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18 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...3

2 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए हैं उनका स्तर उपदेशात्मक ही रहा है. वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए हैं. हालाँकि इस धरती पर बहुत से महापुरुष-गुरु-पीर-पैगम्बर और समाज सुधारक पैदा हुए हैं, जिन्होंने मानव को मानवीय पहलूओं के विषय में बताने की कोशिश की है. साथ ही यह भी प्रयास किया है कि हर कोई अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर अपने जीवन को दूसरों के भले के लिए अर्पित कर दे. लेकिन ऐसा हो कहाँ पा रहा है, आज के भौतिकवादी दौर में अधिकतर लोग भौतिक सुखों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने पूरे समाज के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है. ऐसे में युवाओं को अतीत से अनुभव लेकर, वर्तमान में अपने विचारों और कर्म में परिवर्तन करते हुए भविष्य के लिए एक सुन्दर से संसार की नींव रखनी चाहिए. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि इनसान चाहे जिनती भी भौतिक उन्नति कर ले, अन्ततः उसे मनुष्य के साथ की जरुरत ही पड़ती है. मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव ही ऐसा भाव है जो इस भौतिक उन्नति की प्रासंगिकता को और बढ़ा सकता है. जब तक मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव नहीं होगा तब तक हम इस भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति से कोई ख़ास लाभ नहीं ले सकते. ऐसे में युवाओं को थोडा चिन्तन-मनन कर आगे बढ़ने की जरुरत है. उसके लिए सबसे पहले उन्हें समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझना होगा और देश और दुनिया के परिदृश्य को बदलने के लिए गम्भीर और जिम्मेवार प्रयास की तरफ कदम बढ़ाना होगा. कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिन पर अगर हम थोडा चिन्तन मनन करें तो दुनिया को बदलने में युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है.
     1.   अपने अस्तित्व के विषय में विचार करें: हम दुनिया में तमाम तरह की उपलब्धियां अर्जित करने का प्रयास करते हैं. बचपन से लेकर मृत्यु तक हम कुछ न कुछ ऐसा अर्जित करने के विषय में सोचते रहते हैं जिससे हमारे यश-मान-सम्मान में वृद्धि होती रहे. दुनिया के बीच में नाम होता रहेहम जहाँ भी जाएँ लोग हमें एकदम पहचान लेंऔर ऐसा भी प्रयास मनुष्य का रहा है कि मृत्यु के उपरान्त भी लोग उसे याद करते रहें. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मनुष्य शरीर और शरीर के बाद भी अमर होने के लिए प्रयत्नशील रहा है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है कि मनुष्य को भाग्य के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना चाहिए और अपने जीवन काल में जितना वह कर्म कर सकता है करना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का नुकसान हो. हमारे आगे बढ़ने की दौड़ में कई बार हम अपने साथियों का ही अहित कर देते हैं तो फिर वैसी उपलब्धि का क्या लाभजिसे दूसरों के हक़ मार कर हासिल किया गया हो. यही वह प्रश्न है जो हमें अपने अस्तित्व के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है. अपने कॉलेज के दिनों में मैं एक वाक्य अपनी हर नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा करता था. After all what we are, what is our entity, when we see the universe, where we stand. यह वाक्य मुझे हमेशा आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता रहता. हम क्या हैंयह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर मनुष्य सोचना शुरू करे तो उसके जीवन की कई उलझने तो स्वतः ही समाप्त हो जाएँलेकिन मनुष्य है कि कभी वह इस प्रश्न पर विचार ही नहीं करता. इसलिए युवाओं को कुछ भी करने से पहलेसंसार की तमाम उपलब्धियों की तरफ बढ़ने से पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका अस्तित्व क्या है इस संसार मेंमैं इस प्रश्न का जबाब नहीं दूंगा आप स्वयं सोच लेनाक्योँकि मैं आपको किसी दायरे में नहीं बांधना चाहता कि आप यह हैंआप वो हैंजो कि अब तक होता आया है. लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आप दुनिया में आगे जरुर बढ़ेंजो अरमान आपके हैंउनको पूरा करने के लिए बिलकुल प्रयास करेंलेकिन इतना जरुर सोचें कि आखिर यह सब किया किस लिए जा रहा है और आपको वास्तविक रूप में इससे क्या लाभ होने वाला है.
 2.   जाति के प्रश्न पर तर्क के साथ सोचें: आज दुनिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि हमें जाति जैसे प्रश्न पर विचार करने की जरुरत है. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है जो हमें दिखाई दे रही है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य से मनुष्य के बीच में शरीर की खाई बेशक न होलेकिन मन के स्तर पर मनुष्य से मनुष्य के बीच में गहरी खाई व्याप्त हैऔर यह खाई ऐसी है जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह कितनी गहरी है और कितनी दर्दनाक है. जाति का प्रश्न ऐसा प्रश्न है जो मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाता है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि ताउम्र मनुष्य इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. हालाँकि ऐसा नहीं है कि जाति के प्रश्न पर आज तक विचार नहीं किया गयाइस प्रश्न विचार किया गया हैकई सामाजिक आन्दोलन हुए हैंबहुत कुछ लिखा गया हैलेकिन फिर भी जाति का जिन्न ऐसा है कि यह अन्दर ही अन्दर अपना विकास करता रहता है और समय आने पर अपना रूप दिखा देता है. मुझे लगता है कि मनुष्य से मनुष्य को दूर करने का सबसे बड़ा उपकरण जाति व्यवस्था के रूप में समाज में ऐसा पल्लवित-पुष्पित किया गया है कि इससे बाहर कोई आना ही नहीं चाहता. लेकिन जाति का बजूद क्या हैइस पर कोई तार्किक उत्तर भी नहीं मिल पाता. भारत के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि यहाँ कि सबसे छोटी समझे जाने वाली जाति भी अपने से छोटी जाति ढूंढ लेती है. ऐसी स्थिति में समाज में विघटन की स्थिति पैदा होती रही है. जाति की यह व्यवस्था किसी एक देश में ही व्याप्त नहीं हैकमोवेश इसकी उपस्थिति दुनिया के हिस्से में है. लेकिन हमारे देश में तो यह इतनी विकराल रूप से व्याप्त है कि हम जितनी जल्दी इस जाति से छुटकारा पा लेंउतना ही हमारे लिए अच्छा है. क्योँकि आज जितनी भी विसंगतियां हमारे समाज में मौजूद हैंउनके मूल में जाति एक बड़ा आधार है. जब हम इस प्रश्न पर तर्क के साथ सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि जाति का अस्तित्व सिर्फ मानसिक हैइसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है. हमें जितनी जल्दी या बात समझ आएगी उतना ही हमारे लिए भी यह अच्छा होगा. यूवाओं से यह अपेक्षा है कि वह इस रूढ़ि को समाज से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास करे. शेष अगले अंक में..!!! 

08 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...2

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे...हम अपने आसपास की चीजों को जब समझने की कोशिश करते हैं तो हमें समझ आता है कि इस समाज में कितना कुछ है जिसका हमारी जिन्दगी से कोई सीधा सरोकार नहीं है, और कितना कुछ ऐसा है जिसे हमें अपनाने की जरुरत है. अमूमन तो ऐसा होता है कि हम अपने सामाजिक परिवेश में जो कुछ घटित हो रहा होता है उससे खुद को अलग ही रखते हैं और अगर कहीं ध्यान भी जाता है तो हम उसे बदलने का प्रयास भी नहीं करते. ऐसे माहौल में कई पीढियां जीवन जी लेती हैं, लेकिन समाज वहीँ का वहीँ खड़ा रहता है. अगर कोई समाज की गैर जरुरी मान्यताओं पर प्रश्न करता है तो उसे वह समाज ही बहिष्कृत कर देता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि समाज में कोई बुराई व्याप्त नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि उस बुराई को हटाने के लिए किसी ने प्रयास नहीं किये हैं. समाज में बुराइयों को जन्म देने वाले लोग भी रहे हैं और उन बुराइयों को मिटाने वाले भी पैदा होते रहे हैं. लेकिन बुराइयां पैदा करने वाले और उन्हें मानने वाले लोगों की संख्या हमेशा अधिक रही है और उन्हें मिटाने वाले और उनका अनुसरण करने वालों की संख्या बहुत कम रही है. इसलिए दुनिया में जितने भी महामानव पैदा हुए हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में जिन बुराईयों को मिटाने का प्रयास किया, उनके जाने के बाद लोग फिर उन्हीं बुराईयों की तरफ प्रवृत होने लगे. इसलिए दुनिया में सामाजिक स्तर पर बहुत कम परिवर्तन देखने को मिलते हैं.
हम अगर दुनिया का पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखें तो हमें समझ आता है कि इस काल का इतिहास मानव जीवन में सबसे ज्यादा उथल-पुथल का इतिहास रहा है. इन हजार वर्षों में मानव ने एक और जहाँ भौतिक-तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से काफी उन्नति की, वहीँ दूसरी और कुछ ऐसी परम्पराओं को भी उखाड़ फैंका जो मनुष्य को मनुष्य से दूर करने का कारण बनी हुई थी. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हजार वर्षों में जो कुछ भी हुआ वह सकारात्मक ही हुआ, इस कालखंड में बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ और उसने ऐसा वातावरण मनुष्य के सामने पेश किया कि मानवता की पैरवी करने वाले दांतों तले ऊँगली दबाते ही रह गए. लेकिन यह हुआ किस कारण, उसका एक सटीक सा जबाब है, मनुष्य की नासमझी के कारण. कुछ सत्ता लोलप और अपने अहम् में डूबे लोगों के कारण. जिन्होंने पूरी मानवता को ही विनाश के कगार पर ला खडा कर दिया. अगर हम भारत के ही इतिहास को देखें तो कौन भूला है मुगल आक्रमणकारियों की लूट-पाट को, कौन भूला है सत्ती प्रथा के दर्दनाक मंजर को, कौन भूला है सिक्ख गुरुओं के साथ हुए सलूक को, और कौन भूला है आजादी के दौर में शहीद हुए उन लाखों नौजवान वीर और वीरांगनाओं को. विश्व के इतिहास में भी ऐसे दर्दनाक पहलू भरे पड़े हैं. कुछ हादसे रुढियों के नाम पर हुए हैं, तो कुछ प्रगतिशीलता के नाम पर. लेकिन इन सबके बीच जो चीज सबसे महत्वपूर्ण रही है, वह है मनुष्य की स्वार्थ की प्रवृति और इसी प्रवृति के कारण कुछ लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं, जिनके कारण पूरी मानवता और मानवीय चेतना पर संकट पैदा हुए हैं. ऐसा नहीं है कि आज यह संकट नहीं है, आज भी ऐसे संकटों का माहौल बदस्तूर जारी है और उसके परिणाम बीती सदी में हुई घटनाओं से कहीं ज्यादा गंभीर हैं. लेकिन आज हमारा ध्यान उस तरफ जा कहाँ रहा है? हम एक तरह से गुमराह दौर में जी रहे हैं और अपनी सुविधाओं और स्वार्थों की पूर्ति से आगे हमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है. आज फिर वही दौर और वही घटनाएँ नए अंदाज में घट रही हैं, जो पूर्व काल में घट चुकी हैं. लेकिन किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं है. जो थोड़े बहुत प्रयास ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हुए भी हैं, वह भी आज के दौर में नाकाफी हैं.    
ऐसे में युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. क्योँकि आज तक जिनती भी क्रांतियाँ इस धरा पर हुई हैं उनमें युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. युवा किसी भी देश की अमूल्य धरोहर होते हैं, अगर वह अपने समाज और परिवेश के प्रति सजग रहते हैं तो फिर विश्व की ऐसी कोई ताकत नहीं जो युवाओं को उनके मंतव्यों से पीछे हटा दें. इतिहास में हुई अनेक सफल क्रांतियों का नेतृत्व युवाओं ने किया है. इसलिए आज वैश्विक स्तर पर यह जरुरत महसूस की जा रही है कि युवा अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति सचेत रहें और जो कुछ समाज में विघटन का कारण बन रहा है उसे हटा देने के लिए प्रयास करें. आज जहाँ दुनिया अनेक खेमों-विचारधाराओं में बंट चुकी है, उसके कारण कई तरफ के नकारात्मक भाव मानव के जहन में भरे जा रहे हैं तो ऐसे में हमें दुनिया को वास्तविक रूप से समझने के लिए पुनः प्रयास करने की जरुरत है. हालाँकि आज हम यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं, लेकिन ऐसे दौर में भी ऐसी अनेक बंदिशें मनुष्य से मनुष्य के बीच में पैदा की गयी हैं कि आये दिन विश्व में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहता है जो मानवीय भावों के विपरीत होता है. दुनिया एक और बारूद के ढेर में तब्दील होती जा रही है, और दूसरी ओर हर कोई अपने आप को समृद्ध और शक्तिशाली घोषित करने की फिराक में है. वह विकास की बात कह कर दुनिया को विनाश के रास्ते पर धकेल रहा है. यह कुछ ऐसे पहलू हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं. हमें देश और दुनिया में जो समस्याएं पैदा हुई हैं उनके सतही और कानूनी हल खोजने की बजाय वास्तविक हल खोजने की जरुरत है और उसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हम अपने आप से शुरुआत करें, अपने परिवेश और समाज से शुरुआत करें. जब हम और हमारा समाज बदल जाएगा तो फिर दुनिया अपने आप ही बदल जायेगी. शेष अगले अंक में...!!! 

25 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...3

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गत अंक से आगे... मन वचन और कर्म के पहलुओं को समझाने की कोशिश कई तरीकों से की जाती. गाँव के बुजुर्ग गाँव के हर बच्चे के साथ अपने बच्चे जैसा व्यवहार करते, इसलिए बच्चों के पास कोई अवकाश नहीं होता था कि वह किसी के साथ उदंडता से पेश आये. अगर कभी ऐसी भूल हो भी जाती थी तो वहीं बच्चे को उसकी भूल का अहसास करवा दिया जाता. अगर कहीं बात गलती से घर तक पहुँच जाती थी तो और भी डांट पड़ती. इसलिए गाँव में बुजुर्गों के प्रति सबके मन में सम्मान का भाव बना रहता और बुजुर्ग भी सबको हमेशा मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देते, सबका सम्मान और सहयोग करने की तरफ प्रेरित करते. हर घर में ऐसा माहौल होता कि वहां किसी भी तरह का कोई अनुशासन भंग नहीं होता. घर के सञ्चालन का मुख्य जिम्मा स्त्रियों के हाथ होता, उसमें सबसे बड़ी भूमिका घर में सबसे वरिष्ठ स्त्री की होती, कोई भी निर्णय मिल बैठकर सबकी सहमति से लिया जाता. उसके पीछे एक और भी कारण था कि गाँव में सभी लोग एक दूसरे के सम्मान के साथ-साथ अपने घर का सम्मान भी बनाये रखना बखूबी जानते थे. घर में कोई आपसी मन मुटाव हो तो उसे घर पर ही सुलझाने की कोशिश की जाती, अगर फिर भी कोई मामला नहीं सुलझता है तो गाँव के किसी वरिष्ठ और सम्मानीय व्यक्ति को बुलाकर सुलझाने की कोशिश की जाती और अधिकतर मामले वही शांत हो जाते. मन मुटाव वहीं समाप्त हो जाते और सभी एक ही छत के नीचे प्रेम और सहयोग से रहने की कोशिश करते. गाँव का माहौल मुझे इसलिए भी अच्छा लगता क्योंकि वहां व्यक्ति किसी के प्रति मन में इर्ष्या, द्वेष का भाव नहीं रखता, घर-परिवार से लेकर समाज तक सब एक दूसरे की इज्जत करते और सहयोग करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते.
कुल मिलाकर गाँव में जो वातावरण आज से 10-15 साल पहले तक था वह ऐसा ही था और इससे पहले और भी बेहतर, जैसा कि मुझे मेरे दादा जी बताया करते थे. वह अपने जीवन काल में भी गाँव के बदलते माहौल के लिए चिन्तित दिखाई देते थे. उनकी मृत्यु आज से 10 साल पहले हुई, उनके जाने के बाद मेरे जीवन में न भरा जाने वाला खालीपन आ गया. मेरे सबसे अच्छे दोस्त की तरह थे वह. मेरे जीवन को संवारने में उनकी भूमिका सबसे ज्यादा है. फिर धीरे-धीरे गाँव बदलने लगा. गाँव क्या बदला लोग बदलना शुरू हुए. हालाँकि इस बदलाव के बीज एकदम नहीं उगे थे, यह धीरे-धीरे हो रहा था. जैसे-जैसे भौतिक संसाधन लोगों के पास आना शुरू हुए, लोगों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव जाता रहा. पहले जहाँ सिर्फ जमीन-जायदाद और घर आदि को लेकर भाइयों में कहा सुनी होती थी अब उसके बीच में पैसा भी आ गया. लेकिन पुश्तैनी जायदाद के लिए पहले से नियम बना था तो वह ज्यादा परेशानी का कारण नहीं था किसी के लिए. जब भी किसी को अपने परिवार से अलग होना हो तो वह उन नियमों का पालन करते हुए अपनी नयी दुनिया बसा सकता था, लेकिन वहां पर गाँव की जो समीति होती, जिसे हम ‘प्रजा’ कहते हैं. उसमें वह घर के बड़े सदस्य या पिता की सहमति के बाद ही शामिल हो पाता. क्योंकि बहुत से ऐसे अधिकार जो व्यक्ति के लिए गाँव में जीवनयापन करने के लिए जरुरी होते हैं, वह प्रजा के पास सुरक्षित रहते. इसलिए परिवार से अलग होने का साहस वही करता, जिसे अपने परिवार से कोई ज्यादा परेशानी हो, वर्ना संयुक्त परिवार में आनन्द लेते हुए ही जीवन कट जाता. लेकिन आज गाँव में संयुक्त परिवार इक्का-दुक्का ही देखने को मिलते हैं. वर्ना माहौल ऐसा होता कि बच्चों को परदादा तक के दर्शन अपने जीवन काल में हो जाते, लेकिन आज बदलते दौर में परदादा के तो कहाँ माता-पिता के पास भी बच्चों के लिए समय नहीं है.
आज गाँव में बदलाब की बयार हर स्तर पर देखी जा रही है. उपरी स्तर पर देखने से लगता है कि गाँव की हालत सुधर रही है, विकास हो रहा है. हर गाँव तक सड़क पहुँच गयी है, आने जाने के साधन हैं. लोगों के घरों के बाहर गाड़ियां देखने को मिल जाती हैं. हर घर के हर कमरे में टीवी लगा हुआ है. 15 से ऊपर के हर व्यक्ति के पास मोबाइल फ़ोन हैं. इन्टरनेट की सुविधा भी धीरे-धीरे बेहतर होती जा रही है. लोग टीवी बहसों के आधार पर देश की दशा और दिशा पर चर्चा करने लगे हैं. राजनितिक पार्टी के समर्थन और विरोध के आधार पर दोस्त और दुश्मन बन रहे हैं, रिश्तों में बनावटीपन आता जा रहा है. महिलाओं का परिधान बदल गया है. पुरुष भी भौतिक चकाचौंध से दूर नहीं हैं, उन्होंने भी खुद को बदलते परिवेश के अनुरूप खुद को ढाल लिया है. गाँव में विद्यालय जरुर खुल गए हैं, लेकिन शिक्षा के नाम पर वहां लीपापोती के अलावा कुछ नहीं होता. गाँव का बचपन भी अब अठखेलियाँ नहीं करता, वह किसी बुजुर्ग का सम्मान नहीं करता. वह अब किसी के सामने श्रद्धा से नहीं झुकता. अब गाँव का बच्चा भी अपने पराये का भेद करने लगा है. गाँव का व्यक्ति अब टोली बनाकर घर से बार नहीं निकलता. वह पैसे के दम पर सब कुछ हासिल करने की कोशिश करता है. उसे भी लग रहा है कि भौतिक उन्नति ही जीवन का मूल लक्ष्य है और इसके लिए वह अपने सम्बन्धों को भी दरकिनार कर रहा है. अब उसके पास पडोसी से बात करने का समय नहीं वह अपनी ही धुन पर अपनी डपली बजा रहा है, चाहे किसी कोई परेशानी ही क्यों न हो.
आज गाँव और शहर में कोई अन्तर नहीं रहा गया है, बस एक ही अन्तर है भौगोलिक. इसी आधार पर अब गाँव और शहर में अन्तर किया जाता है. बाकी सब चीजें और व्यक्ति की फितरत वही है जो आज का इनसान कर रहा है और ऐसी फितरतों के आधार पर वह खुद को शिक्षित और बुद्धिमानी साबित करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन भीतर से देखें तो आज का इनसान बाहर से चमकीला जरुर है, लेकिन भीतर से वह खोखला है. गाँव का परिवेश भी इससे अछूता नहीं रहा. अब मेरा गाँव गाँव नहीं रहा, मिटटी वही है, लेकिन उस मिटटी से बने लोग बदल गए हैं और बदलने का यह क्रम हमें संवेदना विहीन कर रहा है. विकास का खोखला नारा हमें अपने बजूद से दूर कर रहा है. मनुष्य तू समझ क्योँ नहीं रहा है. अपने बजूद को बचाए रखने के लिए हमें मानवीय भावों को अपनाना होगा, वर्ना हमारे पास भौतिक साधन तो जरुर होंगे, लेकिन एक अदद इनसान की कमी जीवन में खलती रहेगी. हम गाँव को जरुर बदलें जो हमारे लिए सुविधाजनक हो, सुखद हो, लेकिन मानवीय भावों और संवेदनाओं को हमें जिन्दा रखना होगा, प्रेम और सहयोग को बढ़ाना होगा, सचमुच का इनसान बनना होगा. 

22 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...2

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गत अंक से आगे.... गाँव में जीवन का क्रम जन्म से लेकर मृत्यु तक एक दूसरे के सहज सहयोग पर आधारित होता. लेकिन फिर भी कहीं पर मानवीय स्वभाव और स्वार्थ जरुर सामने आता, और यह जीवन की वास्तविकता भी है. फिर भी गाँव में जीवन सदा ही सुखद और सहज महसूस होता. कहीं कोई भागदौड नहीं, कोई लालसा नहीं, सब कुछ सहज और शान्ति से घटित होता. मैंने अपने जीवन काल में ही मनुष्य के स्वाभाव में बहुत परिवर्तन होते देखे हैं तो मैं कैसे सोच लूं कि गाँव के मनुष्य का स्वभाव नहीं बदलेगा. आज हम जिस भौतिक उन्नति को मानवीय विकास का आधार मान रहे हैं उसका प्रभाव गाँव पर भी पड़ा है और वहां भी उन सब चीजों पर प्रभाव देखने को मिलता है जो हमें शहरों में देखने को मिलता है.
मैं एक बार फिर अपने अतीत में झांककर देखने को कोशिश करते हुए गाँव के जीवन को याद कर रहा हूँ. मैं जिस क्षेत्र में पैदा हुआ हूँ, वहां पर अक्तूबर से मार्च-अप्रैल तक बर्फ पड़ने के कारण पूरी घाटी का सम्पर्क शेष विश्व से कट जाता. हालाँकि गर्मी के मौसम में भी घाटी से बाहर जाने के लिए दुर्गम रास्तों का सफर तय करना पड़ता, और यही वह मौसम होता जब घाटी के लोग अपने आवश्यक सामान आदि इकठ्ठा करना शुरू कर देते. पशुओं के लिए घास आदि इकठ्ठा करके रखा जाता. मेरे गाँव की दुनिया एक अलग ही दुनिया है. एक अलग तरह का अहसास मुझे अब भी उस दौर में ले जाता है तो मैं रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकता. हालाँकि यहाँ के जीवन की अपनी परेशानियां और संघर्ष हैं. लेकिन यहाँ लोगों के एक दूसरे के प्रति अथाह प्रेम, सहयोग और विश्वास किसी भी प्रकार के कठिन समय को काट देते. लोगों का एक दूसरे से मिलजुल कर रहना एक अलग ही अहसास देता. पूरा गाँव एक दूसरे के सुख-दुःख का बराबर सांझीदार होता. ख़ुशी में सब खुश होते, और गम में सब दुखी. ऐसे ही कटता गाँव के जीवन का सफर.
गर्मियों के मौसम में लोग जहाँ मिलजुल कर कृषि सम्बन्धी कार्य करते. इस दौरान प्रकृति जिस रूप में अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से सबके मन को मोह लेती वह एक अलग ही आकर्षण होता. लेकिन सर्दी का मौसम भी कम रोमांचक नहीं होता. गर्मी के मौसम में जहाँ प्रकृति अपने सौन्दर्य से सबको अपनी और आकर्षित करती, वहीँ सर्दियों के मौसम में यहाँ के स्थानीय त्यौहार एक खुशनुमा माहौल बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते. कुल मिलाकर घाटी में पूरे वर्ष कुछ न कुछ सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती रहती, जो लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखती. एक तरफ जहाँ गर्मी के मौसम में प्रकृति के रंगों के साथ-साथ त्यौहार आयोजित किये जाते तो सर्दी के मौसम में भी वही क्रम चलता रहता. इन सब कार्यक्रमों में लोगों का उत्साह, सहयोग और प्रेम देखते ही बनता था.
गाँव के लोग जहाँ गर्मी के दौरान अपना अधिक समय जंगलों और खेतों में व्यतीत करते. वहीँ सर्दी के मौसम में गाँव में ही पूरा समय व्यतीत होता. इस दौरान गाँव के लोग घर के अन्दर रहकर ही अपने कार्यों को निपटाते. कुल मिलकर व्यवस्था ऐसी होती कि सर्दियों में अलग काम किये जाते और गर्मियों में अलग काम. गर्मियों के मौसम में कृषि से सम्बन्धित कार्य अधिक किये जाते और सर्दियों के मौसम में घर के अन्दर रहकर किये जाने वाले कार्य किये जाते. जैसे ऊन कातने से लेकर हथकरघे पर कपड़ा बनाना. इस कार्य को स्त्री को पुरुष दोनों मिलकर करते. महिलायें भी ऐसे कामों में दक्ष होती. वह अधिकतर गेहूं की पुआल से कई तरह की चीजें बनाती, जैसे पाँव में डालने के लिए जूता (जिसे स्थानीय बोली में ‘पूले’ कहा जाता). उसमें भी ऐसे डिजाईन बनाये जाते कि उन्हें देखकर ही मन इस कला पर मुग्ध हो जाता. गेहूं के पुआल से ही चटाई आदि भी बनाई जाती. ऐसे अनेक काम होते जिन्हें लोग अकसर सर्दियों के मौसम में ही करते. सबसे बड़ी बात यह कि यह सब काम समूह में मिलकर सहयोग से किये जाते.
गाँव में वैसे तो हर वक़्त कुछ न कुछ चला रहता. सर्दियों के शुरू होते ही लोग अखरोट की गिरी निकालने का काम करते. हमारे क्षेत्र में अखरोट बहुत मात्रा में पैदा होता है. इसलिए उसकी गिरी से लेकर तेल निकालने तक का कार्य घर में ही किया जाता. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इस काम में काफी सहयोग और रोमांच से भाग लेते. इसके अलावा और भी छोटे-छोटे और रोचक काम गाँव का हर व्यक्ति अपने हिसाब से करता रहता. कोई जुराब बना रहा है तो कोई स्वेटर बुन रहा है. कोई ऊन कात रहा है तो कोई कपड़ा बन रहा है. कुल मिलाकर गाँव के लोग कभी भी बेकार बैठकर अपना समय कभी भी बर्बाद नहीं करते. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई अपने-अपने हिसाब से व्यस्त रहने की कोशिश करता.
मेरे गाँव में एक और विशेष बात होती, वह यह कि वहां एक बड़े बुद्धिजीवी व्यक्ति थे और लोग सर्दियों में उन्हें अपने घर कथा कहने के लिए बुलाते, इस कथा को बड़े ध्यान से सुना जाता. बच्चे जवान बुजुर्ग सब शामिल होते. कई बार तो ऐसा माहौल बनता कि पूरा गाँव ही किसी एक के घर में इकठ्ठा हो जाता और बड़ी तन्मयता से उन कहानियों को सुनता. उन कहानियों को सुनने और सुनाने की एक विशेष व्यवस्था होती, सबसे बड़ी बात तो यह होती कि बच्चे इन सब गतिविधियों में बड़े उत्साह से भाग लेते और कई बार उनके मासूम सवाल लोगों को अचरज में डाल देते. इन कहानियों में साहस, प्रेम, दया, करुणा और बलिदान के अनेक किस्से होते जो सबके मन पर प्रभाव डालते, और जीवन में वैसा कुछ करने के लिए प्रेरित करते. कई बार कुछ कहानियाँ कई दिनों तक चलती दो या तीन दिन तक लेकिन लोग नए अंक को सुनने के लिए बड़ी तन्मयता से पहुँच जाते. एक अलग सा ही अहसास होता है अब मुझे उस दौर के बारे में सोचकर. इन कहानियों में जीवन का हर पहलू बड़ी बारीकी से अभिव्यक्त किया जाता. कहानी सुनाने वाले के साथ एक और व्यक्ति रोचकता बनाये रखने के लिए उससे बीच-बीच में “जी भाई जी” जैसे शब्द कहते हुए कहानी को आगे बढाने में सहायक होता.
गाँव का जीवन कई मायनों में बड़ा परम्परा से बंधा हुआ माना जाता है, मैंने अपने गाँव में परम्पराएँ तो देखी, लेकिन परम्पराओं को निभाने के प्रति कोई कट्टरपन कभी नहीं देखा. अनुशासन की जहाँ तक बात है तो वह हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत मायने रखता है और गाँव के लोग इस विषय में काफी ध्यान देते. इस अनुशासन का पालन व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक किया जाता. दैनिक गतिविधियों में भी अनुशासन का कड़ाई से पालन करने की बात की जाती, सुबह जागने से लेकर रात्रि सोने तक. खान-पान से लेकर आचार व्यवहार तक. शेष अगले अंक में...!!!

18 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...1

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गाँव से बाहर रहते हुए मुझे लगभग 16 वर्ष हुए हैं. 2000 से 2005 के बीच के समय में साल में लगभग दो से तीन महीने गाँव में गुजरते थे. लेकिन 2005 के बाद यह सिलसिला महीने भर का हो गया और अब पिछले तीन-चार सालों से कुछ ऐसा सबब बना है कि साल दो साल में 10-15 दिनों के लिए ही गाँव जाना होता है. ऐसा नहीं है कि मुझे गाँव की याद नहीं आती. शुरू में जब गाँव से बाहर कॉलेज में अध्ययन करने आये थे तो 10-15 दिन की छुट्टी में भी गाँव जाने का मन होता. लेकिन गाँव जाना दुष्कर था. फिर भी जब परीक्षाएं समाप्त होती तो उसी दिन ही गाँव की तरफ चल पड़ते. कॉलेज में पढने वाले सभी साथी उन्हीं दिनों ही टोली में अपने-अपने गाँव की तरफ लौटते, रास्ते में एक दो जगह रात गुजारनी पड़ती, सब साथ ही रहते. लड़के-लडकियां सब साथ चलते किसी को किसी तरह का भय नहीं, जान-पहचान हो न हो, लेकिन रास्ते में सब एक दूसरे के चहेते हो जाते. कहीं पैदल भी चलना पड़ता तो सब एक दूसरे का सहयोग करते. कठिन और दुर्गम रास्तों में सबका सफर हंसी-ख़ुशी से कटता और घाटी में पहुँचने के बाद सब अपने-अपने घरों में पहुँच कर ख़ुशी से सरावोर हो जाते. फिर जब साथियों से मुलाक़ात होती तो उस सफर पर ही अधिकतर चर्चा होती और फिर अगले सफर में साथ चलने की तारीख निश्चित की जाती. ऐसा रोमांचक दौर था हमारे कॉलेज के दिनों का.
जब मैं कॉलेज में पढ़ने के लिए घर से निकला तो एक भरे पूरे परिवार की यादें भी मेरे साथ ही रही. गाँव में जो प्यार मुझे सबसे मिलता, मुझे उसकी कमी अब भी महसूस होती है. घर में दादा-दादी से लेकर भाई-बहन सब थे. इसलिए मेरे पास यादों का पिटारा ज्यादा बड़ा था. मेरे बचपन के दोस्त और गाँव के बुजुर्ग सबकी याद मेरे जहन में थी. कुछ महीने तो ऐसे गुजरे कि जैसे मुझे अस्तित्वहीन कर दिया गया हो. मेरे लिए कॉलेज में पढ़ना तो सजा के समान हो गया. मैं अकेले में कई बार गाँव में गुजरी हर रात को याद करता तो आँखों में आंसू आ जाते, दिल वापस गाँव लौट जाने को कहता. मेरा बचपन मेरे ननिहाल में बीता था तो वह एक अलग ही अहसास था मेरे लिए. मुझे ननिहाल के हर व्यक्ति से प्रेम मिला था, इसलिए वहां की यादें मेरे लिए और भी भावुक करने वाली होती. कुल मिलाकर मैं जब गाँव से बाहर शहर की तरफ आया तो बहुत कुछ ऐसा था जिसे मैंने उसी दिन खो दिया था. इसी बीच कुछ महीनों में नानी जी का देहांत हो गया और मैं उनके अन्तिम दर्शन भी नहीं कर सका, जो मेरे लिए दुखद था.
खैर धीरे-धीरे यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा और मैं खुद को गाँव से बाहर की दुनिया से जोड़ने की कोशिश करता रहा. अब कॉलेज में दोस्त भी बन गए और कुछ स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध भी बन गए तो सुख-दुःख उन्हीं के साथ कटने लगा और मैं खुद को अध्ययन के लिए तैयार करने लगा. क्योंकि जिस मकसद से गाँव से इतने दूर आये थे उस पर ध्यान केन्द्रित करना जरुरी था और अब मन उसी  में रम जाना चाहता था. मैं कोशिश करता रहा और धीरे-धीरे मन गाँव से हटकर अब किताबों की दुनिया में खोने लगा. जैसे ही किताबों से मेरा प्रेम बंधा तो फिर अधिकतर समय या तो पुस्तकालय में बीतता या फिर पुस्तकों को खोजने के लिए पुस्तकों की दुकानों पर. अपने कॉलेज के दिनों में मैंने पाठ्यक्रम की पुस्तकें कम ही पढ़ी, लेकिन पाठ्यक्रम से बाहर जो भी बेहतर पुस्तक मिलती उसे पढ़ने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता. उसका लाभ यह हुआ कि मैं कभी पुस्तकों और अध्ययन के प्रति उदासीन नहीं हुआ और मैं जितना पढ़ता जाता, उतना मुझे खुद की कमी का अहसास होता. फिर मेरा मन और भी मेहनत करने को करता, धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आने लगी कि मैं गाँव की यादें भूल सी गया और पुस्तकों की दुनिया मेरे लिए सब कुछ हो गयी. जीवन भी क्या खेल खेलता है, मैं सोचकर ही असमंजस में पड़ जाता हूँ.
कॉलेज के सफर के तीन साल काफी कुछ अनुभव दे गए. अब मुझे कुछ समझ आने लगी थी. मैं अब कुछ चीजों के बारे में सोचने लगा था. मैं चाहे जो कुछ भी करने की सोचूं, गाँव हमेशा मेरी सोच के केन्द्र में रहता, हालाँकि वह आज भी है. फिर भी उस समय हर निर्णय गाँव को ध्यान में रखकर ही लिया जाता. मुझे शहर के जीवन में कोई ख़ास रोमांच नजर नहीं आया, सब औपचरिकता और बनावटीपन सा लगता. किसी के पास किसी के लिए समय नहीं. किसी भी घर में दो-चार से ज्यादा सदस्य नहीं, और उन सदस्यों में भी दो पति-पत्नी और दो बच्चे. लेकिन किसी के पास किसी के लिए वक़्त नहीं. कोई किसी की खबर नहीं रखता, किसी को किसी की ख़ुशी और गम से कोई लेना देना नहीं. कुल मिलाकर शहर के विषय में बहुत कुछ मुझे ऐसा लगा जो अमानवीय जैसा है, फिर भी लोग शहर को क्यों पसंद करते हैं? यह प्रश्न मेरे जहन में बार-बार उठता. इधर मैं गाँव के विषय में सोचता तो मुझे बड़ा आनन्द आता. वहां लोगों के पास एक दूसरे के लिए समय ही समय है. गाँव में जहाँ 15-20 सदस्यों का संयुक्त परिवार हो तो वह लोग बहुत भले और सम्मानीय माने जाते, उनका अपना ही रुतवा होता. इसके साथ ही सबके घर एक ही समूह में होते. सुबह-शाम बच्चे किसी के भी घर के अन्दर या बाहर हल्ला मचा सकते हैं, खेल सकते हैं, नाच-गा सकते हैं. बच्चों के लिए तो ऐसा माहौल होता कि पूरा गाँव ही उनका है. वह किसी के भी घर में जाएँ उन्हें वहां वह सब कुछ मिल जाएगा जिसकी जरुरत उन्हें अपने माता-पिता से होती. सब एक साथ रहते, खेलते-कूदते, लड़ते-झगड़ते और अपने बचपन को सहेजते.
इसी तरह गाँव में बुजुर्गों की भी अपनी ही दुनिया होती, वह बचपन और बुढ़ापे का आनन्द साथ-साथ ले रहे होते. क्योंकि घर के काम-काजी महिला-पुरुष अपने बच्चों को इन्हीं बुजुर्गों के हवाले रखते. एक ही घर में बच्चों के लिए बुजुर्गों के साथ अलग-अलग रिश्ते होते. वह किसी के दादा-दादी लगते तो किसी के नाना-नानी, बच्चे भी अपने बालपन में भूल से जाते कभी दादा-दादी को नाना-नानी कह देते तो, कभी कुछ जो उन्होंने किसी बड़े से सुन लिया उसका ही सम्बोधन वह घर के किसी भी सदस्य के लिए करते. बच्चों के साथ रहते हुए बुजुर्गों को अपना जीवन एकाकी नहीं लगता. वह हमेशा प्रसन्न रहते. सुबह और शाम का खाना सब मिलकर खाते और रात के खाने के बाद सभी मिलकर एक दूसरे से बातचीत भी कर लेते और अगले दिन की योजना बनाकर सभी आराम करते....शेषअगले अंकों में.

28 जून 2014

धूल चेहरे पर थी और मैं आईना साफ करता रहा

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दुनिया भर के श्रेष्ठ साहित्य का जब हम बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि दुनिया भर का अधिकतर साहित्य एक बिन्दु पर केन्द्रित है और वह बिन्दु है मानवीय मूल्यों का विकास या मानवीय मूल्यों की स्थापना.  आखिर ऐसा क्या है कि मानव को अपने मूल्यों का विकास करना पड़ता है. जबकि धरा पर जितने भी प्राणी रहते हैं उन पर यह नियम लागू नहीं होता. दुनिया भर में लिखे गए साहित्य का अधिकतर भाग मानवीय मूल्यों की स्थापना का है. भाषा चाहे कोई भी हो. रचना की विधा चाहे कोई भी हो. लेकिन सबके मूल में मानवीय मूल्यों को तरजीह दी गयी है. हमारे देश में ही वेदों से लेकर आज तक जितना भी साहित्य रचा गया है उसके केन्द्र में मानव रहा है और मानवीय मूल्यों की स्थापना इन सब रचनाओं का मूल उद्देश्य है. वेद को भारतीय जीवन की आत्मा के रूप में चिन्हित किया जाता है, तो उपनिषद को उसका संगीत माना जाता है, रामायण को हृदय की संज्ञा से अभिहित किया जाता है तो, महाभारत को उसका मस्तक माना जाता है, पुराण प्रज्ञा, दर्शन उसका गाम्भीर्य, धर्म मर्यादा और आचार को उसके मूल्यबोध के रूप में चिन्हित किया जाता है. साहित्य का यह संसार एक परिपूर्ण मानव की परिकल्पना से भरा पडा है और आज भी इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने के प्रयास किये जा रहे हैं.
जब हम गहराई से इस दुनिया के इतिहास को समझने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि इस दुनिया का ज्यादातर इतिहास मानव का मानव से प्रेम का नहीं, बल्कि मानव का मानव से संघर्ष का इतिहास है. इस धरा पर अनेक सभ्यताएं और संस्कृतियाँ जन्मी, उन्होंने अपने शीर्ष को हासिल किया और फिर काल का ग्रास बन गयी. समय के साथ-साथ उनका अस्तित्व मिटता गया. फिर एक नयी सभ्यता और नई संस्कृति ने जन्म लिया. देश काल और वातावरण के अनुरूप उस सभ्यता और संस्कृति ने अपने को स्थापित किया और फिर एक समय ऐसा आया कि वह भी समाप्त गयी. यह क्रम अनवरत रूप से चल रहा है सृष्टि के प्रारम्भ से और चलता रहेगा जब तक इस धरा पर मानव जीवन है. इसे ही हम परिवर्तन कहते हैं, और परिवर्तन को प्रकृति का एक अनिवार्य नियम माना जाता है. यहाँ यह बात गौर करने योग्य है कि प्रकृति के परिवर्तन और मानव के परिवर्तन में बहुत बड़ा अन्तर है.
हालाँकि यह बात भी हमें ध्यान में रखनी चाहिए कि मानव भी प्रकृति का एक हिस्सा है. इसकी संरचना और उसके जीवन का हर एक पक्ष प्रकृति से निसृत है. हम मनुष्य के शरीर की अवस्था से भी इस परिवर्तन और प्रकृति के नियम को समझ सकते हैं. मनुष्य के शरीर की अवस्थाओं बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था, बुढापा या विकास मनुष्य की अपनी इच्छानुसार नहीं होता. यह प्रकृति का नियम है कि बचपन से बुढ़ापा आएगा ही उसे कोई रोक नहीं सकता. अर्थात प्रकृति, पर्यावरण, समाज एवं जीवन में घटने वाली घटनाओं एवं परिस्थितियों को रोक पाना इसके वश में नहीं है. इसलिए मनुष्य भी परिवर्तन से अछूता नहीं है. लेकिन मानवीय सभ्यता और संस्कृति में जो परिवर्तन आते हैं वह मानव को पूरी तरह से परिवर्तित कर देते हैं. लेकिन प्रकृति में जो परिवर्तन आते हैं वह उसके काल चक्र का हिस्सा होते हैं. लेकिन मनुष्य में आये परिवर्तन काल चक्र का नहीं बल्कि उसकी प्रवृतियों में आये परिवर्तन का हिस्सा होते हैं.
इसे यूं भी समझा जा सकता है. प्रकृति अनवरत रूप से परिवर्तित होती रहती है. लेकिन वह एक चक्र के बाद वहीँ पहुँच जाती है, जहाँ से वह शुरू होती है. छोटे से छोटे स्तर से लेकर बड़े से बड़े स्तर तक इस चक्र को विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन मनुष्य के मामले में ऐसा नहीं है. आज हम सतयुग या त्रेता की सभ्यता और संस्कृति में नहीं जा सकते. वह घटित हो गया और अब उसकी पुनरावृति किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती. अब न तो राम इस धरा पर आ सकते हैं और न ही कृष्ण. न तो रावण का जन्म हो सकता है और न ही कंस का बध किया जा सकता है. राम और कृष्ण हमारी सभ्यता और संस्कृति के प्रतिक ही नहीं, बल्कि इन दोनों व्यक्तित्वों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है. हालाँकि और भी बहुत से कारण और व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने मानवीय जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित किया है, लेकिन इन दोनों (राम और कृष्ण) का प्रभाव हमारे साहित्य, समाज, संस्कृति आदि पर व्यापक रूप से पडा है.
भारतीय साहित्य में राम और कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को बहुत बृहत् रूप में उदघाटित किया गया है. इन दोनों का जीवन और कर्म हमारे लिए प्रेरक हैं और आज ही नहीं, बल्कि जब तक मानव इस धरा पर रहेगा वह इन दोनों से प्रभावित होता रहेगा. यह दोनों सभ्यता और संस्कृति के निर्माण और विध्वंस के नायक रहे हैं. इसलिए इन दोनों के जीवन को समझने के लिए हमने एक निरपेक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता के साथ-साथ एक मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है. आज तक श्रीराम और श्रीकृष्ण को आस्था के दृष्टिकोण से ही देखने का प्रयास किया गया है. उन्हें कभी इतिहास और मानवीय दृष्टिकोण से नहीं देखा गया. अगर राम और कृष्ण को इतिहास के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया जाए तो इन दोनों के जीवन का मकसद ही मानवीय मूल्यों की स्थापना करना रहा है. मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता के लिए महाभारत का यह कथन कितना सार्थक है. ‘तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः’ अर्थात “सभी तीर्थों में हृदय ही परम तीर्थ है, पवित्रता में हृदय की शुचिता ही प्रमुख है”. हृदय की शुचिता को भारतीय साहित्य में बहुत गहराई से समझाया गया है और इसके अनेक उदहारण हमें देखने को मिल जाते हैं. हृदय से पवित्र व्यक्ति अपनी पवित्रता के कारण ईश्वर तक को पाने में समर्थ हो सकता है, वह उससे मनचाहा वर प्राप्त कर सकता है. अपने व्यक्तित्व को और उज्जवल बना सकता है. इसलिए हमारे देश में व्यावहारिक जीवन में भी पवित्र हृदय व्यक्ति को ऊँचा स्थान दिया जाता है.
लेकिन वर्तमान सन्दर्भों में हम देखें तो परिस्थितियाँ कुछ बदली हुई नजर आती हैं. आज हम प्रत्येक कर्म के लिए दूसरे को दोषी ठहराना अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं. जबकि हम भी कहीं न कहीं उसमें भागीदार होते हैं. जैसे आजकल एक जूमला बड़ा प्रयोग हो रहा है कि यह अमरीकी संस्कृति का प्रभाव है, या हमारे देश के युवा पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं, आज नशा करना, चोरी करना, डकैती करना, मारपीट करना तो व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. इससे भी आगे व्यक्ति अब व्यक्ति के खून का प्यासा बना फिरता है. आज पूरे विश्व के हालात ऐसे हैं कि व्यक्ति कहीं भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करता. उसके अंतर्मन में डर बना रहता है और वह डर उसे विचलित करता रहता है. आम व्यवहार में भी ऐसी स्थितियां पैदा हो चुकी हैं कि व्यक्ति अपनी भौतिक लालसाओं के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और गिर रहा है. जब स्थितियां ऐसी हैं तो एक सुन्दर और स्वस्थ समाज की परिकल्पना करना बेमानी साबित होती है.
हमें आज ऐसा माहौल तैयार करने की जरुरत है जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सर्वांगीण विकास की तरफ प्रवृत हो. भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति या संसारिक उपलब्धियां व्यक्ति के जीवन का एक पक्ष हो सकती हैं, लेकिन जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए उसे अन्य पहलूओं की तरफ भी ध्यान देने की जरुरत है. वैसे भारतीय जीवन पद्धति कितनी वैज्ञानिक थी. जीवन को 16 संस्कारों और चार वर्गों में विभाजित किया गया था और जीवन के हर एक पड़ाव का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. लेकिन आज ऐसा नहीं है, माता-पिता बच्चों को सिर्फ और सिर्फ हॉट कलर जॉब के लिए तैयार कर रहे हैं और जब वह बच्चे बड़े होते हैं तो वहीँ कहीं न कहीं उनके लिए दुःख का कारन भी बन रहे हैं. आज आवश्यकता है दूसरों पर दोषारोपण के बजाय अपने आसपास के वातावरण को बदलने की, ताकि आने वाली पीढ़ियों के हाथ में हम एक सुन्दर सामाजिक व्यवस्था सौंप कर जाएँ.

16 जनवरी 2014

बदलावों की आहट...3

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गतांक से आगे वह बात तो भविष्य को बदलने की करते हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान और इतिहास की कोई ख़ास समझ नहीं होती, बस वह एक राग अलापते हैं और उसी के बल पर अपना प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करते हैं. नका सिर्फ एक ही मकसद है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाना, ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रभावित करना, उनसे समाज सेवा के नाम पर धन इक्कठा करना, उन्हें मानसिक रूप से ऐसा तैयार करना कि वह अपना सर्वस्व अर्पित करने के लिए तत्पर हो जाएँ. कुछ को तो मैंने बहुत बड़े-बड़े दावे करते हुए सुना है, वह कुछ ऐसी काल्पनिक कहानियाँ लोगों के बीच प्रचारित करते हैं जिनसे इनके सब कुछ होने की ख़बरें चारों और फैलती रहती हैं और आम जनता भ्रमित होती रहती है. आम लोग इसे ही बदलाव का नाम दे रहे हैं. लेकिन बहुत गहरे में उतरकर जब देखा जाता है तो स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं, लोग सिर्फ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी को अपना मार्गदर्शक समझ रहे हैं, कई बार तो मुझे ऐसा लगता है कि लोगों के लिए अब किसी तथाकथित “स्वयम्भू प्रभु” या नेता के पीछे चलना शान की बात हो गया है और लोगों की इसी मानसिकता का लाभ यह तथाकथित समाज सुधारक, अध्यात्म और धर्म, राजनीति आदि के नाम पर सुधार करने वाले लोग उठाते हैं. मैं बहुत बार सोचता हूँ कि अगर कहीं किसी के पीछे चलकर ही बदलाव आता तो आज हर कोई किसी न किसी का अनुसरण कर रहा है तो फिर दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता. क्योँकि जितने भी महान लोग इस धरा पर हुए हैं और ज्यादातर लोग जिनका अनुसरण करते हैं उन्होंने सदैव मानवता का ही पाठ पढ़ाया है और उनके विचारों में तो कोई भी बैर नहीं, कहीं किसी से कोई द्वेष नहीं, उन्होंने तो सम्पूर्ण सृष्टि को खुदा का कुनवा कहा है, फिर यह विरोध और प्रतिरोध कहाँ और कैसा, यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है और हम सबको इस प्रश्न पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है.

अतीत को याद करके हम वर्तमान को नहीं संवार सकते, लेकिन वर्तमान में अतीत को याद करके, उसमें हुई
महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण करके हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. उस सीख को हम अगर वर्तमान में अपना लें और उसी अनुरूप कार्य करें तो निश्चित रूप से भविष्य सुखद हो सकता है, उसी आधार पर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना सकते हैं, उनके लिए कोई मानक बना सकते हैं. लेकिन आज ऐसा नहीं है, काम कम किया जाए उसका प्रचार ज्यादा हो, सोचा समझा कम जाए, लेकिन बखान ज्यादा हो, आज ज्यादातर लोगों में प्रसिद्धि की इतनी भूख है कि वह उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, ऐसी स्थिति में उनका जो मकसद होता है वह तो पूरा हो जाता है. लेकिन जिस मकसद से जनता उनके साथ जुडी होती है उन्हें धोखा ही मिलता है. पूरे परिदृश्य पर अगर हम नजर डालें तो स्थिति समझ आ जायेगी और फिर हम समझ सकते हैं कि हालात किस कदर बदतर हैं. हमें इन हालतों से निबटने के लिए कितने शीघ्र प्रयास करने की जरुरत है. लेकिन अब सिर्फ प्रयास करने से ही नहीं बल्कि कुछ ऐसा ठोस करना होगा जिससे इस परिदृश्य को बदलने की एक मजबूत नींव डाली जा सके. ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि अब कौन ऐसा कुछ नया करेगा, जिससे कि सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा. तो इस सवाल का सीधा सा उत्तर है कि यह सब हमें ही करना पडेगा और हम तक हम सब इन अभियानों में सक्रीय रूप से शामिल नहीं होते तब तक चाहे कोई कितने भी बदलावों की बात करे, सतही तौर पर कैसे भी प्रयास करे, सफलता किसी भी स्तर तक नहीं मिल सकती और अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं हमें इस धरा पर मानव की मानवीयता के सिर्फ उदहारण ही सुनने, पढने को मिलेंगे. क्योँकि जैसे–जैसे हम विज्ञान और तकनीक के क्ष्रेत्र में उन्नति करते जा रहे हैं वैसे ही हमरा संपर्क समाज से कटता जा रहा है, हम सामाजिक सोच की अपेक्षा व्यक्तिवादी सोच को अपना रहे हैं, हम सामूहिक हितों की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, अब तो स्थिति ऐसी भी आ गयी है कि हमारे लिए परिवार नाम की संस्था के मायने भी ख़त्म होते जा रहे हैं, अब हम निकृष्ट व्यक्तिवादी हो गए हैं और इसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं, और अगर ऐसा ही होता रहा तो व्यक्ति की हालत क्या हो सकती है, इसके विषय में सिर्फ सोचा जा सकता है. 

आज जैसा माहौल हमारे सामने है उस पर समग्र रूप से विश्लेषण करने की जरुरत है. हर कोई कहता है कि खामियां हैं. किसी को सामाजिक संरचना में खामी नजर आती है, किसी को राजनीति में, कहीं पर धर्म की खामियां गिनाई जा रही हैं तो कोई साहित्य की बात कर रहा है. हर कहीं खामी है और हर खामी को बदलने की बात की जा रही है. इसके लिए बहुत से लोग प्रयास कर रहे हैं, और उनके प्रयास निरंतर जारी हैं. लेकिन जिस बदलाव की बात वह करते हैं वह कहीं नजर नहीं आते, बल्कि स्थिति इसके उलट होती जा रही है. कोई एक सच्चा व्यक्ति विचार पैदा करता है लोग उसका अनुसरण करते हैं और फिर उसके जाने के बाद स्थिति वहीँ की वहीँ रह जाती हैं, और ऐसे में भ्रष्ट बुद्धि लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करते जाते हैं और उनका बोलबाला वैसा ही बना रहता है. हम यह नहीं कह सकते कि आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसने इस सली गडी व्यवस्था को परिवर्तित करने की जी जान से कोशिश न की हो, ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं. महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, कबीर, रैदास, मीरा, स्वामी दयानंद, विवेकाननद, महात्मा ज्योतिबा फुले, विद्यासागर, महात्मा गांधी, भगत सिंह ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने भ्रष्ट व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें मिटाने के लिए जी जान से प्रयास किये. आज अफ़सोस इस बात का है कि इनके नामों का प्रयोग करके हर कोई अपनी दुकान तो चमका रहा है, लेकिन इनके विचारों और कार्यों का अनुसरण करने वाला कोई विरला ही नजर आता है. ऐसे में जिसे हम बदलाव का नाम दे रहे हैं उसकी सिर्फ आहट सुनाई दे रही है, वह भी इन नामों के कारण और वास्तविक बदलाब आना अभी बहुत दूर का काँटों का सफ़र है. 

आज जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, जैसा वातावरण हमारे सामने है उससे तो लगता है कि दुनिया में कहीं
कोई समस्या नहीं है. सूचना-तकनीक के साधनों से हमारा सीधा संपर्क है. हम उनका बखूबी इस्तेमाल भी कर रहे हैं, आज के विज्ञान ने जितना कुछ हमें दिया है वह हमारे लिए लाभकारी है. दुनिया के सारे देश एक दूसरे के संपर्क में हैं, कुछ ऐसी वैश्विक संस्थाएं गठित की गयी गयी हैं जिनके नियम और कायदे पूरी दुनिया पर लागू होते हैं और इन संस्थाओं के निर्णयों का प्रभाव पूरी दुनिया पर पढता है. इसे हम वैश्वीकरण का नाम दे रहे हैं. दुनिया पूरी एक  गाँव बन गयी है, अब कोई समस्या नहीं, पूरी दुनिया के लोग एक हो गए हैं, ऐसा प्रचार वैश्वीकरण के समर्थक करते हैं और इस माध्यम से एक आस जगाते हैं कि अब तो दुनिया का स्वरूप बदल कर ही रहेगा. क्योँकि अब कोका कोला पूरी दुनिया में बिकता है, जहाँ पानी पीने को नहीं मिलता वहां कोक की बोतलें मिल जाती हैं, चाइनीस फ़ूड अब गली मोहल्लों, सड़कों में खाने को मिल जाता है, आधुनिकता के नाम पर बदन दिखाने की कोशिश की जा रही हैं, लोगों ने लिव इन रिलेशनशिप को तरजीह देना शुरू किया है, समलैंगिक सम्बन्ध जरुरी हो गए हैं, ऐसे सम्बन्धों की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, बहुत बड़े-बड़े स्टार फिल्मों के माध्यम से कामुक अदाओं का बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, साहित्य ज्यादातर कामुक चरित्रों से भर गया है, बहुत बड़े शक्तिशाली बम बन गए हैं जो एक मिनट में पूरी दुनिया को समाप्त कर सकते हैं, मिसाइलों का निर्माण जोरों से किया जा रहा है, विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, चिकित्सा के नाम पर व्यक्ति के शरीर को प्रयोगशाला समझ लिया गया है, और ऐसे में कुछ लोग ताली पीट रहे हैं, उनके चेहरे पर बहुत खुशी है. क्योँकि उन्हें लग रहा है कि सच में बदलाव आ गया है. व्यक्ति आधुनिक हो गया है. आधुनिकता और उतर-आधुनिकता का विमर्श जोरों पर है, बस ऐसा लगा रहा है कि सब कुछ बदल गया है, अब कोई समस्या नहीं, वह बहुत प्रचार कर रहे हैं और ऐसा कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन और जगत दोनों को बदल कर रख दिया है. पर स्थितियां बहुत विपरीत नजर आती हैं और हम सब उनसे रोज ही जूझते हैं, ऐसे में हम सब यह महसूस कर सकते हैं कि कितना बदलाव आया है और कैसे बदलाव की आवश्यकता हमें है. 

आज बेशक भौतिक रूप से हमने बहुत उन्नति कर ली है और इसके लिए मानव बधाई का पात्र है. लेकिन इसके साथ एक और पहलू भी जुडा है वह यह कि आज जितना भी भौतिक विकास मानव ने किया है वह उसे और ज्यादा स्वार्थी बना रहा है, इसलिए मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह दूसरों का शोषण करने की फिराक में रहता है, वह अपने स्वार्थ के कारण ही प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, और उसे विकास का नाम देकर प्रचारित कर रहा है. ऐसे कई पहलू हैं जो आज व्यक्ति के स्वार्थ का परिचय देते हैं, लेकिन दुसरे शब्दों में हम उसे ही बदलाव का नाम देते हैं. लेकिन हमें इस बात को बहुत गहरे से समझना होगा कि जरुरी नहीं ऊँचे महलों में रहने वालों का चरित्र और कर्म भी उंचा ही हो, जिन्होंने वास्तविक बदलाव के साथ जीवन को जिया है, वह सड़कों पर रहे हैं, गुफाओं से संचालन किया है अपने मंतव्यों को पूरा करने के अभियाओं का, उनके पास बस एक ही शक्ति थी जिसके बल पर उन्होंने पूरी दुनिया को जीता है वह शक्ति थी संकल्प की शक्ति. आओ हम सब मिलकर ऐसा संकल्प ले कि इस दुनिया का स्वरूप बदल जाए और इसके लिए मानव की सोच को बदलना बहुत जरुरी है, मानव की सोच बदल गयी, कर्म बदल जाएगा और जब कर्म बदल जाएगा तो वास्तविक बदलाव अपने आप ही आयेगा, और जब तक ऐसा नहीं हो पाता तब तक बदलाव की सिर्फ आहट ही सुनाई देगी, वह सकारात्मक दिशा में आएगा इस पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह अभी तक बरकरार है .

10 जनवरी 2014

बदलावों की आहट...1

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मैं जब भी कहीं दूर पहाड़ की चोटी की तरफ देखता हूँ तो मुझे उसमें कोई बदलाब नजर नहीं आता, और जब उस पहाड़ की चोटी से दुनिया को देखता हूँ तो बहत कुछ बदला हुआ नजर आता है. ऐसे में एक ही स्थान के बारे में मेरे दो दृष्टिकोण उभरकर सामने आते हैं. जब मैं अपनी ही दुनिया में रहकर अपनी दुनिया को पहचानने की कोशिश करता हूँ तो संभवतः बहुत कुछ ऐसा बदला हुआ नजर नहीं आता जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं होता, और अगर कहीं मेरे वास्ते की चीजों में हल्का सा भी परिवर्तन आये और वह मेरे अनुकूल न हो तो मैं खुद को बहुत असहज महसूस करता हूँ. अगर वह परिवर्तन मेरे अनुकूल होते हैं तो मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता. लेकिन बदलावों का अनुकूल और प्रतिकूल होने से तो कोई मतलब नहीं वह तो होते ही हैं, उन्हें तो होना ही है, वह हो कर ही रहेंगे, समय के साथ. वैसे भी जब यह कहा जाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो वह किसी एक चीज पर ही लागू नहीं होता, सब चीजों की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे बदलना ही है, और बदलाव की यह प्रक्रिया स्वाभाविक और नैसर्गिक है. इसे हम चाहकर भी नहीं बदल सकते. बस इस बदलाव के प्रति अपने दृष्टिकोण में एक सहज और सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं, लेकिन यह मुमकिन है और नहीं भी?? 

बदलावों के प्रति हमारे दृष्टिकोण और सोच में परिवर्तन भी बहुत कुछ हमारे स्वार्थ का हिस्सा होता है और वह भी
काफी हद तक बदलाव लाने की प्रक्रिया हो सकता है. बेशक वह बदलाव हमारे लिए सहज न हो, लेकिन फिर भी बदलाव लाने की वह प्रक्रिया हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है, और जब वह हमें अपने आगोश में ले जाती है तो हम उसके साथ चलना शुरू करते हैं, बेशक हम चलना नहीं चाहते, लेकिन परिस्थिति वश हमें चलना ही होता है और वह हमारी प्रकृति का हिस्सा है. उसके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं और वही बदलाव की प्रक्रिया के फलस्वरूप हुआ बदलाव कहीं न कहीं पर नयेपन की निशानी भी है, हो सकता है वह नयापन हमारी सोच के अनुकूल न हो, और उसका स्वरूप हमें पसंद भी न हो लेकिन प्राकृतिक रूप से उसे नयापन धारण करना है. इसलिए वह अपनी गति से ही हो रहा है. हम अपने जीवन क्रम से इस बदलाव को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. हम पूरी दुनिया को समझने की कोशिश न करें सिर्फ एक बार अपने भीतर और बाहर जितना झाँक सकते हैं, जितने गहरे में उतरकर देख सकते हैं देखने की कोशिश करें, और शांतचित होकर अपने बदलावों पर ध्यान देने की कोशिश करें तो हमें स्वयं ही पता चल जाएगा कि मुझमें कितने परिवर्तन हुए हैं और उनकी मेरे जीवन में क्या महता है? यहीं से सफ़र शुरू होगा न परिवर्तन होने वाली अवस्था का, और जब हम उस मुकाम पर पहुँच जायेंगे तो बाहरी परिवर्तन तो होंगे ही, लेकिन भीतर से परिवर्तन न होने वाली अवस्था होगी, कहीं कोई दुःख नहीं, कोई ख़ुशी नहीं, कोई अपना नहीं, कोई पराया नहीं. लेकिन ऐसा होना तो कल्पना करने जैसा है, संभवतः यह प्रश्न आप मुझसे कर सकते हैं और यह स्वाभाविक भी है. 

इसे ऐसे समझने की कोशिश करते हैं, मैं जब भी पहाड़ की चोटी की तरफ देख रहा हूँ तो अपने घर की एक खिड़की से देख रहा हूँ जो मेरे लिए सहज भी है, सुविधाजनक भी और मुझे पहाड़ से प्रेम है इसलिए मैंने घर बनाते वक़्त खिड़की पहाड़ की दिशा में रखीं. सिर्फ इसलिए कि मैं पहाड़ की चोटी का दर्शन कर सकूँ. मैंने पहाड़ के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करने के लिए मनचाही व्यवस्था की और उसी से मैं खुश होता गया. लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि बहुत लम्बे अरसे से पहाड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और वह मुझे बोझिल लगने लगा. हर बार उसमें कोई आंशिक सा बाहरी परिवर्तन होता लेकिन भीतरी रूप से वह पहाड़ कभी बदला ही नहीं और संभवतः मैंने भी यह समझ लिया कि इसमें बदलने की कोई संभावना ही नहीं. लेकिन बहुत प्रयास करके उस पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर जब मैंने अपनी दुनिया को देखने की कोशिश की तो मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया, अब पहाड़ अपना सा लगने लगा और जिस दुनिया में मैं रहता था उसके प्रति मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया. संभवतः इसके पीछे एक कारण यह भी काम कर रहा होगा कि मैं ऊंचाई से दुनिया को देख रहा हूँ और इसलिए मेरा दृष्टिकोण भी बदल गया है. अब मैं जिस ऊंचाई पर हूँ वहां न कोई अपना है, न कोई पराया, मुझे सब कुछ समान दिखाई दे रहा है और काफी हद तक यह सब मेरे लिए आनंदायक भी है, लेकिन यह बदलाव बाहरी तौर ही है तो मुझे ऐसा लग सकता है कि स्थान के परिवर्तन के कारण यह आया होगा, हां यह एक कारण हो सकता है, लेकिन वास्तविक कारण यह नहीं, वास्तविक कारण तो यह है कि उस पहाड़ की चोटी तक पहुँचते हुए मुझे जो श्रम करना पडा जो कुछ झेलना पडा और जो अनुभव मुझे वहां जाकर हुए उन्होंने मेरे दृष्टिकोण को बदल दिया. इसलिए सब कुछ समान सा लगने लगा और जहाँ तक भी नजर गयी बस एक नया अनुभव हुआ और दृष्टि बदल गयी. 

इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जब हम अपनी बनाई हुई सोच और नजर से दुनिया को देखने समझने की
कोशिश करते हैं तो हम भ्रम में पड जाते हैं और यह स्वाभाविक भी है. क्योँकि जब भी कोई इस धरा पर जन्म लेता है तो उसे उसी समय से बन्धनों में जकड़ने प्रक्रिया शुरू की जाती है. एक नवजात के जन्म लेते ही वह हिन्दू, मुस्लमान, सिक्ख, इसाई हो जाता है. वह किसी जाति का, वर्ण का, किसी धर्म का, आमिर-गरीब तबके आदि का बना दिया जाता है, और वहीँ पर उसकी स्वतन्त्र सत्ता छिन जाती है और उसे दुनिया में जीवन रहते तक बाहरी आडम्बरों के पालन के लिए ना चाहते हुए भी मजबूर किया जाता है. हर कोई उस पर अपना हक जताता है और अपनी सोच से उसे चलाने की कोशिश करता है. एक स्वतन्त्र पैडा हुआ मनुष्य बन्धनों में जकड दिया जाता है और वह अपने जीवन रहते हुए कभी भी उन बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता. इसमें एक और दृष्टिकोण भी काम करता है जो कहीं किसी की मानसिक गुलामी से आगे निकल जाते हैं, वह अपनी सोच और शोहरत के आधार पर दूसरों की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. यहाँ भी एक आम इंसान का दृष्टिकोण कोई मायने नहीं रखता, वह परिवर्तन की आस में उस तरफ कदम बढाता है, लेकिन अफ़सोस कि वह वहां पर भी सिर्फ और सिर्फ भीड़ का हिस्सा ही बनकर रह जाता है. ऐसी स्थिति में न तो परिवर्तन होता है और न ही मनुष्य बदलता है. 

आज दुनिया का जितना भी स्वरूप हमारे सामने खडा है उसमें सिर्फ एक ही चीज काम कर रही है वह है व्यक्ति का परम्पराओं के प्रति आकृष्ट होना. वैसे तो परम्पराओं के प्रति आकृष्ट होना कोई बुरी बात नहीं है, वह हमारे जीवन और आधार का हिस्सा हैं, हमें उनका निर्वाह करना चाहिए, लेकिन वक़्त और हालात को देखते हुए, उनकी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता को देखते हुए. वर्ना हममें इतना भी साहस होना चाहिए कि हम उन पुरानी, अव्यवहारिक  और जर्जर परम्पराओं को उखाड़ फेंकने की हिम्मत भी कर सकें .....!!!  शेष अगले अंकों में.