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16 मार्च 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...4

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4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुसार उसका धर्म भी निर्धारित कर दिया जाता है. हालाँकि इसका एक पहलू यह भी है कि जो जिस देश में पैदा होता है, उसके द्वारा उसी देश में प्रचलित धर्म का पालन करना पहली प्राथमिकता होता है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. क्योँकि हमारी मान्यता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि धर्म के पालन के बिना जीवन का कोई मकसद पूरा नहीं हो सकता. इसलिए धर्म को जीवन का आधार सा मान लिया गया है. लेकिन धर्म की अनुपालना के विषय में ज्यादातर अनुभव यही बताते हैं कि इसने किसी एक समाज और धर्म के लोगों को जोड़ने का काम बेशक किया है, लेकिन किसी दूसरे को अपने से अलग मानने का भाव भी अधिकतर धर्म के कारण ही पैदा हुआ है. मेरा धर्म श्रेष्ठ है, और किसी दूसरे का नहीं. इस भाव ने दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा की हैं. हमारी किसी दूसरे व्यक्ति से नफरत के कारणों पर विचार करें तो उसमें धर्म और जाति की भूमिका सबसे बड़ी है. हालाँकि देशों की सीमाओं के आधार पर भी व्यक्ति से व्यक्ति का भेद पैदा हुआ है, लेकीन यह भेद उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धर्म और जाति का भेद खतरनाक है. देशों का भेद किसी दूसरे देश के लोगों से हो सकता है. लेकिन जाति और धर्म का भेद किसी एक देश में बसने वाले लोगों में भी द्वंद्व का कारण बन सकता है, और इतिहास गवाह है कि इसी भेद के कारण दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा हुई हैं.
हालाँकि देखने में यह आया है कि जाति की सीमा किसी हद तक सीमित है, लेकिन धर्म की सीमा व्यापक है. एक ही समाज-क्षेत्र और देश में कई जातियां हो सकती हैं, लेकिन उसी समाज और क्षेत्र में उन सभी जातियों का एक ही धर्म हो सकता है. इससे यह सिद्ध होता है कि जाति और धर्म का गहरा सम्बन्ध है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जाति धर्म की रक्षा करती है तो, धर्म जाति को संरक्षण प्रदान करता है. अगर हम भारत के विषय में ही बात करें तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ चार मुख्य धर्म प्रचलन में हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और सिक्ख. लेकिन मुझे लगता है कि सिक्ख धर्म को धर्म कहने के बजाय अध्यात्म के प्रचार की संस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. हालाँकि सिक्खों की भी अपनी एक जीवन पद्धति है. लेकिन सामाजिक समरसता के जो तत्व सिक्खों में देखने को मिलते हैं वह बाकी के तीन धर्मों में कम ही देखने को मिलते हैं. फिर भी अगर कोई सिक्ख धर्म मानता है तो वह उसकी अपनी सोच है. मैं धर्म के विषय पर दूसरे तरीके से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ.
हमारे देश में वैसे तो बौद्ध और जैन विचारधाराओं को भी धर्म की श्रेणी में रखा जाता है. लेकिन इनमें धर्म के तत्व मौजूद होते हुए भी इन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता. फिर भी बात जो भी हो इन्हें विचारधारा कह लीजिये यह धर्म, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें समझना यह है कि एक ही धर्म को मामने वाले अगर समान हैं तो फिर जाति का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए था, लेकिन यहाँ होता यह है कि एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में भी कई जातियां विद्यमान रहती है. इससे यह जाहिर होता है कि इनसान किसी एक स्तर पर बंटा हुआ नहीं है, बल्कि कुछ धर्मभीरु लोगों ने उसे अनेक स्तरों पर बांटने की कोशिश की है. इसलिए हम किसी भी धर्म को मानें, पहले तो हमें उसकी खूबियों और खामियों के विषय में अवगत होना चाहिए और दूसरी बात यह है कि हम धर्म और जाति के आधार पर इनसान को न बाँटें तो बेहतर होगा. किसी की आस्था, मान्यता से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे नफरत का अधिकार हमें किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं है. बदलते दौर में युवाओं की यह जिम्मेवारी है कि वह धर्म और जाति के बन्धन से ऊपर उठकर इनसान को इनसान के नजरिये से देखने का प्रयास करे, ऐसा करने से उन्हें खुद भी एक बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा और वह दूसरों के लिए भी एक बेहतर मिसाल के रूप में दुनिया के सामने होंगे. उन्हें धर्मों के इस अस्तित्व को सकारात्मक रूप में लेने की आवश्यकता है.
5. परम्पराओं और संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को समझें: परम्पराएँ और संस्कृति किसी भी देश-समाज और व्यक्ति की पहचान है. परम्पराएँ और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं. हम देखते हैं कि हमारे समाज में अनेक परम्पराएं मौजूद हैं, जो समाज के स्वरुप को निर्धारित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं. एक तरह से अनेक परम्पराएं मिलकर के संस्कृति का निर्माण करती हैं. संस्कृति किसी भी देश की पहचान को निर्धारित करती है, इसलिए अक्सर यह कहा जाता है कि इस देश की संस्कृति ऐसी है, उस देश की संस्कृति ऐसी है. संस्कृति के आधार पर ही हम किसी देश के जन-जीवन और मानवीय मूल्यों के विषय में जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. इसलिए हमारे लिए यह जरुरी है कि हम अपने देश और समाज की परम्पराओं और संस्कृति के विषय में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें. परम्पराओं के पीछे जो मान्यताएं प्रचलन में हैं उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें. इससे एक तो हमारी जानकारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ हमें जो सही लगेगा हम उसे बड़े उत्साह से अपनाएंगे और जो कुछ सही नहीं है उसमें सुधार करने का प्रयास करेंगे.
यह सब युवाओं पर निर्भर करता है कि वह अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह से समझते हैं और किस तरह से उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं. आजकल जो दौर चल रहा है इसमें परम्पराओं और संस्कृति की बात करना बेमानी सा हो गया है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इसका खामियाजा हमें भुगतना भी पड़ रहा है. जो परम्पराएं और संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़कर रखती थी, उनके न मानने से समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई हैं, मनुष्य-मनुष्य का वैरी हो गया है, समाज में व्यक्ति केन्द्रित जीवन को तरजीह दी जाने लगी है. जिससे हम एकाकी जीवन की और बढ़ रहे हैं. एकाकी जीवन में अवसाद और घुटन के कारण आत्महत्या और किसी की जान लेने की प्रवृतियां बढ़ रही हैं. इससे हर जगह भय का माहौल बना हुआ है. युवाओं के लिए यह जरुरी है कि वह अपने आसपास के समाज में सक्रिय रूप से भागीदार बने. लोगों के दुःख-दर्द में काम आने का साधन बने, एक सहयोग और प्रेम वाली संस्कृति को जन्म देने की कोशिश करें. इसे एक परम्परा के रूप में ही विकसित करें, ताकि समाज एक सुंदर रूप ले सके और सभी का जीवन खुशहाली से बीत सके. शेष अगले अंक में...!!!  

08 मार्च 2016

एक ऐसा विश्व जहाँ सिर्फ इनसान रहते हों

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पहचानों के दायरे में सिमटता इनसान संभवतः अपनी वास्तविक पहचान को भूल गया है. ऐसा कौन सा समय रहा होगा जब मनुष्य ने खुद को मनुष्य के रूप में समझा होगा. इतिहास का गहन अध्ययन करने के पश्चात इस बात के संकेत कम ही मिलते हैं कि इनसान ने इस धरती पर जन्म लेने के बाद खुद को इनसान के रूप में प्रस्तुत किया हो. वह अधिकतर पहचानों के दायरे में खुद को बांधता हुआ प्रतीत होता है. उसकी शंकाएं और संभावनाएं अधिकतर निर्मूल हैं, लेकिन फिर भी वह खुद की एक पहचान बताते और बनाते हुए आगे बढ़ रहा है, और उसका लक्ष्य उस पहचान को कायम रखते हुए ‘व्यक्तिगत’ रूप से एक ‘नयी’ पहचान कायम करने का रहा है. ऐसे में हम देखते हैं कि इनसान के रूप में जन्म लेने वाला प्राणी कभी इनसान की तरह व्यवहार नहीं कर पाया है. वह अधिकतर खुद को “दूसरों से श्रेष्ठ” साबित करने की होड़ में आगे बढ़ रहा है. इस तथाकथित श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए इनसान ने कई ऐसे कदम उठाये हैं, जिनके बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय बैचैनी से काँप उठता है,  दिमाग सोचने पर मजबूर हो जाता है, कि इस धरती पर ऐसा भी कोई कालखंड रहा होगा जब इनसान ने सबसे ज्यादा नुकसान इनसान का ही किया. हमें इनसान के द्वारा इनसान के बजूद तक को मिटाने के लिए किये गए प्रयासों के भरपूर चिन्ह देखने को मिलते हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों का जिक्र कम ही मिलता है, जब इनसान ने मानवता की रक्षा और इंसानियत के लिए अपने सर्वस्व को अर्पित किया हो. अगर ऐसे चिन्ह कहीं मिलते भी हैं तो उनकी संख्या बहुत ही कम है. मनुष्य द्वारा अपनी एक विशेष पहचान को कायम करने के लिए किये गए प्रयासों और उनके परिणामों पर अगर हम गौर करें तो बहुत से ऐसे पहलू हमारे सामने आते हैं जो सर्वथा निर्मूल हैं, एक भ्रान्ति के सिवा कुछ भी नहीं.

मनुष्य द्वारा खुद की एक नयी पहचान को कायम करने के लिए बनाये गए दायरों को अगर हम देखें तो हमें आसानी से समझ आता है कि यह प्रयास कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि मेरी कमीज दूसरे की कमीज से ज्यादा सफ़ेद है, हालाँकि मुझे यह भी पता है कि दूसरे की कमीज भी सफ़ेद ही है, लेकिन मेरा प्रयास खुद की कमीज को ज्यादा सफ़ेद सिद्ध करने का है. मनुष्य की श्रेष्ठता की सारी कहानी सिर्फ कमीज के सफ़ेद होने और ज्यादा सफ़ेद होने की ही कहानी जैसी लगती है, लेकिन इस यथार्थ को कोई समझना नहीं चाहता, अगर कोई इसे समझने का प्रयास करेगा तो उसे भी उसी वर्ग के लोगों द्वारा बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, उसके जीवन को दूभर किया जाएगा, यहाँ तक कि उसके मानवीय अधिकार भी छीन लिए जायेंगे. इसलिए अधिकतर मनुष्य अपनी संसारिक पहचान को बनाये रखने के प्रयास करता है, और ऐसा ही प्रयास मनुष्य का रहा है कि वह अपनी पहचान के लिए हमेशा सजग रहे. उसे जो पहचान उसके देश, धर्म, समाज, भाषा, जाति, वर्ग, वर्ण आदि द्वारा प्रदान की गयी है, वह हर हाल में उस पहचान की रक्षा करे, किसी भी स्थिति में उस पहचान से सम्बन्धित नियमों का उलंघन नहीं होना चाहिए. अगर किसी के द्वारा भूल से भी इन तथाकथित नियमों और सीमाओं का उलंघन होता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान ऐसा किया गया है कि सोचकर ही दिल दहल जाता है.

आज हम जिस विश्व में जी रहे हैं वहां कई तरह की चीजें एक साथ घटित हो रही हैं. ऐसा नहीं है कि इससे
पहले यह सब कुछ न हुआ हो, यह सब कुछ पहले से ही होता आ रहा है, और संभवतः किसी भी घटना के पीछे इतिहास को जोड़ दिया जाता है. पहचानों के दायरे में बंधे इनसान के सामने आज कई तरह की चुनौतियां हैं, एक तरफ वह इन चुनौतियों से लड़ना चाहता है, वहीं दूसरी और वह अपनी तथाकथित पहचान को बनाये रखना चाहता है. उसकी यात्रा दो नावों में एक साथ सफ़र करने की है, वह परम्परा और आधुनिकता को साथ लेकर बढ़ना चाहता है, लेकिन इसी द्वंद्व में वह सब कुछ खो भी देता है, क्योँकि परम्परा के स्थान पर आधुनिकता आई है, उसके पास एक ही विकल्प है, या तो वह परम्परा को साथ लेकर जीवन जिए या फिर आधुनिकता को साथ लेकर. दोनों जीवन दर्शनों को साथ लेकर जीवन जीना एक सामान्य मनुष्य के लिए बहुत चुनौती भरा है. परम्परा और आधुनिकता की जहाँ तक बात है उसमें भी पहली जरुरत मनुष्य को अपनी सोच को बदलने की है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि आज का परम्परावादी इनसान पाषाणकालीन तकनीक के साथ जी रहा है, वह तकनीकी और भौतिक स्तर पर आज के दौर के साथ जी रहा है या ऐसा भी कह सकते हैं कि वह भौतिक रूप से समय के साथ जी रहा है, लेकिन जहाँ तक सोच का सवाल है, उस पर कई प्रश्न किये जा सकते हैं. जो पहचान उसे प्रकृति की विविधता के कारण मिली थी, उस पहचान को कहीं खोकर वह कृत्रिम पहचान को बनाये रखने के लिए कृतसंकल्प है.

इनसान की कृत्रिम पहचान ने उसे इनसान से जुदा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. कई बार मुझे ऐसा आभास होता है कि यह सब, कुछ लोगों द्वारा इनसान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किया गया है. हम देखते हैं कि एक इनसान के जन्म के साथ ही उसकी जाति, धर्म आदि निर्धारित हो जाता है और पूरा जीवन उस इनसान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसका पालन करेगा. उसी दायरे में वह बंध कर रहेगा. एक हद तक यह ठीक भी लगता है, लेकिन दूसरी और हम देखते हैं कि जाति और धर्म के नाम पर आज तक दुनिया के इतिहास में कई हृदय विदारक घटनाएँ घटी हैं. मनुष्य की पहली पहचान जाति हो गयी है, उसी के हिसाब से उसका धर्म निर्धारित हुआ है. यह बड़ा अजीब सा है पहलू है. धर्म का जहाँ तक लक्ष्य है वह मनुष्य के आचरण से सम्बन्धित है. काफी हद तक धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत मामला लगता है, लेकिन धर्म के मामले में ऐसा होता कहाँ है? आज मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई जाति और धर्म से है. एक ही धरा पर रहने वाले इनसान, एक ही तरह से जीवन यापन करने वाले लोग धर्म के नाम पर कैसे एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं यह हमें आये दिन देखने को मिलता रहता है. कुछ तथाकथित लोग धर्म को एक खौफ की तरह प्रचारित करते हैं और जाति उनके लिए मनुष्य की भावनाओं से खेलने का एक महत्वपूर्ण अस्त्र है. शेष अगले अंकों में......

27 दिसंबर 2013

न काशी न काबा, बस बाबा ही बाबा ... 4

4 टिप्‍पणियां:
आजकल जितने भी ऐसे छुटभये तैयार हुए हैं उनके कई तरह के नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज और देश पर पड़ रहे हैं और जिस धर्म की आड़ में वह यह सब कुछ कर रहे हैं वह वास्तव में धर्म को स्थापित करने जैसा नहीं है, बल्कि भोले-भाले लोगों को अधर्म की तरफ ले जाने वाला मार्ग है. गतांक से आगे ......

हम किसी से सहज शब्दों में पूछे कि धर्म क्या है ? तो संभवतः हमें संतुष्ट करने वाला उत्तर नहीं मिल पायेगा.
कोई कहेगा जिसमें यह सब निशानियाँ होंगी वह धर्म है, कोई कहेगा ऐसे मतों से भरा हुआ जो है वह धर्म है. धर्म के सन्दर्भ में हर किसी के अपने विचार हैं, लेकिन वह विचार स्पष्ट नहीं है. कोई कहता है हिन्दू, इस्लाम, इसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि धर्म हैं. लेकिन जब विचार करते हैं तो पाते हैं कि जितने भी नाम लिए जा रहे हैं वह वास्तविकता में धर्म नहीं हैं . हम जो नाम ले रहे हैं हमें इन नामों और इनके इतिहास पर चिंतन करने की जरुरत है, क्योँकि जब इनका उद्भव हुआ था तब यह सब नाम अध्यात्म के नाम से जाने जाते थे. सिक्खजिसे हम धर्म का नाम दे रहे हैं उस पर ही हम विचार करें तो पायेंगे कि जो इस शब्द का वास्तविक अर्थ था वह कहीं खो गया है और एक औपचारिक अर्थ हमारे सामने रह गया. कालान्तर में इसी से कई और विचारधारों का जन्म हुआ और आज हर कोई अपनी दुकान चला रहा है . ऐसी स्थिति विश्व के बाकी विचारों के साथ भी है और आज भी यही हो रहा है.

आज की स्थिति बहुत गंभीर है, धर्म और अध्यात्म बाजार भाव के आधार पर चल रहे हैं, उनके माध्यम से राजनीति की जा रही है, खरीद और फरोख्त के कामों को अंजाम दिया जा रहा है, भोले-भाले लोगों को ईश्वर के नाम का डर दिखाकर उनका सब कुछ लूटा जा रहा है, और ऐसी स्थिति में धर्म का प्रचार करने वालों की फौज खड़ी हो गयी है. हर कोई अपनी दुकान चला रहा है और हर कोई ग्राहक बनाने के चक्कर में जगह-जगह नुमाइश लगा रहा है. ऐसे में कहाँ हम धर्म की स्थापना कर पायेंगे और कहाँ हम एक अंधकार में भटक रहे मनुष्य को सही राह दिखा पायेंगे, यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है? ओ माय गॉड फिल्म में एक संवाद है जहाँ धर्म है वहां सत्य नहीं, और जहाँ सत्य है वहां धर्म की जरुरत नहीं”. यह संवाद सत्य और धर्म के बारे में सारा निचोड़ हमारे सामने रखता है. जहाँ सत्य है ...और सत्य सिर्फ ईश्वर को कहा गया है, बाकी जिसे हम सत्य कहते हैं उसके पैमाने तो अलग-अलग जगह पर बदलते रहते हैं, लेकिन ईश्वर एक ऐसा सत्य है जिसका पैमाना कहीं नहीं बदलता, जो आज है वह कल भी होगा और हजारों वर्षों बाद भी वैसा ही रहेगा. 

अगर हम इस सच को समझ जाते हैं तो फिर हमें कुछ करने की जरुरत ही कहाँ रह जाती है, और ऐसा नहीं है कि हमारे सामने इस बात के प्रमाण नहीं हैं हमारे सामने ऐसे अनेक प्रमाण हैं, हमारे रब्बी पुरुषों की वाणियां इस बात की गवाही हमारे सामने हमेशा देती रहती हैं, और दे रही हैं , लेकिन हम हैं कि किसी जाल में हमेशा फंस जाते हैं और इस कारण में ऐसे अवसरवादी लोगों के स्वार्थ का शिकार बन जाते हैं, जिन्हें हम बड़े अदब से बाबा कहते हैं, जिन्हें हम गुरु के सामान समझते हैं. लेकिन वास्तविकता में न तो वह गुरु हैं और न ही वह ऐसी कोई योग्यता रखते हैं. तो फिर हम क्योँ ऐसे लोगों की शरण में हैं, जिनका न तो धर्म से कोई सम्बन्ध हैं और न ही जिन्हें अध्यात्म की कोई समझ है, न ही जिन्हें इस मार्ग का कोई अनुभव है. जितने भी आज टेलीविजन पर प्रवचन करने आते हैं उनमें से तो आधे से ज्यादा सिर्फ भाषण वाजी के अलावा और कुछ नहीं करते, उनके पास उसके अलावा कुछ है भी नहीं, सिर्फ राम और कृष्ण के अलावा उन्हें कुछ आता भी नहीं और इनके बारे में भी जो जानकारी इन प्रवचन कर्ताओं के पास है वह भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं. फिर ऐसे में एक प्रश्न सहज ही उठता है कि हम जा कहाँ रहे हैं और हमारी मंजिल कहाँ है ???? यह सब तो हम सभी को विचार करना होगा न.....!!!! 

27 अक्टूबर 2013

न काशी न काबा, बस बाबा ही बाबा ... 3

8 टिप्‍पणियां:
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पडा है, खासकर मध्यकाल के बाद का इतिहास जब इस देश की शासन व्यवस्था का जिम्मा विदेशी शासकों ने अपने हाथ में ले लिया था और अपने मकसद को पूरा करने के लिए वह तरह-तरह हथकंडे अपनाते थे और यह परम्परा आज तक भी जारी है. गतांक से आगे 

भारत जैसे देश में आज जो कुछ हो रहा है वह बहुत ही खेदजनक है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि इससे पहले यहाँ
ऐसा कुछ ऐसा था ही नहीं, कुछ लोग इतिहास के नाम पर भ्रम फैलाते हैं कि भारत एक समृद्धशाली, वैभवशाली देश नहीं रहा है. भारत का अतीत बहुत स्वर्णिम रहा है. लेकिन उसके पक्षों पर कभी विचार नहीं करते कि हम किस पक्ष से समृद्ध और सम्पूर्ण रहे हैं. जहाँ तक भारत के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि यहाँ युद्ध होते रहे हैं. असुरी शक्तियों से देवताओं का लड़ना होता रहा है और उनकी जीत भी होती रही है. ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जहाँ पर हमारे ऋषियों ने अपने प्राणों को दाव पर लगाकर मानवता के हित को साधने के लिए कार्य किया है. आज हम जिस उच्च संस्कृति और सभ्यता की बात करते हैं वह हमारे चिरंतन साधना और सकारात्मक सोच का परिणाम है, आज जो भी हम अपने इतिहास पर गर्व कर पाते हैं वह उस काल के प्रतापी लोगों का ही फल है. 

हालाँकि यह बात भी सच है कि भविष्य का निर्माण वर्तमान की नींव पर टिका होता है और वर्तमान ही भविष्य को तय करता है. आज जो वर्तमान है कल वह अतीत बन जाएगा, लेकिन भविष्य के लिए आधार आज ही तैयार करता है. हम देखते हैं कि एक पल में लिए गए निर्णय जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, और इन निर्णयों का प्रभाव उतना ही सामने वाले के जीवन पर भी पड़ता है. आपका जीवन जितना सार्वजनिक होगा उतना ही प्रभाव आपके साथ जुड़े लोगों पर आपके निर्णयों का पडेगा. हम इतिहास से कितना सीखे हैं. दुर्योधन के एक हठ ने महाभारत रचा दिया और संस्कृति का नाश हो गया, जो कुछ भी तत्कालीन राजाओं ने अर्जित किया था वह बिना बजह के समाप्त हो गया, रावण के एक निर्णय ने उसकी सभी खूबियों को मटियामेट कर दिया और भी ऐसे कई उदाहरण आज हमारे सामने हैं, लेकिन हम हैं कि आज भी कुछ सीख नहीं ले पाए हैं और ना ही हम कुछ सकारात्मक करने की पहल कर पाए हैं . 

आज के दौर में जो कुछ भी हमारे सामने हो रहा है उसके कुछ पहलू ऐसे हैं जो हमें आगाह करते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस धरा पर मानवीय पहलू मात्र पुस्तकों में ही पढने को मिलेंगे, व्यावहारिक जीवन से उनका कोई सरोकार नहीं होगा और जो त्राहि-त्राहि आज हमारे सामने हो रही है वह इतनी बढ़ जायेगी कि मानव-मानव के लिए ही नाश का कारण बनेगा. हालाँकि यह सब आज भी घटित हो रहा है, लेकिन अभी कुछ सीमा तक, हाँ यह बात अलग है कि आज ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो चुका है जहाँ मनुष्य हमेशा तनाव में जीता है और उसके जीवन का हर पल संघर्षमय है. इतना कुछ होने के बाबजूद भी वह संतुष्ट नहीं है वह सदा दूसरों से आगे बढ़ने की होड़ में सब कुछ भूल गया है. लेकिन यह बात भी सच है कि जिसे वह उन्नति-प्रगति आदि कह रहा है वह उसका पतन भी है, जिस मार्ग पर आज का इंसान दौड़ रहा है उसका अंत सिर्फ और सिर्फ विनाश ही है. वह इंसान से खुद को बचाने के लिए बहुत जहरीले हथियारों का निर्माण निरंतर कर रहा है और आज हर जगह ऐसे प्रयोगों और अविष्कारों की होड़ लगी हुई है कि कहना ही क्या. एक तरफ तो ऐसे हालत हैं वहीँ दूसरी और पूंजी के दम पर सब कुछ खरीदा और बेचा जा रहा है आज मानवीय पहलूओं का कहीं कोई प्रचार नहीं है और न ही उस तरफ किसी का ध्यान जाता है, हाँ कुछ पाखण्ड जरुर इस पहलू पर किया जाता है, लेकिन सिर्फ बातों में ही. जो लोग ऐसे उपदेश देते हैं उनका अपना जीवन भी उस बात पर अमल नहीं करता, लेकिन सभी ऐसे भी तो नहीं हैं पर जो सही मायने में मानवीय पहलूओं के पक्षधर हैं उनका कोई नामलेवा नहीं है, ना आज है, ना कल था और भविष्य में भी ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती. 

इतिहास इस बात का गवाह है जिसने भी इस धरा पर नेकी से मानवीय पहलूओं को स्थापित करने की कोशिश की, उसे हमने ही नहीं बख्शा. किसी को तत्ते तवे पर चढ़ा दिया तो किसी को दीवारों में चिनवा दिया. किसी को गोली मार दी तो किसी को ढेरों यातनाएं दी. फिर भी वह मानवता के पुजारी दुनिया को समझाते रहे और अपने कर्तव्य पथ पर अंतिम सांस तक आगे बढ़ते रहे, दुनिया ने जो कुछ भी उनके साथ किया वह फिर भी दुनिया को माफ़ ही करते रहे और आज भी ऐसे कई संत इस धरा पर हैं जो मानवता की स्थापना के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और दूसरी तरफ धर्म के नाम पर जो पाखण्ड रचे जा रहे हैं वह किसी से छुपे नहीं है, आये दिन दुनिया में कोई न कोई परमात्मा पैदा हो जाता है और भक्तों का तो कहना ही क्या? ऐसा लगता है कि वह अपने इस पाखंडी परमात्मा के जन्म के लिए वर्षों से इन्तजार कर रहे हों और उसके दीदार के लिए राह में पलकें बिछाए बैठे हों, और वह पाखंडी परमात्मा जनता को ऐसे गुमराह करता है जैसे वह ही इस सृष्टि का कर्ता-धर्ता हो. आजकल जितने भी ऐसे छुटभये तैयार हुए हैं उनके कई तरह के नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज और देश पर पड़ रहे हैं और जिस धर्म की आड़ में वह यह सब कुछ कर रहे हैं वह वास्तव में धर्म को स्थापित करने जैसा नहीं है, बल्कि भोले-भाले लोगों को अधर्म की तरफ ले जाने वाला मार्ग है ....!!!          

09 जुलाई 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 3 ..

17 टिप्‍पणियां:
काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
गतांक से आगे .....!

आज के परिप्रेक्ष्यों पर विचार किया जाये तो बहुत गंभीर सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं . कोई ऐसा चिराग सच में नहीं जो आम व्यक्ति का आदर्श हो , जिसका अनुसरण किया जाये , हम जिसके विचारों पर मंथन कर सकें , सब और शोर ही शोर है . ऐसे हालात में आम व्यक्ति क्या करे उसके सामने बड़े अँधेरे रास्ते हैं और उनकी मंजिलें कहाँ तक जाती हैं यह उसे मालूम नहीं . मानसिक प्रदूषण के साथ - साथ यहाँ वैचारिक प्रदूषण बहुत तेजी से फ़ैल रहा है और उसे फ़ैलाने के लिए लोग तरह - तरह के साधनों का प्रयोग करते हैं . इस वैचारिक प्रदूषण के कई आयाम हैं और यह सबसे खतरनाक साबित हो रहा है . लोग गुटों में बंट रहे हैं , हर तरफ अस्थिरता का माहौल है और इन दूषित विचारों के कारण दिन प्रतिदिन हमारे देश और समाज की तस्वीर बदल रही है और इसके भयंकर परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं . व्यवस्था चाहे कोई भी हो सब जगह विचारों की टकराहट है. किसी हद तक तो यह होनी भी चाहिए लेकिन जब यही विचार टकराकर आग का रूप ले लेते हैं , जानमाल का नुक्सान करते हैं , आदमी का शोषण करते हैं , उसे मानसिक क्षति पहुंचाते हैं तो फिर ऐसे विचारों का क्या किया जाए ??? यह सबसे बड़ा सवाल है हम सबके सामने और इसका उत्तर भी हम सभी को खोजना है , लेकिन इस दिशा में बढ़ने की बजाय हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं और अगर यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपना अस्तिव खो देंगे . 

आज हर स्तर पर वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . हम अपनी राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को देख लें सब जगह वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . यहाँ जितनी भी व्यवस्थाएं हैं यह सब हमारे उत्तम विचारों की व्यवस्थाएं हैं . लेकिन आप किसी भी व्यवस्था का गहराई से आकलन करें तो वह अपने लक्ष्यों की तरफ हमें नहीं बढाती हुई लगती है . राजनीति की अगर हम बात करें तो इसका तो सबसे बुरा हाल है . हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शासन व्यवस्था और राजनीति बेशक एक दूसरे से गहरे से जुड़े होते हैं लेकिन क्रियात्मक रूप से यह दोनों अलग हैं . लेकिन आज के दौर में जो राजनीति करता है, जिसकी सत्ता होती है, वह शासन को अपने अनुकूल बना देता है और यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है और हो रही है . राजनीतिज्ञों और प्रशासकों की सांठगाँठ ने आम व्यक्ति का जीना दूभर कर दिया है . अगर हमारे पास स्वस्थ विचार होता तो हम  कदापि ऐसा नहीं करते . दूसरी बात राजनीति की कोई स्पष्ट दिशा नहीं और राजनेता का कोई चरित्र नहीं, ऐसे में एक व्यक्ति ही समूची राजनीति को प्रभावित कर रहा है . सबके अपने - अपने स्वार्थ हैं और सभी मौके की तलाश में हैं कि कब उन्हें लोगों और इस देश को लूटने का अवसर प्राप्त हो . इससे गन्दी राजनीति और क्या हो सकती है ? यह सब हमारे विचारों के कारण है . हमारे यहाँ जितनी भी राजनितिक पार्टियाँ अस्तित्व में हैं वह देश और समाज को नई दिशा देने के नज़रिये से नहीं , बल्कि अपने स्वार्थों के कारण अस्तित्व में हैं.  किसी का भी कोई चरित्र नहीं जिसको जहाँ जैसे अवसर प्राप्त हो रहा है वह अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है .
 
समाज व्यक्तियों से बनता है , व्यक्ति समाज की एक सशक्त ईकाई है लेकिन आज जैसे - जैसे व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है वैसे - वैसे समाज रुपी यह व्यवस्था समाप्त होती जा रही है . संकीर्ण विचारों ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है उसे अपने सिवाय किसी से कुछ लेना देना नहीं , उसे यह आभास नहीं कि उसके पड़ोस में क्या हो रहा है . वह अपने आसपास की हलचल से कोई मतलब नहीं रखना चाहता . उसका मतलब तो सिर्फ वहां है जहाँ उसका स्वार्थ पूरा हो रहा है . दूसरी तरफ हमारी सोच के कारण हमारे समाज में कई कुरीतियाँ आ गयी हैं . कन्या भ्रूण ह्त्या , दहेज के लिए किसी अबला का कत्ल, किसी नारी के शोषण की दास्ताँ , ऐसे कई पहलू हैं जो सीधे ही हमारे समाज से जुड़े होते हैं . लेकिन आज हमारे विचारों के कारण सामाजिक नाम की यह संस्था ही समाप्त होती जा रही है . धर्म से व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं रह गया है . उसे आचरण से कोई सरोकार नहीं और जो धर्म के प्रतिनिधि हैं वह भी इसे सही दिशा की तरफ ले जाने के बजाय इसे पतन की तरफ ले जा रहे हैं . यहाँ तो हर जगह नित्यानंद , निर्मल बाबा और ना जाने क्या - क्या पैदा हो रहे हैं . धर्म जो व्यक्ति को जीने की कला सिखाता था . वही आज गर्त में जा रहा है और लोग हैं कि अंधश्रद्धा के वशीभूत होकर अपना सब कुछ लूटा रहे हैं और यह जो लोग खुद को बड़ा भक्त कह रहे हैं वह भी एक स्वार्थ के कारण ऐसे लोगों से जुड़े हैं , भौतिक साधनों की प्राप्ति के लिए , मतलब सोच और विचार दोनों तरफ से गलत . ऐसे में किसी से क्या आशा कर सकते हैं ?

अर्थ की तो बात ही छोडिये जिसको जैसे मौका मिल रहा है वह इसका अर्जन कर रहा है . जीवन चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है , यह तो सबकी समझ में आता है . लेकिन पूँजी के लिए जीवन का सब कुछ दावं पर लगा देना कैसी समझदारी है ?? आज इस देश में कोई ऐसा नजर नहीं आता जो गलत तरीकों से धन अर्जन की अपेक्षा नहीं रखता हो . यानि के हमारे विचारों में बहुत परिवर्तन आ गया है हम उत्तम विचारों से गिर रहे हैं . साहित्य की तो बात ही छोडिये यहाँ भी स्थिति ठीक नहीं है . कहीं पर पूरी कायनात को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाने वाला रचनाकार अब दलित विमर्श , स्त्री विमर्श , आदिवासी विमर्श की कल्पित धारणाओं तक ही सीमित हो गया है और कुछ लोग विचारधाराओं के नाम पर उल जलूल लिखने से भी नहीं हिचक रहे हैं . और दूसरी तरफ मनोहर कहानियां , जीजा साली के किस्से, अखबारों में छपते काम शक्ति बढाने के विज्ञापन सब खोखला कर रहे हैं इस देश को ?? 

संगीत में पॉप कल्चर के नाम पर कुछ भी गाया जा रहा है और फिल्मों में देह दिखाने के आलावा कोई दृष्टि नहीं बची है , चित्रकार देवी देवताओं की नग्न और अश्लील तस्वीरें बनाकर क्या दिखाना चाह रहे हों यह समझ से बाहर की बात है . इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया भी अपने तरीके से प्रदूषण फ़ैलाने की भूमिका निभा रहा है . कोई नेता जब किसी को गाली देता है तो वह इनके समाचारों की हेडलाइन बन जाती है . इधर कुछ वर्षों से ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की नयी क्रांति या स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का माध्यम माना जा रहा था . लेकिन यहाँ भी कुछ लोग ऐसे आ गए हैं जो अपने तरीके से इसे प्रदूषित कर रहे हैं . 

अगर जिसे देश की राजनितिक , सामाजिक , धार्मिक और आर्थिक स्थिति ही दयनीय हो कोई स्पष्ट विचार जहाँ ना हो वहां की संस्कृति क्या हो सकती है ? यह बड़ा विचारणीय पहलू है . अगर जहाँ कोई संस्कृति ही ना हो वहां फिर प्रदूषण के सिवा क्या हो सकता है ? अब हर जगह प्रदूषण ही प्रदूषण है तो जी लो कैसे जीना है आपको , एक तनाव भरे माहौल में संभवतः ऐसे में खुद को पाक साफ़ रखना ही एक बड़ी चुनौती है और जो अपने दामन को पाक साफ़ रखकर जीवन जी रहा है समझो वह बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है . उसका जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं .

05 मई 2012

'बाबा' मुझे 'निर्मल' कर दो .. 2

29 टिप्‍पणियां:
ज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो लोगों पर विज्ञापन बहुत हावी हो गया है . कुछ लोगों के लिए यह व्यक्तिगत प्रचार का साधन है तो कुछ के लिए यह अपनी वस्तुओं को आम लोगों तक पहुँचाने का  . यहाँ तक तो ठीक है , लेकिन जब जीवन सन्दर्भों को विज्ञापन के माध्यम से भुनाने की कोशिश की जाती है तो यह बहुत अटपटा लगता है और लोगों को देखिये जो ऐसी चीजों/ बातों / विचारों को प्रश्रय देते हैं और बाकी के लोगों के लिए भी ऐसा ही मार्ग प्रशस्त करते हैं , और यहाँ लोग भी ऐसे हैं जो बिना जांचे परखे किसी के मत/बात पर विश्वास कर लेते हैं , और फिर सब कुछ खोने के बाद खुद को ही कोसते हैं . लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है . आज के दौर में अध्यात्म की जहाँ तक बात है यह भी विज्ञापन से अछुता नहीं . आज विभिन्न तरह के ताबीज , यंत्र और ना जाने क्या -क्या विज्ञापन के माध्यम से हमें देखने को मिलता है . एक तरफ तो यह चीजें और दूसरी तरफ छदम गुरुओं की चर्चा , धर्म और अध्यात्म पर उनके विचार और उपदेश और उन उपदेशों को सुनकर झूमते भक्त सब सपने की तरह गुजरता है आँखों के सामने से और मैं सोचता हूँ अपने उज्ज्वल अतीत, अंधकारमय भविष्य को ?

से में कई प्रश्न मेरे सामने यकायक खड़े हो जाते हैं , मैं भी किसी गुरु का नाम लेता हूँ और कहता हूँ " बाबा मुझे निर्मल कर दो , और वहां से कोई उत्तर नहीं आता सिवा इसके कि अभी कृपा प्राप्त होने में वक़्त लगेगा या फिर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए मुझे उनसे व्यापार करना होगा . मुझे उनके द्वारा बताई गयी धनराशि किसी माध्यम से उन तक पहुंचानी होगी और तब जाकर कहीं कृपा प्राप्त होगी . यह तो बात हुई पैसा फैंको तमाशा देखो , मैं भी किसी स्थिति से निकलना चाहता हूँ इसलिए मुझे उस धनराशि को उनके श्रीचरणों में समर्पित करने से कोई गुरेज नहीं , और बाबा हैं कि उस धनराशि से उनको कोई ख़ास संतुष्टि नहीं उनकी लालसा और बढ़ रही है और मेरा जीवन बेहाल होता है जा रहा है , एक बार फंस चूका हूँ और बार - बार वही प्रक्रिया दोहराई जा रही है , बाबा की कृपा को प्राप्त करने के लिए यही कुछ करना पड़ रहा है और मेरी चिंता कम होने की बजाय बढ़ रही है ओर मैं ऐसी स्थिति में किसी से कुछ कहने की हालत में नहीं हूँअब क्या करूँ ? ? ऐसी हालत मैंने कि लोगों की देखी है , और निर्मल बाबा प्रकरण में ऐसे कई लोग सामने आये . निश्चित रूप से ऐसे कई उदहारण हमारे सामने हैं जिसमें व्यक्ति को इन छदम गुरुओं द्वारा लूटा जाता रहा है और हम हैं कि कृपा, आशीर्वाद आदि के नाम पर सब लुटाये जाते रहे हैं . हद तो तब होती है जब शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग भी इनके चुंगल में फंस जाता है .  
विज्ञापन के इस दौर में मैंने एक बात बहुत करीब से महसूस की है , वह यह कि इस दौड़ में वह सब शामिल हैं जो खुद को भुनाना चाहते हैं . इनका एक नया तरीका है , यह सब अपना विज्ञापन करते वक़्त किसी व्यक्ति का मत जरुर शामिल करते हैं जिसमें इनके द्वारा उस व्यक्ति को पहुंचे लाभ की चर्चा होती है . बस फिर क्या है धीरे - धीरे इनका बाजार जमना शुरू हो जाता है , फिर एक समय ऐसा आता है जब यह अपना अर्थशास्त्र खुद तय करते हैं . मांग अधिक और आपूर्ति कम ऐसी हालत में एक तरफ लोगों की भीड़ है और कोई ऐसा नहीं जिसकी मनोकामना इनके दर पर जाकर पूरी न हुई हो . समाज का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति भी इनकी शरण में है और इनकी कृपा प्राप्त करके सबके चेहरे पर आलौकिक उर्जा का संचार हो रहा है . बस यही से खेल शुरू होता है , जो पकड़ा गया वह चोर है और जो नहीं पकड़ा गया वह अपना धंधा अनवरत चलाये रखता है . जब सब तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त है तो फिर हर जगह यही होना है और निश्चित रूप से हो भी रहा है . निर्मल बाबा हमारे सामने एक उदहारण मात्र हैं , और उनका यह सच भी सामने नहीं आता अगर वह कुछ चैनलों के साथ अपना करार कर लेते . लेकिन विडंबना यह है कि बाबा पर तो कार्यवाही हुई लेकिन उन चैनलों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई जिन्होंने बाबा के विज्ञापन को दिखाया या फिर उनके शो आयोजित किये . मुझे लगता है कि इस दिशा में भी सोचा जाना चाहिए , अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से जनता का भला होगा .  

निर्मल बाबा प्रकरण से पहले भी ऐसे कई प्रकरण हो चुके हैं , लेकिन फिर भी हम हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं , आज जितनी भी समस्याएं हमारे सामने हैं उनमें आम जनता की भागीदारी भी कम नहीं है . लेकिन हर बार हम उसी को निशाना बनाते हैं जो इस जाल में फंस जाता है , और हमारा मीडिया तो ऐसा है जब कोई किसी एक के पक्ष में बोलता है तो सभी वही राग अलापते हैं और अगर विपक्ष में बोलता है तो तब भी यही हाल होता है . मैं कई वर्षों से देख रहा हूँ कि हमारे देश में खोजी और विश्लेष्णात्मक पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गयी है . सिर्फ सूचनात्मक पत्रकारिता ने हमारे देश और समाज को भीतर से खोखला कर दिया है . ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का हर स्तम्भ ढहता जा रहा है . हम किस पर विश्वास करें , कैसा विश्वास करें . अजीब सी स्थिति है एक तरफ हम विकास और सूचना तकनीक की बात करते हैं वहीँ दूसरी और हम अंधविश्वासों में फंसते जा रहे हैं . व्यक्तिवादी राजनीति और देश में पूंजीपतियों की बढती साख ने आज देश को गुलामी के कगार पर ला दिया है . ऐसी स्थिति में हर किसी का यही कहना है " बाबा मुझे निर्मल कर दो " अब जब बाबा ही नार्मल नहीं हैं तो फिर किस तरफ देखें . हमारा देश विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं का देश है , और यही समन्वय का भाव हमें पूरे विश्व को एक घर मानने की समझ देता है .  लेकिन जब इस दिशा से हम भटक जाएँ तो क्या आशा की जा सकती है ?