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17 नवंबर 2016

प्रकृति-मनुष्य और शिक्षा की भाषा...4

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गत अंक से आगे.....आम जनमानस बोली में ही अपने भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता है, उसके जीवन का हर पहलू बोली के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ अभिव्यक्त होता है. हम अगर भाषा का गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि भाषा में प्रयुक्त कुछ शब्द भाव सम्प्रेषण में बाधक होते हैं. इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि संसार की अधिकतर भाषाओं में प्रयोग होने वाले शब्द आसपास की बोलियों से लिए गए होते हैं, लेकिन बोली में अधिकतर शब्द मौलिक और भाव के बिलकुल निकट होते हैं. इसलिए भाषा के बजाय बोली भाव सम्प्रेषण के लिए ज्यादा सहज है, सार्थक है और स्वीकार्य भी. भाषा और बोली के सम्बन्ध में कई आयाम हमारे सामने हैं और दुनिया में जितने भी शोध आज तक हुए हैं वह यह बताते हैं कि मौलिक सृजन की मंजिल हमेशा बोली के रास्ते पर चलकर ही तय होती है. बेशक अन्त में उसे भाषा ही कहा जाता है.
हम यहाँ भाषा और बोली के अन्तर्सम्बन्धों पर विचार करने के बजाय इस पहलू पर विचार करने की कोशिश करेंगे कि हम किस (भाषा/बोली) माध्यम से बच्चों को शिक्षा देने का प्रयास करें, जिससे कि वह अधिक से अधिक मौलिक सृजन कर सकें. हम अधिकतर यही मानते हैं कि भाषा तो सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम है, लेकिन हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भाषा मात्र अभिव्यक्ति का ही माध्यम नहीं, वह हमारे सृजन और चिन्तन का भी आधार है. इसलिए हम जिस भाषा या बोली के करीब हैं, वही हमारे चिन्तन और सृजन के आधार को पुष्ट करती है. यह भी एक तथ्य है कि मनुष्य जिस भाषा को अपने बचपन में सीखता है वह उसी भाषा/बोली के माध्यम से ही सोचता है. जब सोच का आधार बचपन में सीखी हुई भाषा है तो स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति और सृजन के लिए भी वह उपयुक्त होगी.  
एक अवोध बालक बोलना अपने परिवेश से सीखता है, लेकिन जब हम उसे शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करते हैं तो हम उसे किसी अन्य भाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रयास करते हैं. दुनिया में यह चलन कम है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में अगर बात की जाए तो यहाँ अनेक बोलियाँ हैं, फिर क्षेत्रीय भाषाएँ हैं और फिर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय भाषाएं. अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हमारे देश में अंग्रेजी का प्रचलन जोरों पर है. हर किसी माँ-बाप की इच्छा है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करे, साथ ही उनका यह भी प्रयास है कि वह किसी अच्छे से निजी विद्यालय में पढ़े. जिससे कि उसे एक बेहतर काम मिल सके और उसका जीवनयापन बेहतर तरीके से हो सके.
बाजारवाद के इस दौर में व्यक्ति को एक मशीन की तरह प्रयोग किया जा रहा है, और व्यक्ति की विवशता यह है कि वह न चाहते हुए भी इसके लिए खुद को प्रस्तुत कर रहा है. बाजारवाद व्यक्ति को भविष्य का एक सुनहरा सपना दिखाता है और हर व्यक्ति से यह अपेक्षा करता है कि वह उसके मत से सहमत होते हुए खुद को उसके साथ चलने के लिए सहमत कर ले, अगर कोई सहमत नहीं है तो उसे बाजारवाद विवशता से अपनी और मोड़ने की कोशिश करता है. ऐसे में सबसे पहले जिस पहलू पर वह मार देता है वह है, मनुष्य की भाषा और उसका रहन-सहन. मनुष्य में जब यह परिवर्तन हो जाते हैं तो वह सहज ही बाजारवाद के हाथों की कठपुतली बन जाता है. इसका सबसे बड़ा असर मनुष्य की बोली और स्थानीयता पर होता है. बाजारवाद बोली, स्थानीयता और परम्परा को पिछड़े होने की निशानी मानता है, जब व्यक्ति को यह बोध हो जाता है कि अपनी बोली-स्थानीयता और अपनी परम्पराओं का पालन करना पिछड़े होने की निशानी है तो वह जल्द से जल्द इनका त्याग करने की कोशिश करता है. जैसे ही व्यक्ति इस और आकृष्ट होता है तो वह अपनी बोली-वेशभूषा-रहन सहन आदि का त्याग करते हुए आधुनिक होने का सपना देखता है. लेकिन सच तो यह है कि व्यक्ति की आधुनिकता उसके पहरावे और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने में नहीं है, वह उसके विचारों से झलकनी चाहिए.
आज जहाँ पूरी शिक्षा व्यवस्था बाजारवाद के हाथों संचालित हो रही है तो ऐसे में हम कैसे यह तय करें कि हम अपने बच्चे को किस भाषा माध्यम से शिक्षा दें कि वह एक बेहतर सृजक बन सके, एक अच्छा विचारक बन सके. उसके जहन में मौलिक चिन्तन का बीज बोने के लिए जरुरी है कि उसे हम उस भाषा से जोड़ें जो आगे चलकर उसे अभिव्यक्ति और चिन्तन के बेहतर अवसर उपलब्ध करवा सके. इन सब पहलूओं को जब हम ध्यान में रखते है तो हम पाते हैं कि व्यक्ति जिस परिवेश में अपने जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में रहता है, वह उसी हिसाब से अपनी अभिव्यक्ति के विषय और क्षेत्र को चुनता है. इसलिए जरुरी है कि हम भावी पीढ़ियों को ऐसा वातावरण प्रदान कर सकें जिससे वह अपनी प्राकृतिक क्षमताओं का बेहतर से बेहतर प्रयोग कर सके और इसके लिए जरुरी है अपने आसपास एक सकारात्मक वातावरण तैयार करें. जिससे इस देश में पलने वाला हर एक बच्चा जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके. वह देश और दुनिया को कुछ बेहतर देन देते हुए अपने जीवन के सफर को तय कर सके. हम भी यह कोशिश करें कि हम अपने बच्चों को भाषा और बोली के प्रति सजग करते हुए उन्हें अपनी सभ्यता-संस्कृति से जोड़ते हुए आगे बढ़ें.

30 जून 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 2 ..

24 टिप्‍पणियां:
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम देशों में कमोबेश ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहीं हैं . लेकिन ऐसी स्थितियों के लिए प्रकृति कम और मनुष्य ज्यादा जिम्मेवार है .
गत अंक से आगे……!
मनुष्य के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने उसके ही सामने कई विकट स्थितियां पैदा की हैं , ओजोन परत का क्षीण हो जाना और सूर्य की पराबैंगनी किरणों का उस तक पहुंचना और फिर इन किरणों के कारण उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर होना यह सब स्थितियां एक दूसरे से गहरा ताल्लुख रखती हैं . इधर कई वर्षों से यह कहा जा रहा है कि धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब धरती पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है . जल, जंगल और जमीन के अत्याधिक दोहन के कारण प्रकृति का सारा संतुलन बिगड़ गया है और हम हैं कि सिर्फ आंकड़े एकत्र करने में लगे हैं . कहीं पर ग्रीनहॉउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है तो कहीं पर अन्य कारणों पर चर्चा की जा रही है . लेकिन अगर परिणाम देखते हैं तो सब कुछ होने के बाबजूद भी परिणाम शून्य नजर आ रहे हैं .

अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने तो कार्बनडाईऑक्साइड को कम करने के लिए कृत्रिम पेड लगाने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा है . लेकिन यह ज्यादा समझदारी होगी कि जितना श्रम और धन उन कृत्रिम पेड़ों को लगाने में लगेगा उसका आधा भी अगर हम प्राकृतकि पेड़ों को लगाने में खर्च करें तो वर्षों तक स्थितियां बेहतर बनायीं जा सकती हैं और दूसरी तरफ जितना श्रम और धन उन पेड़ों के रख रखाब पर खर्च होगा उतना ही ध्यान अगर अपनी मौजूदा प्राकृतिक सम्पदाओं पर देने की कोशिश करेंगे तो आने वाले समय में बेहतर प्रबंधन के साथ और आगे बढ़ते हुए काफी क्रांतिकारी परिवर्तन हासिल किये जा सकते हैं . क्योँकि प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करते वक़्त हमें बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हम अकेले ही नहीं हैं इस धरा पर, हमारे साथ - साथ इस धरती के प्रत्येक जीव को प्राकृतिक साधनों और सम्पदाओं की उतनी ही जरुरत है जितनी कि हमें है . वन्य प्राणियों का जीवन पेड पौधों पर आश्रित है , पेड पोधों का जीवन जल और वायु पर , इसी तरह से यह क्रम है और इस प्रकृति की प्रत्येक सता एक दूसरे से जुडी हुई है और सभी एक दूसरे पर आश्रित भी है . अगर कहीं पर कोई भी रिक्त स्थान आ जायेगा तो वह श्रृंखला टूट जायेगी और हम सदा - सदा के लिए के दूसरे से बिछुड़ जायेंगे , यानि मिट जायेंगे इसलिए समय रहते इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है . 

अब इस दिशा में कदम कौन उठाएगा यह विचारणीय है ? लेकिन मेरा मानना है कि इस दिशा में तो हमें सरकारों से किसी तरह की अपेक्षा करने की बजाए स्वयं कदम उठाने होंगे और इसके लिए अगर हम अपने गाँव या शहर या आसपास के लोगों को छोटे -छोटे समूहों में संगठित कर कार्य करेंगे तो शीघ्र ही उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और अगर हर जगह ऐसा करने में हम सफल हो जाएँ तो वह दिन दूर नहीं जब हम फिर इस धरती के वातावरण को जीने लायक बना सकते हैं . 

यह तो एक पहलू है प्रदूषण का मैंने जब प्राकृतिक प्रदूषण के पर विभिन्न पहलुओं पर विचार किया तो मेरे सामने बहुत विकट स्थितियां पैदा हुईं . हालाँकि जब भी मुझे इस विषय पर चर्चा करने का मौका मिलता है तो मैं बहत बैचैन होता हूँ . क्योँकि मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं इस प्राकृतिक प्रदूषण की जड़ यह भी है और वह है मानसिक प्रदूषण और यह इतना खतरनाक और प्रभावी है कि इससे बचना अब बहुत मुश्किल हो गया है . हमारे मनों में इतनी दीवारें हैं कि हम एक दूसरे के विषय में सकारात्मक सोच ही नहीं पाते . जाति , भाषा , मजहब , धर्म , क्षेत्र ना जाने कितने वर्ग हैं जिनके आधार पर एक छोटे से क्षेत्र के लोग बंटे होते हैं , हालाँकि उन सबका जीवन एक जैसा होता है एक जैसे साधनों का उपयोग वह करते हैं फिर भी एक दुसरे से इतनी नफरत कि जैसे सामने वाला इनसान इस धरती का है ही नहीं और इस मानसिक प्रदूषण के परिणाम प्राकृतिक प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं .

इस मानसिक प्रदूषण ने ऐसा वातावरण तैयार किया कि हम खुलकर बात करने की स्थिति में नहीं हैं . आये दिन ना जाने क्या - क्या घटित हो जाता है हमारे सामने और हम मूकदर्शक की भूमिका निभाते हुए आगे बढ़ रेहे हैं और अपना संवेदनाहीन जीवन जी रहे हैं . कुछ भौतिक साधनों का एकत्रण हमनें कर लिया है और उसे हम अपने जीवन की सफलता मानकर फूले नहीं समा रहे हैं . लेकिन वास्तविकता से कटकर जीना भी कोई जीना है ? कम से कम मेरी समझ में नहीं आता ! मानसिक प्रदूषण का प्रभाव हम पर इतना हावी है कि हम वास्तविकता को जाने बगैर आगे बढ़ रहे हैं . जो बातें किसी तरह का अस्तित्व नहीं रखती उन्हें मानकर उनका अनुसरण कर रहे हैं , जबकि प्रायः यह देखा जाता है कि ऐसी बातों का वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं होता , और जो लोग ऐसी बातें करते या उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं उनसे ही अगर पूछ लिया जाये तो वह भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते . तो फिर यही आभास होता है कि यह एक तरह का मानसिक प्रदूषण है जिसे हम अपना रहे हैं . हमनें कभी विविधता को स्वीकार नहीं किया और एकांगी और मानसिक रूप से प्रदूषित जीवन को हम जीते रहे और जीवन की इतिश्री इसी रूप में हो गयी और आने वाली पीढ़ी को भी वही प्रदूषित सोच हमनें सौंप दी . काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
अगले अंक में भी जारी.....!