12 अक्तूबर 2012

साँसों के सफ़र का उत्सव

भारतीय संस्कृति में उत्सव का बड़ा महत्व है. उत्सव शब्द सुनते ही हमारे जहन में एक रोमांच सा भर जाता हैमन ख़ुशी की कल्पना से झूम उठता हैऔर ऐसा लगने लगता है जैसे सारा वातावरण खुशियों से सराबोर होउत्सव मात्र हंसी-ख़ुशीनाच-गान या खेल का नहीं होताउत्सव तो जीवन की नैसर्गिकता का होता हैजहाँ हम साकार और निराकार को इकमिक महसूस करते हैं. वास्तविकता में उत्सव अपने में एक बृहत् अर्थ समाये हुए हैयह तो उस हर चीज का होता हैजहाँ लोग अपने पराये के भेद भूल जाते हैंदेशों की सरहदें यहाँ कोई मायने नहीं रखतीभाषायी भिन्नता यहाँ कोई अड़चन पैदा नहीं करती और किसी प्रकार का कोई मानसिक द्वंद्व यहाँ नहीं रहताअगर कुछ रहता है तोवह एक उत्सव! बस एक उत्सव,  उसके सिवा कुछ भी नहीं , और अगर हम साँसों के इस सफर को उत्सव में तब्दील कर पायें तो जीवन की महता बढ़ जायेजीवन कालजयी हो जाये.
हम उत्सव तो मनाते हैं सबकी ख़ुशी के लिएदूसरों की ख़ुशी में खुद को शामिल करना उत्सव की चरम सीमा है .जब किसी समारोह में लोगों को एक दुसरे से मिलते हुए देखता हूँ तो मन ख़ुशी से भर जाता है. उनका परस्पर सौहार्द भरा मिलन और मुस्कराहट भरा स्वागत एक आनंद देता है.  लेकिन दूसरे ही पल हमारी मानसिक दीवारें हमें घेर लेती हैंहमारी संकीर्णता हम पर हावी हो जाती हैतब सब कुछ ऐसा लगनेलगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं होयहाँ कोई ख़ुशी थी ही नहींकोई प्रेम नहीं था. एकदम भिन्न वातावरण और ऐसे वातावरण में  हमारे लिए उत्सव एक औपचारिकता बन जाता हैकुछ मजबूरी को निभाने जैसामात्र कुछ करने जैसा.  बस कर लिया या करना है उससे आगे कोई ख्याल नहीं फिर हम जुड़ ही नहीं पाए उत्सव से तो वास्तविक खुशी कहाँआनंद कहाँजब हम वास्तविक रूप से उत्सव से जुड़ ही नहीं पाए तो आनंद की बात कहीं दूर हैऔर जब हम आनंद और खुशी को समझ ही नहीं पाए तो फिर जीवन के उत्सव होने की बात कहीं दूर है. जीवन एक उत्सव है यह सोचना भी बेमानी होगीएक कपोल कल्पना जैसे
इस धरा पर जब कोई नवजात जन्म लेता है तो सब उत्सव मनाते हैं. माँ को सबसे अधिक ख़ुशी होती है. पिता का हृदय भी आनंद से भर जाता है. दादा-दादीनाना-नानीचाचा-चाची ना जाने कितने रिश्ते उससे जुड़ जाते हैं. सिर्फ यह रिश्ते ही नहीं बल्कि समाज की कई ओर चीजें  भी उससे जुड़ जाती हैंफिर धीरे-धीरे उस नवजात का जीवन क्रम शुरू होता है. वह जीवन के सफ़र की ओर अग्रसर होता है. कई बार नहींबल्कि हर बार यह सुना जाता है कि बचपन बड़ा सुहाना होता है. लेकिन सबका बचपन सुहाना हो ऐसा सम्भव नहीं. यहाँ तो दरिन्दगी इतनी बढ़ चुकी है कि हम नवजात को जन्म से पहले  ही मार रहे हैं. जो जन्म लेकर इस धरा पर जीवन यापन कर रहे हैं वह भी कहाँ सुरक्षित हैं? हर कोई इस धरा पर परेशानियां झेल रहा है. हर किसी को जीवन में कुछ खोने का डर बना रहता है. जो कि काफी हद तक स्वाभाविक भी है ओर मानवीय वयवहार के अनुकूल भी. लेकिन मुश्किल वहां पर खड़ी हो जाती है जब हम मोहवश किसी को अपना मान लेते हैं, ओर उसके खोने का डर हमें हमेशा सताए रखता है. जीवन  में मोह और नासमझी हमारे जीवन उत्सव से हमें परेशानियों की और अग्रसर करते हैं. ऐसे हालात में हमारे जीवन में उत्सव का महत्व कम होता चला जाता है और एक दिन हम ऐसे मोड़ पर पहुँचते हैं जहाँ उत्सव कहीं पीछे छुट जाता है और मजबूरियाँ और औपचारिकताएँ जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. फिर जीवन-जीवन नहीं रहता तो उत्सव-उत्सव कहाँ रहेगा? 
मानव इस धरा पर एक ऐसा प्राणी है जो काफी हद तक प्रकृति को अपने अनुकूल कर सकता है. आज तक उसने ऐसे प्रयास किये भी हैं. उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है और उसी सफलता के आधार  पर वह अपने प्रयासों को जारी रखे हुए है. उसके इन प्रयासों के पीछे हमारे शास्त्रों की यह मान्यता भी कहीं सटीक बैठती है कि इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी कायनात है वह सब भोग योनियाँ हैं और मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म योनि प्राप्त है. जिसे बुद्धि और विवेक की सौगात ईश्वर द्वारा प्रदत है. ईश्वर ने जिसे अपने प्रतिरूप के रूप में जन्म दिया हैइसलिए वह सर्वश्रेष्ठ है. परमात्मा ने जो कुछ भी मानव को दिया है उसके आधार पर उसे श्रेष्ठ कहा जाये, किसी हद तक इस बात को माना जा सकता है. लेकिन यह एक पैमाना नहीं है जीवन की श्रेष्ठता का. यह जीवन की श्रेष्ठता का एक पहलू हो सकता है. जीवन की श्रेष्ठता के तो अनेक आयाम हैं. अगर हम उन्हें पूरी तरह से भी जीवन में अपना लें तो भी कहीं पर कोई कमी रह जाएगी. फिर भी अगर हम जीवन में कुछ करने के लिए प्रयासरत हैं तो कुछ न कुछ तो हमारे हाथ लगेगा ही. बस यही समझ है जो हमें जीवन की श्रेष्ठता की और ले जाती है. अगर हम जीवन में श्रेष्ठता के मानक भी छू पाएंगे तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. जीवन में नए मानक बनाना तो विरलों के हाथ में होता है. ऐसे इनसान तो ब्रह्माण्ड में कभी-कभी ही पैदा होते हैं और ऐसे इनसानों के व्यक्तित्व और विचारों की चमक इनती तेज होती है जो हजारों वर्षों तक फीकी नहीं पड़ती. लेकिन अफ़सोस कि ऐसे इनसानों की संख्या को आज हम अँगुलियों पर गिन सकते हैं , जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्मों से इतिहास की धारा को बदला है और हमारे लिए जीवन के नए और उदात मानक अख्तियार किये हैं. आये दिन जनसंख्या बढ़ने के नए-नए आंकड़े तो आते रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता के आंकड़े कोई नहीं बना सकता. आज हम जिन इनसानों को महान होने का दर्जा देते हैं वह किसी एक क्षेत्र में सिद्धहस्त थे. उसी कारण हम उन्हें महान की संज्ञा से अभिहित करते हैं. सम्पूर्ण इनसान तो आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ और ना ही होने की सम्भावना है. लेकिन इनसान कितना नासमझ है कि उसे अगर कहीं कोई छोटी सी उपलब्धि हासिल हो जाती है तो वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और यही आभासी श्रेष्ठता का पहलू उसे जीवन में अभिमान की तरफ अग्रसर करता है. किसी उपलब्धि पर अभिमान को तरजीह देना और किसी को अपने से निम्न समझना अंधकार की तरफ बढ़ना है. जीवन में सब कुछ हासिल करके विनम्र बने रहें तो हम जरुर प्रकाश की तरफ अग्रसर होंगे और यही जीवन का मंतव्य भी है. 
सुकरात को विश्व में एक एक निर्भीक दार्शनिक के रूप में ख्याति प्राप्त है. लेकिन जैसे-जैसे सुकरात की प्रसिद्धि बढती जाती है तो वह खुद को अज्ञानी घोषित करता जाता है. जिस व्यक्ति (सुकारत) को पहले अपनी प्रसिद्धि पर गर्व होता था उसने ही अन्तिम समय में कहा था कि "मैं जीवन में कुछ सीख नहीं पायामुझे कुछ पता नहींमैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूँ".  सुकरात का खुद को सबसे बड़ा अज्ञानी कहना यह दर्शाता है कि उन्होंने जगत का सबसे बड़ा ज्ञान हासिल कर लिया. हमारे जीवन की जितनी भी उपलब्धियां हैं, उन्हें ऐसे भी अभिव्यक्त किया जा सकता है.  जैसे हम एक सागर के किनारे खड़े हों तो हमारी दृष्टि कितनी दूर तक देख पाएगी और हम उस सागर से क्या समेट पाएंगे हो सकता है हम जो समेटें वह हमारे किसी काम का न हो लेकिन हम समेट रहे हैं इस भ्रम में कि मैंने सबसे ज्यादा समेट लिया है. मेरी क्षमता हर किसी से कहीं अधिक है.  लेकिन जब वास्तविकता सामने आ गयी कि मैं चाहे जितने भी यतन कर लूं मैं इस सागर को खुद में नहीं समेट सकता तो फिर जितना भी समेटा है वही सुख का कारण है. लेकिन जो घटित होता है वह इसके विपरीत होता है. उसका कारण भी हम ही होते हैं. क्योँकि हमें जिस दिशा कि तरफ बढ़ना होता है उस दिशा कि तरफ हम बढ़ते नहीं तो फिर उलटी दिशा में चलकर व्यक्ति कहाँ मंजिल तक पहुँच पायेगा. जब वह मंजिल तक पहुंचेगा ही नहीं तो फिर जीवन का उत्सव कहाँ फिर वह ख़ुशी कहाँ और सच तो यह है कि जिन चीजों में हम ख़ुशी ढूंढते हैं वही कहीं हमारे लिए दुःख का कारण भी बन जाती है. हम जीवन को उत्सव तभी बना पाएंगे  जब जीवन कि वास्तविकता से जुड़ जायेंगे.
मेरे जन्मदिन के इस अवसर पर आपने मुझे जो शुभकामनाएं प्रेषित की उसके लिए आप सबका तहे दिल से आभारी हूँ. आपका यह प्रेम मुझे अनवरत मिलता रहेयही कामना है. आपके प्रेम और सहयोग से यह जीवन उत्सव बन जाए और साँसों का यह सफ़र आसानी से तय हो जाये तो जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए.

18 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन को उत्सव ही समझा जाये ...नहीं तो परिस्थितियां और आपाधापी इसे बोझ बना देती हैं...... विचारणीय पोस्ट

    उत्तर देंहटाएं
  2. साँसों के सफर का उत्सव
    पढकर अच्छा लगा.
    सार्थक चिंतन

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्सव अपने अस्तित्व की आनन्दमयी स्थिति याद दिलाने में सहायक होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कोई माने या ना माने ..जन्मदिन वाले दिन ...हर इंसान दिल से एक बार सोचता जरुर हैं ...वो सोच बड़े इंसान जैसी हो या बच्चे जैसी
    अपने ही भीतर उत्सव सा प्रकाश उज्जवल रहता हैं :)))

    उत्तर देंहटाएं
  5. सही कहा जीवन को उत्सव समझ जीने में ही हो 'जीने' जैसा है...वरना 'काटना'

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर पोस्ट, क्या बात है
    बहुत बहुत शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  7. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  8. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  9. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  10. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  11. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  12. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  13. उत्सव कोई भी रोमांच तो होता ही है. शायद रोज की भागदौड से बचने का उत्साह हो.

    बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  14. कोई भी नई शुरुआत उत्सव ही तो है..जीवन का हर नया क्षण उत्सव है... जन्म दिन की अशेष शुभकामनाएं....

    उत्तर देंहटाएं
  15. एक बार पुनः आपको जन्मदिवस की दिल से शुभकामनायें केवल राम जी ..
    बेहद ही उम्दा पोस्ट है ..'सांसो का सफ़र ..अपने अस्तित्व की गरिमामयी दास्तान ,रोचक होता है , हर उम्र में अपना जन्मदिवस .................लाजवाब लेख .. कोटिशः बधाई ..........

    उत्तर देंहटाएं
  16. विचारणीय सार्थक रोमांचक पोस्ट ,बधाई,मेरे ब्लॉग विविधा पर स्वागत है |

    उत्तर देंहटाएं
  17. साँसों का सफर मुबारक .....!!

    जन्म दिन की ढेरों शुभकामनाएं .....!!

    उत्तर देंहटाएं

जब भी आप आओ , मुझे सुझाब जरुर दो.
कुछ कह कर बात ऐसी,मुझे ख्वाब जरुर दो.
ताकि मैं आगे बढ सकूँ........केवल राम.