आज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो लोगों पर विज्ञापन बहुत हावी हो गया है . कुछ लोगों के लिए यह व्यक्तिगत प्रचार का साधन है तो कुछ के लिए यह अपनी वस्तुओं को आम लोगों तक पहुँचाने का . यहाँ तक तो ठीक है , लेकिन जब जीवन सन्दर्भों को विज्ञापन के माध्यम से भुनाने की कोशिश की जाती है तो यह बहुत अटपटा लगता है और लोगों को देखिये जो ऐसी चीजों/ बातों / विचारों को प्रश्रय देते हैं और बाकी के लोगों के लिए भी ऐसा ही मार्ग प्रशस्त करते हैं , और यहाँ लोग भी ऐसे हैं जो बिना जांचे परखे किसी के मत/बात पर विश्वास कर लेते हैं , और फिर सब कुछ खोने के बाद खुद को ही कोसते हैं . लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है . आज के दौर में अध्यात्म की जहाँ तक बात है यह भी विज्ञापन से अछुता नहीं . आज विभिन्न तरह के ताबीज , यंत्र और ना जाने क्या -क्या विज्ञापन के माध्यम से हमें देखने को मिलता है . एक तरफ तो यह चीजें और दूसरी तरफ छदम गुरुओं की चर्चा , धर्म और अध्यात्म पर उनके विचार और उपदेश और उन उपदेशों को सुनकर झूमते भक्त सब सपने की तरह गुजरता है आँखों के सामने से और मैं सोचता हूँ अपने उज्ज्वल अतीत, अंधकारमय भविष्य को ?
ऐसे में कई प्रश्न मेरे सामने यकायक खड़े हो जाते हैं , मैं भी किसी गुरु का नाम लेता हूँ और कहता हूँ " बाबा मुझे निर्मल कर दो , और वहां से कोई उत्तर नहीं आता सिवा इसके कि अभी कृपा प्राप्त होने में वक़्त लगेगा या फिर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए मुझे उनसे व्यापार करना होगा . मुझे उनके द्वारा बताई गयी धनराशि किसी माध्यम से उन तक पहुंचानी होगी और तब जाकर कहीं कृपा प्राप्त होगी . यह तो बात हुई पैसा फैंको तमाशा देखो , मैं भी किसी स्थिति से निकलना चाहता हूँ इसलिए मुझे उस धनराशि को उनके श्रीचरणों में समर्पित करने से कोई गुरेज नहीं , और बाबा हैं कि उस धनराशि से उनको कोई ख़ास संतुष्टि नहीं उनकी लालसा और बढ़ रही है और मेरा जीवन बेहाल होता है जा रहा है , एक बार फंस चूका हूँ और बार - बार वही प्रक्रिया दोहराई जा रही है , बाबा की कृपा को प्राप्त करने के लिए यही कुछ करना पड़ रहा है और मेरी चिंता कम होने की बजाय बढ़ रही है ओर मैं ऐसी स्थिति में किसी से कुछ कहने की हालत में नहीं हूँ, अब क्या करूँ ? ? ऐसी हालत मैंने कि लोगों की देखी है , और निर्मल बाबा प्रकरण में ऐसे कई लोग सामने आये . निश्चित रूप से ऐसे कई उदहारण हमारे सामने हैं जिसमें व्यक्ति को इन छदम गुरुओं द्वारा लूटा जाता रहा है और हम हैं कि कृपा, आशीर्वाद आदि के नाम पर सब लुटाये जाते रहे हैं . हद तो तब होती है जब शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग भी इनके चुंगल में फंस जाता है .
विज्ञापन के इस दौर में मैंने एक बात बहुत करीब से महसूस की है , वह यह कि इस दौड़ में वह सब शामिल हैं जो खुद को भुनाना चाहते हैं . इनका एक नया तरीका है , यह सब अपना विज्ञापन करते वक़्त किसी व्यक्ति का मत जरुर शामिल करते हैं जिसमें इनके द्वारा उस व्यक्ति को पहुंचे लाभ की चर्चा होती है . बस फिर क्या है धीरे - धीरे इनका बाजार जमना शुरू हो जाता है , फिर एक समय ऐसा आता है जब यह अपना अर्थशास्त्र खुद तय करते हैं . मांग अधिक और आपूर्ति कम ऐसी हालत में एक तरफ लोगों की भीड़ है और कोई ऐसा नहीं जिसकी मनोकामना इनके दर पर जाकर पूरी न हुई हो . समाज का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति भी इनकी शरण में है और इनकी कृपा प्राप्त करके सबके चेहरे पर आलौकिक उर्जा का संचार हो रहा है . बस यही से खेल शुरू होता है , जो पकड़ा गया वह चोर है और जो नहीं पकड़ा गया वह अपना धंधा अनवरत चलाये रखता है . जब सब तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त है तो फिर हर जगह यही होना है और निश्चित रूप से हो भी रहा है . निर्मल बाबा हमारे सामने एक उदहारण मात्र हैं , और उनका यह सच भी सामने नहीं आता अगर वह कुछ चैनलों के साथ अपना करार कर लेते . लेकिन विडंबना यह है कि बाबा पर तो कार्यवाही हुई लेकिन उन चैनलों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई जिन्होंने बाबा के विज्ञापन को दिखाया या फिर उनके शो आयोजित किये . मुझे लगता है कि इस दिशा में भी सोचा जाना चाहिए , अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से जनता का भला होगा .
निर्मल बाबा प्रकरण से पहले भी ऐसे कई प्रकरण हो चुके हैं , लेकिन फिर भी हम हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं , आज जितनी भी समस्याएं हमारे सामने हैं उनमें आम जनता की भागीदारी भी कम नहीं है . लेकिन हर बार हम उसी को निशाना बनाते हैं जो इस जाल में फंस जाता है , और हमारा मीडिया तो ऐसा है जब कोई किसी एक के पक्ष में बोलता है तो सभी वही राग अलापते हैं और अगर विपक्ष में बोलता है तो तब भी यही हाल होता है . मैं कई वर्षों से देख रहा हूँ कि हमारे देश में खोजी और विश्लेष्णात्मक पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गयी है . सिर्फ सूचनात्मक पत्रकारिता ने हमारे देश और समाज को भीतर से खोखला कर दिया है . ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का हर स्तम्भ ढहता जा रहा है . हम किस पर विश्वास करें , कैसा विश्वास करें . अजीब सी स्थिति है एक तरफ हम विकास और सूचना तकनीक की बात करते हैं वहीँ दूसरी और हम अंधविश्वासों में फंसते जा रहे हैं . व्यक्तिवादी राजनीति और देश में पूंजीपतियों की बढती साख ने आज देश को गुलामी के कगार पर ला दिया है . ऐसी स्थिति में हर किसी का यही कहना है " बाबा मुझे निर्मल कर दो " अब जब बाबा ही नार्मल नहीं हैं तो फिर किस तरफ देखें . हमारा देश विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं का देश है , और यही समन्वय का भाव हमें पूरे विश्व को एक घर मानने की समझ देता है . लेकिन जब इस दिशा से हम भटक जाएँ तो क्या आशा की जा सकती है ?


