जीवन एक अनवरत चलने
वाली प्रक्रिया है. साँसों का यह सफ़र इंसान को किस पड़ाव तक ले जाए यह
निश्चित नहीं है. जब तक साँसें चल रही है जीवन है, सांसें रुकी
की नहीं जीवन समाप्त समझो. लेकिन साँसों के रुकने से जीवन समाप्त नहीं होता हमें यह
बात समझ लेनी चाहिए. हालाँकि इस जीवन के बारे में यह कहा जाता है कि
"पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात
/ देखते ही
छुप जायेगा ज्यों तारा प्रभात". किसी हद तक तो यह बात सही भी लगती
है. लेकिन जब गहरे में उतरकर देखते हैं तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि जीवन की
तो सीमा है, लेकिन जीव की नहीं. जीव की यात्रा
अनन्त है और जीवन की सीमित. जीव परमात्मा का अंश है, तो जीवन
प्रकृति का. यह बात भी गौर करने योग्य है कि प्रकृति परमात्मा की छाया है और हम भी
प्रकृति का एक अंश, यह भी सही है कि जिन तत्वों से जीवन का
निर्माण हुआ है, जीवन की समाप्ति पर वह
तत्व अपने-अपने मूल में मिल जाते हैं और फिर नव निर्माण होता है.
यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है सृष्टि के प्रारम्भ से,
और चलती
रहेगी अनंत काल तक. बस जीवन के प्रति अगर यही समझ बनी रहती है तो जीवन का सफर सुखदायी
और आनंदमय बना रहता है, और हम साँसों के इस सफर को तय करते हैं पूरी
संजीदगी के साथ.
आज जब मैंने जीवन के 29 वर्षों का सफर तय कर लिया तो बहुत सी बातों के विषयों में सोचा और
आकलन किया खुद का, और खुद के कर्मों का बस यही कि जीवन जिस दिशा में जा रहा है और जिस गति से जा रहा है, अगर वही दिशा और गति बनी रहे तो भी कहीं न कहीं जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए. लेकिन इसके लिए मुझे बहुत संभल कर चलना है. क्योँकि इस संसार में खुद को पाक-साफ रखना बहुत कठिन कार्य है, लेकिन फिर भी कोशिश तो की जा सकती है और बस यही प्रयास अनवरत जारी रहता है. हालाँकि यह मानवीय स्वभाव है कि वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रहता और उसे रहना भी नहीं चाहिए. मन की चंचलता और बुद्धि की तार्किकता उसे जीवन भर संघर्षरत रखती है और मानव अपनी उपलब्धियों से खुद को गर्वित महसूस करता है. लेकिन यह बात हमेशा मेरे जहन में रहती है कि "क्षणिकता" से "वास्तविकता" की और बढ़ा जाए, अन्धकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, भौतिकता से अध्यात्म की ओर अगर यह सब हो जाता है तो निश्चित रूप से जीवन मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ जाएगा ओर जीवन का लक्ष्य सिद्ध हो जायेगा. लेकिन यह होगा तब ही जब हमारा-आपका सहयोग और प्रेम परस्पर बना रहेगा.
आज
मन बहुत द्रवित है. सोचा अपने जीवन के हर पहलु को तो बहुत सी बातें नजर आयीं. ब्लॉगजगत का दिया हुआ प्यार और सम्मान मेरी आखों में आंसू ले आया.
जब मैंने ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रवेश किया था तो एक सामान्य पाठक
के रूप में और आज भी खुद को ब्लॉगिंग के विस्तृत पटल पर एक सामान्य पाठक ही मानता
हूँ. आज जो भी कुछ कर पाता हूँ यह सब आपके प्रेम और सहयोग का ही परिणाम है.
आपकी प्रेरणादायी टिप्पणियाँ ही नहीं बल्कि समय -समय पर व्यक्तिगत
रूप दिए गए आपके सुझाब भी मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं. इसके अलावा आपका अपनापन
तो मेरे लिए खुदा की सौगात से कम नहीं. इसलिए आज नतमस्तक हूँ आप सबके सामने. कल जब
पोस्ट लिख रहा था तो कुछ नाम मेरे जहन में उभर आये थे. लेकिन जब पूरी सूची देखी तो
लगा कि इतने सारे नामों के लिए तो एक अलग से पोस्ट लिखनी पड़ेगी और फिर सोचा कि
ब्लॉग जगत ने जो कुछ मुझे दिया है उसके लिए धन्यवाद कहना, एक
औपचारिकता को निभाने जैसा होगा.
हालाँकि
सूचना और तकनीक के इस दौर में आभासी रिश्तों की बात की जाती है और इसे एक तरह से
आभासी दुनिया कहा जाता है. लेकिन मैंने जहाँ तक अनुभव किया मुझे काफी हद तक ऐसा
प्रतीत नहीं हुआ. जिस भी व्यक्ति से बात हुई सबने सहयोग और प्रेम की ही बात की. माध्यम
कोई भी रहा हो (टेलीफोन, फेसबुक, ऑरकुट, मेल) आदि. लेकिन मैंने
सबको सहयोग देते हुए पाया. इसलिए खुद को बहुत खुशनसीब समझ रहा हूँ. अब तो लगता है
कि जीवन का सफर एक नए दौर की तरफ चल पड़ा और यह दौर और यह रिश्ते मुझे जरुर कोई
नया मुकाम देंगे. इसी आशा के साथ....! अब आप सब तो यही कहेंगे न ........ !
आज की इस
पोस्ट का पॉडकास्ट ब्लॉग जगत की चर्चित पॉडकास्टर आदरणीय अर्चना
जी के सौजन्य से आप मेरी आवाज में सुन सकते हैं
...आदरणीय अर्चना जी ने मेरे मन की भावनाओं को समझते हुए आपकी नजर यह
पोस्ट पेश की ...आशा है आपको यह प्रयास पसंद आएगा ...!





