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06 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...2

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे...भावों की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीव जन्तु भी कुछ ध्वनि संकेतों का प्रयोग करते हैं. हालाँकि हम उनके ध्वनि संकेतों को समझ नहीं पाते, लेकिन सामान्य व्यवहार में देखा गया है कि वह ऐसा करते हैं. जीवन की हर स्थिति में वह भी अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. जो पशु-पक्षी-जन्तु मनुष्य के साथ-साथ जीवन जीते हैं, उनके हाव-भाव से तो यही प्रतीत होता है कि वह भी भावों की अभिव्यक्ति के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं. जैसे कभी आप प्रयोग करके देखें कि गाय ने जब किसी बच्चे को जन्म दिया हो, उसके बच्चे को जब कोई हानि पहुंचाने की कोशिश करता है या जब कोई उसे उससे दूर करने की कोशिश करता है तो वह इस तरह का व्यवहार करती है कि हमें उसकी सम्वेदना और बच्चे के प्रति उसका प्यार समझ आता है. कई बार हम जंगलों में भी देखते हैं कि अगर किसी जन्तु को कोई तकलीफ होती है तो उस क्षेत्र में रहने वाले सभी जीव-जन्तु वहां इकठ्ठा हो जाते हैं, कई बार तो दृश्य इतना सुखद और सम्वेदनात्मक होता है कि जो जीव किसी दूसरे के आहार का आधार है, उसे तकलीफ की स्थिति में वह भी हानि नहीं पहुंचाते. ऐसे दृश्य देखने के बाद कई बार मनुष्य के व्यवहार के विषय में सोचना पड़ जाता है कि किसी विकट स्थिति में कई बार मनुष्य दूसरे मनुष्य का गलत फायदा उठाने की कोशिश करता है. लेकिन ऐसी स्थिति में पशु ऐसा कम ही करते देखे गए हैं. कुल मिलाकर यही समझने का प्रयास में कर रहा हूँ कि प्रकृति में विचरण करने वाले अधिकतर चेतन जीव अपना भावों को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं, मनुष्य भी उनमें से एक है.
मनुष्य के व्यवहार और भाव अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में अगर हम भाषा का अध्ययन करने का प्रयास करते हैं तो एक रोचक सा संसार हमारे सामने उपस्थित हो जाता है. मनुष्य की भाषा और अभिव्यक्ति का प्रभाव उसके पूरे जीवन पर देखा जा सकता है. मैं कई बार सोचता हूँ कि मनुष्य के पास अगर भाषा नहीं होती तो मनुष्य की स्थिति क्या होती? भाषा विहीन मनुष्य क्या वह सब कुछ हासिल कर लेता, जो वह आज तक करता आया है या जो वह आज कर रहा है. संभवतः वह ऐसा नहीं कर पाता. क्योँकि मनुष्य ने किसी भी क्षेत्र में जो कुछ हासिल किया है उसका आधार भाषा रही है. भाषा के बिना मनुष्य की प्रगति सम्भव नहीं होती. इसलिए भाषा मात्र भावों की अभिव्यक्ति के लिए ही जरुरी नहीं है, भाषा का उद्देश्य व्यापक है. इस संसार में भाषा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. मनुष्य के महान अविष्कारों में भाषा का आविष्कार एक महान आविष्कार कहा जाना चाहिए और भाषा को सदा-सदा के लिए सुरक्षित और जन-मन तक पहुंचाने के लिए किया गया लिपि का आविष्कार भी कोई महत्वपूर्ण नहीं है. समग्र रूप से हम यह कह सकते हैं कि भाषा और लिपि का आविष्कार इस संसार में अब तक हुए अविष्कारों में सबसे महत्वपूर्ण हैं, अगर यह आविष्कार नहीं होते तो शायद जितने भी आविष्कार आज तक हमें किये हैं, उनका कोई भी बजूद नहीं होता.
भाषा और लिपि का आविष्कार मनुष्य की चिरंतन सोच का नतीजा है. लेकिन हम यह भी देखते हैं कि इस संसार में भाषाएँ अधिक हैं और लिपियाँ कम. यह एक अलग बहस का बिन्दु हो सकता है. लेकिन हम यहाँ इस तथ्य को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते कि लिपि के आविष्कार से पहले मनुष्य ने भाषा का आविष्कार किया है. आज भी हम दुनिया में यह देख सकते हैं कि कई भाषाएँ ऐसी हैं जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं, लेकिन उस भाषा में लिखित कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. जो ध्वनि संकेत पीढ़ी दर पीढ़ी किसी समुदाय, जाति और क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच में प्रचलित रहे हैं, वह उनकी भावाभिव्यक्ति का आधार हैं. सामान्य स्थिति में हम उसे बोली कहते हैं.
बोली के विषय में व्याकरण और भाषा विज्ञान में कुछ परिभाषाएं पढने को मिल जाती हैं. लेकिन इन परिभाषाओं का उपयोग हम भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग में करते हैं. भाषा वैज्ञानिकों और वैयाकरणों ने भाषा और बोली के अन्तर पर विचार करने की कोशिश की है. लेकिन यहाँ हम यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य अपनी भावाभिव्यक्ति और संवाद के लिए जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग करता है वह उसके लिए कितना महत्वपूर्ण हैं. हम देखते हैं कि मनुष्य जन्म लेने के साथ ही जिन ध्वनि संकेतों के माध्यम से अपने भावों को दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, उसे हम मातृभाषा कहते हैं. दुनिया के तमाम मनुष्य सबसे पहले माँ से सीखी हुई या ग्रहण की हुई भाषा में ही अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं. इससे के बात और भी समझ आती है कि मनुष्य जन्म से भाषा विहीन होता है, लेकिन धरती पर जन्म लेने के बाद वह जिस परिवेश में पलता है वह वहां की भाषा सीख करके उसके माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है. इसलिए दुनिया भर में किये गए शोध से यह बात भी सामने आई है कि मनुष्य जिस भाषा को अपनी माँ से सीखता है वह ताउम्र उसी भाषा में सोचता है, बेशक वह भाव को किसी और भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है, लेकिन सोच के स्तर पर वह उसी भाषा या बोली में सोचता है जो उसने अपनी माँ से सीखी हो, जिस हम मातृभाषा की संज्ञा से अभिहित करते हैं. 
मातृभाषा को सामान्य शब्दों में माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में परिभाषित किया जा सकता है. ऐसे ध्वनि संकेत जिन्हें हम माँ से सीखते हैं, उन्हें मातृभाषा की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है. एक नवजात अपने घर-परिवार से ही भाषा की प्रथम शिक्षा पाता है. लेकिन भाषा शिक्षण और भाषा प्रयोग के प्रारम्भिक बिन्दु क्या हैं? यह जानना बड़ा रोचक है. दुनिया के तमाम देशों के मनुष्य अपने भावों की अभिव्यक्ति भाषा या बोली के माध्यम से करते हैं. जहाँ तक बोली का विषय है उसे हम मातृभाषा भी कह सकते हैं. मातृभाषा को हमें माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में प्रयोग करना चाहिए, कुछ लोग मातृभाषा शब्द को किसी देश विशेष की भाषा के सन्दर्भ में भी प्रयोग करते हैं. लेकिन मैं जहाँ तक समझता हूँ कि इस शब्द का बेहतर प्रयोग माँ से सीखी हुई भाषा के सन्दर्भ में ही किया जाना चाहिए, जिस सामान्य तौर पर हम बोली कहते हैं. बोली और भाषा में बुनियादी तो नहीं लेकिन व्यवहारिक अन्तर जरुर हैं. उनके विषय में किसी और रूप में भी चर्चा की जा सकती है. लेकिन यहाँ सरसरी और कुछ हद तक व्यवहारिक समझ के लिए हमें यह समझना जरुरी है कि भाषा शिक्षण ज्यादा जरुरी है या भाषा प्रयोग. लेकिन जहाँ तक अनुभव रहा है मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में बोली को सीखता है. शेष बिन्दु अगले अंक में...!!

08 फ़रवरी 2013

पुस्तकें और पाठक .. 1

11 टिप्‍पणियां:

संवाद स्थापित करना प्राणी की अनिवार्य और महत्वपूर्ण आवश्यकता है. अगर हम यह कल्पना करें कि जब संवाद स्थापित करने के साधन नहीं थे तो जीवन कैसा रहा होगा ? संवाद करना सिर्फ मनुष्य की ही नहीं, प्राणी मात्र की आवश्यकता है. हर एक प्राणी अपने भाव को प्रकट करता है और उसे प्रकट करने के लिए वह किसी ख़ास शैली का प्रयोग करता है. संवाद प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से स्थापित किया जा सकता है. संवाद स्थापित करने के लिए लिखित, मौखिक और सांकेतिक विधियां मुख्य रूप से प्रयोग में लायी जाती रही हैं. हालाँकि इनकी कोई सीमा नहीं निर्धारित की जा सकती, लेकिन यह तीन विधियां प्रारंभ से प्रचलन में रही हैं और जीवन रहते तक इनकी महता बनी रहेगी. जहाँ पर हम प्रत्यक्ष संवाद करते हैं वहां हमारे सामने मौखिक विकल्प ज्यादा रहता है या फिर लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से हम संवाद स्थापित कर सकते हैं. लेकिन जहाँ हम लोगों के सामने जाकर अपनी बात नहीं रख पाते तो वहां हम लिखकर या संकेत रूप में अपने भावों को प्रकट करते हैं, और आधुनिक युग में तो हम संवाद स्थापित करने के लिए सुचना तकनीक के अनेक साधनों का प्रयोग करते हैं.
गर हम यह कहें कि जो कुछ भी हम देख रहे हैं उसमें संवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. मानव जीवन के इतिहास का एक नहीं बल्कि अनेक पहलू संवाद के बिना अधूरे हैं, इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि संवाद के बिना उनकी कल्पना करना बेमानी जैसा होगा. संवाद करने की इस उत्कट इच्छा ने मानव को भाषा दी, लिपि दी और फिर आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह एक तरह से संवाद स्थापित करने का ही हिस्सा है. सूचना तकनीक के साधनों का विकास भी एक पड़ाव है संवाद स्थापित करने के और इसने सब कुछ बदल दिया है. मनुष्य ने जब लिखित रूप से संवाद करने की कोशिश की तो फिर अनेक साधनों का विकास किया. एक तरफ उसने लिपि का अविष्कार अपनी भाषा को सुरक्षित करने के लिए किया तो दूसरी तरफ कागज़, कलम और स्याही का आविष्कार उसे सुरक्षित रूप प्रदान किया. अपने विचारों को सहेजने के लिए उसने फिर की शैलियों का प्रयोग किया और उन विचारों को जिस माध्यम से दुनिया तक पहुंचाया उसे हमने पुस्तक की संज्ञा से अभिहित किया. आज हम देखते हैं कि एक रचनाकार अपने भावों को, विचारों को पुस्तकों के माध्यम से दुनिया के कोने - कोने तक सहजता से पहुंचा सकता है, यही नहीं हम हजारों वर्षों पुराने दस्तावेजों के माध्यम से अपने अतीत को जान सकते हैं और यह भी बड़ा रोचक है कि भविष्य की योजनायें बनाने में भी कहीं न कहीं पुस्तकों की भूमिका महत्वपूर्ण है. यह आज भी है, कल भी थी और भविष्य में भी बनी रहेगी.
क पुस्तक जो हमारी नजरों के सामने से गुजरती है, आज जिस रूप में वह हमारे सामने है उसके विकास की कहानी बड़ी रोचक है और ना जाने उसके कितने पड़ाव हैं. यह भी हो सकता है कि उसके विकास के कुछ पडावों को हम विस्मृत कर गए हों. लेकिन एक पुस्तक विकास का सिर्फ एक आयाम लेकर ही हमारे सामने नहीं आती बल्कि अनेक आयामों का प्रकटीकरण वह अपने माध्यम से करती है. संवाद स्थापित करने के लिए भाषा, भाषा को सहेजने के लिए लिपि, लिपि को मानक रूप देने के लिए ध्वनि चिन्ह और उसे व्यवस्थित करने के लिए व्याकरण इसी प्रकार यह शृंखला आगे बढती जाती है. एक तरफ तो यह अगर दूसरी तरफ देखें तो भाषा को जिन  माध्यमों से सहेजा गया उनमें कहीं पर पत्थरों/ शिलाओं का योगदान रहा तो कहीं बांस का, फिर हमने भोजपत्रों, धातुपत्रों  पर लिखना शुरू किया आगे चलकर कागज़ का अविष्कार हुआ, हाथ से लिखने से लेकर बड़ी- बड़ी मशीनों माध्यम से यह काम होना आदि बहुत से आयाम हैं जो इस पुस्तक के इतिहास से जुड़े हैं. इस दिशा में हम निरंतर विकास कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. इन सब पर लिखने के लिए स्याही के रूप में अनेक द्रव्यों का प्रयोग आदि काल से होता रहा है . हालाँकि यह विषय एक स्वतन्त्र विश्लेषण की अपेक्षा रखता है और निकट भविष्य में इस पर भी आपसे अपने अनुभव सांझा करने का प्रयास रहेगा. 
क पुस्तक के पाठक तक पहुँचने के आयामों की कहानी बड़ी रोचक और गतिशील है और उस पुस्तक के माध्यम से व्यक्ति की जीवन में परिवर्तन बड़ा अद्भुत है. यह किसी चमत्कार से कम नहीं. यूं देखने में तो पुस्तक निर्जीव लगती है लेकिन अगर उसकी अंतरात्मा को हम समझ पाए तो वह हमारे लिए जीवन से कहीं बढ़कर है . पुस्तक की महता का कोई पैमाना शायद आज तक निश्चित नहीं हो पाया है कि वह कितनी महत्वपूर्ण है, लेकिन एक संकेत देता चलूँ कि आज जिन रचनाकारों के सामने हम नतमस्तक होते हैं उन चिंतन और व्यक्तित्व अगर किसी माध्यम से हमारे सामने आया है तो वह हैं 'पुस्तकें' ....!