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12 अक्टूबर 2013

जन्मदिन के बहाने

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जन्मदिन हर किसी की जिन्दगी का अहम् दिन होता है. जीवन में चाहे कैसी भी स्थिति हो हम इस अवसर पर खासे रोमांचित होते हैं और माता-पिता के साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद देते हैं. जीवन में माता-पिता हमारे लिए पूजनीय होते हैं और ईश्वर अराध्य, माता-पिता साधन होते हैं तो ईश्वर साध्य, माता-पिता साकार हैं तो ईश्वर निराकार, माता-पिता के बगैर हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, तो ईश्वर के बिना जीव की, ईश्वर और माता-पिता के गुणों और कर्मों का सम्बन्ध इतना गहरा है कि उसे एक दुसरे से अलग करना मुमकिन नहीं. इसलिए भारतीय संस्कृति में माता-पिता को ही ईश्वर की संज्ञा से अभिहित किया जाता रहा है. जीवन का कोई भी पक्ष हो हर पक्ष का शृंगार माता-पिता और ईश्वर के माध्यम से ही होता है, हम जीवन में किसी भी मुकाम तक पहुँच जाएँ लेकिन माता-पिता के लिए हम हमेशा बच्चे ही बने रहते हैं और इसी कारण हमें उनका प्रेम अनवरत मिलता रहता है और हमारा जीवन धन्य होता रहता है. 

जीवन के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं और अनेक विश्लेषण भी, लेकिन अभी तक जीवन के विषय में कोई 
एक सर्वसम्मत मत प्रचलन में हो, ऐसा नहीं है. संसार में जितने भी दर्शन, मत और विचार आये सब जीवन की व्याख्या अपने-अपने तरीके से करते हैं और अभी तक कर रहे हैं, लेकिन कोई किसी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता. जैसे हम जीवन के प्रति किसी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सके वैसे ही हम ईश्वर के प्रति भी एकरूप दृष्टिकोण नहीं बना पाए और इसीलिए हम जीवन और मृत्य के बीच में जूझते हुए आगे बढ़ रहे हैं. जिसे हम जीवन कह रहे हैं वह तो ठीक है, लेकिन जिसे हम मृत्यु कह रहे हैं वह कहीं एक पक्षीय है. क्योँकि हम जब इस कायनात को देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह पूरी सृष्टि पांच तत्वों से बनी हुई है और इस सृष्टि का संचालन-पालन करने वाला ईश्वर है और यह निराकार है, अजर है, अमर है, अविनाशी है, अखंड है तो फिर यह बात स्वाभाविक है कि ईश्वर का अंश जो शरीर में रहता है वह शरीर के न होने पर भी उसी स्थिति में रहता है, और जहाँ तक पांच तत्वों का सवाल है यह भी अपने-अपने मूल में मिलते हैं इसलिए मृत्यु का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता. अब यह एक कपोल कल्पना जैसा है कि मृत्यु के बाद जीवन समाप्त हो जाता है, हाँ यह बात तो सच है कि जिस रूप में यह हमारे सामने होता है, वह रूप मिटता जरुर है, लेकिन वह ही कहीं नव जीवन का आधार बनता है, इसलिए जितना सकारात्मक दृष्टिकोण हम जीवन के प्रति रखते हैं उतना ही सकारात्मक दृष्टिकोण हमें इसके न होने पर भी रखना चाहिए. जब तक जीवन है तब तक हम पूरे संसार के प्रति सकारात्मक बने रहें और यह तब ही हो सकता है जब हम जीवन की वास्तविकता को समझते हों.

वर्तमान परिवेश को जब हम गहराई से विश्लेषित करते हैं तो हम पाते हैं कि जीवन के प्रति अनेक प्रकार के विरोधाभास प्रचलित हैं और यही हमारे बीच विरोध का कारण हैं. इन्ही विरोधों के कारण हम एक दुसरे को भिन्न समझते हैं और यहीं से क्रम शुरू होता है मनुष्य का मनुष्य के प्रति वैर भाव का और यही वैर भाव हमें गहन अन्धकार की तरफ ले जाता है और हम इतने क्रूर होते हैं कि हम मनुष्य को मनुष्य समझते ही नहीं और इस हद तक गिर जाते हैं कि हम उसके शरीर से प्राणों तक को जुदा करते हैं. फिर ऐसी स्थिति में न तो हमारे जीवन का कोई लाभ है और न ही जन्मदिन की कोई महता. हम जन्मदिन मनाएं एक उत्सव की तरह और जीवन जिएँ एक महोत्सव की तरह तो जीवन और जन्मदिन दोनों की महता बनी रहेगी.....इस ख़ास अवसर पर शुभकामनाओं के लिए आप सबका तहे दिल से शुक्रिया.     

01 जनवरी 2013

शुभकामना से शुभकर्म की ओर

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भारतीय जन जीवन को जब देखते हैं तो यहाँ पर शुभकामनाओं की बड़ी महता नजर आती है। सोने से लेकर जागने तकशाम से सुबह तकमृत्यु से जीवन तकजड़ से चेतन तकयुद्ध से शांति तकहार से जीत तकप्रकृति से परमात्मा तक। शुभकामनाओं का यह सिलसिला अनवरत रूप से चलता रहता है, और इसके अनेक पक्ष हैं। हमारे जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं जहाँ हम शुभकामनाओं की अपेक्षा नहीं करते या हम शुभकामना देने को आतुर नहीं होते। घर से किसी काम को निकलते वक़्त अगर कोई बुजुर्ग या उम्र में बड़ा सामने दिख जाये तो उसका आशीर्वाद लेना और उससे अपने लिए शुभकामना की कामना करना तो हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। जीवन में चाहे कैसा भी समय आये शुभकामना आगे बढ़ने का साहस देती है। हम तो यहाँ तक मानते हैं कि ‘जो बात दवा से नहीं होतीवो बात दुआ से होती है। जब कामिल मुर्शिद मिलता हैतो बात खुदा से होती हैकामिल मुर्शिद’ मतलब कि सच्चा गुरु जब मिलता है तो फिर जीवन में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहतीगुरु की दुआओं और आशीर्वाद से जीवन का हर मसला हल हो जाता है। क्योँकि गुरु एक भटके हुए इनसान को उसकी वास्तविक राह पर डाल देता है। जब किसी इनसान की दिशा बदल जाती है तो दशा स्वयं ही बदल जाती है। क्योँकि जब हम मंजिल की तरफ चलते हैं तो चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आयें हम अगर दृढ निश्चयी हैं तो जरुर पहुंचेंगे और जब हमने अपनी इच्छित मंजिल पा ली तो दशा का बदलना स्वाभाविक है। किसी अनुभवी और सच्चे इनसान का मार्गदर्शन जीवन की महता को अनमोल बना देता है तो वहीँ दूसरी तरफ अगर हम मंजिल से उलटे चलते हैं तो जीवन कौड़ियों से भी बदहाल हो जाता है।
शुभकामना और शुभकर्म दोनों का चोली-दामन का साथ है। हमारे जीवन दर्शन में मनवचन और कर्म से एक होने की बात की गयी है। जो व्यक्ति अपने जीवन रहते इस अवस्था को प्राप्त कर लेता हैउसका जीवन धन्य हो माना है। उसे संत (मतलब की सत्य से अंत तक जुड़ा रहने वाला) महात्माया ऋषि की उपाधि से विभूषित किया जाता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन और चरित्र का अनुसरण हर कोई करना चाहता है। ऐसा जीवन जो अनेक के लिए प्रेरक और पथप्रदर्शक होता है। हमारे चिन्तन में जीवन को संवारने की बात की गयी है। कोई भी ऐसा कर्म न हो जिससे खुद को या दूसरे किसी प्राणी को क्षति हो। हमारा जीवन दर्शन सामूहिकता और सामाजिकता को महत्व देता है। हमारी व्यक्तिगत उपलब्धियों का लाभ सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि जितने प्राणियों हम वह लाभ को दे सकते हैं उतनों तक पहुंचाने की कोशिश की बात यहाँ की जाती है, और हमेशा जहन में शुभ भाव सभी के लिए रखते हुए शुभकर्म की और बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है। इस देश के लोग ही हैं जो जो यह शुभकामना करते हुए सुने जाते हैं कि:
                                                             सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया:।
                                                             सर्वे भद्राणि पश्यन्तुमा कश्चित दु:ख भाग भवेत्।।
यानि की एक ऐसी शुभकामना जिसमें सभी के सुख की आशा की गयी होऔर हम तो ऐसे चिंतन का हिस्सा रहे हैं जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की कामना की जाती है। कोई एक देश और उस देश के प्राणी ही नहींबल्कि सार संसार ही अपना घर है। यह सब पढ़करसोच कर खुद पर गर्व होता है और ज्यादा ख़ुशी तो तब होती है कि यह मात्र कहनेलिखनेपढने की ही बातें नहीं हैं। बल्कि जिन्होंने इन्हें कहा हैलिखा है उनका जीवन ऐसी भावनाओं और कर्मों का जीवन्त उदाहरण रहा है। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होती कि हम एक महान देश भारत के नागरिक हैं। मनुष्य जन्म मिलना तो खुदा की सौगात है हीलेकिन भारत जैसे देश में जन्म मिलना यह खुदा की विशेष कृपा हैउसका एक उपहार है। जहाँ सबके भले की कामना ही नहीं की जाती बल्कि अगर किसी को कोई मौका मिलता है तो वह उस व्यक्ति के लिए काम करने से भी नहीं कतराता और बदले में किसी लाभ की कोई इच्छा किये बगैर सेवा भाव से कर्म करता है। इस देश में शुभकर्म और शुभकामना दोनों का महत्व है।
आज फिलहाल इतना ही....आप सबको नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं.