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30 जून 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 2 ..

24 टिप्‍पणियां:
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम देशों में कमोबेश ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहीं हैं . लेकिन ऐसी स्थितियों के लिए प्रकृति कम और मनुष्य ज्यादा जिम्मेवार है .
गत अंक से आगे……!
मनुष्य के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने उसके ही सामने कई विकट स्थितियां पैदा की हैं , ओजोन परत का क्षीण हो जाना और सूर्य की पराबैंगनी किरणों का उस तक पहुंचना और फिर इन किरणों के कारण उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर होना यह सब स्थितियां एक दूसरे से गहरा ताल्लुख रखती हैं . इधर कई वर्षों से यह कहा जा रहा है कि धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब धरती पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है . जल, जंगल और जमीन के अत्याधिक दोहन के कारण प्रकृति का सारा संतुलन बिगड़ गया है और हम हैं कि सिर्फ आंकड़े एकत्र करने में लगे हैं . कहीं पर ग्रीनहॉउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है तो कहीं पर अन्य कारणों पर चर्चा की जा रही है . लेकिन अगर परिणाम देखते हैं तो सब कुछ होने के बाबजूद भी परिणाम शून्य नजर आ रहे हैं .

अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने तो कार्बनडाईऑक्साइड को कम करने के लिए कृत्रिम पेड लगाने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा है . लेकिन यह ज्यादा समझदारी होगी कि जितना श्रम और धन उन कृत्रिम पेड़ों को लगाने में लगेगा उसका आधा भी अगर हम प्राकृतकि पेड़ों को लगाने में खर्च करें तो वर्षों तक स्थितियां बेहतर बनायीं जा सकती हैं और दूसरी तरफ जितना श्रम और धन उन पेड़ों के रख रखाब पर खर्च होगा उतना ही ध्यान अगर अपनी मौजूदा प्राकृतिक सम्पदाओं पर देने की कोशिश करेंगे तो आने वाले समय में बेहतर प्रबंधन के साथ और आगे बढ़ते हुए काफी क्रांतिकारी परिवर्तन हासिल किये जा सकते हैं . क्योँकि प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करते वक़्त हमें बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हम अकेले ही नहीं हैं इस धरा पर, हमारे साथ - साथ इस धरती के प्रत्येक जीव को प्राकृतिक साधनों और सम्पदाओं की उतनी ही जरुरत है जितनी कि हमें है . वन्य प्राणियों का जीवन पेड पौधों पर आश्रित है , पेड पोधों का जीवन जल और वायु पर , इसी तरह से यह क्रम है और इस प्रकृति की प्रत्येक सता एक दूसरे से जुडी हुई है और सभी एक दूसरे पर आश्रित भी है . अगर कहीं पर कोई भी रिक्त स्थान आ जायेगा तो वह श्रृंखला टूट जायेगी और हम सदा - सदा के लिए के दूसरे से बिछुड़ जायेंगे , यानि मिट जायेंगे इसलिए समय रहते इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है . 

अब इस दिशा में कदम कौन उठाएगा यह विचारणीय है ? लेकिन मेरा मानना है कि इस दिशा में तो हमें सरकारों से किसी तरह की अपेक्षा करने की बजाए स्वयं कदम उठाने होंगे और इसके लिए अगर हम अपने गाँव या शहर या आसपास के लोगों को छोटे -छोटे समूहों में संगठित कर कार्य करेंगे तो शीघ्र ही उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और अगर हर जगह ऐसा करने में हम सफल हो जाएँ तो वह दिन दूर नहीं जब हम फिर इस धरती के वातावरण को जीने लायक बना सकते हैं . 

यह तो एक पहलू है प्रदूषण का मैंने जब प्राकृतिक प्रदूषण के पर विभिन्न पहलुओं पर विचार किया तो मेरे सामने बहुत विकट स्थितियां पैदा हुईं . हालाँकि जब भी मुझे इस विषय पर चर्चा करने का मौका मिलता है तो मैं बहत बैचैन होता हूँ . क्योँकि मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं इस प्राकृतिक प्रदूषण की जड़ यह भी है और वह है मानसिक प्रदूषण और यह इतना खतरनाक और प्रभावी है कि इससे बचना अब बहुत मुश्किल हो गया है . हमारे मनों में इतनी दीवारें हैं कि हम एक दूसरे के विषय में सकारात्मक सोच ही नहीं पाते . जाति , भाषा , मजहब , धर्म , क्षेत्र ना जाने कितने वर्ग हैं जिनके आधार पर एक छोटे से क्षेत्र के लोग बंटे होते हैं , हालाँकि उन सबका जीवन एक जैसा होता है एक जैसे साधनों का उपयोग वह करते हैं फिर भी एक दुसरे से इतनी नफरत कि जैसे सामने वाला इनसान इस धरती का है ही नहीं और इस मानसिक प्रदूषण के परिणाम प्राकृतिक प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं .

इस मानसिक प्रदूषण ने ऐसा वातावरण तैयार किया कि हम खुलकर बात करने की स्थिति में नहीं हैं . आये दिन ना जाने क्या - क्या घटित हो जाता है हमारे सामने और हम मूकदर्शक की भूमिका निभाते हुए आगे बढ़ रेहे हैं और अपना संवेदनाहीन जीवन जी रहे हैं . कुछ भौतिक साधनों का एकत्रण हमनें कर लिया है और उसे हम अपने जीवन की सफलता मानकर फूले नहीं समा रहे हैं . लेकिन वास्तविकता से कटकर जीना भी कोई जीना है ? कम से कम मेरी समझ में नहीं आता ! मानसिक प्रदूषण का प्रभाव हम पर इतना हावी है कि हम वास्तविकता को जाने बगैर आगे बढ़ रहे हैं . जो बातें किसी तरह का अस्तित्व नहीं रखती उन्हें मानकर उनका अनुसरण कर रहे हैं , जबकि प्रायः यह देखा जाता है कि ऐसी बातों का वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं होता , और जो लोग ऐसी बातें करते या उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं उनसे ही अगर पूछ लिया जाये तो वह भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते . तो फिर यही आभास होता है कि यह एक तरह का मानसिक प्रदूषण है जिसे हम अपना रहे हैं . हमनें कभी विविधता को स्वीकार नहीं किया और एकांगी और मानसिक रूप से प्रदूषित जीवन को हम जीते रहे और जीवन की इतिश्री इसी रूप में हो गयी और आने वाली पीढ़ी को भी वही प्रदूषित सोच हमनें सौंप दी . काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
अगले अंक में भी जारी.....! 

17 जून 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 1 ..

28 टिप्‍पणियां:
आजकल देश के हर भाग में भीषण गर्मी पड़ रही है . मौसम विज्ञान विभाग हर दिन तापमान बढ़ने  के आंकड़े जारी करता है , और साथ में यह भी चेतावनी देता है कि आने वाले दो दिनों में पारा उंचाई की तरफ जाने वाला है तो इंसान त्राहि - त्राहि करने लगता है . इंसान ही क्योँ धरती का हर जीव इस भीषण गर्मी की चपेट में खुद को असहज महसूस करता है . एक तरफ इंसान ने विकास के नाम पर जल , जंगल, जमीन और प्राकृतिक संपदाओं का अंधाधुंध दोहन किया और दूसरी तरफ उसे बचाने और संवारने के कोई प्रयास नहीं किये . विकास की इस अंधी दौड़, भौतिक साधनों और सुखों के मोह ने उसे इतना पंगू बना दिया कि अपनी चिर सहचरी प्रकृति के विषय में सोच ही नहीं पाया, उसने उसका दोहन तो आवशयकता से कई गुणा ज्यादा किया, लेकिन जब सरंक्षण और उसे सहेजने की बारी आई तो वह सिर्फ बातें ही करता रहा , योजनायें ही बनाता रहा, नियमों में ही उलझता रहा . आज जो हालात हमारे सामने हैं वह बहुत भयावाह दृश्य हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं और यह चेतावनी भी देते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी भी प्रकार से सुरक्षित नहीं है यह धरती ? एक तरफ तो प्रदूषण बढ़ रहा है और दूसरी तरफ इनसान - इनसान से इतना त्रस्त है कि उसने उसके अस्तित्व को मिटाने की ठान ली और सुरक्षा के नाम पर इतने हथियारों का आविष्कार किया कि आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी दिखाई देती है . इतना सब कुछ कैसे हुआ ? आखिर जिस दिशा की तरफ हम बढे क्या उसकी जरुरत और महता है ? क्या जो दिशा हमने तय की है हमें अब भी इस तरफ बढ़ना चाहिए या फिर पुनः प्रकृति के करीब रहकर प्राकृतिक जीवन जीना शुरू करना चाहिए ? ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है , और वैसे तो अब समय निकल गया है लेकिन फिर भी अगर मिलजुल कर प्रयास किये जाते हैं तो देर से ही सही हम इस वातावरण में कुछ तो तबदीली लाने में सफल हो सकते हैं . लेकिन यह किसी एक हाथ से होने वाला नहीं है इसके लिए तो बिना कोई देर किये हर एक इनसान को जुट जाने की आवश्यकता है . हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज जिन प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हम कर रहे हैं वह हमें हमारे पूर्वजों की देन है , अब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम भी आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक संपदा को सहेज कर रखें और जितना भी संभव हो सकता है इसे और बढाने का प्रयास करें . 

आज धरती के वातावरण को जब हम देखते हैं तो एक अजीब सा अहसास होता है . ऐसे लगता है कि हम प्रकृति से कोसों दूर चले गए हैं, हमारे जहन में प्रकृति के लिए कोई प्रेम नहीं रहा, अब हम भौतिक साधनों के इतने गुलाम बन गए हैं कि प्रकृति के करीब रहकर जीवन जीने की कल्पना ही नहीं कर सकते . बस यहीं से घुटन और टूटन शुरू होती है और आज जिस कगार पर हम खड़े हैं वह आने वाले समय में निश्चित रूप से मानवीय अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है . हमारे पूर्वजों ने जीवन जीने की जो पद्धति हमें सिखाई थी हम उसे तो भूल ही गए , अब हम वातानुकूलित वातावरण को तरजीह दे रहे हैं और यह भूल गए हैं कि इस वातानुकूलित वातावरण के लिए भी तो प्रकृति का साथ चाहिए , वर्ना हमारे सारे प्रयास निष्फल सिद्ध होंगे और हो भी रहे हैं . हमनें प्रकृति को भूलकर जब जीवन जीने की सोची तो इसने भी हमें भुलाना शुरू कर दिया और आये दिन प्रकृति के कोपों का भाजन हमें करना पड़ता है . कहीं पर भीषण गर्मी पड़ रही है तो , कहीं पर बाढ़ और तूफ़ान आ रहे हैं , कहीं पर लोग वर्षा के लिए तरस रहे हैं तो कहीं उसके रोकने के प्रयास किये जा रहे हैं . सब कुछ एकदम सोच, समझ और जरुरत के उलट घट रहा है . यह प्रकृति की चेतावनियाँ हमारे लिए हैं लेकिन हम हैं कि सब कुछ नजरअंदाज कर बस आगे बढ़ने की होड़ में लगे हैं और इसी होड़ के परिणाम आज धीरे - धीरे हमारे सामने आ रहे हैं . आने वाला कल कैसे होगा यह सोच जा सकता है , और अगर उस कल को बेहतर बनाना है तो आज से बिना देर किये ही गंभीर और लक्ष्य तक पहुंचाने वाले प्रयास किये जाने आवश्यक हैं . 

यहाँ जब हम इनसान की जीवन शैली को देखते हैं तो और भी कई बातें उभर कर सामने आती हैं जिन पर उसे पुनर्विचार करने की आवश्यकता है . अगर हम पर्यावरणीय प्रदूषण को ही विश्लेषित करने का प्रयास करें तो हमारे सामने कई चौकांने वाले तथ्य उभर कर सामने आते हैं . ऐसा नहीं है कि पर्यावरण पर कोई बहस नहीं होती , उसे बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किये जाते , इस दिशा में कोई बात नहीं करता या फिर किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता . जहां तक मैंने अध्ययन किया है तो ऐसा सब कुछ तो वर्षों से किया जाता रहा है . विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून हर वर्ष) भी मनाया जाता है , और धरती दिवस (22 अप्रैल हर वर्ष) भी . लेकिन फिर भी इन दोनों को सहेजने की कबायद कितनी आगे बढ़ पाई है यह सबके सामने है . क्योटो प्रोटोकोल और कानकुन एग्रीमेंट जैसे प्रयास भी सामने आये लेकिन कोई परिवर्तन होने की बजाए स्थितियां निरंतर बिगडती रहीं . करीब 20 साल पहले 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज बना था . तभी से ही जलवायु परिवर्तन के उपायों पर चर्चा होनी शुरू हुई थी . अगर हम गंभीरता से विचार करें तो यह तथ्य सामने आता है कि इन 20 सालों में जो कुछ हमें हासिल करना चाहिए था वह नहीं कर पाए . क्योँकि इस दिशा में जो भी कार्य हुआ वह सिर्फ नीतिगत स्तर पर ही हुआ जमीनी धरातल पर उसका क्रियान्वयन किया जाना बाकी है . इन सब घटनाओं और प्रयासों पर अगर विचार करें तो यहाँ भी एक तरह का प्रदूषण ही फैलाया जा रहा है . क्लाइमेट चेंज के नाम पर राजनीति हो रही है . जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी वैश्विक बैठकें बेमानी साबित होती जा रहीं हैं , क्योँकि इन बैठकों में जो चर्चा होती है वह समस्या पर नहीं बल्कि आमिर देशों के हितों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित होती है . कभी - कभी तो ऐसा महसूस होता है कि यह वैश्विक फोरम गरीब बनाम अमीर देशों की लड़ाई का मोर्चा बनता जा रहा है . लेकिन इस लड़ाई का नुक्सान तो दोनों तरह के देशों को भुगतना पड़ेगा और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम देशों में कमोबेश ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहीं हैं . लेकिन ऐसी स्थितियों के लिए प्रकृति कम और मनुष्य ज्यादा जिम्मेवार है .
कुछ बिंदु अगले अंक में ....!