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19 फ़रवरी 2014

सृजन की प्राथमिकता, ब्लॉगिंग और हम...2

5 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे......!!! सृजन की धारणा, सृजन के मन्तव्य, सृजन की कला और तकनीक आदि में समय-समय पर परिवर्तन होता आया है. सृजन की प्राथमिकताओं के विषय में जब हम पूर्ववर्ती विचारकों के विचारों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि सभी विद्वान इस विषय में एकमत नहीं हैं कि आखिर कोई रचनाकार जब सृजन करता है तो उसके पीछे उसका मन्तव्य क्या होता है? हालाँकि यह विषय बहुत समय से बहस का विषय रहा है, शायद तब से जब से मनुष्य ने सृजन के क्षेत्र में कदम रखा है तब से वह इस विषय पर लगातार चिन्तन करता रहा है और आज तक इस विषय पर उसका चिन्तन अनवरत जारी है. प्रारम्भ से मनुष्य सृजन को दैवीय प्रेरणा का कारण मानता रहा है, इसके साथ वह यह भी मानता रहा है कि सृजन के पीछे व्यक्ति की प्रतिभा की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है. लेकिन हम यहाँ इस मत को ऐसे भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि प्रतिभा के साथ अगर प्रेरणा नहीं होगी तो फिर ऐसी प्रतिभा कोई खास रचनात्मक कार्य नहीं कर सकती.

सृजन के लिए प्रतिभा एक आवशयक पहलू हो सकता है, लेकिन प्रेरणा का अपना एक ख़ास महत्व है. इस सन्दर्भ में प्लेटो की मान्यता है कि : “For not by art does the post sign, but by power Divine; had he learned by rules of art, he would have known how to speak not of them only, but of all. And reason is no longer with him; no man while he retains that faculty has the oracular gift of poetry”. (Dialogue of Plato by B. Jowett) प्लेटो की स्पष्ट मान्यता है कि इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं के पीछे दैवी प्रेरणा काम करती है. कवि भी दैवी प्रेरणा के वशीभूत होकर ही काव्य-रचना और कलाकार कला की सृष्टि करता है. उनका विचार है कि कवि के भीतर नयी उद्भावना और भावावेश कला से नहीं, वरन् दैवी प्रेरणा से अभिभूत होता है. उत्कृष्ट काव्य उच्च भावनाओं, उच्च विचारों और ज्ञान का संचार करता है. अतः वह समाज के लिए उपयोगी होता है. इसके विपरीत निम्न कोटि का काव्य अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को नहीं निभाता और समाज में अनैतिकता और भ्रष्टाचार को फैलाता है तथा उच्च आदर्शों को क्षीण बनाता है. उनके प्रति अनास्था का भाव जगाता है. अतः ऐसा काव्य समाज के लिए घातक है. वह ज्ञान, धर्म, नीति और ईश्वर-विरोधी होने का भाव जगाता है. इसलिए प्लेटो की स्पष्ट मान्यता है कि श्रेष्ठ काव्य प्रतिभा के बल पर नहीं, बल्कि प्रेरणा के बल पर रचा जाता है. इससे यह बात स्पष्ट होती है कि किसी व्यक्ति में बेशक सृजन की प्रतिभा नहीं, लेकिन उसमें किसी विशेष रचनात्मक कार्य के लिए प्रेरणा का संचार किया जाये तो वह उसी प्रेरणा के बल पर बहुत कुछ हासिल कर सकता है. हाँ जन्मजात प्रतिभा में हमेशा मौलिकता की सम्भावना ज्यादा बलबती होती है, इसलिए जिस व्यक्ति में जन्मजात किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करने की रूचि होती है तो वह बहुत कुछ ऐसा कर जाता है जिसकी कल्पना दुनिया ने नहीं की होती है. सृजन की प्रेरणा के पीछे मत चाहे जैसे भी हों और जो भी हों, लेकिन हमें सृजन के लिए प्रतिभा और प्रेरणा दोनों के महत्व को स्वीकारना चाहिए.

जहाँ पर साहित्य की बात आती है तो उसके उद्देश्यों और सृजनकर्ता की प्राथमिकताओं पर काफी बहस हुई
है. भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों ने साहित्य सृजन की प्राथमिकताओं और उसके प्रयोजन को लेकर बहुत विचार किया है. भारतीय आचार्यों में भरत, भामह, वामन, कुन्तक, रुद्रट, मम्मट आदि आचार्यों  ने इस विषय पर काफी चिन्तन किया है. आचार्य भरत ने नाट्य (काव्य) के प्रयोजन पर विचार करते हुए कहा है कि : “दुःखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्. / विश्रान्ति जननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति.. / धर्म्यं यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धि विवर्धनम्. / लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति्”.. (नाट्यशास्त्र) अर्थात दुःख, श्रम, शोक से आर्त तपस्वियों के विश्राम के लिए तथा धर्म, यश, आयु-वृद्धि, हित साधन, बुद्धि-वर्धन और लोकोपदेश के निमित नाट्य की रचना होगी. आचर्य भरत के बाद के आचार्यों के सामने काव्य सृजन के यह प्रयोजन रहे हैं. उन्होंने इन सबमें से अपनी बुद्धि और रूचि के अनुसार कुछ को अपना लिया है और कुछ को छोड़ दिया है. इतना ही नहीं समय और स्थिति के अनुसार उन्हें जो कुछ और सही लगा है उसे जोड़ भी दिया है. इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि काव्य का प्रयोजन समय और स्थिति के अनुसार बदलता रहा है. आचार्य भरत के बाद भामह ने काव्य के प्रयोजन पर इन शब्दों में विचार किया है : “धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च. / करोति कीर्ति प्रीतिं च साधु काव्य निबन्धनम्. (काव्यालंकर) अर्थात काव्य की रचना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति तथा कलाओं में निपुणता के उपलब्धि के निमित की जाती है. साथ ही वह कीर्ति एवं प्रीति (आनन्द) प्रदान करने वाली होती है. भामह के शब्दों में रचना और रचनाकार के उद्देश्य स्पष्ट नजर आते हैं. रचना का उद्देश्य है पाठक को आनंद की अनुभूति करवाना और रचनाकर का उद्देश्य है रचना प्रक्रिया का आनन्द प्राप्त करते हुए यश की प्राप्ति करना.

सृजन का मूल उद्देश्य मानव के सकारात्मक पहलूओं को उजागर कर मानवीय मूल्यों की स्थापना करना है. प्राचीन आचार्य इस बात पर व्यापक ध्यान देते थे. इसकी अभिव्यक्ति हमें संस्कृत वाऽ.मय में देखने को मिलती है. कालान्तर में साहित्य की भाषा में परिवर्तन, मानव मूल्यों में बदलाव, सभ्यता और संस्कृति में परिवर्तन के साथ-साथ सृजन और सृजनकर्ता की प्राथमिकताएं भी बदली हैं, और किसी हद तक यह बदलाव मानव की प्रगति के सूचक हैं. मानव ने जितना भौतिक विकास और अध्यात्मिक चिन्तन किया है उस सबकी अभिव्यक्ति साहित्य के माध्यम से हुई है. साहित्य मानव के चिन्तन और विकास से अछूता नहीं रह सकता. आज तक के साहित्य के इतिहास का जब हम गहन अध्ययन करते हैं तो हमें पता चलता है कि ज्यादातर साहित्य में वही अभिव्यक्त हुआ है जिसका सीधा सम्बन्ध मानव की भावनाओं, संवेदनाओं से है. बिना मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति के कोई भी साहित्य श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता. हालाँकि कई बार मनोरंजन परक साहित्य भी लिखा जाता रहा है, लेकिन उस मनोरंजन में भी मानवीय वृतियों पर कटाक्ष या उनकी प्रशंसा की जाती रही है, और यह सब कुछ साहित्य का अंग रहा है और आने वाले समय में भी यह सब कुछ साहित्य में घटित होता रहेगा. समग्र रूप से हम यह कह सकते हैं कि साहित्य या सृजन के केन्द्र में मानवीय पहलू ज्यादा रहे हैं. जिस रचनाकार ने मानवीय मूल्यों की स्थापना को अपनी रचना का उद्देश्य बनाया है वह रचनाकार कालजयी हो गया है. ऐसे रचनाकारों की कृतियाँ बेशक हजारों वर्ष पहले रची गयी हों लेकिन उनकी महता आज भी वैसी ही है, और आने वाले समय में भी यह मानव का पथ प्रदर्शन करती रहेंगी. 

सूचना तकनीक के इस दौर में सब कुछ अप्रत्याशित रूप से घटित हो रहा है. आज की दुनिया में जब हम अपने चारों और देखते हैं तो पाते हैं कि सब कुछ परिवर्तित हो गया है, और मानव का जीवन सुखद हो गया है. मानव ने चाँद-तारों तक अपनी पहुँच वर्षों पहले बना ली है, अब वह मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की तलाश में जुटा है. इन सब उपलब्धियों और संघर्ष के लिए मानव बधाई का पात्र है. आज चिन्तन के जितने आयाम व्यक्ति के सामने हैं वह उसकी क्रियाशीलता और उसकी कभी हार न मानने वाली प्रवृति के परिचायक हैं. ऐसा बहुत कुछ मानव ने अपने आदिकाल से आज तक हासिल किया है जिससे उसका जीवन सहज और सुखद हो गया है. साहित्य ही नहीं विज्ञान, कला, तकनीक, संगीत, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में मानव की उपलब्धियां गर्व करने योग्य हैं. हाँ इस सन्दर्भ में यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि यह जो कुछ भी मानव ने आज तक किया है उसमें उसकी जिजीविषा, यश और कीर्ति की लालसा ने भी मुख्य भूमिका निभाई है. बहरहाल स्थिति और कारण जो भी हो मनुष्य की उपलब्धियां कभी-कभी सोचने पर मजबूर कर देती हैं. शेष अगले अंकों में.....!!! 

01 अप्रैल 2012

मेरे आलेख , आपकी टिप्पणियाँ और यह पॉडकास्ट

19 टिप्‍पणियां:

जीवन और साहित्य एक दूसरे के पर्याय हैं . जिस तरह जीवन की कोई सीमा नहीं , उसी तरह साहित्य को भी किसी सीमा में बांधना असंभव सा प्रतीत होता है . सीमा तो शरीरों की है . लेकिन भाव तो शाश्वत है , भाव मानव जीवन की अमूल्य पूंजी है और इसे अभिव्यक्त करने के माध्यम भी कई है . शब्द अपने आप में निर्जीव होता, लेकिन अर्थ उसे जीवन देता है और  एक मधुर आवाज उस शब्द को अमर करती है . मधुर आवाज और शब्द का अद्भुत संगम ही हमें आनंद की पराकाष्ठा तक ले जाता है, और हम भाव विभोर हो जाते हैं . इन्हीं शब्दों और आवाज के अद्भुत संगम ने संगीत जैसी कला को जन्म दिया और आज हम चाहे जैसी परिस्थिति में हो संगीत हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है . पिछले दिनों मैंने सार्थक ब्लॉगिंग के कुछ पहलूओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया था . जिसे चार पोस्टों में मैंने आपसे सांझा किया . आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं भी मुझे प्राप्त हुई और आदरणीय अर्चना जी ने तो मुझे हतप्रभ कर दिया . इन चारों पोस्टों को स्वर देकर .....! तो आइये पहले अवगत करवाते हैं, आपकी चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं से.......!

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर  इस श्रृंखला के पहले भाग से लेकर अंतिम भाग तक आप सबकी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई जिनमें से कुछ यहाँ शामिल कर रहा हूँ  ......! 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने सलिल वर्मा जी ने कहा … केवल राम जी, बड़ी वृहत जानकारी आपने प्रस्तुत की है.. एक ज्ञानवर्धक श्रृंखला!!  गिरधारी खंकरियाल जी का कहना है …गहन अध्ययन के बाद किया गया विवेचन . कुछ जगहों पर वर्तिका का संपादन छुट गया है. उपेन्द्र नाथ बहुत ही अच्छी प्रस्तुति. ... आज के समय में ब्लागिंग की सार्थकता से इंकार नहीं किया जा सकता है. अपनी बात कहने का ये महत्वपूर्ण साधन है. मनोज कुमार जी इस आलेख को ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना बता रहे हैं  यह आलेख सार्थक ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना है। SKT ने कहा… सुंदर विवेचन ! सृष्टि, मानव सृष्टि पर आपकी दृष्टि के हम कायल हुए! 

दूसरे भाग पर आपकी टिप्पणियाँ कुछ इस तरह प्राप्त हुई .......!
vidya सार्थक लेख...टिप्पणियां पाने से खुशी तो मिलती है...मानव स्वभाव है...मगर हम स्वयं आपने आलोचक बने तो रचनात्मकता निश्चित ही बनी रहेगी.. डा. अरुणा कपूर. जी ने महत्वपूर्ण बात कही :  मात्र सृजन को ही धर्म मान कर चलने वाले लेखक आज के जमाने में मिलने मुश्किल है...सृजन के पीछे कोई न कोई उद्देश्य जरुर होता ही है!...देखना यह है कि उद्देश्य लेखक को किसी भी तरह का लाभ पहुंचाने के बावजूद भी पाठक गण को भी लाभकारक सिद्ध हो!...बहुत सुन्दर विषय!...धन्यवाद! shikha varshney जी ने इस बात पर ध्यान दिलाते हुए कहा " आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं ."  मेरे ख़याल से यही मुख्य बात है.टिप्पणियों पर बहस बहुत हो चुकी है.वह सार्थक लेखन की गारंटी नहीं - सहमत.परन्तु लेखन के लिए हौसलाफजाई का माध्यम अवश्य ही हैं.अंत में - ब्लॉग्गिंग को ब्लॉग्गिंग ही रहने दो .....:) कुल मिलाकर बहुत अच्छा विश्लेषण और सार्थक लेखन. Rahul Singh जी की बात बहुत गौर करने वाली है : अवधारणा और विवरणमूलक चर्चा के साथ बिंदुवार और भी स्‍पष्‍ट किया जाना आवश्‍यक है. दूसरे शब्‍दों में ब्‍लागिंग और ब्‍लागेतर लेखन में क्‍या कोई खास, साफ और ठोस फर्क बताया जा सकता है. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद  ब्लागिंग तो रचनाकार को विधा और शैली चुनने के साथ साथ मकसद का विस्तार भी देताहै। यह तो क्षितिज है :) रचना दीक्षित जी की चिंता बाजिब है  : यदि विकासकाल में ही उसके कायदे निर्धारित हो जाएँ तो विकास सही दिशा में होता है . अन्यथा दिशाहीन विकास रचनात्मकता खो बैठता है और कुछ समय पश्चात ही निरर्थक लगने लगता है. संजय @ मो सम कौन ? जी कह रहे हैं  : मैनेजमेंट की शुरुआती पढ़ाई में एक चैप्टर एफ़िशियेंटऔर इफ़ैक्टिवपर हुआ करता था, वैसा ही कुछ सफ़लऔर सार्थकके बारे में समझा जा सकता है। प्राथमिकताएं सबकी अपनी अपनी होती हैं। अच्छा लगा पढ़ना। पी.एस .भाकुनी : बेशक टिप्पणियां किसी भी रचना को आयाम देते हैं किन्तु सिर्फ टिप्पणियों की संख्या के आधार पर रचना का मुल्यांकन नहीं किया जा सकता है.....सुंदर प्रस्तुति...! anju(anu) choudhary इस बात से सहमत होती हुई कहती हैं कि " मात्र और मात्र सार्थक सृजन ,चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन ? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है . जैसे कहा जाता है कि कला - कला के लिए , कला जीवन के लिए "  . .... इन सब से हट कर बस एक ही बात ...सृजन ...कभी नहीं रुकता...उसे सबके सामने आना ही हैं...किसी का पहले या किसी का बाद में ...बिना किसी उम्मीद के ...बिना किसी इच्छा के .....! 

तीसरे भाग पर आपकी प्रतिक्रियाएं ऐसी रहीं ........! 
दर्शन कौर 'दर्शी' जी को तो हमारी बात समझ ही नहीं आई .....हा..हा..हा..!  लेकिन फिर भी ऐसे अपनी बात कही ...केवल,... मुझे कुछ समझ आया कुछ नहीं ..पर जो समझ आया वो ईमानदारी से लिखा प्रतीत होता हैं ....एक बार नहीं अपितु कई बार पढ़ चुकी हूँ ...टिपण्णी लिखने में भी सहज नहीं हो पाती हूँ ..पर फिर भी हमेशा तुम्हारे ब्लॉग पर आती हूँ कई बार टिपण्णी नहीं लिख पाती हूँ ओके या बहुत अच्छा ,बढियां कहकर तुम्हारे मेहनती लेख के साथ इन्साफ करना ठीक नहीं लगता ...तुम इसी तरह लिखते रहो ..धन्यवाद ! संध्या शर्मा जी ने लिखा  ब्लॉगिंग के लिए आवश्यक विभिन्न पहलूओं  पर आपके विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. और इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है... " निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं , और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं " उपयोगी जानकारी से भरे इस आलेख के लिए बहुत-बहुत आभार ...! सुबीर रावत जी तो सोच में पड़ गए : आपकी पोस्ट बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है. इतने गंभीर विषय लेकर आप चलते हैं कि इसको पढने के लिए तन्हा होना बहुत जरूरी हो जाता है, और फिर दुबारा पढ़कर ही कुछ पल्ले पड़ता है. सचमुच आपकी इस तन्मयता का कायल हूँ. अब ब्लॉगिंग  जैसे नए व नीरस विषय को उठाकर आपने एक सार्थक बहस छेड़ ही है. आभार !! ब्लॉ.ललित शर्मा का अंदाज काबिल -ए- तारीफ है  कल ही एक मित्र ने चर्चा के दौरान कहा कि - केवल राम जो लिखता है वह समझ नहीं आता, क्या लिख गया और मेरी भी समझ नहीं आता कि क्या कमेंट लिखुं।---------- मेरी भी आज यही स्थिति है क्योंकि………………आज होली है। इसलिए इसी से काम चलाएं, "हम आपकी लेखनी के कायल हैं, इतना अच्छा आप कैसे लिख लेते हैं?" :):) हरकीरत ' हीर' जी ने हमारी बात को ही हथियार बना लिया और कहा " जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है , क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है , राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है . लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी . विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार - बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है " lgta hai bloging par kitaab likhi ja rahi hai ....agrim shubhkamnayein .....:)) वाणी गीत जी के विचार भी महत्वपूर्ण हैं …ब्लॉगिंग में मौलिक अभिव्यक्ति की सहजता बहुत मायने रखती है , वैसे तो पाठक वर्ग पर निर्भर करता है वह क्या पढना चाहता है !अच्छी प्रस्तुति !

अब हम  चौथे भाग तक पहुँच गए .....! काजल कुमार Kajal Kumar जी भाषा पर बात करते हुए कहते हैं : यहां बहुत से लोगों के अपने अपने एजेंडें हैं. जहां तक भाषा की बात है जिसके थाली में जितना है, जीम कर चला जाता हैडॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहायही पूरी श्रृंखला सभी के लिए उपयोगी रही है .... सार्थक चिंतन प्रस्तुत करती पोस्ट....प्रवीण पाण्डेय ने कहासबके लिये बार बार पठनीय..Amrita Tanmay ने कहा… ब्लॉगिंग के अद्भुत संसार के नायाब हीरे की कलम से निकली.. अनमोल आलेख..अरुण चन्द्र रॉय जी ने सुझाब देते हुए कहा बढ़िया चर्चा केवल जी. थोड़े उदहारण के साथ चर्चा करेंगे तो अच्छा रहेगा.......! इन सब प्रतिक्रियाओं के साथ इस पॉडकास्ट को सुनना अपने आप में एक नया अनुभव रहेगा .....किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .......! 

                                              

04 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...3

19 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....जीवन का मंतव्य जब कला की साधना बन जाता है तो फिर जीवन उस कला में रम जाता है. फिर कला ही जीवन बन जाता है और ऐसा सर्जक निश्चित रूप से कला को नया आयाम देते हुए जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर देता है. ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है यह तकनीक और कला का अद्भुत संगम है. आपके पास सृजन के इतने आयाम हैं कि आप किसी भी विषय को किसी भी तरह से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बेशर्त कि आप रोचकता और संजीदगी से सृजन को प्राथमिकता देते हों. अगर आप सृजन की प्राथमिकता और महता को समझते हैं तो आपके लिए ब्लॉगिंग रोचक और गंभीर होने के साथ-साथ जिम्मेवारी भरा कार्य हो सकता है. अगर ब्लॉगिंग के प्रति ऐसा दृष्टिकोण है तो निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं.

मौलिकता : आपने अपने सृजन की प्राथमिकता को तय कर लिया. आप किसी भी विषय पर गहन चिंतन के
लिए तैयार हैं तो आपके समक्ष मौलिकता एक बड़ा प्रश्न हो सकता है. मौलिकता से अभिप्राय विषय के प्रति आपका दृष्टिकोण है, आपकी उस विषय के प्रति दृष्टि है. यूं तो हर विषय पर वर्षों से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है और हो सकता है कि आपके समय में भी ऐसे विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा हो, लेकिन हर विषय में नवीनता और मौलिकता की सम्भावना सदा से छिपी रहती है. किसी भी विषय के अनेकों आयाम हो सकते हैं, हम किस आयाम पर केन्द्रित होकर विचार करते हैं यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है. एक ही विषय पर दो अलग-अलग विशेषज्ञ अपनी अलग - अलग मान्यताएं रख सकते हैं. यह मान्यातएं उनके चिंतन को हमारे सामने लाती हैं और यही मान्यताएं आगे चलकर उस विषय की नवीनता और मौलिकता को बनाये रखती हैं. ब्लॉगिंग की जो प्रकृति है यहाँ कोई भी विषय, अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकता है. इसकी प्रकृति को समझते हुए हम उस विषय को किस तरह और कितने मौलिक तरीके से सांझा करते हैं यह हम पर निर्भर करता है. जितना मौलिक चिंतन करते हुए हम किसी विषय को सांझा करते हैं निश्चित रूप से वह विषय अपन प्रभाव छोड़ने में सक्षम होता है, और उसी विषय का प्रस्तुतीकरण  हमारे चिंतन और दर्शन को पाठकों तक पहुंचाने में कारगर सिद्ध होता है. मौलिकता विषय को नयी जान देती है और नए आयाम देती है. अगर हम किसी शुष्क विषय पर भी लिख रहे हैं तो हमारी मौलिक सोच और प्रस्तुतीकरण उस विषय को ग्राह्य और पठन के योग्य बनाता है. अनुभव के आधार  पर कह सकता हूँ कि ब्लॉगिंग में विषय को मौलिकता प्रदान करने की अनेकों संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं का बेहतर उपयोग इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.  

सम्बंधित विषय की पूर्ण जानकारी : यूं तो जब कोई किसी सृजन की तरफ अग्रसर होता है तो उसकी अपनी मानसिकता होती है, प्रारंभ में हो सकता है कि सृजन की तरफ आकृष्ट होना एक शौक हो, लेकिन जब हम उस विधा में रम जाते हैं तो यह हमारा स्वभाव बन जाता है और किसी चीज का स्वभाव होना उसकी गहराई और महता को समझते हुए उसका हो जाना है. यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने भावानुकूल विषय की तरफ बढ़ता है तो उसे आनंद आने लगता है और वही आनंद हमारी निरंतरता को बनाये रखता है. किसी विधा की तरफ बढ़ने से पहले उसकी जानकारी होना आवश्यक है और जब हम जानकारी के साथ आगे बढ़ते हैं तो परिपक्वता की तरफ अग्रसर होते हैं. जैसे अगर हम कविता लिखना चाहते हैं तो हमें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि छंद क्या है? अलंकार क्या है? प्रतीक क्या होता है? बिम्ब किसे कहते हैं? आदि-आदि. साहित्य की विधाओं का अपना एक शास्त्र है इसी तरह ग़ज़ल, कहानी, निबंध आदि विधाओं के विषय में बात की जा सकती है. हालाँकि ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच है जहाँ साहित्य, कला, इतिहास, रंगमंच, संगीत, संस्कृति, समाज आदि ना जाने कितने आयाम हैं जिनमें निरंतर बेहतर अभिव्यक्ति हो रही है और काफी हद तक संतोषजनक भी. लेकिन फिर भी हर आयाम का अपना एक शास्त्र है, अपने नियम हैं और अगर हमें उन नियमों की जानकारी है तो हम बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकते हैं. सम्बन्धित विषय की पूर्ण जानकारी होना नितांत आवश्यक है जिस विषय पर आप लिख रहे हैं. वर्ना अधूरी जानकारी ना तो आपने लिए उपयोगी होती है और ना किसी और के लिए. अगर हम पूरी जानकारी के साथ किसी विषय को पाठकों के साथ सांझा करते हैं तो निश्चित रूप से पाठक लाभान्वित होते हैं और आपके प्रति सम्मान के भाव उनके हृदय में पैदा होते हैं और आपसे बहुत कुछ सीखने की ललक उनमें बनी रहती है, और जब हमारा पाठक हमसे लाभान्वित हो रहा है तो हमारे श्रम का लाभ उसे मिल रहा है. ब्लॉगिंग की कोई सीमा नहीं आपके किसी पोस्ट को कौन सा पाठक पढ़ रहा है यह तय कर पाना कठिन है, अलग-अलग पाठक के लिए आपकी पोस्ट अपना महत्व रखती है. एक सामान्य पाठक के लिए वह जानकारी नवीन हो सकती है जिसे आप ब्लॉग पर पोस्ट के माध्यम से सांझा कर रहे हैं और वहीँ पर दूसरा पाठक उस विषय में अपनी जानकारी को और बढ़ाना चाहता हो और एक ऐसा भी पाठक है जो सब कुछ जानता है वह विश्लेषण, मौलिकता और प्रस्तुतीकरण  के लिए आपकी पोस्ट पढ़ रहा हो. जिस तरह लेखन के कई आयाम हो सकते हैं उसी से पठन के भी कई आयाम होते हैं, हर पाठक का अपना नजरिया होता है और एक लेखक को उन सब बातों के मध्यनजर अपने आपको प्रस्तुत करना होता है, लेकिन यह सब तभी संभव हो पाता है जब हम विषय को पूरी तरह से समझते हैं और उस समझ को सभी के साथ सांझा करना चाहते हैं. 

स्पष्टता : विचारों को अभिव्यक्त करना किसी हद तक कठिन नहीं है. लेकिन विचारों को स्पष्टता से अभिव्यक्ति करना यह एक कठिन कार्य है. हम किसी विषय पर लिख रहे हैं हमारे मन में विचारों का प्रबल प्रवाह बना हुआ है और हम एकाग्र होकर मन में आने वाले विचारों को अभिव्यक्त किये जा रहे हैं. लेकिन जब किसी विषय पर अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख लेने के बाद जब उसे पुनः पढ़ा जाता है तो बहुत सी खामियां नजर आ  सकती हैं जिन्हें हम दूर कर सकते हैं. विचार जब आ रहे हैं आने दिए जा सकते हैं लेकिन जब विषय को साँझा कर रहे हैं तो एक बार उन विचारों की महता और उनका मूल्यांकन करना जरुरी हो जाता है. जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है, राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है. लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी. विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार-बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है. धर्म जैसे विषय पर लिखने के लिए हमें तार्किकता नहीं बल्कि अनुभवजन्य समझ की जरूरत होती ही और अध्यात्म और दर्शन जैसे विषयों पर लिखने के लिए खुद अगर हम उस राह से गुजरे हैं तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि जैसा विषय हमारे पास है वैसे ही हम विचारों को अभिव्यक्त करें तो बेहतर होता है. विषय के प्रति समझ से ही, विषय के प्रति दृष्टिकोण बनता है और यह दृष्टिकोण जितना सकारत्मक होगा उतनी ही लेखन की सार्थकता होगी. लेकिन यह सार्थकता तभी बनी रहेगी जब हम तथ्यों के प्रति ईमानदार बने रहकर अपने विषय का प्रतिपादन करेंगे. शेष अगले अंक में....!!!  

18 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...2

35 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे....जैसे ही सृजन का क्रम प्रारंभ हुआ वैसे ही उसे और बेहतर बनाने के लिए कुछ मूल बिंदु भी निर्धारित किये गए. यह आप किसी भी क्षेत्र में देख सकते हैं. संगीत, साहित्य, शिल्प, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान, योग आदि  ना जाने कितने आयाम हैं सृजन के, सभी के अपने  नियम है और उन्हीं नियमों के तहत वह आगे बढ़ते हैं, और जो उन नियमों का अनुसरण करते हुए नव सृजन करता है. वह उस क्षेत्र का ज्ञाता माना जाता है. इस पोस्ट के पहले भाग पर टिप्पणी करते हुए आदरणीय राहुल सिंह जी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है ‘ब्‍लागिंग का स्‍वभाव और प्रकृति की सीमा व्‍यापक है, निर्धारित करना कठिन जान पड़ता है’. काफी हद तक इनकी यह बात प्रासंगिक प्रतीत होती है. ब्लॉगिंग के स्वभाव और प्रकृति को समझना कठिन जरुर हो सकता है लेकिन असंभव नहीं और ऐसा कुछ भी नहीं जो हमारी समझ से बाहर हो, क्योँकि किसी नयी चीज को समझना मुश्किल हो सकता है.

लेकिन जब हम उससे प्रत्यक्ष ताल्लुक रखना शुरू करते हैं तो निश्चित रूप से हम उसके प्रति संवेदनशील
होते हैं और वहीँ से हमारी समझ विकसित होना शुरू होती है, और अगर हम अनमने ढंग से जुड़े हैं या कहीं पर हमारा स्वार्थ जुड़ा है तो हम उस स्वार्थ की पूर्ति करने में सफल तो हो सकते हैं लेकिन सार्थकता का जहाँ तक सवाल है वह नहीं हो सकता. इसे यूँ भी समझाया जा सकता है. जैसे कि टिप्पणी या लगातार लिखना किसी के लिए महत्वपूर्ण है तो कुछ भी लिखकर वह टिप्पणी हासिल कर सकता/सकती है. टिप्पणी के लिहाज से तो उसने सफलता प्राप्त कर ली लेकिन उस लिखे हुए की सार्थकता कितनी है यह बात बहुत महत्वपूर्ण है (मात्र संकेत किया है कृपया अन्यथा न लें) सफलता और सार्थकता में अंतर जान पड़ता है और उस अंतर को समझे बिना हम किसी दिशा में आगे नहीं बढ़ सकते. भाव और कर्म के दृष्टिकोण से सफलता के अनेक बिंदु हो सकते हैं. सफलता के मानक व्यष्टिगत और समष्टिगत दोनों होते हैं, लेकिन सार्थकता के मानक हमेशा समष्टिगत रहे हैं. सफलता के मानक निरपेक्ष और सापेक्ष दोनों हो सकते हैं लेकिन सार्थकता के मानक सापेक्ष ही रहे हैं. सफलता और सार्थकता पर ऐसी बहुत सी विचारणीय बाते कही जा सकती हैं लेकिन यहाँ सिर्फ संकेत रूप में कहूँ तो बेहतर है. सफल और सार्थक ब्लॉगिंग के लिए कुछ बिंदु हो सकते हैं, अगर हम उन्हें ध्यान में रखकर आगे बढ़ते हैं तो निश्चित रूप से हम काफी हद तक बेहतर योगदान कर सकते हैं. हालाँकि यह सभी  बिन्दु मेरा एक दृष्टिकोण हैं....और इसे आगे बढाने में आप अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं :-

सृजन की प्राथमिकता : सृजन मानवीय स्वभाव है. लेकिन सृजन करते वक़्त सर्जक को यह सोचना अवश्यम्भावी हो जाता है कि वह जिस दिशा या विधा में आगे बढ़ रहा है वह समाज और देश के लिए कितनी सार्थक है. उसकी दृष्टि क्या? उसका दृष्टिकोण क्या है? उसे क्या नया करना है? किस चीज को आगे बढ़ाना है. उस विधा में क्या सार्थक है और समय के साथ-साथ उसे उसमें क्या निरर्थक लगता है? ऐसे बहुत से प्रश्न है जो सृजन से पहले सर्जक के मन में कौंधने चाहिए. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या सच में वह-वह करना चाहता है जिसके विषय में वह सोच रहा है. निश्चित है व्यक्ति किसी काम को करने से पहले अपना लाभ भी सोचता है. यह व्यक्ति का स्वभाव है. उसे उस सृजन से क्या लाभ होने वाला है यह भी विचारणीय है. यह सब कुछ सोचने के बाद उसे अपनी सक्षमता पर भी ध्यान देना होगा. क्या जो कुछ वह सोच रहा है उसे कर पाने में वह सक्षम है या नहीं, उसकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक आदि स्थितियां उसे यह सब कुछ करने के लिए सहायक हैं या नहीं. हालाँकि सृजन इन सबका मोहताज नहीं होता लेकिन ऐसा सर्जक भी तो कोई-कोई ही होता है जो सब कुछ दावं पर लगाकर सिर्फ और सिर्फ सृजन के लिए जीता है. सृजन ही उसका ‘धर्म’ बन जाता है. लेकिन बहुतर ऐसा नहीं होता इसलिए इन स्थितियों पर भी ध्यान दिया जाये तो बेहतर है.

सृजन का एक पहलू यह भी है कि हम किस विधा को अपनाना चाहते हैं, और उस विधा में हम कितना जानते हैं पूर्ववर्तियों के बारे में जो हमसे पहले इस दिशा में अग्रसर हैं. उनकी क्या उपलब्धियां हैं, क्या कुछ उन्होंने किया है. जब हम किसी दिशा में कदम बढ़ाते हैं तो यह सब जानकारी हमारे लिए अपेक्षित हो जाती है. अगर हम थोडा सा इस बिंदु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवा सकते हैं और उस विधा में नव सृजन के द्वारा उसके किसी महत्वपूर्ण पक्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. जिस निश्चित विधा की तरफ आप बढ़ रहे हैं उस विधा के भी अपने कई आयाम हैं और उनमें से आप किसी एक का चुनाव करके भी सार्थकता को लेकर आगे बढ़ते हैं तो आपका योगदान निश्चित रूप से रेखांकित करने योग्य हो जाता है. इतिहास में जिन व्यक्तियों का नाम आज दर्ज है उनके व्यक्तित्व में यह विशिष्ट गुण देखने को मिलता है. भाव के स्तर पर भी कई आयाम देखे जाते हैं जिनको आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होता है. लेकिन यह सब कुछ करने से पहले आपको सृजन की प्राथमिकता को तय करना होगा और जैसे ही आप यह तय करने में सक्षम हो जाते हैं आपके सामने सृजन के नए आयाम खुलते जाते हैं और फिर आप निर्बाध गति से आगे बढ़ते हुए ऊँचाइयों को प्राप्त करते हैं. लेकिन सृजन के बदले किसी पुरस्कार की कामना या किसी चर्चा में आने के लिए सृजन करना एक निम्न पहलू है. आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं. अब हमें यह निर्धारित करना होगा कि हमारा सृजन का मुख्य पहलू क्या है??? मात्र और मात्र सार्थक सृजन, चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है. जैसे कहा जाता है कि कला-कला के लिए, कला जीवन के लिए. शेष अगले अंक में...!!!

14 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...1

36 टिप्‍पणियां:
सृजन मानव का स्वभाव है. यही उसकी चेतना का प्रतिबिम्ब भी है. मानव मन-मस्तिष्क में चलने वाली हलचल, भावनाओं और विचारों का अनवरत प्रवाह सृजन के माध्यम से बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है. जब तक सब कुछ हमारे मन-मस्तिष्क में घटित हो रहा है, तक वह हमारा है. जैसे ही हमनें उसे अभिव्यक्त किया वह सबका हो गया. हमारी चेतना के मूल में सृजन स्वभाव के रूप में स्थापित है. (स्वभाव के बारे में बात फिर कभीऔर इसी का परिणाम है कि मानव अपने अस्तित्व में आने से लेकर निरंतर सृजन में प्रवृत है. सृजन की उद्भट प्रतिभा ने उसे ‘सृष्टा’ के समकक्ष ला दिया. सृजन के मूल में उसकी भावना ने महती भूमिका अदा की. अनवरत चिंतन और दनिया में कुछ नया करने के भाव ने उसे हमेशा जगाए रखा. प्रकृति उसकी पहली प्ररणा रही है और परमात्मा उसके जीवन का ध्येय. उसने सारी प्रकृति को परमात्मा का प्रतिबिम्ब स्वीकार कर लिया और प्रकृति में ही उसने सृजन के विविध आयाम खोजे. अगर हम संस्कृत वाङ्मय पर गहराई से ध्यान देते हैं तो यही पाते हैं. ‘ऋग्वेद के प्रत्येक मंडल में ऐसा बहुत कुछ हमें देखने को मिलता है. जहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वर्षा आदि के लिए ऋचाएं वर्णित है. कालान्तर में इन्हीं ऋचाओं का रूपांतरण मन्त्र के रूप में हुआ. हालाँकि ‘मन्त्र-तंत्र’ के लिए लिखित साहित्य को आज तक साहित्य की कोटि में नहीं रखा गया है. लेकिन कहीं न कहीं पर इनकी प्रमाणिकता पर भी ध्यान देने की जरुरत है. ‘मन्त्र–तंत्र’ के लिए लिखी गयी बातें सिर्फ उन्हीं लोगों का विषय बनी रही हैं जिनका इससे सम्बन्ध रहता है. हालाँकि अब यह कहा जाता है कि यह सब वैज्ञानिक नहीं है, और यह सब ढोंग है. लेकिन एक बात बताता चलूँ कि 'विज्ञान जहाँ अपनी हद मान लेता है वहीँ से अध्यात्म शुरू होताहै और उसका आज तक कोई अंत नहीं पा सका. सृजन भी एक अनन्त और अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. समय और स्थिति का प्रभाव बेशक इस पर पड़ता है लेकिन यह भावनात्मक रूप से एक सी रहती है. कालिदास के ‘अभिज्ञानशकुन्तलम’ में जिस प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है, उसी प्रेम को आज तक विभिन्न रूपों में, विभिन्न शैलियों में विभिन्न देशों और भाषाओँ के रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता रहा है, लेकिन न तो कालिदास द्वारा अभिव्यक्त प्रेम पुराना पड़ा, और न ही परवर्ती रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त प्रेम. इसीलिए यह बात हमें स्वीकार करनी पड़ेगी कि सिर्फ भावनाओं को अभिव्यक्त करने के तरीके बदले हैं, लेकिन भाव तो शाश्वत है. 

आचार्य भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में भाव को लेकर बहुत कुछ वैज्ञानिक तरीके से अभिव्यक्त करने
का प्रयास किया गया है. भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी आदि भावों को लेकर बहुत सटीक व्याख्याएं भरतमुनि के बाद के आचार्यों ने प्रस्तुत की हैं. भट्ट लोल्लट, भट्ट शंकुक,  भट्ट नायक और अभिनवगुप्त इस सिद्धांत को आगे बढाने का काम करते हैं और काफी हद तक विषद विवेचन के आधार पर अपनी मान्यताओं को पुष्ट करते हुए भाव और उसके अंगों को पुष्ट करने का प्रयास करते हैं और यह भी समझाने की कोशिश करते हैं कि काव्य में क्या जरुरी है. हालाँकि उनके इस सिद्धांत पर कई पोस्ट्स लिखी जा सकती हैं, और आदरणीय मनोज जी के ब्लॉग मनोज पर आपको यह जानकारी सहज मिल सकती है. सृजन के सन्दर्भ  में इसी तरह की मान्यता पाश्चात्य विचारक प्लेटो ने भी अभिव्यक्त की है. काव्य के सन्दर्भ में अपनी मान्यता को अभिव्यक्त करते हुए प्लेटो कहता हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति है’. हालाँकि बाद में प्लेटो की इस मान्यता का खंडन उनके शिष्य अरस्तु करते हैं और यह कहते हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति नहीं, बल्कि उसकी प्रतिकृति हैयहाँ अनुकृति और प्रतिकृति शब्दों ने एक दुसरे में भेद कर दिया और एक ही विषय पर दो सिद्धांत प्रचलन में आ गए. इससे भी यह स्पष्ट होता है कि सृजन के मूल में प्रकृति की महता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भरतमुनि ने जो मंतव्य अपने नाट्यशास्त्र में रस के सम्बन्ध में अभिव्यक्त किया है, उसी तरह के भाव मुझे अरस्तु के विरेचन सिद्धांत में देखने को मिलते हैं, और कभी-कभी मुझे इन दोनों आचार्यों की काव्य के सन्दर्भ में लगभग एक सी मान्यताओं ने ( रस और विरेचन के सम्बन्ध में ) आश्चर्यचकित किया है. भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने काव्य की सार्थकता, उसकी उपयोगिता, सृजन की प्राथमिकता को लेकर व्यापक बहस की है, और कुछ सार्थक निष्कर्ष भी निकाले हैं. उनके यह निष्कर्ष आज सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है, और उन्हीं के आधार पर समस्त साहित्य रचना  हो रही है. हालाँकि समय -समय पर इनमें भी बदलाव आया है, यह बदलाव पूर्व प्रचलित मान्यता को खंडित तो करता है, लेकिन उसकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं करता, और यही सार्थक बहस से ही संभव हो सकता है. 

सूचना तकनीक के विकास के इस दौर में अभिव्यक्ति और सृजन के साधनों का भी विकास होता रहा .सृजन की विधाएं अनन्त हैं. लेखन उनमें से एक है.  कभी पत्थरों पर लिखा गया तो कभी भोजपत्रों पर. लेखन का इतिहास सृजन के इतिहास से ही जुड़ा है. लेखन पर भी विकास का प्रभाव पड़ा. कभी शैली तो कभी भाव पर और यह विकास निरंतर जारी है. इन्हीं विकास के पडावों को पार करते हुए हमने इन्टरनेट की दुनिया में प्रवेश किया. इन्टरनेट ने दुनिया को एक क्लिक तक सीमित कर दिया और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हमें एक नायाब तोहफा दिया ‘ब्लॉगिंग’. आज दुनिया के तमाम लोग तरह-तरह के माध्यमों से एक-दुसरे से जुड़ रहे है. मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति के नए साधन मिले हैं, इन साधनों ने मनुष्य में रचनाशीलता का जो संचार किया है वह कभी-कभी सोचने पर मजबूर करता है. ब्लॉगिंग भी मनुष्य की रचनाशीलता को अभिव्यक्त करने के एक सशक्त माध्यम के रूप में आज हमारे सामने है. ब्लॉगिंग की दुनिया अद्भुत है. रचनाशीलता का यहाँ व्यापक प्रसार है. एक ही मंच पर सब कुछ अभिनीत किया जा रहा है और दर्शक दांतों तले अंगुली दवाने पर मजबूर है. हालाँकि ब्लॉगिंग का अपना एक स्वभाव है, उसकी अपनी एक प्रकृति है (यह विषय फिर कभी) इन सभी के बाबजूद ब्लॉगिंग करने के लिए कुछ बाते निर्धारित की जा सकती हैं. जिनके आधार पर हम सफल ब्लॉगिंग की और बढ़ सकते हैं. शेष अगले अंकों में....!!!