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16 मार्च 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...4

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4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुसार उसका धर्म भी निर्धारित कर दिया जाता है. हालाँकि इसका एक पहलू यह भी है कि जो जिस देश में पैदा होता है, उसके द्वारा उसी देश में प्रचलित धर्म का पालन करना पहली प्राथमिकता होता है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. क्योँकि हमारी मान्यता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि धर्म के पालन के बिना जीवन का कोई मकसद पूरा नहीं हो सकता. इसलिए धर्म को जीवन का आधार सा मान लिया गया है. लेकिन धर्म की अनुपालना के विषय में ज्यादातर अनुभव यही बताते हैं कि इसने किसी एक समाज और धर्म के लोगों को जोड़ने का काम बेशक किया है, लेकिन किसी दूसरे को अपने से अलग मानने का भाव भी अधिकतर धर्म के कारण ही पैदा हुआ है. मेरा धर्म श्रेष्ठ है, और किसी दूसरे का नहीं. इस भाव ने दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा की हैं. हमारी किसी दूसरे व्यक्ति से नफरत के कारणों पर विचार करें तो उसमें धर्म और जाति की भूमिका सबसे बड़ी है. हालाँकि देशों की सीमाओं के आधार पर भी व्यक्ति से व्यक्ति का भेद पैदा हुआ है, लेकीन यह भेद उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धर्म और जाति का भेद खतरनाक है. देशों का भेद किसी दूसरे देश के लोगों से हो सकता है. लेकिन जाति और धर्म का भेद किसी एक देश में बसने वाले लोगों में भी द्वंद्व का कारण बन सकता है, और इतिहास गवाह है कि इसी भेद के कारण दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा हुई हैं.
हालाँकि देखने में यह आया है कि जाति की सीमा किसी हद तक सीमित है, लेकिन धर्म की सीमा व्यापक है. एक ही समाज-क्षेत्र और देश में कई जातियां हो सकती हैं, लेकिन उसी समाज और क्षेत्र में उन सभी जातियों का एक ही धर्म हो सकता है. इससे यह सिद्ध होता है कि जाति और धर्म का गहरा सम्बन्ध है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जाति धर्म की रक्षा करती है तो, धर्म जाति को संरक्षण प्रदान करता है. अगर हम भारत के विषय में ही बात करें तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ चार मुख्य धर्म प्रचलन में हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और सिक्ख. लेकिन मुझे लगता है कि सिक्ख धर्म को धर्म कहने के बजाय अध्यात्म के प्रचार की संस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. हालाँकि सिक्खों की भी अपनी एक जीवन पद्धति है. लेकिन सामाजिक समरसता के जो तत्व सिक्खों में देखने को मिलते हैं वह बाकी के तीन धर्मों में कम ही देखने को मिलते हैं. फिर भी अगर कोई सिक्ख धर्म मानता है तो वह उसकी अपनी सोच है. मैं धर्म के विषय पर दूसरे तरीके से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ.
हमारे देश में वैसे तो बौद्ध और जैन विचारधाराओं को भी धर्म की श्रेणी में रखा जाता है. लेकिन इनमें धर्म के तत्व मौजूद होते हुए भी इन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता. फिर भी बात जो भी हो इन्हें विचारधारा कह लीजिये यह धर्म, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें समझना यह है कि एक ही धर्म को मामने वाले अगर समान हैं तो फिर जाति का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए था, लेकिन यहाँ होता यह है कि एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में भी कई जातियां विद्यमान रहती है. इससे यह जाहिर होता है कि इनसान किसी एक स्तर पर बंटा हुआ नहीं है, बल्कि कुछ धर्मभीरु लोगों ने उसे अनेक स्तरों पर बांटने की कोशिश की है. इसलिए हम किसी भी धर्म को मानें, पहले तो हमें उसकी खूबियों और खामियों के विषय में अवगत होना चाहिए और दूसरी बात यह है कि हम धर्म और जाति के आधार पर इनसान को न बाँटें तो बेहतर होगा. किसी की आस्था, मान्यता से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे नफरत का अधिकार हमें किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं है. बदलते दौर में युवाओं की यह जिम्मेवारी है कि वह धर्म और जाति के बन्धन से ऊपर उठकर इनसान को इनसान के नजरिये से देखने का प्रयास करे, ऐसा करने से उन्हें खुद भी एक बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा और वह दूसरों के लिए भी एक बेहतर मिसाल के रूप में दुनिया के सामने होंगे. उन्हें धर्मों के इस अस्तित्व को सकारात्मक रूप में लेने की आवश्यकता है.
5. परम्पराओं और संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को समझें: परम्पराएँ और संस्कृति किसी भी देश-समाज और व्यक्ति की पहचान है. परम्पराएँ और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं. हम देखते हैं कि हमारे समाज में अनेक परम्पराएं मौजूद हैं, जो समाज के स्वरुप को निर्धारित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं. एक तरह से अनेक परम्पराएं मिलकर के संस्कृति का निर्माण करती हैं. संस्कृति किसी भी देश की पहचान को निर्धारित करती है, इसलिए अक्सर यह कहा जाता है कि इस देश की संस्कृति ऐसी है, उस देश की संस्कृति ऐसी है. संस्कृति के आधार पर ही हम किसी देश के जन-जीवन और मानवीय मूल्यों के विषय में जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. इसलिए हमारे लिए यह जरुरी है कि हम अपने देश और समाज की परम्पराओं और संस्कृति के विषय में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें. परम्पराओं के पीछे जो मान्यताएं प्रचलन में हैं उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें. इससे एक तो हमारी जानकारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ हमें जो सही लगेगा हम उसे बड़े उत्साह से अपनाएंगे और जो कुछ सही नहीं है उसमें सुधार करने का प्रयास करेंगे.
यह सब युवाओं पर निर्भर करता है कि वह अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह से समझते हैं और किस तरह से उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं. आजकल जो दौर चल रहा है इसमें परम्पराओं और संस्कृति की बात करना बेमानी सा हो गया है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इसका खामियाजा हमें भुगतना भी पड़ रहा है. जो परम्पराएं और संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़कर रखती थी, उनके न मानने से समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई हैं, मनुष्य-मनुष्य का वैरी हो गया है, समाज में व्यक्ति केन्द्रित जीवन को तरजीह दी जाने लगी है. जिससे हम एकाकी जीवन की और बढ़ रहे हैं. एकाकी जीवन में अवसाद और घुटन के कारण आत्महत्या और किसी की जान लेने की प्रवृतियां बढ़ रही हैं. इससे हर जगह भय का माहौल बना हुआ है. युवाओं के लिए यह जरुरी है कि वह अपने आसपास के समाज में सक्रिय रूप से भागीदार बने. लोगों के दुःख-दर्द में काम आने का साधन बने, एक सहयोग और प्रेम वाली संस्कृति को जन्म देने की कोशिश करें. इसे एक परम्परा के रूप में ही विकसित करें, ताकि समाज एक सुंदर रूप ले सके और सभी का जीवन खुशहाली से बीत सके. शेष अगले अंक में...!!!  

18 सितंबर 2016

जीवन में इतिहास जैसा कुछ नहीं...2

4 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.... मनुष्य चेतना का प्रतिबिम्ब है और यही इसकी वास्तविक पहचान है. वैसे अगर चेतना के इस दायरे को मनुष्य से बाहर की दुनिया पर भी लागू किया जाए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. जब हम इस बात को स्वीकारते हैं कि इस सृष्टि के कण-कण में इसे रचने वाली चेतना समाई है तो सभी इसी चेतना के  ही प्रतिबिम्ब कहे जाएँ तो ज्यादा बेहतर होगा. लेकिन मनुष्य को इन सबमें श्रेष्ठ माना गया है और किसी हद तक यह बात सही भी है. लेकिन मनुष्य को जिस पहलू के कारण श्रेष्ठ माना गया है उसे भी समझने की जरुरत है. जिन्होंने अपने जीवन का अधिकतर समय इस पहलू को समझने में लगाया और जिनकी कही हुई बात की मान्यता इस दुनिया में है, उन्होंने तो कहा है कि:-
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥
आहार, निद्रा, भय और मैथुनइनके आधार पर तो इनसान और पशु में कोई भेद नहीं है. धर्म के कारण ही मनुष्य विशेष है और जो धर्म विहीन है वह पशु के समान है. इसी सन्दर्भ को संतों ने और स्पष्ट तरीके से समझते हुए कहा कि:-  
निद्रा, भोजन, भोग, भय, यह पशु पुरुष समान
ज्ञान अधिक इक नरन में, ज्ञान बिना नर पशु जान
इनसान और पशु में अन्तर शारीरिक क्रियाओं के आधार पर नहीं, क्योँकि शारीरिक क्रियाएं मनुष्य और पशु में समान हैं. देखा तो यहाँ तक भी गया है कि पशु इन शारीरिक क्रियाओं का निर्वाह उसे प्रकृति द्वारा प्रदत्त मर्यादा के अनुरुप ही करता है. लेकिन मनुष्य अधिकतर इन मर्यादाओं का उलंघन करता है. उसके लिए जीवन का कोई एक निश्चित पैमाना नहीं है. देश काल और समय के अनुसार मनुष्य के जीवन जीने और समझने का पैमाना बदलता रहता है. जो पहलू किसी एक देश में बुरा माना जाता है वही किसी और देश के लोगों में सम्मान का सूचक हो सकता है. पूरी दुनिया में जीवन को किसी एक पैमाने में नहीं जिया जाता. मनुष्य जीवन में, जीवन जीने के पहलूओं और उससे सम्बन्धित मान्यताओं में इतनी विविधता है कि किसी एक को बेहतर और किसी एक को कमतर करके कभी नहीं आँका जा सकता. इन सबके विषय में विचार करते हुए हम सोच सकते हैं कि क्या मनुष्य जीवन में इतिहास की कोई भूमिका होती है? उसके जीवन में इतिहास जैसा कुछ है? और अगर इतिहास जैसा कुछ है तो उसकी सीमा क्या है ? उसका क्या प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता है और वह किस तरह से मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है. मनुष्य जीवन में इतिहास से सम्बन्धित ऐसे अनेक पहलू हैं, जो कई बार हमें जीवन के विषय में गंभीरता से सोचने पर विवश करते हैं.
बहुत बार मुझे लगता है कि जीवन में इतिहास जैसा कुछ  नहीं है. हम इतिहास को जिस सन्दर्भ में लेते हैं. कम से कम उस जैसा तो कुछ भी जीवन में कभी घटित ही नहीं होता. इस पहलू को जब बड़ी बारीकी से सोचा तो मैं खुद पर बड़ा आश्चर्यचकित हुआ. आप भी इसे समझने की चेष्टा करेंगे तो शायद आप भी मेरी तरह विस्मय से भर जायेंगे. इतिहास के सन्दर्भ में हमारी मान्यता है कि जो कुछ घटित हो चुका है, और जिसकी पुनरावृति नहीं हो सकती, वह इतिहास है. जिसे हम तथ्य और तर्क के आधार पर प्रमाणित करते हैं.   हम हमेशा इस बात पर बड़ा गर्व करते हैं कि हमारा इतिहास ऐसा है, हमारा इतिहास वैसा है. लेकिन गहराई से देखें तो हमारा कोई इतिहास भी होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. क्योँकि जीवन जिस गति से चल रहा है वह तो हमेशा ही वर्तमान है. हम सब मानवीय विकास का हिस्सा है और हमारा जन्म मानवीय लड़ी को आगे ले जाने की एक कड़ी मात्र है. हम बेशक अपने पूर्वजों की लड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन अनुभव और अन्तर्यात्रा में हम अकेले हैं. उनके अनुभव और हमारे अनुभव कभी एक जैसे नहीं होंगे. चाहे सन्दर्भ कोई भी हो. उसमें इतिहास जैसा कुछ भी नहीं होगा. वहां हमेशा ही वर्तमान है और रहेगा.
यहाँ मैं जीवन में इतिहास जैसा कुछ  नहीं है. इस पहलू पर सिर्फ मनुष्य की अन्तर्यात्रा और उसके अनुभव के आधार पर अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ.  यहाँ मैं राजनीति, सभ्यता, संस्कृति, शिल्प आदि के इतिहास पर बात करने के बजाय मनुष्य की अन्तर्यात्रा और इतिहास के सन्दर्भ में हमारी सोच के विषय में बात करने का प्रयास कर रहा हूँ. जिसे हम इतिहास कह रहे हैं, वह वास्तव में इतिहास जैसा लगता है. लेकिन वह भी एक समय वर्तमान का हिस्सा रहा है, जो हमारे पूर्वजों के समय उनका वर्तमान था, आज वही हमारे लिए इतिहास है. इतिहास की कहानी सिर्फ इतनी सी है. किसी समय किसी का वर्तमान आगे आने वाली पीढ़ियों का इतिहास है. हम इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि हमारा वर्तमान किसी दिन हमारा इतिहास होते हुए आने वाली पीढ़ियों का भी इतिहास होगा, और उनका वर्तमान उनकी आने वाली पीढ़ियों का इतिहास होगा. यह क्रम तो चलता ही रहेगा और चल भी रहा है. इतिहास हमेशा भूत का विषय है और वह सिर्फ घटना है, जो घटित हो चुकी है, और उस घटना के घटित होने में उस समय के मनुष्य का कोई ज्यादा योगदान नहीं. हाँ यह जरुर है कि सामूहिक रूप से वह घटना उसे दौर के हर मनुष्य से जुडी हो सकती है. हम उस घटना को सुनकर थोडा सा अनुमान उस समय की परिस्थिति के विषय में लगा सकते हैं, लेकिन जिसने उस घटना को झेला है उसका अनुभव अलग होगा, जिसने उस घटना को देखा होगा उसका अनुभव अलग होगा, जिसने उस समय में उस घटना के विषय में सुना होगा उसका अनुभव अलग होगा और जो उस घटना के लिए जिम्मेवार होगा उसका अनुभव अलग होगा.
अब देखें कि एक ही घटना के विषय में जितने लोग उतना अनुभव, फिर इतिहास कैसे हो गया? इतिहास हो गया तो एक सा होना चाहिए, तर्क और तथ्य पर खरा उतरने वाला. लेकिन यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं है. फिर जीवन में इतिहास जैसा कुछ कहाँ और कैसे होता है. वास्तव में हमारी यात्रा अकेले मंजिल पर पहुँचने की यात्रा है, यह जितने भी संगी-साथी है, यह शरीर के साथ तक के साथी हैं. भीतर से हम अद्वितीय हैं, अकेले हैं और सिर्फ वर्तमान हैं. हमारी यात्रा इतिहास की नहीं है, बल्कि वर्तमान की यात्रा है, एक नैसर्गिक यात्रा है. यहाँ किसी घटना का अनुभव जरुर है, लेकिन प्रमाण नहीं, इसलिए जीवन में इतिहास जैसा कुछ नहीं. सबका अपना-अपना बजूद है और सब अपने अनुभव और दृष्टिकोण से अपने जीवन की यात्रा को तय करते हैं. मनुष्य का हर अनुभव उसे एक नई सीख देता है और समझने वाला मनुष्य हमेशा उस अनुभव के आधार पर खुद को परिष्कृत करता हैं. हम दूसरों के अनुभवों से सीखते जरुर हैं, लेकिन जीवन बेहतर तब होता है जब हम स्वयं उस अनुभव से गुजरते हैं. लेकिन यहाँ यह भी समझना जरुरी है कि किसी एक घटना के विषय में एक ही समय में अलग-अलग व्यक्ति के अलग-अलग अनुभव होते हैं. जीवन की यात्रा इतिहास से जुडी यात्रा सिर्फ भौतिक स्तर पर है और वह भी अपनी समझ की सुविधा के लिए, जीवन की वास्तविक यात्रा तो नैसर्गिक है, अनिश्चित है, बिना इतिहास की है. शेष अगले अंक में...!! 

14 सितंबर 2016

जीवन में इतिहास जैसा कुछ नहीं...1

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इतिहास शब्द जहन में आते ही हम अतीत के विषय में सोचना शुरू करते हैं. संभवतः हम अतीत के विषय में जानने और समझने के लिए कल्पना का सहारा कम ही लेते हैं. कल्पना की ऊँची उड़ान तो भविष्य के लिए है. अतीत के लिए तो सोच है, समझ है, तर्क है और अंततः अतीत तथ्य पर आकर रुकता है और वहीँ रूढ़ हो जाता है. अतीत को समझने के लिए तथ्य के मायने बहुत है, लेकिन भविष्य के लिए तथ्य कहीं भी मायने नहीं रखता. लेकिन जीवन का जहाँ तक प्रश्न है, यह न तो तथ्य है और न ही तर्क, यह न तो इतिहास है और न ही भविष्य. जीवन तो बस जीवन है. एक अद्भुत और नैसर्गिक प्रक्रिया.

जीवन को समझने के लिए आज तक अनेक प्रयास हुए हैं. हर प्रयास का कुछ न कुछ निष्कर्ष हमारे सामने है. हमारी कोशिश जीवन में यही रहती है कि हम अपने अग्रजों की बनी बनाई परिपाटी पर चलते हुए जीवन की गति को दिशा दें, और अधिकतर ऐसा ही होता रहा है. लेकिन दुनिया में एक तरफ अग्रजों की परिपाटी पर चलने वाले लोग रहे हैं तो वहीँ दूसरी और कुछ ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने अपने रास्ते की तलाश खुद की है और मंजिल को हासिल किया है.  यह दौर भी दुनिया में बराबर चलता रहा है कि एक तरफ परम्परा को मानने वाले रहे हैं तो वहीँ दूसरी और उस परम्परा का खण्डन करने वाले भी पैदा हुए हैं. लेकिन जिन लोगों ने किसी परम्परा का खण्डन किया है वह दुनिया को कोई न कोई नयी परम्परा देकर ही गए हैं. लेकिन आने वाले समय में वह परम्परा जो एक समय नयी थी वह भी पुरानी हो गयी, वह भी जड़ लगने लगी और फिर किसी ने उसे भी तोड़ने का प्रयास किया और उसके स्थान पर नयी परम्परा स्थापित कर दी. इतिहास के कालचक्र में यह दौर मनुष्य के अस्तित्व से लेकर आज तक निरन्तर चला आ रहा है और चलता रहेगा मनुष्य के अन्तिम अवशेष तक.  

लेकिन मैं जिस प्रश्न पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाह रहा हूँ वह मेरे अनुभव को लेकर है. मेरे ही क्योँ? वह आपके अनुभव को लेकर भी है. मनुष्य जीवन हमें बेशक शरीर की यात्रा लगता है. लेकिन अब यह महसूस होने लगा है कि मनुष्य की यात्रा शरीर की कम ‘मन’ की ज्यादा है. शरीर तो सिर्फ एक माध्यम मात्र है. शरीर कई मायनों में जड़ जैसा है, अगर इसमें भाव, विचार, सम्वेदना आदि न हो. तभी तो कबीर ने इसे प्रेम के बिना लोहार के द्वारा प्रयोग की जाने वाली खाल के समान कहा है. प्रेम ही क्योँ जीवन तो हजारों भावों, विचारों और सम्वेदनाओं का प्रतिबिम्ब है. हमारी यात्रा हांड-मास के स्थूल ढांचे की नहीं, बल्कि हमारी यात्रा सूक्ष्म की यात्रा है. यह जड़ की नहीं, बल्कि चेतना की यात्रा है. इसी चेतन तत्व पर आज तक अनेक तरह से विचार किया गया है और इसे समझने के प्रयास निरन्तर जारी हैं. शेष अगले अंक में....!! 

08 मार्च 2016

एक ऐसा विश्व जहाँ सिर्फ इनसान रहते हों

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पहचानों के दायरे में सिमटता इनसान संभवतः अपनी वास्तविक पहचान को भूल गया है. ऐसा कौन सा समय रहा होगा जब मनुष्य ने खुद को मनुष्य के रूप में समझा होगा. इतिहास का गहन अध्ययन करने के पश्चात इस बात के संकेत कम ही मिलते हैं कि इनसान ने इस धरती पर जन्म लेने के बाद खुद को इनसान के रूप में प्रस्तुत किया हो. वह अधिकतर पहचानों के दायरे में खुद को बांधता हुआ प्रतीत होता है. उसकी शंकाएं और संभावनाएं अधिकतर निर्मूल हैं, लेकिन फिर भी वह खुद की एक पहचान बताते और बनाते हुए आगे बढ़ रहा है, और उसका लक्ष्य उस पहचान को कायम रखते हुए ‘व्यक्तिगत’ रूप से एक ‘नयी’ पहचान कायम करने का रहा है. ऐसे में हम देखते हैं कि इनसान के रूप में जन्म लेने वाला प्राणी कभी इनसान की तरह व्यवहार नहीं कर पाया है. वह अधिकतर खुद को “दूसरों से श्रेष्ठ” साबित करने की होड़ में आगे बढ़ रहा है. इस तथाकथित श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए इनसान ने कई ऐसे कदम उठाये हैं, जिनके बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय बैचैनी से काँप उठता है,  दिमाग सोचने पर मजबूर हो जाता है, कि इस धरती पर ऐसा भी कोई कालखंड रहा होगा जब इनसान ने सबसे ज्यादा नुकसान इनसान का ही किया. हमें इनसान के द्वारा इनसान के बजूद तक को मिटाने के लिए किये गए प्रयासों के भरपूर चिन्ह देखने को मिलते हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों का जिक्र कम ही मिलता है, जब इनसान ने मानवता की रक्षा और इंसानियत के लिए अपने सर्वस्व को अर्पित किया हो. अगर ऐसे चिन्ह कहीं मिलते भी हैं तो उनकी संख्या बहुत ही कम है. मनुष्य द्वारा अपनी एक विशेष पहचान को कायम करने के लिए किये गए प्रयासों और उनके परिणामों पर अगर हम गौर करें तो बहुत से ऐसे पहलू हमारे सामने आते हैं जो सर्वथा निर्मूल हैं, एक भ्रान्ति के सिवा कुछ भी नहीं.

मनुष्य द्वारा खुद की एक नयी पहचान को कायम करने के लिए बनाये गए दायरों को अगर हम देखें तो हमें आसानी से समझ आता है कि यह प्रयास कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि मेरी कमीज दूसरे की कमीज से ज्यादा सफ़ेद है, हालाँकि मुझे यह भी पता है कि दूसरे की कमीज भी सफ़ेद ही है, लेकिन मेरा प्रयास खुद की कमीज को ज्यादा सफ़ेद सिद्ध करने का है. मनुष्य की श्रेष्ठता की सारी कहानी सिर्फ कमीज के सफ़ेद होने और ज्यादा सफ़ेद होने की ही कहानी जैसी लगती है, लेकिन इस यथार्थ को कोई समझना नहीं चाहता, अगर कोई इसे समझने का प्रयास करेगा तो उसे भी उसी वर्ग के लोगों द्वारा बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, उसके जीवन को दूभर किया जाएगा, यहाँ तक कि उसके मानवीय अधिकार भी छीन लिए जायेंगे. इसलिए अधिकतर मनुष्य अपनी संसारिक पहचान को बनाये रखने के प्रयास करता है, और ऐसा ही प्रयास मनुष्य का रहा है कि वह अपनी पहचान के लिए हमेशा सजग रहे. उसे जो पहचान उसके देश, धर्म, समाज, भाषा, जाति, वर्ग, वर्ण आदि द्वारा प्रदान की गयी है, वह हर हाल में उस पहचान की रक्षा करे, किसी भी स्थिति में उस पहचान से सम्बन्धित नियमों का उलंघन नहीं होना चाहिए. अगर किसी के द्वारा भूल से भी इन तथाकथित नियमों और सीमाओं का उलंघन होता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान ऐसा किया गया है कि सोचकर ही दिल दहल जाता है.

आज हम जिस विश्व में जी रहे हैं वहां कई तरह की चीजें एक साथ घटित हो रही हैं. ऐसा नहीं है कि इससे
पहले यह सब कुछ न हुआ हो, यह सब कुछ पहले से ही होता आ रहा है, और संभवतः किसी भी घटना के पीछे इतिहास को जोड़ दिया जाता है. पहचानों के दायरे में बंधे इनसान के सामने आज कई तरह की चुनौतियां हैं, एक तरफ वह इन चुनौतियों से लड़ना चाहता है, वहीं दूसरी और वह अपनी तथाकथित पहचान को बनाये रखना चाहता है. उसकी यात्रा दो नावों में एक साथ सफ़र करने की है, वह परम्परा और आधुनिकता को साथ लेकर बढ़ना चाहता है, लेकिन इसी द्वंद्व में वह सब कुछ खो भी देता है, क्योँकि परम्परा के स्थान पर आधुनिकता आई है, उसके पास एक ही विकल्प है, या तो वह परम्परा को साथ लेकर जीवन जिए या फिर आधुनिकता को साथ लेकर. दोनों जीवन दर्शनों को साथ लेकर जीवन जीना एक सामान्य मनुष्य के लिए बहुत चुनौती भरा है. परम्परा और आधुनिकता की जहाँ तक बात है उसमें भी पहली जरुरत मनुष्य को अपनी सोच को बदलने की है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि आज का परम्परावादी इनसान पाषाणकालीन तकनीक के साथ जी रहा है, वह तकनीकी और भौतिक स्तर पर आज के दौर के साथ जी रहा है या ऐसा भी कह सकते हैं कि वह भौतिक रूप से समय के साथ जी रहा है, लेकिन जहाँ तक सोच का सवाल है, उस पर कई प्रश्न किये जा सकते हैं. जो पहचान उसे प्रकृति की विविधता के कारण मिली थी, उस पहचान को कहीं खोकर वह कृत्रिम पहचान को बनाये रखने के लिए कृतसंकल्प है.

इनसान की कृत्रिम पहचान ने उसे इनसान से जुदा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. कई बार मुझे ऐसा आभास होता है कि यह सब, कुछ लोगों द्वारा इनसान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किया गया है. हम देखते हैं कि एक इनसान के जन्म के साथ ही उसकी जाति, धर्म आदि निर्धारित हो जाता है और पूरा जीवन उस इनसान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसका पालन करेगा. उसी दायरे में वह बंध कर रहेगा. एक हद तक यह ठीक भी लगता है, लेकिन दूसरी और हम देखते हैं कि जाति और धर्म के नाम पर आज तक दुनिया के इतिहास में कई हृदय विदारक घटनाएँ घटी हैं. मनुष्य की पहली पहचान जाति हो गयी है, उसी के हिसाब से उसका धर्म निर्धारित हुआ है. यह बड़ा अजीब सा है पहलू है. धर्म का जहाँ तक लक्ष्य है वह मनुष्य के आचरण से सम्बन्धित है. काफी हद तक धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत मामला लगता है, लेकिन धर्म के मामले में ऐसा होता कहाँ है? आज मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई जाति और धर्म से है. एक ही धरा पर रहने वाले इनसान, एक ही तरह से जीवन यापन करने वाले लोग धर्म के नाम पर कैसे एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं यह हमें आये दिन देखने को मिलता रहता है. कुछ तथाकथित लोग धर्म को एक खौफ की तरह प्रचारित करते हैं और जाति उनके लिए मनुष्य की भावनाओं से खेलने का एक महत्वपूर्ण अस्त्र है. शेष अगले अंकों में......

28 जून 2014

धूल चेहरे पर थी और मैं आईना साफ करता रहा

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दुनिया भर के श्रेष्ठ साहित्य का जब हम बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि दुनिया भर का अधिकतर साहित्य एक बिन्दु पर केन्द्रित है और वह बिन्दु है मानवीय मूल्यों का विकास या मानवीय मूल्यों की स्थापना.  आखिर ऐसा क्या है कि मानव को अपने मूल्यों का विकास करना पड़ता है. जबकि धरा पर जितने भी प्राणी रहते हैं उन पर यह नियम लागू नहीं होता. दुनिया भर में लिखे गए साहित्य का अधिकतर भाग मानवीय मूल्यों की स्थापना का है. भाषा चाहे कोई भी हो. रचना की विधा चाहे कोई भी हो. लेकिन सबके मूल में मानवीय मूल्यों को तरजीह दी गयी है. हमारे देश में ही वेदों से लेकर आज तक जितना भी साहित्य रचा गया है उसके केन्द्र में मानव रहा है और मानवीय मूल्यों की स्थापना इन सब रचनाओं का मूल उद्देश्य है. वेद को भारतीय जीवन की आत्मा के रूप में चिन्हित किया जाता है, तो उपनिषद को उसका संगीत माना जाता है, रामायण को हृदय की संज्ञा से अभिहित किया जाता है तो, महाभारत को उसका मस्तक माना जाता है, पुराण प्रज्ञा, दर्शन उसका गाम्भीर्य, धर्म मर्यादा और आचार को उसके मूल्यबोध के रूप में चिन्हित किया जाता है. साहित्य का यह संसार एक परिपूर्ण मानव की परिकल्पना से भरा पडा है और आज भी इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने के प्रयास किये जा रहे हैं.
जब हम गहराई से इस दुनिया के इतिहास को समझने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि इस दुनिया का ज्यादातर इतिहास मानव का मानव से प्रेम का नहीं, बल्कि मानव का मानव से संघर्ष का इतिहास है. इस धरा पर अनेक सभ्यताएं और संस्कृतियाँ जन्मी, उन्होंने अपने शीर्ष को हासिल किया और फिर काल का ग्रास बन गयी. समय के साथ-साथ उनका अस्तित्व मिटता गया. फिर एक नयी सभ्यता और नई संस्कृति ने जन्म लिया. देश काल और वातावरण के अनुरूप उस सभ्यता और संस्कृति ने अपने को स्थापित किया और फिर एक समय ऐसा आया कि वह भी समाप्त गयी. यह क्रम अनवरत रूप से चल रहा है सृष्टि के प्रारम्भ से और चलता रहेगा जब तक इस धरा पर मानव जीवन है. इसे ही हम परिवर्तन कहते हैं, और परिवर्तन को प्रकृति का एक अनिवार्य नियम माना जाता है. यहाँ यह बात गौर करने योग्य है कि प्रकृति के परिवर्तन और मानव के परिवर्तन में बहुत बड़ा अन्तर है.
हालाँकि यह बात भी हमें ध्यान में रखनी चाहिए कि मानव भी प्रकृति का एक हिस्सा है. इसकी संरचना और उसके जीवन का हर एक पक्ष प्रकृति से निसृत है. हम मनुष्य के शरीर की अवस्था से भी इस परिवर्तन और प्रकृति के नियम को समझ सकते हैं. मनुष्य के शरीर की अवस्थाओं बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था, बुढापा या विकास मनुष्य की अपनी इच्छानुसार नहीं होता. यह प्रकृति का नियम है कि बचपन से बुढ़ापा आएगा ही उसे कोई रोक नहीं सकता. अर्थात प्रकृति, पर्यावरण, समाज एवं जीवन में घटने वाली घटनाओं एवं परिस्थितियों को रोक पाना इसके वश में नहीं है. इसलिए मनुष्य भी परिवर्तन से अछूता नहीं है. लेकिन मानवीय सभ्यता और संस्कृति में जो परिवर्तन आते हैं वह मानव को पूरी तरह से परिवर्तित कर देते हैं. लेकिन प्रकृति में जो परिवर्तन आते हैं वह उसके काल चक्र का हिस्सा होते हैं. लेकिन मनुष्य में आये परिवर्तन काल चक्र का नहीं बल्कि उसकी प्रवृतियों में आये परिवर्तन का हिस्सा होते हैं.
इसे यूं भी समझा जा सकता है. प्रकृति अनवरत रूप से परिवर्तित होती रहती है. लेकिन वह एक चक्र के बाद वहीँ पहुँच जाती है, जहाँ से वह शुरू होती है. छोटे से छोटे स्तर से लेकर बड़े से बड़े स्तर तक इस चक्र को विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन मनुष्य के मामले में ऐसा नहीं है. आज हम सतयुग या त्रेता की सभ्यता और संस्कृति में नहीं जा सकते. वह घटित हो गया और अब उसकी पुनरावृति किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती. अब न तो राम इस धरा पर आ सकते हैं और न ही कृष्ण. न तो रावण का जन्म हो सकता है और न ही कंस का बध किया जा सकता है. राम और कृष्ण हमारी सभ्यता और संस्कृति के प्रतिक ही नहीं, बल्कि इन दोनों व्यक्तित्वों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है. हालाँकि और भी बहुत से कारण और व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने मानवीय जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित किया है, लेकिन इन दोनों (राम और कृष्ण) का प्रभाव हमारे साहित्य, समाज, संस्कृति आदि पर व्यापक रूप से पडा है.
भारतीय साहित्य में राम और कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को बहुत बृहत् रूप में उदघाटित किया गया है. इन दोनों का जीवन और कर्म हमारे लिए प्रेरक हैं और आज ही नहीं, बल्कि जब तक मानव इस धरा पर रहेगा वह इन दोनों से प्रभावित होता रहेगा. यह दोनों सभ्यता और संस्कृति के निर्माण और विध्वंस के नायक रहे हैं. इसलिए इन दोनों के जीवन को समझने के लिए हमने एक निरपेक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता के साथ-साथ एक मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है. आज तक श्रीराम और श्रीकृष्ण को आस्था के दृष्टिकोण से ही देखने का प्रयास किया गया है. उन्हें कभी इतिहास और मानवीय दृष्टिकोण से नहीं देखा गया. अगर राम और कृष्ण को इतिहास के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया जाए तो इन दोनों के जीवन का मकसद ही मानवीय मूल्यों की स्थापना करना रहा है. मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता के लिए महाभारत का यह कथन कितना सार्थक है. ‘तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः’ अर्थात “सभी तीर्थों में हृदय ही परम तीर्थ है, पवित्रता में हृदय की शुचिता ही प्रमुख है”. हृदय की शुचिता को भारतीय साहित्य में बहुत गहराई से समझाया गया है और इसके अनेक उदहारण हमें देखने को मिल जाते हैं. हृदय से पवित्र व्यक्ति अपनी पवित्रता के कारण ईश्वर तक को पाने में समर्थ हो सकता है, वह उससे मनचाहा वर प्राप्त कर सकता है. अपने व्यक्तित्व को और उज्जवल बना सकता है. इसलिए हमारे देश में व्यावहारिक जीवन में भी पवित्र हृदय व्यक्ति को ऊँचा स्थान दिया जाता है.
लेकिन वर्तमान सन्दर्भों में हम देखें तो परिस्थितियाँ कुछ बदली हुई नजर आती हैं. आज हम प्रत्येक कर्म के लिए दूसरे को दोषी ठहराना अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं. जबकि हम भी कहीं न कहीं उसमें भागीदार होते हैं. जैसे आजकल एक जूमला बड़ा प्रयोग हो रहा है कि यह अमरीकी संस्कृति का प्रभाव है, या हमारे देश के युवा पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं, आज नशा करना, चोरी करना, डकैती करना, मारपीट करना तो व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. इससे भी आगे व्यक्ति अब व्यक्ति के खून का प्यासा बना फिरता है. आज पूरे विश्व के हालात ऐसे हैं कि व्यक्ति कहीं भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करता. उसके अंतर्मन में डर बना रहता है और वह डर उसे विचलित करता रहता है. आम व्यवहार में भी ऐसी स्थितियां पैदा हो चुकी हैं कि व्यक्ति अपनी भौतिक लालसाओं के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और गिर रहा है. जब स्थितियां ऐसी हैं तो एक सुन्दर और स्वस्थ समाज की परिकल्पना करना बेमानी साबित होती है.
हमें आज ऐसा माहौल तैयार करने की जरुरत है जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सर्वांगीण विकास की तरफ प्रवृत हो. भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति या संसारिक उपलब्धियां व्यक्ति के जीवन का एक पक्ष हो सकती हैं, लेकिन जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए उसे अन्य पहलूओं की तरफ भी ध्यान देने की जरुरत है. वैसे भारतीय जीवन पद्धति कितनी वैज्ञानिक थी. जीवन को 16 संस्कारों और चार वर्गों में विभाजित किया गया था और जीवन के हर एक पड़ाव का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. लेकिन आज ऐसा नहीं है, माता-पिता बच्चों को सिर्फ और सिर्फ हॉट कलर जॉब के लिए तैयार कर रहे हैं और जब वह बच्चे बड़े होते हैं तो वहीँ कहीं न कहीं उनके लिए दुःख का कारन भी बन रहे हैं. आज आवश्यकता है दूसरों पर दोषारोपण के बजाय अपने आसपास के वातावरण को बदलने की, ताकि आने वाली पीढ़ियों के हाथ में हम एक सुन्दर सामाजिक व्यवस्था सौंप कर जाएँ.