वातावरण खुशियों से सराबोर होउत्सव मात्र हंसी-ख़ुशीनाच-गान या खेल का नहीं होताउत्सव तो जीवन की नैसर्गिकता का होता हैजहाँ हम साकार और निराकार को इकमिक महसूस करते हैं. वास्तविकता में उत्सव अपने में एक बृहत् अर्थ समाये हुए हैयह तो उस हर चीज का होता हैजहाँ लोग अपने पराये के भेद भूल जाते हैंदेशों की सरहदें यहाँ कोई मायने नहीं रखतीभाषायी भिन्नता यहाँ कोई अड़चन पैदा नहीं करती और किसी प्रकार का कोई मानसिक द्वंद्व यहाँ नहीं रहताअगर कुछ रहता है तोवह एक उत्सव! बस एक उत्सव,  उसके सिवा कुछ भी नहीं , और अगर हम साँसों के इस सफर को उत्सव में तब्दील कर पायें तो जीवन की महता बढ़ जायेजीवन कालजयी हो जाये.
हम उत्सव तो मनाते हैं सबकी ख़ुशी के लिएदूसरों की ख़ुशी में खुद को शामिल करना उत्सव की चरम सीमा है .जब किसी समारोह में लोगों को एक दुसरे से मिलते हुए देखता हूँ तो मन ख़ुशी से भर जाता है. उनका परस्पर सौहार्द भरा मिलन और मुस्कराहट भरा स्वागत एक आनंद देता है.  लेकिन दूसरे ही पल हमारी मानसिक दीवारें हमें घेर लेती हैंहमारी संकीर्णता हम पर हावी हो जाती हैतब सब कुछ ऐसा लगनेलगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं होयहाँ कोई ख़ुशी थी ही नहींकोई प्रेम नहीं था. एकदम भिन्न वातावरण और ऐसे वातावरण में  हमारे लिए उत्सव एक औपचारिकता बन जाता हैकुछ मजबूरी को निभाने जैसामात्र कुछ करने जैसा.  बस कर लिया या करना है उससे आगे कोई ख्याल नहीं फिर हम जुड़ ही नहीं पाए उत्सव से तो वास्तविक खुशी कहाँआनंद कहाँजब हम वास्तविक रूप से उत्सव से जुड़ ही नहीं पाए तो आनंद की बात कहीं दूर हैऔर जब हम आनंद और खुशी को समझ ही नहीं पाए तो फिर जीवन के उत्सव होने की बात कहीं दूर है. जीवन एक उत्सव है यह सोचना भी बेमानी होगीएक कपोल कल्पना जैसे
इस धरा पर जब कोई नवजात जन्म लेता है तो सब उत्सव मनाते हैं. माँ को सबसे अधिक ख़ुशी होती है. पिता का हृदय भी आनंद से भर जाता है. दादा-दादीनाना-नानीचाचा-चाची ना जाने कितने रिश्ते उससे जुड़ जाते हैं. सिर्फ यह रिश्ते ही नहीं बल्कि समाज की कई ओर चीजें  भी उससे जुड़ जाती हैंफिर धीरे-धीरे उस नवजात का जीवन क्रम शुरू होता है. वह जीवन के सफ़र की ओर अग्रसर होता है. कई बार नहींबल्कि हर बार यह सुना जाता है कि बचपन बड़ा सुहाना होता है. लेकिन सबका बचपन सुहाना हो ऐसा सम्भव नहीं. यहाँ तो दरिन्दगी इतनी बढ़ चुकी है कि हम नवजात को जन्म से पहले  ही मार रहे हैं. जो जन्म लेकर इस धरा पर जीवन यापन कर रहे हैं वह भी कहाँ सुरक्षित हैं? हर कोई इस धरा पर परेशानियां झेल रहा है. हर किसी को जीवन में कुछ खोने का डर बना रहता है. जो कि काफी हद तक स्वाभाविक भी है ओर मानवीय वयवहार के अनुकूल भी. लेकिन मुश्किल वहां पर खड़ी हो जाती है जब हम मोहवश किसी को अपना मान लेते हैं, ओर उसके खोने का डर हमें हमेशा सताए रखता है. जीवन  में मोह और नासमझी हमारे जीवन उत्सव से हमें परेशानियों की और अग्रसर करते हैं. ऐसे हालात में हमारे जीवन में उत्सव का महत्व कम होता चला जाता है और एक दिन हम ऐसे मोड़ पर पहुँचते हैं जहाँ उत्सव कहीं पीछे छुट जाता है और मजबूरियाँ और औपचारिकताएँ जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. फिर जीवन-जीवन नहीं रहता तो उत्सव-उत्सव कहाँ रहेगा? 
मानव इस धरा पर एक ऐसा प्राणी है जो काफी हद तक प्रकृति को अपने अनुकूल कर सकता है. आज तक उसने ऐसे प्रयास किये भी हैं. उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है और उसी सफलता के आधार  पर वह अपने प्रयासों को जारी रखे हुए है. उसके इन प्रयासों के पीछे हमारे शास्त्रों की यह मान्यता भी कहीं सटीक बैठती है कि इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी कायनात है वह सब भोग योनियाँ हैं और मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म योनि प्राप्त है. जिसे बुद्धि और विवेक की सौगात ईश्वर द्वारा प्रदत है. ईश्वर ने जिसे अपने प्रतिरूप के रूप में जन्म दिया हैइसलिए वह सर्वश्रेष्ठ है. परमात्मा ने जो कुछ भी मानव को दिया है उसके आधार पर उसे श्रेष्ठ कहा जाये, किसी हद तक इस बात को माना जा सकता है. लेकिन यह एक पैमाना नहीं है जीवन की श्रेष्ठता का. यह जीवन की श्रेष्ठता का एक पहलू हो सकता है. जीवन की श्रेष्ठता के तो अनेक आयाम हैं. अगर हम उन्हें पूरी तरह से भी जीवन में अपना लें तो भी कहीं पर कोई कमी रह जाएगी. फिर भी अगर हम जीवन में कुछ करने के लिए प्रयासरत हैं तो कुछ न कुछ तो हमारे हाथ लगेगा ही. बस यही समझ है जो हमें जीवन की श्रेष्ठता की और ले जाती है. अगर हम जीवन में श्रेष्ठता के मानक भी छू पाएंगे तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. जीवन में नए मानक बनाना तो विरलों के हाथ में होता है. ऐसे इनसान तो ब्रह्माण्ड में कभी-कभी ही पैदा होते हैं और ऐसे इनसानों के व्यक्तित्व और विचारों की चमक इनती तेज होती है जो हजारों वर्षों तक फीकी नहीं पड़ती. लेकिन अफ़सोस कि ऐसे इनसानों की संख्या को आज हम अँगुलियों पर गिन सकते हैं , जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्मों से इतिहास की धारा को बदला है और हमारे लिए जीवन के नए और उदात मानक अख्तियार किये हैं. आये दिन जनसंख्या बढ़ने के नए-नए आंकड़े तो आते रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता के आंकड़े कोई नहीं बना सकता. आज हम जिन इनसानों को महान होने का दर्जा देते हैं वह किसी एक क्षेत्र में सिद्धहस्त थे. उसी कारण हम उन्हें महान की संज्ञा से अभिहित करते हैं. सम्पूर्ण इनसान तो आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ और ना ही होने की सम्भावना है. लेकिन इनसान कितना नासमझ है कि उसे अगर कहीं कोई छोटी सी उपलब्धि हासिल हो जाती है तो वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और यही आभासी श्रेष्ठता का पहलू उसे जीवन में अभिमान की तरफ अग्रसर करता है. किसी उपलब्धि पर अभिमान को तरजीह देना और किसी को अपने से निम्न समझना अंधकार की तरफ बढ़ना है. जीवन में सब कुछ हासिल करके विनम्र बने रहें तो हम जरुर प्रकाश की तरफ अग्रसर होंगे और यही जीवन का मंतव्य भी है. 
सुकरात को विश्व में एक एक निर्भीक दार्शनिक के रूप में ख्याति प्राप्त है. लेकिन जैसे-जैसे सुकरात की प्रसिद्धि बढती जाती है तो वह खुद को अज्ञानी घोषित करता जाता है. जिस व्यक्ति (सुकारत) को पहले अपनी प्रसिद्धि पर गर्व होता था उसने ही अन्तिम समय में कहा था कि "मैं जीवन में कुछ सीख नहीं पायामुझे कुछ पता नहींमैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूँ".  सुकरात का खुद को सबसे बड़ा अज्ञानी कहना यह दर्शाता है कि उन्होंने जगत का सबसे बड़ा ज्ञान हासिल कर लिया. हमारे जीवन की जितनी भी उपलब्धियां हैं, उन्हें ऐसे भी अभिव्यक्त किया जा सकता है.  जैसे हम एक सागर के किनारे खड़े हों तो हमारी दृष्टि कितनी दूर तक देख पाएगी और हम उस सागर से क्या समेट पाएंगे हो सकता है हम जो समेटें वह हमारे किसी काम का न हो लेकिन हम समेट रहे हैं इस भ्रम में कि मैंने सबसे ज्यादा समेट लिया है. मेरी क्षमता हर किसी से कहीं अधिक है.  लेकिन जब वास्तविकता सामने आ गयी कि मैं चाहे जितने भी यतन कर लूं मैं इस सागर को खुद में नहीं समेट सकता तो फिर जितना भी समेटा है वही सुख का कारण है. लेकिन जो घटित होता है वह इसके विपरीत होता है. उसका कारण भी हम ही होते हैं. क्योँकि हमें जिस दिशा कि तरफ बढ़ना होता है उस दिशा कि तरफ हम बढ़ते नहीं तो फिर उलटी दिशा में चलकर व्यक्ति कहाँ मंजिल तक पहुँच पायेगा. जब वह मंजिल तक पहुंचेगा ही नहीं तो फिर जीवन का उत्सव कहाँ फिर वह ख़ुशी कहाँ और सच तो यह है कि जिन चीजों में हम ख़ुशी ढूंढते हैं वही कहीं हमारे लिए दुःख का कारण भी बन जाती है. हम जीवन को उत्सव तभी बना पाएंगे  जब जीवन कि वास्तविकता से जुड़ जायेंगे.
मेरे जन्मदिन के इस अवसर पर आपने मुझे जो शुभकामनाएं प्रेषित की उसके लिए आप सबका तहे दिल से आभारी हूँ. आपका यह प्रेम मुझे अनवरत मिलता रहेयही कामना है. आपके प्रेम और सहयोग से यह जीवन उत्सव बन जाए और साँसों का यह सफ़र आसानी से तय हो जाये तो जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए.

12 अक्टूबर 2011

जीवन और जन्मदिन

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जीवन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. साँसों का यह सफ़र इंसान को किस पड़ाव तक ले जाए यह निश्चित नहीं है. जब तक साँसें चल रही है जीवन है, सांसें रुकी की नहीं जीवन समाप्त समझो. लेकिन साँसों के रुकने से जीवन समाप्त नहीं होता हमें यह बात समझ लेनी चाहिए. हालाँकि इस जीवन के बारे में यह कहा जाता है कि "पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात / देखते ही छुप जायेगा ज्यों तारा प्रभात". किसी हद तक तो यह बात सही भी लगती है. लेकिन जब गहरे में उतरकर देखते हैं तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि जीवन की तो सीमा है, लेकिन जीव की नहीं. जीव की यात्रा अनन्त है और जीवन की सीमित. जीव परमात्मा का अंश है, तो जीवन प्रकृति का. यह बात भी गौर करने योग्य है कि प्रकृति परमात्मा की छाया है और हम भी प्रकृति का एक अंश, यह भी सही है कि जिन तत्वों से जीवन का निर्माण हुआ है, जीवन की समाप्ति पर वह तत्व अपने-अपने मूल में मिल जाते हैं और फिर नव निर्माण होता है. यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है सृष्टि के प्रारम्भ से, और चलती रहेगी अनंत काल तक. बस जीवन के प्रति अगर यही समझ बनी रहती है तो जीवन का सफर सुखदायी और आनंदमय बना रहता है, और हम साँसों के इस सफर को तय करते हैं पूरी संजीदगी के साथ. 
 
आज जब मैंने जीवन के 29 वर्षों का सफर  तय कर लिया तो बहुत सी बातों के विषयों में सोचा और
आकलन किया खुद का, और खुद के कर्मों का बस यही कि जीवन जिस दिशा में जा रहा है और जिस गति से जा रहा है, अगर वही दिशा  और गति  बनी रहे तो भी कहीं न कहीं जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए. लेकिन इसके लिए मुझे बहुत संभल कर चलना है. क्योँकि इस संसार में खुद को पाक-साफ रखना बहुत कठिन कार्य है, लेकिन फिर भी कोशिश तो की जा सकती है और बस यही  प्रयास अनवरत जारी रहता है. हालाँकि यह मानवीय स्वभाव है कि वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रहता और उसे रहना भी नहीं चाहिए. मन की चंचलता और बुद्धि की तार्किकता उसे जीवन भर संघर्षरत रखती है और मानव अपनी उपलब्धियों से खुद को गर्वित महसूस करता है. लेकिन यह बात हमेशा मेरे जहन में रहती है कि "क्षणिकता" से "वास्तविकता" की और बढ़ा जाए, अन्धकार से प्रकाश  की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, भौतिकता से अध्यात्म की ओर  अगर यह सब हो जाता  है तो निश्चित रूप से जीवन मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ जाएगा ओर जीवन का लक्ष्य सिद्ध हो जायेगा. लेकिन यह होगा तब ही जब हमारा-आपका सहयोग और प्रेम परस्पर बना रहेगा. 

आज मन बहुत द्रवित है. सोचा अपने जीवन के हर पहलु को तो बहुत सी बातें नजर आयीं. ब्लॉगजगत का दिया हुआ प्यार और सम्मान मेरी आखों में आंसू ले आया. जब मैंने ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रवेश किया था तो एक सामान्य पाठक के रूप में और आज भी खुद को ब्लॉगिंग के विस्तृत पटल पर एक सामान्य पाठक ही मानता हूँ. आज जो भी कुछ कर पाता हूँ यह सब आपके प्रेम और सहयोग का ही परिणाम है. आपकी प्रेरणादायी टिप्पणियाँ ही नहीं बल्कि समय -समय पर व्यक्तिगत रूप दिए गए आपके सुझाब भी मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं. इसके अलावा आपका अपनापन तो मेरे लिए खुदा की सौगात से कम नहीं. इसलिए आज नतमस्तक हूँ आप सबके सामने. कल जब पोस्ट लिख रहा था तो कुछ नाम मेरे जहन में उभर आये थे. लेकिन जब पूरी सूची देखी तो लगा कि इतने सारे नामों के लिए तो एक अलग से पोस्ट लिखनी पड़ेगी और फिर सोचा कि ब्लॉग जगत ने जो कुछ मुझे दिया है उसके लिए धन्यवाद कहना, एक औपचारिकता को निभाने जैसा होगा.

हालाँकि सूचना और तकनीक के इस दौर में आभासी रिश्तों की बात की जाती है और इसे एक तरह से आभासी दुनिया कहा जाता है. लेकिन मैंने जहाँ तक अनुभव किया मुझे काफी हद तक ऐसा प्रतीत नहीं हुआ. जिस भी व्यक्ति से बात हुई सबने सहयोग और प्रेम की ही बात की. माध्यम कोई भी रहा हो (टेलीफोन, फेसबुक, ऑरकुट, मेल) आदि. लेकिन मैंने सबको सहयोग देते हुए पाया. इसलिए खुद को बहुत खुशनसीब समझ रहा हूँ. अब तो लगता है कि जीवन का सफर एक नए दौर की तरफ चल पड़ा और यह दौर और यह रिश्ते मुझे जरुर कोई नया मुकाम देंगे. इसी आशा के साथ....! अब आप सब तो यही कहेंगे न ........ !
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आज की इस पोस्ट का पॉडकास्ट ब्लॉग जगत की चर्चित पॉडकास्टर आदरणीय अर्चना जी के सौजन्य से आप मेरी आवाज में सुन सकते हैं ...आदरणीय अर्चना जी ने मेरे मन की भावनाओं को समझते हुए आपकी नजर यह पोस्ट पेश की ...आशा है आपको यह प्रयास पसंद आएगा ...!