27 अक्तूबर 2013

न काशी न काबा, बस बाबा ही बाबा ... 3

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पडा है, खासकर मध्यकाल के बाद का इतिहास जब इस देश की शासन व्यवस्था का जिम्मा विदेशी शासकों ने अपने हाथ में ले लिया था और अपने मकसद को पूरा करने के लिए वह तरह-तरह हथकंडे अपनाते थे और यह परम्परा आज तक भी जारी है. गतांक से आगे 

भारत जैसे देश में आज जो कुछ हो रहा है वह बहुत ही खेदजनक है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि इससे पहले यहाँ
ऐसा कुछ ऐसा था ही नहीं, कुछ लोग इतिहास के नाम पर भ्रम फैलाते हैं कि भारत एक समृद्धशाली, वैभवशाली देश नहीं रहा है. भारत का अतीत बहुत स्वर्णिम रहा है. लेकिन उसके पक्षों पर कभी विचार नहीं करते कि हम किस पक्ष से समृद्ध और सम्पूर्ण रहे हैं. जहाँ तक भारत के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि यहाँ युद्ध होते रहे हैं. असुरी शक्तियों से देवताओं का लड़ना होता रहा है और उनकी जीत भी होती रही है. ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जहाँ पर हमारे ऋषियों ने अपने प्राणों को दाव पर लगाकर मानवता के हित को साधने के लिए कार्य किया है. आज हम जिस उच्च संस्कृति और सभ्यता की बात करते हैं वह हमारे चिरंतन साधना और सकारात्मक सोच का परिणाम है, आज जो भी हम अपने इतिहास पर गर्व कर पाते हैं वह उस काल के प्रतापी लोगों का ही फल है. 

हालाँकि यह बात भी सच है कि भविष्य का निर्माण वर्तमान की नींव पर टिका होता है और वर्तमान ही भविष्य को तय करता है. आज जो वर्तमान है कल वह अतीत बन जाएगा, लेकिन भविष्य के लिए आधार आज ही तैयार करता है. हम देखते हैं कि एक पल में लिए गए निर्णय जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, और इन निर्णयों का प्रभाव उतना ही सामने वाले के जीवन पर भी पड़ता है. आपका जीवन जितना सार्वजनिक होगा उतना ही प्रभाव आपके साथ जुड़े लोगों पर आपके निर्णयों का पडेगा. हम इतिहास से कितना सीखे हैं. दुर्योधन के एक हठ ने महाभारत रचा दिया और संस्कृति का नाश हो गया, जो कुछ भी तत्कालीन राजाओं ने अर्जित किया था वह बिना बजह के समाप्त हो गया, रावण के एक निर्णय ने उसकी सभी खूबियों को मटियामेट कर दिया और भी ऐसे कई उदाहरण आज हमारे सामने हैं, लेकिन हम हैं कि आज भी कुछ सीख नहीं ले पाए हैं और ना ही हम कुछ सकारात्मक करने की पहल कर पाए हैं . 

आज के दौर में जो कुछ भी हमारे सामने हो रहा है उसके कुछ पहलू ऐसे हैं जो हमें आगाह करते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस धरा पर मानवीय पहलू मात्र पुस्तकों में ही पढने को मिलेंगे, व्यावहारिक जीवन से उनका कोई सरोकार नहीं होगा और जो त्राहि-त्राहि आज हमारे सामने हो रही है वह इतनी बढ़ जायेगी कि मानव-मानव के लिए ही नाश का कारण बनेगा. हालाँकि यह सब आज भी घटित हो रहा है, लेकिन अभी कुछ सीमा तक, हाँ यह बात अलग है कि आज ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो चुका है जहाँ मनुष्य हमेशा तनाव में जीता है और उसके जीवन का हर पल संघर्षमय है. इतना कुछ होने के बाबजूद भी वह संतुष्ट नहीं है वह सदा दूसरों से आगे बढ़ने की होड़ में सब कुछ भूल गया है. लेकिन यह बात भी सच है कि जिसे वह उन्नति-प्रगति आदि कह रहा है वह उसका पतन भी है, जिस मार्ग पर आज का इंसान दौड़ रहा है उसका अंत सिर्फ और सिर्फ विनाश ही है. वह इंसान से खुद को बचाने के लिए बहुत जहरीले हथियारों का निर्माण निरंतर कर रहा है और आज हर जगह ऐसे प्रयोगों और अविष्कारों की होड़ लगी हुई है कि कहना ही क्या. एक तरफ तो ऐसे हालत हैं वहीँ दूसरी और पूंजी के दम पर सब कुछ खरीदा और बेचा जा रहा है आज मानवीय पहलूओं का कहीं कोई प्रचार नहीं है और न ही उस तरफ किसी का ध्यान जाता है, हाँ कुछ पाखण्ड जरुर इस पहलू पर किया जाता है, लेकिन सिर्फ बातों में ही. जो लोग ऐसे उपदेश देते हैं उनका अपना जीवन भी उस बात पर अमल नहीं करता, लेकिन सभी ऐसे भी तो नहीं हैं पर जो सही मायने में मानवीय पहलूओं के पक्षधर हैं उनका कोई नामलेवा नहीं है, ना आज है, ना कल था और भविष्य में भी ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती. 

इतिहास इस बात का गवाह है जिसने भी इस धरा पर नेकी से मानवीय पहलूओं को स्थापित करने की कोशिश की, उसे हमने ही नहीं बख्शा. किसी को तत्ते तवे पर चढ़ा दिया तो किसी को दीवारों में चिनवा दिया. किसी को गोली मार दी तो किसी को ढेरों यातनाएं दी. फिर भी वह मानवता के पुजारी दुनिया को समझाते रहे और अपने कर्तव्य पथ पर अंतिम सांस तक आगे बढ़ते रहे, दुनिया ने जो कुछ भी उनके साथ किया वह फिर भी दुनिया को माफ़ ही करते रहे और आज भी ऐसे कई संत इस धरा पर हैं जो मानवता की स्थापना के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और दूसरी तरफ धर्म के नाम पर जो पाखण्ड रचे जा रहे हैं वह किसी से छुपे नहीं है, आये दिन दुनिया में कोई न कोई परमात्मा पैदा हो जाता है और भक्तों का तो कहना ही क्या? ऐसा लगता है कि वह अपने इस पाखंडी परमात्मा के जन्म के लिए वर्षों से इन्तजार कर रहे हों और उसके दीदार के लिए राह में पलकें बिछाए बैठे हों, और वह पाखंडी परमात्मा जनता को ऐसे गुमराह करता है जैसे वह ही इस सृष्टि का कर्ता-धर्ता हो. आजकल जितने भी ऐसे छुटभये तैयार हुए हैं उनके कई तरह के नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज और देश पर पड़ रहे हैं और जिस धर्म की आड़ में वह यह सब कुछ कर रहे हैं वह वास्तव में धर्म को स्थापित करने जैसा नहीं है, बल्कि भोले-भाले लोगों को अधर्म की तरफ ले जाने वाला मार्ग है ....!!!          

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

अंधश्रद्धा के चलते आमजन भी इस जाल में जा फंसते हैं..... सार्थक चिन्तन

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति-
शुभकामनायें आदरणीय-

babanpandey ने कहा…

भावमयी कविता ...मेरे भी पोस्ट पर आयें .. दीपावली की सुभकामनाए भावमयी कविता ... मोनिका शर्मा जी सहमत हूँ

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गुणवत्ता हर युग में रही है, हम उसे छोड़कर मानकहीनों का सहारा ले बैठते हैं।

संजय भास्‍कर ने कहा…

भविष्य का निर्माण वर्तमान की नींव पर टिका होता है...न बाबा

संगीता पुरी ने कहा…

कारण यह भी है कि समाज पाखंडियों के चकाचौंध से प्रभावित होता है ... उन्‍हें फलने फूलने में प्रश्रय देता है ... जबकि वास्‍तविक संत को नहीं स्‍वीकार कर पाता ... क्‍योंकि उसमें व्‍यावसायिक क्षमता नहीं होती है !!

संतोष पाण्डेय ने कहा…

एक-एक शब्द सच है। धर्म के नाम पर अधर्म को बढ़ावा दिया जा रहा हैं।
दीपोत्सव की शुभकामनाएं।

Ankur Jain ने कहा…

उत्तम प्रस्तुति...
शुभकामनाएं आपको..