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01 अप्रैल 2012

मेरे आलेख , आपकी टिप्पणियाँ और यह पॉडकास्ट

19 टिप्‍पणियां:

जीवन और साहित्य एक दूसरे के पर्याय हैं . जिस तरह जीवन की कोई सीमा नहीं , उसी तरह साहित्य को भी किसी सीमा में बांधना असंभव सा प्रतीत होता है . सीमा तो शरीरों की है . लेकिन भाव तो शाश्वत है , भाव मानव जीवन की अमूल्य पूंजी है और इसे अभिव्यक्त करने के माध्यम भी कई है . शब्द अपने आप में निर्जीव होता, लेकिन अर्थ उसे जीवन देता है और  एक मधुर आवाज उस शब्द को अमर करती है . मधुर आवाज और शब्द का अद्भुत संगम ही हमें आनंद की पराकाष्ठा तक ले जाता है, और हम भाव विभोर हो जाते हैं . इन्हीं शब्दों और आवाज के अद्भुत संगम ने संगीत जैसी कला को जन्म दिया और आज हम चाहे जैसी परिस्थिति में हो संगीत हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है . पिछले दिनों मैंने सार्थक ब्लॉगिंग के कुछ पहलूओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया था . जिसे चार पोस्टों में मैंने आपसे सांझा किया . आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं भी मुझे प्राप्त हुई और आदरणीय अर्चना जी ने तो मुझे हतप्रभ कर दिया . इन चारों पोस्टों को स्वर देकर .....! तो आइये पहले अवगत करवाते हैं, आपकी चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं से.......!

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर  इस श्रृंखला के पहले भाग से लेकर अंतिम भाग तक आप सबकी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई जिनमें से कुछ यहाँ शामिल कर रहा हूँ  ......! 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने सलिल वर्मा जी ने कहा … केवल राम जी, बड़ी वृहत जानकारी आपने प्रस्तुत की है.. एक ज्ञानवर्धक श्रृंखला!!  गिरधारी खंकरियाल जी का कहना है …गहन अध्ययन के बाद किया गया विवेचन . कुछ जगहों पर वर्तिका का संपादन छुट गया है. उपेन्द्र नाथ बहुत ही अच्छी प्रस्तुति. ... आज के समय में ब्लागिंग की सार्थकता से इंकार नहीं किया जा सकता है. अपनी बात कहने का ये महत्वपूर्ण साधन है. मनोज कुमार जी इस आलेख को ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना बता रहे हैं  यह आलेख सार्थक ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना है। SKT ने कहा… सुंदर विवेचन ! सृष्टि, मानव सृष्टि पर आपकी दृष्टि के हम कायल हुए! 

दूसरे भाग पर आपकी टिप्पणियाँ कुछ इस तरह प्राप्त हुई .......!
vidya सार्थक लेख...टिप्पणियां पाने से खुशी तो मिलती है...मानव स्वभाव है...मगर हम स्वयं आपने आलोचक बने तो रचनात्मकता निश्चित ही बनी रहेगी.. डा. अरुणा कपूर. जी ने महत्वपूर्ण बात कही :  मात्र सृजन को ही धर्म मान कर चलने वाले लेखक आज के जमाने में मिलने मुश्किल है...सृजन के पीछे कोई न कोई उद्देश्य जरुर होता ही है!...देखना यह है कि उद्देश्य लेखक को किसी भी तरह का लाभ पहुंचाने के बावजूद भी पाठक गण को भी लाभकारक सिद्ध हो!...बहुत सुन्दर विषय!...धन्यवाद! shikha varshney जी ने इस बात पर ध्यान दिलाते हुए कहा " आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं ."  मेरे ख़याल से यही मुख्य बात है.टिप्पणियों पर बहस बहुत हो चुकी है.वह सार्थक लेखन की गारंटी नहीं - सहमत.परन्तु लेखन के लिए हौसलाफजाई का माध्यम अवश्य ही हैं.अंत में - ब्लॉग्गिंग को ब्लॉग्गिंग ही रहने दो .....:) कुल मिलाकर बहुत अच्छा विश्लेषण और सार्थक लेखन. Rahul Singh जी की बात बहुत गौर करने वाली है : अवधारणा और विवरणमूलक चर्चा के साथ बिंदुवार और भी स्‍पष्‍ट किया जाना आवश्‍यक है. दूसरे शब्‍दों में ब्‍लागिंग और ब्‍लागेतर लेखन में क्‍या कोई खास, साफ और ठोस फर्क बताया जा सकता है. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद  ब्लागिंग तो रचनाकार को विधा और शैली चुनने के साथ साथ मकसद का विस्तार भी देताहै। यह तो क्षितिज है :) रचना दीक्षित जी की चिंता बाजिब है  : यदि विकासकाल में ही उसके कायदे निर्धारित हो जाएँ तो विकास सही दिशा में होता है . अन्यथा दिशाहीन विकास रचनात्मकता खो बैठता है और कुछ समय पश्चात ही निरर्थक लगने लगता है. संजय @ मो सम कौन ? जी कह रहे हैं  : मैनेजमेंट की शुरुआती पढ़ाई में एक चैप्टर ’एफ़िशियेंट’ और ’इफ़ैक्टिव’ पर हुआ करता था, वैसा ही कुछ ’सफ़ल’ और ’सार्थक’ के बारे में समझा जा सकता है। प्राथमिकताएं सबकी अपनी अपनी होती हैं। अच्छा लगा पढ़ना। पी.एस .भाकुनी : बेशक टिप्पणियां किसी भी रचना को आयाम देते हैं किन्तु सिर्फ टिप्पणियों की संख्या के आधार पर रचना का मुल्यांकन नहीं किया जा सकता है.....सुंदर प्रस्तुति...! anju(anu) choudhary इस बात से सहमत होती हुई कहती हैं कि " मात्र और मात्र सार्थक सृजन ,चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन ? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है . जैसे कहा जाता है कि कला - कला के लिए , कला जीवन के लिए "  . .... इन सब से हट कर बस एक ही बात ...सृजन ...कभी नहीं रुकता...उसे सबके सामने आना ही हैं...किसी का पहले या किसी का बाद में ...बिना किसी उम्मीद के ...बिना किसी इच्छा के .....! 

तीसरे भाग पर आपकी प्रतिक्रियाएं ऐसी रहीं ........! 
दर्शन कौर 'दर्शी' जी को तो हमारी बात समझ ही नहीं आई .....हा..हा..हा..!  लेकिन फिर भी ऐसे अपनी बात कही ...केवल,... मुझे कुछ समझ आया कुछ नहीं ..पर जो समझ आया वो ईमानदारी से लिखा प्रतीत होता हैं ....एक बार नहीं अपितु कई बार पढ़ चुकी हूँ ...टिपण्णी लिखने में भी सहज नहीं हो पाती हूँ ..पर फिर भी हमेशा तुम्हारे ब्लॉग पर आती हूँ कई बार टिपण्णी नहीं लिख पाती हूँ ओके या बहुत अच्छा ,बढियां कहकर तुम्हारे मेहनती लेख के साथ इन्साफ करना ठीक नहीं लगता ...तुम इसी तरह लिखते रहो ..धन्यवाद ! संध्या शर्मा जी ने लिखा  ब्लॉगिंग के लिए आवश्यक विभिन्न पहलूओं  पर आपके विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. और इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है... " निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं , और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं " उपयोगी जानकारी से भरे इस आलेख के लिए बहुत-बहुत आभार ...! सुबीर रावत जी तो सोच में पड़ गए : आपकी पोस्ट बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है. इतने गंभीर विषय लेकर आप चलते हैं कि इसको पढने के लिए तन्हा होना बहुत जरूरी हो जाता है, और फिर दुबारा पढ़कर ही कुछ पल्ले पड़ता है. सचमुच आपकी इस तन्मयता का कायल हूँ. अब ब्लॉगिंग  जैसे नए व नीरस विषय को उठाकर आपने एक सार्थक बहस छेड़ ही है. आभार !! ब्लॉ.ललित शर्मा का अंदाज काबिल -ए- तारीफ है  कल ही एक मित्र ने चर्चा के दौरान कहा कि - केवल राम जो लिखता है वह समझ नहीं आता, क्या लिख गया और मेरी भी समझ नहीं आता कि क्या कमेंट लिखुं।---------- मेरी भी आज यही स्थिति है क्योंकि………………आज होली है। इसलिए इसी से काम चलाएं, "हम आपकी लेखनी के कायल हैं, इतना अच्छा आप कैसे लिख लेते हैं?" :):) हरकीरत ' हीर' जी ने हमारी बात को ही हथियार बना लिया और कहा " जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है , क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है , राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है . लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी . विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार - बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है " lgta hai bloging par kitaab likhi ja rahi hai ....agrim shubhkamnayein .....:)) वाणी गीत जी के विचार भी महत्वपूर्ण हैं …ब्लॉगिंग में मौलिक अभिव्यक्ति की सहजता बहुत मायने रखती है , वैसे तो पाठक वर्ग पर निर्भर करता है वह क्या पढना चाहता है !अच्छी प्रस्तुति !

अब हम  चौथे भाग तक पहुँच गए .....! काजल कुमार Kajal Kumar जी भाषा पर बात करते हुए कहते हैं : यहां बहुत से लोगों के अपने अपने एजेंडें हैं. जहां तक भाषा की बात है जिसके थाली में जितना है, जीम कर चला जाता है . डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…यही पूरी श्रृंखला सभी के लिए उपयोगी रही है .... सार्थक चिंतन प्रस्तुत करती पोस्ट....प्रवीण पाण्डेय ने कहा…सबके लिये बार बार पठनीय..Amrita Tanmay ने कहा… ब्लॉगिंग के अद्भुत संसार के नायाब हीरे की कलम से निकली.. अनमोल आलेख..अरुण चन्द्र रॉय जी ने सुझाब देते हुए कहा बढ़िया चर्चा केवल जी. थोड़े उदहारण के साथ चर्चा करेंगे तो अच्छा रहेगा.......! इन सब प्रतिक्रियाओं के साथ इस पॉडकास्ट को सुनना अपने आप में एक नया अनुभव रहेगा .....किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .......! 

                                              

12 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...4

24 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....रचनाकर्म में स्पष्टता का अपना महत्व है. हम कुछ भी सृजन कर रहे हैं लेकिन जितनी हमारी विषय और विचार के प्रति स्पष्टता होगी उतना ही हमारा सृजन बेहतर होगा. कालजयी सृजन निश्चित रूप से विषय के प्रति स्पष्टता का ही परिणाम होता है . पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से भरा सृजन कभी भी कालजयी नहीं हो सकता. ऐसा सृजन थोड़ी देर के लिए चर्चा का विषय तो बन सकता है. लेकिन एक सच्चे और समझदार पाठक के लिए उसके कोई मायने नहीं. कुछ एक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम यह सोच लें कि हमारा सृजन उत्तम है तो यह हमारे लिए भी भ्रम ही होगा. अच्छे चिंतन और बेहतर लेखन के परिणाम तो वर्षों बाद ही प्राप्त होते हैं. इसलिए बेशक हमें आलोचनाओं का सामना करना पड़े लेकिन सृजन के मूल्यों को बरकरार रखने के लिए हमें अगर यह भी सहना पड़े तो कोई हर्ज नहीं. 

बोधगम्यता : विषय प्रतिपादन में जितना महत्व स्पष्टता का है. उससे कहीं ज्यादा महत्व विषय की बोधगम्यता का है. विषय प्रतिपादन बहुत कठिन कार्य हो सकता है, जब विषय के प्रति सोच स्पष्ट न हो. लेकिन अगर हम किसी तरह विषय प्रतिपादन में सफल हो जाते हैं तो सबसे बड़ा मुद्दा उसकी बोधगम्यता का बना रहता है. हमारी दृष्टि विषय के प्रति मौलिक भी है, जानकारी भी हमें पूरी है और हम उस विषय के प्रति पूरी तरह से स्पष्ट भी हैं. लेकिन हमने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया है कि वह समझ से बाहर की वस्तु बना रहता है तो हमारे अच्छे तर्कों और तथ्यों का कोई लाभ पाठक को नहीं होने वाला. पाठक की अपनी समझ और सोच है किसी विषय के प्रति और उसी समझ और सोच के आधार पर वह आपके लेखन का मूल्यांकन करता है. इसलिए यह जरुरी है कि जब हम किसी विषय को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें तो उसके प्रत्येक पहलू पर गहराई से चिंतन करें. जब तक हम विषय की बोधगम्यता पर ध्यान नहीं दे पायेंगे तो अच्छे से अच्छे तर्क और तथ्य भी समझ के स्तर पर टेढ़ी खीर बने रहेंगे. कई बार यह देखने में आता है कि रचनाकार ने बहुत अच्छे विषय का चुनाव किया है, लेकिन उसकी विषय प्रतिपादन शैली इतनी असमंजस भरी होती है कि सब कुछ पढने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता. हालाँकि पाठक उस विषय में जानना चाहता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी वह समझ नहीं पाता कि क्या कहा गया है. हालाँकि तथ्य और तर्क वहां पर पूरी तरह से अभिव्यक्त किए गए होते हैं. मेरा अपना निजी अनुभव है कि कई अच्छे रचनाकारों की पुस्तकों को सिर्फ और सिर्फ बोधगम्यता की कमी के कारण ही नहीं पढ़ा गया. हालाँकि यह हो सकता है कि मेरे लिए जो कुछ कठिन रहा हो वह किसी के लिए सरल भी तो हो सकता है. लेकिन विषय को ग्राह्य बनाने में विषय की बोधगम्यता निश्चित रूप से महती भूमिका निभाती है और बोधगम्य विषय अपेक्षा से अधिक लाभ पाठक को दे जाता है.

विषय अनुकूल भाषा : भाषा भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है. भाव अव्यक्त रह जाता अगर भाषा नहीं होती. हालाँकि बहुत से माध्यम हैं भावों को अभिव्यक्त करने के, लेकिन भाषा से सशक्त माध्यम कोई नहीं हो सकता. मानव ने जितना भी विकास किया है उसमें भाषा की महता को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. विकास के हर एक मानक में भाषा की महता बहुत महत्वपूर्ण है. यह भी सच है कि आज भाषा ने विषय के अनुकूल अपना विकास किया है . हर विषय की अपनी शब्दावली है और उसी शब्दाबली के आधार पर उस विषय ने भी नए आयाम स्थापित किए हैं. विषय के प्रतिपादन में भाषा महती भूमिका निभाती है. जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जिसे भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. अनुभूति को अभिव्यक्त करना, दृश्य को अभिव्यक्त करना, सोच को अभिव्यक्त करना, समझ को अभिव्यक्त करना, भाषा के ना जाने कितने आयाम है अभिव्यक्ति के स्तर पर, और इन सभी आयामों ने भाषा को बहुत व्यापक विस्तार दिया है. जितनी-जितनी हमारी आवश्यकता और समझ बढ़ी भाषा ने उसी अनुरूप अपना विकास किया और यह निरंतर विकास की राह पर अग्रसर है. 

विश्व की प्रत्येक भाषा का मंतव्य तो स्वस्थ संवाद के माध्यम से जीवन को आनंदमय बनाना रहा है,
सभ्यता-संस्कृति का विकास करना रहा है और इन मंतव्यों को पूरा करने में हर भाषा सक्षम भी है. लेखन के स्तर पर जब हम भाषा की बात करते हैं तो इसका प्रयोग करना और भी सजगता का विषय बन जाता है. क्योँकि हम जो कुछ भी अनुभूत करते हैं वह अभिव्यक्त तो भाषा के माध्यम से ही होता है. भाषा के दृष्टिकोण से अगर हिंदी ब्लॉगिंग की बात करें तो यहाँ एक नयी शब्दावली का विकास होता नजर आ रहा है. लेकिन अभी तक इसको अंतिम स्वरूप मान लिया जाये यह कहना तर्कसंगत नहीं लगता. या कोई यह कह दे कि हिंदी ब्लॉगिंग अपनी शब्दावली में भावों को अभिव्यक्ति देती है तो यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी. हालाँकि इस दिशा में सम्भावना देखी जा सकती है, लेकिन भाषा का विकास या शब्दों का निर्माण करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है, यह एक विज्ञान है और विज्ञान हमेशा तर्क और तथ्य के आधार पर  कार्य करता हुआ किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है. लेकिन भाषा, विज्ञान से भी आगे की चीज है, विज्ञान से भी दो कदम आगे का आविष्कार है, इस कथन के पीछे मेरी यह मान्यता है कि भाषा अक्षरों से बनती बेशक है लेकिन उन अक्षरों के निर्माण और संयोजन से जो शब्द बनते हैं उनमें भाव और अनुभूति भी समाहित होती है. हिंदी भाषा में ऐसे अनेकों शब्द हैं जहाँ पर यह तथ्य पूरी तरह से उभरकर सामने आता है कि जब हम किसी भाव को अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं और हमने शब्द का उच्चारण कर दिया तो एक बिम्ब स्वतः ही उभर आता है जो कि भाषा के वैज्ञानिक पक्ष को उभार कर सामने लाता है. इसलिए किसी भी विषय को अभिव्यक्ति देते समय भाषा और शब्दों का चयन बहुत चुनौती भरा कार्य होता है . लेकिन जब हमें विषय पूरी तरह से स्पष्ट है तो फिर भाषा कोई चुनौती नहीं. जैसे कबीर द्वारा अपने उपदेशों के लिए प्रयुक्त की गयी भाषा के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है  ‘कबीर वाणी के डिक्टेटर थे, भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था’ निश्चित रूप से कबीर ने अपने विषय को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाषा को सशक्त माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया. लेकिन ब्लॉगिंग में कई बार टिप्पणी या पोस्ट में अभद्र शब्दों का प्रयोग अखरता है, और जब कहीं भी ऐसा कुछ देखता हूँ तो उस व्यक्ति की भाषा के प्रति नासमझी पर दया का भाव पैदा हो जाता है.  

शैली की रोचकता : भाषा अगर भावों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है तो शैली उन भावों को रोचकता से पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम है. हालाँकि सामान्य तौर पर पाठक शैली पर ध्यान नहीं देते. लेकिन जैसे ही हम रचनाकार की शैली को पहचान जाते हैं तो उस रचनाकार को समझना हमारे लिए आसान होता है. भारतीय काव्यशास्त्र में शैली पर व्यापक चर्चा की गयी है और पाश्चात्य समीक्षा जगत में तो यह कहा जाता है कि ‘शैली ही व्यक्तित्व है’ यानि शैली के माध्यम से ही रचनाकार के विचार पाठक तक पहुंचते हैं और पाठक उन विचारों को शैली के माध्यम से ही समझने का प्रयास करता है. शैलियाँ के भी कई प्रकार हैं. जैसे वर्णात्मक, विवरणात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक आदि और इसी तरह निबंध में समास शैली, व्यास शैली, धारा प्रवाह शैली और तरंग आदि शैलियाँ  प्रयोग की जाती हैं. कविता का तो अपना एक अलग से शास्त्र है ही जहाँ पर कविता के सभी पक्षों पर विचार किया गया है. रस, अलंकार, रीति,  ध्वनि आदि पर बहुत व्यापक रूप से विचार किया गया है, और यह विचार रचना की शैली के रूप को समृद्ध करने के लिए किया गया है. हालाँकि भावों को किसी नियम या सीमा में बांधना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी अगर हम ऐसा प्रयास नहीं करेंगे तो सब कुछ बिखर जाएगा. ब्लॉगिंग में शैली का एक अपना महत्व है. हालाँकि यहाँ सब कुछ साहित्य के सिद्धांतों के अनुरूप रचा जा रहा है. इसलिए हर कोई ब्लॉगर होने के बजाये लेखक होने का भ्रम पाले है. लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है. 

लेखन और ब्लॉगिंग के सृजन में व्यापक अंतर है. ब्लॉगर अपने आप में सृजन से लेकर प्रकाशन और विज्ञापन तक एक संस्था है. लेकिन लेखक के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए निश्चित रूप से हमें ब्लॉगिंग और साहित्य सृजन के सम्बन्ध में ध्यान देना होगा. अगर हम इस अंतर को समझ जाते हैं तो निश्चित  रूप से किसी भी पोस्ट को शैली के स्तर पर रोचक बनाने का प्रयास कर सकते हैं. ब्लॉगिंग में ब्लॉगर किसी भी विषय को त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, लेकिन लेखन का अपना स्तर है. यहाँ पाठक की प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है और दूसरी तरफ साहित्य में ऐसा नहीं है. ब्लॉगिंग में हर कोई टिप्पणी करने की लालसा रखता है, लेकिन साहित्य में ऐसा प्रयास कोई-कोई ही करता है, और वहां की गयी समीक्षा निश्चित  रूप से बहुत उतरदायी भरा कार्य होता है. शैली की रोचकता निश्चित रूप से लेखक के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करती है और ब्लॉगिंग में ब्लॉगर की अंतरात्मा उसकी पोस्ट के माध्यम से अभिव्यक्त होती है. ब्लॉगिंग का स्वभाव ही है स्पष्ट, त्वरित और उन्मुक्त अभिव्यक्ति और निश्चित रूप से इस आधार पर देखें तो ब्लॉगिंग की शैली भिन्न होनी ही स्वाभाविक है. 

ब्लॉगिंग का अद्भुत संसार विविधताओं भरा है. किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं. मैंने एक छोटा सा प्रयास किया अपनी समझ के आधार पर...आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ और प्रोत्साहन इस दिशा में और गंभीरता से सोचने को प्रेरित करेगा...!

04 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...3

19 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....जीवन का मंतव्य जब कला की साधना बन जाता है तो फिर जीवन उस कला में रम जाता है. फिर कला ही जीवन बन जाता है और ऐसा सर्जक निश्चित रूप से कला को नया आयाम देते हुए जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर देता है. ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है यह तकनीक और कला का अद्भुत संगम है. आपके पास सृजन के इतने आयाम हैं कि आप किसी भी विषय को किसी भी तरह से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बेशर्त कि आप रोचकता और संजीदगी से सृजन को प्राथमिकता देते हों. अगर आप सृजन की प्राथमिकता और महता को समझते हैं तो आपके लिए ब्लॉगिंग रोचक और गंभीर होने के साथ-साथ जिम्मेवारी भरा कार्य हो सकता है. अगर ब्लॉगिंग के प्रति ऐसा दृष्टिकोण है तो निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं.

मौलिकता : आपने अपने सृजन की प्राथमिकता को तय कर लिया. आप किसी भी विषय पर गहन चिंतन के
लिए तैयार हैं तो आपके समक्ष मौलिकता एक बड़ा प्रश्न हो सकता है. मौलिकता से अभिप्राय विषय के प्रति आपका दृष्टिकोण है, आपकी उस विषय के प्रति दृष्टि है. यूं तो हर विषय पर वर्षों से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है और हो सकता है कि आपके समय में भी ऐसे विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा हो, लेकिन हर विषय में नवीनता और मौलिकता की सम्भावना सदा से छिपी रहती है. किसी भी विषय के अनेकों आयाम हो सकते हैं, हम किस आयाम पर केन्द्रित होकर विचार करते हैं यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है. एक ही विषय पर दो अलग-अलग विशेषज्ञ अपनी अलग - अलग मान्यताएं रख सकते हैं. यह मान्यातएं उनके चिंतन को हमारे सामने लाती हैं और यही मान्यताएं आगे चलकर उस विषय की नवीनता और मौलिकता को बनाये रखती हैं. ब्लॉगिंग की जो प्रकृति है यहाँ कोई भी विषय, अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकता है. इसकी प्रकृति को समझते हुए हम उस विषय को किस तरह और कितने मौलिक तरीके से सांझा करते हैं यह हम पर निर्भर करता है. जितना मौलिक चिंतन करते हुए हम किसी विषय को सांझा करते हैं निश्चित रूप से वह विषय अपन प्रभाव छोड़ने में सक्षम होता है, और उसी विषय का प्रस्तुतीकरण  हमारे चिंतन और दर्शन को पाठकों तक पहुंचाने में कारगर सिद्ध होता है. मौलिकता विषय को नयी जान देती है और नए आयाम देती है. अगर हम किसी शुष्क विषय पर भी लिख रहे हैं तो हमारी मौलिक सोच और प्रस्तुतीकरण उस विषय को ग्राह्य और पठन के योग्य बनाता है. अनुभव के आधार  पर कह सकता हूँ कि ब्लॉगिंग में विषय को मौलिकता प्रदान करने की अनेकों संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं का बेहतर उपयोग इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.  

सम्बंधित विषय की पूर्ण जानकारी : यूं तो जब कोई किसी सृजन की तरफ अग्रसर होता है तो उसकी अपनी मानसिकता होती है, प्रारंभ में हो सकता है कि सृजन की तरफ आकृष्ट होना एक शौक हो, लेकिन जब हम उस विधा में रम जाते हैं तो यह हमारा स्वभाव बन जाता है और किसी चीज का स्वभाव होना उसकी गहराई और महता को समझते हुए उसका हो जाना है. यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने भावानुकूल विषय की तरफ बढ़ता है तो उसे आनंद आने लगता है और वही आनंद हमारी निरंतरता को बनाये रखता है. किसी विधा की तरफ बढ़ने से पहले उसकी जानकारी होना आवश्यक है और जब हम जानकारी के साथ आगे बढ़ते हैं तो परिपक्वता की तरफ अग्रसर होते हैं. जैसे अगर हम कविता लिखना चाहते हैं तो हमें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि छंद क्या है? अलंकार क्या है? प्रतीक क्या होता है? बिम्ब किसे कहते हैं? आदि-आदि. साहित्य की विधाओं का अपना एक शास्त्र है इसी तरह ग़ज़ल, कहानी, निबंध आदि विधाओं के विषय में बात की जा सकती है. हालाँकि ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच है जहाँ साहित्य, कला, इतिहास, रंगमंच, संगीत, संस्कृति, समाज आदि ना जाने कितने आयाम हैं जिनमें निरंतर बेहतर अभिव्यक्ति हो रही है और काफी हद तक संतोषजनक भी. लेकिन फिर भी हर आयाम का अपना एक शास्त्र है, अपने नियम हैं और अगर हमें उन नियमों की जानकारी है तो हम बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकते हैं. सम्बन्धित विषय की पूर्ण जानकारी होना नितांत आवश्यक है जिस विषय पर आप लिख रहे हैं. वर्ना अधूरी जानकारी ना तो आपने लिए उपयोगी होती है और ना किसी और के लिए. अगर हम पूरी जानकारी के साथ किसी विषय को पाठकों के साथ सांझा करते हैं तो निश्चित रूप से पाठक लाभान्वित होते हैं और आपके प्रति सम्मान के भाव उनके हृदय में पैदा होते हैं और आपसे बहुत कुछ सीखने की ललक उनमें बनी रहती है, और जब हमारा पाठक हमसे लाभान्वित हो रहा है तो हमारे श्रम का लाभ उसे मिल रहा है. ब्लॉगिंग की कोई सीमा नहीं आपके किसी पोस्ट को कौन सा पाठक पढ़ रहा है यह तय कर पाना कठिन है, अलग-अलग पाठक के लिए आपकी पोस्ट अपना महत्व रखती है. एक सामान्य पाठक के लिए वह जानकारी नवीन हो सकती है जिसे आप ब्लॉग पर पोस्ट के माध्यम से सांझा कर रहे हैं और वहीँ पर दूसरा पाठक उस विषय में अपनी जानकारी को और बढ़ाना चाहता हो और एक ऐसा भी पाठक है जो सब कुछ जानता है वह विश्लेषण, मौलिकता और प्रस्तुतीकरण  के लिए आपकी पोस्ट पढ़ रहा हो. जिस तरह लेखन के कई आयाम हो सकते हैं उसी से पठन के भी कई आयाम होते हैं, हर पाठक का अपना नजरिया होता है और एक लेखक को उन सब बातों के मध्यनजर अपने आपको प्रस्तुत करना होता है, लेकिन यह सब तभी संभव हो पाता है जब हम विषय को पूरी तरह से समझते हैं और उस समझ को सभी के साथ सांझा करना चाहते हैं. 

स्पष्टता : विचारों को अभिव्यक्त करना किसी हद तक कठिन नहीं है. लेकिन विचारों को स्पष्टता से अभिव्यक्ति करना यह एक कठिन कार्य है. हम किसी विषय पर लिख रहे हैं हमारे मन में विचारों का प्रबल प्रवाह बना हुआ है और हम एकाग्र होकर मन में आने वाले विचारों को अभिव्यक्त किये जा रहे हैं. लेकिन जब किसी विषय पर अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख लेने के बाद जब उसे पुनः पढ़ा जाता है तो बहुत सी खामियां नजर आ  सकती हैं जिन्हें हम दूर कर सकते हैं. विचार जब आ रहे हैं आने दिए जा सकते हैं लेकिन जब विषय को साँझा कर रहे हैं तो एक बार उन विचारों की महता और उनका मूल्यांकन करना जरुरी हो जाता है. जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है, राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है. लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी. विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार-बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है. धर्म जैसे विषय पर लिखने के लिए हमें तार्किकता नहीं बल्कि अनुभवजन्य समझ की जरूरत होती ही और अध्यात्म और दर्शन जैसे विषयों पर लिखने के लिए खुद अगर हम उस राह से गुजरे हैं तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि जैसा विषय हमारे पास है वैसे ही हम विचारों को अभिव्यक्त करें तो बेहतर होता है. विषय के प्रति समझ से ही, विषय के प्रति दृष्टिकोण बनता है और यह दृष्टिकोण जितना सकारत्मक होगा उतनी ही लेखन की सार्थकता होगी. लेकिन यह सार्थकता तभी बनी रहेगी जब हम तथ्यों के प्रति ईमानदार बने रहकर अपने विषय का प्रतिपादन करेंगे. शेष अगले अंक में....!!!  

18 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...2

35 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे....जैसे ही सृजन का क्रम प्रारंभ हुआ वैसे ही उसे और बेहतर बनाने के लिए कुछ मूल बिंदु भी निर्धारित किये गए. यह आप किसी भी क्षेत्र में देख सकते हैं. संगीत, साहित्य, शिल्प, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान, योग आदि  ना जाने कितने आयाम हैं सृजन के, सभी के अपने  नियम है और उन्हीं नियमों के तहत वह आगे बढ़ते हैं, और जो उन नियमों का अनुसरण करते हुए नव सृजन करता है. वह उस क्षेत्र का ज्ञाता माना जाता है. इस पोस्ट के पहले भाग पर टिप्पणी करते हुए आदरणीय राहुल सिंह जी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है ‘ब्‍लागिंग का स्‍वभाव और प्रकृति की सीमा व्‍यापक है, निर्धारित करना कठिन जान पड़ता है’. काफी हद तक इनकी यह बात प्रासंगिक प्रतीत होती है. ब्लॉगिंग के स्वभाव और प्रकृति को समझना कठिन जरुर हो सकता है लेकिन असंभव नहीं और ऐसा कुछ भी नहीं जो हमारी समझ से बाहर हो, क्योँकि किसी नयी चीज को समझना मुश्किल हो सकता है.

लेकिन जब हम उससे प्रत्यक्ष ताल्लुक रखना शुरू करते हैं तो निश्चित रूप से हम उसके प्रति संवेदनशील
होते हैं और वहीँ से हमारी समझ विकसित होना शुरू होती है, और अगर हम अनमने ढंग से जुड़े हैं या कहीं पर हमारा स्वार्थ जुड़ा है तो हम उस स्वार्थ की पूर्ति करने में सफल तो हो सकते हैं लेकिन सार्थकता का जहाँ तक सवाल है वह नहीं हो सकता. इसे यूँ भी समझाया जा सकता है. जैसे कि टिप्पणी या लगातार लिखना किसी के लिए महत्वपूर्ण है तो कुछ भी लिखकर वह टिप्पणी हासिल कर सकता/सकती है. टिप्पणी के लिहाज से तो उसने सफलता प्राप्त कर ली लेकिन उस लिखे हुए की सार्थकता कितनी है यह बात बहुत महत्वपूर्ण है (मात्र संकेत किया है कृपया अन्यथा न लें) सफलता और सार्थकता में अंतर जान पड़ता है और उस अंतर को समझे बिना हम किसी दिशा में आगे नहीं बढ़ सकते. भाव और कर्म के दृष्टिकोण से सफलता के अनेक बिंदु हो सकते हैं. सफलता के मानक व्यष्टिगत और समष्टिगत दोनों होते हैं, लेकिन सार्थकता के मानक हमेशा समष्टिगत रहे हैं. सफलता के मानक निरपेक्ष और सापेक्ष दोनों हो सकते हैं लेकिन सार्थकता के मानक सापेक्ष ही रहे हैं. सफलता और सार्थकता पर ऐसी बहुत सी विचारणीय बाते कही जा सकती हैं लेकिन यहाँ सिर्फ संकेत रूप में कहूँ तो बेहतर है. सफल और सार्थक ब्लॉगिंग के लिए कुछ बिंदु हो सकते हैं, अगर हम उन्हें ध्यान में रखकर आगे बढ़ते हैं तो निश्चित रूप से हम काफी हद तक बेहतर योगदान कर सकते हैं. हालाँकि यह सभी  बिन्दु मेरा एक दृष्टिकोण हैं....और इसे आगे बढाने में आप अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं :-

सृजन की प्राथमिकता : सृजन मानवीय स्वभाव है. लेकिन सृजन करते वक़्त सर्जक को यह सोचना अवश्यम्भावी हो जाता है कि वह जिस दिशा या विधा में आगे बढ़ रहा है वह समाज और देश के लिए कितनी सार्थक है. उसकी दृष्टि क्या? उसका दृष्टिकोण क्या है? उसे क्या नया करना है? किस चीज को आगे बढ़ाना है. उस विधा में क्या सार्थक है और समय के साथ-साथ उसे उसमें क्या निरर्थक लगता है? ऐसे बहुत से प्रश्न है जो सृजन से पहले सर्जक के मन में कौंधने चाहिए. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या सच में वह-वह करना चाहता है जिसके विषय में वह सोच रहा है. निश्चित है व्यक्ति किसी काम को करने से पहले अपना लाभ भी सोचता है. यह व्यक्ति का स्वभाव है. उसे उस सृजन से क्या लाभ होने वाला है यह भी विचारणीय है. यह सब कुछ सोचने के बाद उसे अपनी सक्षमता पर भी ध्यान देना होगा. क्या जो कुछ वह सोच रहा है उसे कर पाने में वह सक्षम है या नहीं, उसकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक आदि स्थितियां उसे यह सब कुछ करने के लिए सहायक हैं या नहीं. हालाँकि सृजन इन सबका मोहताज नहीं होता लेकिन ऐसा सर्जक भी तो कोई-कोई ही होता है जो सब कुछ दावं पर लगाकर सिर्फ और सिर्फ सृजन के लिए जीता है. सृजन ही उसका ‘धर्म’ बन जाता है. लेकिन बहुतर ऐसा नहीं होता इसलिए इन स्थितियों पर भी ध्यान दिया जाये तो बेहतर है.

सृजन का एक पहलू यह भी है कि हम किस विधा को अपनाना चाहते हैं, और उस विधा में हम कितना जानते हैं पूर्ववर्तियों के बारे में जो हमसे पहले इस दिशा में अग्रसर हैं. उनकी क्या उपलब्धियां हैं, क्या कुछ उन्होंने किया है. जब हम किसी दिशा में कदम बढ़ाते हैं तो यह सब जानकारी हमारे लिए अपेक्षित हो जाती है. अगर हम थोडा सा इस बिंदु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवा सकते हैं और उस विधा में नव सृजन के द्वारा उसके किसी महत्वपूर्ण पक्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. जिस निश्चित विधा की तरफ आप बढ़ रहे हैं उस विधा के भी अपने कई आयाम हैं और उनमें से आप किसी एक का चुनाव करके भी सार्थकता को लेकर आगे बढ़ते हैं तो आपका योगदान निश्चित रूप से रेखांकित करने योग्य हो जाता है. इतिहास में जिन व्यक्तियों का नाम आज दर्ज है उनके व्यक्तित्व में यह विशिष्ट गुण देखने को मिलता है. भाव के स्तर पर भी कई आयाम देखे जाते हैं जिनको आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होता है. लेकिन यह सब कुछ करने से पहले आपको सृजन की प्राथमिकता को तय करना होगा और जैसे ही आप यह तय करने में सक्षम हो जाते हैं आपके सामने सृजन के नए आयाम खुलते जाते हैं और फिर आप निर्बाध गति से आगे बढ़ते हुए ऊँचाइयों को प्राप्त करते हैं. लेकिन सृजन के बदले किसी पुरस्कार की कामना या किसी चर्चा में आने के लिए सृजन करना एक निम्न पहलू है. आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं. अब हमें यह निर्धारित करना होगा कि हमारा सृजन का मुख्य पहलू क्या है??? मात्र और मात्र सार्थक सृजन, चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है. जैसे कहा जाता है कि कला-कला के लिए, कला जीवन के लिए. शेष अगले अंक में...!!!

14 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...1

36 टिप्‍पणियां:
सृजन मानव का स्वभाव है. यही उसकी चेतना का प्रतिबिम्ब भी है. मानव मन-मस्तिष्क में चलने वाली हलचल, भावनाओं और विचारों का अनवरत प्रवाह सृजन के माध्यम से बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है. जब तक सब कुछ हमारे मन-मस्तिष्क में घटित हो रहा है, तक वह हमारा है. जैसे ही हमनें उसे अभिव्यक्त किया वह सबका हो गया. हमारी चेतना के मूल में सृजन स्वभाव के रूप में स्थापित है. (स्वभाव के बारे में बात फिर कभी) और इसी का परिणाम है कि मानव अपने अस्तित्व में आने से लेकर निरंतर सृजन में प्रवृत है. सृजन की उद्भट प्रतिभा ने उसे ‘सृष्टा’ के समकक्ष ला दिया. सृजन के मूल में उसकी भावना ने महती भूमिका अदा की. अनवरत चिंतन और दनिया में कुछ नया करने के भाव ने उसे हमेशा जगाए रखा. प्रकृति उसकी पहली प्ररणा रही है और परमात्मा उसके जीवन का ध्येय. उसने सारी प्रकृति को परमात्मा का प्रतिबिम्ब स्वीकार कर लिया और प्रकृति में ही उसने सृजन के विविध आयाम खोजे. अगर हम संस्कृत वाङ्मय पर गहराई से ध्यान देते हैं तो यही पाते हैं. ‘ऋग्वेद’ के प्रत्येक मंडल में ऐसा बहुत कुछ हमें देखने को मिलता है. जहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वर्षा आदि के लिए ऋचाएं वर्णित है. कालान्तर में इन्हीं ऋचाओं का रूपांतरण मन्त्र के रूप में हुआ. हालाँकि ‘मन्त्र-तंत्र’ के लिए लिखित साहित्य को आज तक साहित्य की कोटि में नहीं रखा गया है. लेकिन कहीं न कहीं पर इनकी प्रमाणिकता पर भी ध्यान देने की जरुरत है. ‘मन्त्र–तंत्र’ के लिए लिखी गयी बातें सिर्फ उन्हीं लोगों का विषय बनी रही हैं जिनका इससे सम्बन्ध रहता है. हालाँकि अब यह कहा जाता है कि यह सब वैज्ञानिक नहीं है, और यह सब ढोंग है. लेकिन एक बात बताता चलूँ कि 'विज्ञान जहाँ अपनी हद मान लेता है वहीँ से अध्यात्म शुरू होता' है और उसका आज तक कोई अंत नहीं पा सका. सृजन भी एक अनन्त और अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. समय और स्थिति का प्रभाव बेशक इस पर पड़ता है लेकिन यह भावनात्मक रूप से एक सी रहती है. कालिदास के ‘अभिज्ञानशकुन्तलम’ में जिस प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है, उसी प्रेम को आज तक विभिन्न रूपों में, विभिन्न शैलियों में विभिन्न देशों और भाषाओँ के रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता रहा है, लेकिन न तो कालिदास द्वारा अभिव्यक्त प्रेम पुराना पड़ा, और न ही परवर्ती रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त प्रेम. इसीलिए यह बात हमें स्वीकार करनी पड़ेगी कि सिर्फ भावनाओं को अभिव्यक्त करने के तरीके बदले हैं, लेकिन भाव तो शाश्वत है. 

आचार्य भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में भाव को लेकर बहुत कुछ वैज्ञानिक तरीके से अभिव्यक्त करने
का प्रयास किया गया है. भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी आदि भावों को लेकर बहुत सटीक व्याख्याएं भरतमुनि के बाद के आचार्यों ने प्रस्तुत की हैं. भट्ट लोल्लट, भट्ट शंकुक,  भट्ट नायक और अभिनवगुप्त इस सिद्धांत को आगे बढाने का काम करते हैं और काफी हद तक विषद विवेचन के आधार पर अपनी मान्यताओं को पुष्ट करते हुए भाव और उसके अंगों को पुष्ट करने का प्रयास करते हैं और यह भी समझाने की कोशिश करते हैं कि काव्य में क्या जरुरी है. हालाँकि उनके इस सिद्धांत पर कई पोस्ट्स लिखी जा सकती हैं, और आदरणीय मनोज जी के ब्लॉग मनोज पर आपको यह जानकारी सहज मिल सकती है. सृजन के सन्दर्भ  में इसी तरह की मान्यता पाश्चात्य विचारक प्लेटो ने भी अभिव्यक्त की है. काव्य के सन्दर्भ में अपनी मान्यता को अभिव्यक्त करते हुए प्लेटो कहता हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति है’. हालाँकि बाद में प्लेटो की इस मान्यता का खंडन उनके शिष्य अरस्तु करते हैं और यह कहते हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति नहीं, बल्कि उसकी प्रतिकृति है’. यहाँ अनुकृति और प्रतिकृति शब्दों ने एक दुसरे में भेद कर दिया और एक ही विषय पर दो सिद्धांत प्रचलन में आ गए. इससे भी यह स्पष्ट होता है कि सृजन के मूल में प्रकृति की महता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भरतमुनि ने जो मंतव्य अपने नाट्यशास्त्र में रस के सम्बन्ध में अभिव्यक्त किया है, उसी तरह के भाव मुझे अरस्तु के विरेचन सिद्धांत में देखने को मिलते हैं, और कभी-कभी मुझे इन दोनों आचार्यों की काव्य के सन्दर्भ में लगभग एक सी मान्यताओं ने ( रस और विरेचन के सम्बन्ध में ) आश्चर्यचकित किया है. भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने काव्य की सार्थकता, उसकी उपयोगिता, सृजन की प्राथमिकता को लेकर व्यापक बहस की है, और कुछ सार्थक निष्कर्ष भी निकाले हैं. उनके यह निष्कर्ष आज सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है, और उन्हीं के आधार पर समस्त साहित्य रचना  हो रही है. हालाँकि समय -समय पर इनमें भी बदलाव आया है, यह बदलाव पूर्व प्रचलित मान्यता को खंडित तो करता है, लेकिन उसकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं करता, और यही सार्थक बहस से ही संभव हो सकता है. 

सूचना तकनीक के विकास के इस दौर में अभिव्यक्ति और सृजन के साधनों का भी विकास होता रहा .सृजन की विधाएं अनन्त हैं. लेखन उनमें से एक है.  कभी पत्थरों पर लिखा गया तो कभी भोजपत्रों पर. लेखन का इतिहास सृजन के इतिहास से ही जुड़ा है. लेखन पर भी विकास का प्रभाव पड़ा. कभी शैली तो कभी भाव पर और यह विकास निरंतर जारी है. इन्हीं विकास के पडावों को पार करते हुए हमने इन्टरनेट की दुनिया में प्रवेश किया. इन्टरनेट ने दुनिया को एक क्लिक तक सीमित कर दिया और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हमें एक नायाब तोहफा दिया ‘ब्लॉगिंग’. आज दुनिया के तमाम लोग तरह-तरह के माध्यमों से एक-दुसरे से जुड़ रहे है. मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति के नए साधन मिले हैं, इन साधनों ने मनुष्य में रचनाशीलता का जो संचार किया है वह कभी-कभी सोचने पर मजबूर करता है. ब्लॉगिंग भी मनुष्य की रचनाशीलता को अभिव्यक्त करने के एक सशक्त माध्यम के रूप में आज हमारे सामने है. ब्लॉगिंग की दुनिया अद्भुत है. रचनाशीलता का यहाँ व्यापक प्रसार है. एक ही मंच पर सब कुछ अभिनीत किया जा रहा है और दर्शक दांतों तले अंगुली दवाने पर मजबूर है. हालाँकि ब्लॉगिंग का अपना एक स्वभाव है, उसकी अपनी एक प्रकृति है (यह विषय फिर कभी) इन सभी के बाबजूद ब्लॉगिंग करने के लिए कुछ बाते निर्धारित की जा सकती हैं. जिनके आधार पर हम सफल ब्लॉगिंग की और बढ़ सकते हैं. शेष अगले अंकों में....!!!  

01 फ़रवरी 2011

ब्लॉगरीय षटकर्म

108 टिप्‍पणियां:
अगर आप ब्लॉगिंग के प्रति समर्पित हैं तो ब्लॉगरीय षटकर्म से आपको जरुर वास्ता पड़ता होगा, इन बातों से हालाँकि जरुरी नहीं कि आप सभी सहमत हों, लेकिन ब्लॉगिंग के इस छोटे से सफर में मैंने जो अनुभव किया उसके निष्कर्ष कुछ इस तरह है, और आदरणीय ललित शर्मा जी यही मानते हैं, तो चलो बात करते हैं क्या है ब्लॉगरीय षटकर्म :-

लेखन : आपकी रचनात्मकता आपकी सोच का परिणाम है, और आपकी सोच आपके व्यक्तिव का परिचय। हम जब भी कोई शब्द लिखते या बोलते हैं तो वह शब्द हमारे व्यक्तिव का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। लेखन का जहाँ तक सम्बन्ध है, कालजयी और सार्थक लेखन उसे ही कहा जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति के उदात भाव अभिव्यक्त हुए हों। यानि उस व्यक्ति ने भावों को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त किया हो. यदि हम भारतीय वाऽ.मय पर दृष्टिपात करें तो वेदों का महत्व आज भी उतना ही है जितना की उस युग में था, यही बात पुराण, उपनिषद और परवर्ती ग्रंथों और रचनाकारों पर भी समान रूप से लागू होती है। आधुनिक युग में भी बहुत से विचारक, दार्शनिक और लेखक हुए हैं। लेकिन काल और समय की सीमा से परे वही लेखक हैं जिनके भावों में उदात्ता और मानवीय भावों समावेश है, और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शन का काम कर रहा है, करता रहेगा उनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।

ब्लॉग की जहाँ तक बात है यह अपार संभावनाओं का द्वार है। हम तकनीकी रूप से बेशक उस काल के लोगों
से बहुत आगे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि चिंतन, सोच और संवेदना के स्तर पर हम उनका मुकाबला नहीं कर सकते. हमें अपने स्तर और लेखन के स्तर को बनाये रखने के लिए मौलिक चिंतन की तरफ ध्यान देना होगा। सकारात्मक सोच के साथ वैश्विक स्तर पर सोचना होगा आज भी हमारे सामने मानवीय सोच के वह पहलु हैं जिनके कारण हम एक दुसरे से जुदा हैं, कहीं भाषा के स्तर पर तो जाति के स्तर पर, कहीं धर्म के स्तर पर तो कहीं देशों की सीमा के स्तर पर। ऐसे और भी अनेक कारण हैं जो आज हमें एक दुसरे से जुदा करते हैं. ऐसे हालत में हमें खुद को समाज के जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में देखना होगा और जितना भी संभव हो सके हम सार्थक विचारों से खुद की छवि के साथ-साथ देश और समाज की छवि को भी सुधरने का प्रयास करें यही हमारे लेखन और ब्लॉगिंग की सार्थकता के साथ-साथ जीवन की सार्थकता भी है. 

पढना : हम किसी रचनाकार से चाहे किसी भी तरह से परिचित हैं। लेकिन उसकी सारी बातों से बढ़कर हमारे लिए उसका लेखन है। किसी लेखक के विचारों के जरिये हम उसके जीवन और सोच को विश्लेषित कर रहे होते हैं। हम किसी रचनाकार को तब रोचकता और जिज्ञासा से पढ़ते हैं, जब उसके विचार हमारे जीवन में उर्जा, सोच में सकारात्मकता, मन में पवित्रता ,विचार में दृढ़ता लाते हों। क्योँ हम बार-बार गीता, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों को पढ़ते हैं , सिर्फ इसलिए कि वह हमें एक नयी जीवन दृष्टि देते हैं, हमारे जीवन में आशा का संचार करते हैं, हमारे भावों में पवित्रता लाते हैं, या संक्षिप्त रूप से कहूँ तो वह हमें एक इंसान बनाते हैं। ब्लॉग में भी एक पाठक के तौर हमें इन संभावनाओं को तलाशना होगा। हमें सही मायने में पाठक बनना होगा। जब हम किसी का लेख पढ़ रहे होते हैं खुद हम लेखक होने की बजाए एक पाठक होते हैं। हम बेशक कम पढ़ें लेकिन जो पढ़ें उसे मनन करते हुए पढ़ें तभी हम एक सार्थक दिशा की तरफ बढ़ सकते हैं, वर्ना....आप समझदार हैं ...मैं तो नाचीज हूँ क्या कह सकता हूँ।

पढने के लिए लिंक देना : भामह ने अपने ग्रन्थ काव्यालंकार में काव्य प्रयोजन पर विचार करते हुए यश प्राप्ति को भी काव्य का एक प्रयोजन माना है, और यह मानवीय स्वभाव भी है कि उसके किसी कर्म का फल उसे अवश्य मिलना चाहिए। आज के तकनीकी युग में यह बात ज्यादा आसन हो गयी है। आज दृश्य और श्रव्य साधनों का विस्तार इतना हो चुका है कि पूरा विश्व हमें गाँव नजर आता है, और इस कारण हम किसी व्यक्ति से अपना संपर्क किसी भी तरीके से कर सकते हैं। उसे अपनी बात समझा सकते हें। ब्लॉग जगत में भी यह बात शत प्रतिशत लागू होती है, और यह आवशयक भी है कि हम जो भी लिखें किसी दुसरे को अवगत करवाएं लेकिन उसी सीमा तक जहाँ तक वह किसी की भावनाओं के साथ सही बैठता है। वर्ना ऐसा करना किसी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. 

ब्लॉग लेखन के लिए प्रोत्साहित करना : यह एक नेक काम है कि हम किसी का उत्साहवर्धन कर उसे एक सकारात्मक काम के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। आप किसी ब्लॉगर की पोस्ट को पढ़कर एक टिप्पणी कर देते हैं तो लिखने वाले का मनोबल बढ़ जाता है और वह पूरी शिद्दत से अपने काम के प्रति समर्पित हो जाता है। किसी नए ब्लॉगर को लेखन के लिए प्रोत्साहन देना हमारा नेक कार्य है, और मैं जानता हूँ कि यह काम आप बहुत बखूबी करते हो। तभी तो हिंदी में ब्लॉगरों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, और इससे दो लाभ प्रत्यक्ष रूप से हो रहें हैं एक तो हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है, और दूसरा हम एक दुसरे की रचनात्मकता को समझते हुए व्यक्तिगत संबंधों में भी बंध रहे हैं, जो कि ब्लॉगिंग का एक सुखद सकारात्मक पहलु है। निश्चित रूप से यह लेखन के इतिहास में एक नया अध्याय है। 

टिप्पणी करना : किसी रचना की महता पाठक के साथ समीक्षक पर निर्भर करती है, और हम जब किसी ब्लॉगर की पोस्ट पर टिप्पणी कर रहे होते हैं तो हम उसकी रचना की एक तरह से समीक्षा भी कर रहे होते हैं। यानि पढने के बाद एक समीक्षक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया भी दर्ज करवा रहे होते हैं। आपकी टिप्पणी लेखक का मार्गदर्शन करती है, उसकी कमियां बताती हैं, और उसे और अच्छा लिखने को प्रेरित करती हैं। लेकिन इसी के उल्ट की गयी टिप्पणी किसी लेखक को निराश भी कर सकती है और उसके मनोबल को ठेस भी पहुंचा सकती है। इसलिए टिप्पणी करते वक़्त विवेक से काम लेन की आवश्यकता है.

टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित करना : यह भी ब्लॉग की एक ख़ास बात है। जब हम किसी के ब्लॉग पर जाते हैं तो हमें लगता है कि इस पाठक या ब्लॉगर की उपस्थिति हमारे ब्लॉग पर आवश्यक है तो हम उसे आमंत्रित करते हैं कि इस रचना पर आपकी टिप्पणी अपेक्षित है, या इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे में सामने वाले को भी बल मिलता है और उत्सुकता बनी रहती है, किसी नए विषय को जानने की, कोई नया दृष्टिकोण प्राप्त करने की। यह भी एक तरीका है अपनी सोच और कर्म को किसी व्यक्ति तक पहुँचाने का, और यह बहुत सहज है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ब्लॉगिंग का संसार विविधता भरा, रोचक, ज्ञानवर्धक तथा अनन्त है। हमें अंतर्जाल के इस विशाल सागर में गोते लगाने चाहिए। लेकिन सब काम करते हुए संभल कर चलना चाहिए.....इतना ही "केवल"..! ब्लॉगरीय षटकर्म वाली मेरी यह पोस्ट आदरणीय राजीव जी के ब्लॉग  उफ़ ! ये ब्लॉगिंग  पर भी प्रकाशित हुई है ...मैं आदरणीय राजीव जी का आभारी हूँ ..!