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18 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...3

2 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए हैं उनका स्तर उपदेशात्मक ही रहा है. वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए हैं. हालाँकि इस धरती पर बहुत से महापुरुष-गुरु-पीर-पैगम्बर और समाज सुधारक पैदा हुए हैं, जिन्होंने मानव को मानवीय पहलूओं के विषय में बताने की कोशिश की है. साथ ही यह भी प्रयास किया है कि हर कोई अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर अपने जीवन को दूसरों के भले के लिए अर्पित कर दे. लेकिन ऐसा हो कहाँ पा रहा है, आज के भौतिकवादी दौर में अधिकतर लोग भौतिक सुखों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने पूरे समाज के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है. ऐसे में युवाओं को अतीत से अनुभव लेकर, वर्तमान में अपने विचारों और कर्म में परिवर्तन करते हुए भविष्य के लिए एक सुन्दर से संसार की नींव रखनी चाहिए. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि इनसान चाहे जिनती भी भौतिक उन्नति कर ले, अन्ततः उसे मनुष्य के साथ की जरुरत ही पड़ती है. मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव ही ऐसा भाव है जो इस भौतिक उन्नति की प्रासंगिकता को और बढ़ा सकता है. जब तक मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव नहीं होगा तब तक हम इस भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति से कोई ख़ास लाभ नहीं ले सकते. ऐसे में युवाओं को थोडा चिन्तन-मनन कर आगे बढ़ने की जरुरत है. उसके लिए सबसे पहले उन्हें समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझना होगा और देश और दुनिया के परिदृश्य को बदलने के लिए गम्भीर और जिम्मेवार प्रयास की तरफ कदम बढ़ाना होगा. कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिन पर अगर हम थोडा चिन्तन मनन करें तो दुनिया को बदलने में युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है.
     1.   अपने अस्तित्व के विषय में विचार करें: हम दुनिया में तमाम तरह की उपलब्धियां अर्जित करने का प्रयास करते हैं. बचपन से लेकर मृत्यु तक हम कुछ न कुछ ऐसा अर्जित करने के विषय में सोचते रहते हैं जिससे हमारे यश-मान-सम्मान में वृद्धि होती रहे. दुनिया के बीच में नाम होता रहेहम जहाँ भी जाएँ लोग हमें एकदम पहचान लेंऔर ऐसा भी प्रयास मनुष्य का रहा है कि मृत्यु के उपरान्त भी लोग उसे याद करते रहें. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मनुष्य शरीर और शरीर के बाद भी अमर होने के लिए प्रयत्नशील रहा है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है कि मनुष्य को भाग्य के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना चाहिए और अपने जीवन काल में जितना वह कर्म कर सकता है करना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का नुकसान हो. हमारे आगे बढ़ने की दौड़ में कई बार हम अपने साथियों का ही अहित कर देते हैं तो फिर वैसी उपलब्धि का क्या लाभजिसे दूसरों के हक़ मार कर हासिल किया गया हो. यही वह प्रश्न है जो हमें अपने अस्तित्व के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है. अपने कॉलेज के दिनों में मैं एक वाक्य अपनी हर नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा करता था. After all what we are, what is our entity, when we see the universe, where we stand. यह वाक्य मुझे हमेशा आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता रहता. हम क्या हैंयह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर मनुष्य सोचना शुरू करे तो उसके जीवन की कई उलझने तो स्वतः ही समाप्त हो जाएँलेकिन मनुष्य है कि कभी वह इस प्रश्न पर विचार ही नहीं करता. इसलिए युवाओं को कुछ भी करने से पहलेसंसार की तमाम उपलब्धियों की तरफ बढ़ने से पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका अस्तित्व क्या है इस संसार मेंमैं इस प्रश्न का जबाब नहीं दूंगा आप स्वयं सोच लेनाक्योँकि मैं आपको किसी दायरे में नहीं बांधना चाहता कि आप यह हैंआप वो हैंजो कि अब तक होता आया है. लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आप दुनिया में आगे जरुर बढ़ेंजो अरमान आपके हैंउनको पूरा करने के लिए बिलकुल प्रयास करेंलेकिन इतना जरुर सोचें कि आखिर यह सब किया किस लिए जा रहा है और आपको वास्तविक रूप में इससे क्या लाभ होने वाला है.
 2.   जाति के प्रश्न पर तर्क के साथ सोचें: आज दुनिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि हमें जाति जैसे प्रश्न पर विचार करने की जरुरत है. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है जो हमें दिखाई दे रही है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य से मनुष्य के बीच में शरीर की खाई बेशक न होलेकिन मन के स्तर पर मनुष्य से मनुष्य के बीच में गहरी खाई व्याप्त हैऔर यह खाई ऐसी है जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह कितनी गहरी है और कितनी दर्दनाक है. जाति का प्रश्न ऐसा प्रश्न है जो मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाता है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि ताउम्र मनुष्य इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. हालाँकि ऐसा नहीं है कि जाति के प्रश्न पर आज तक विचार नहीं किया गयाइस प्रश्न विचार किया गया हैकई सामाजिक आन्दोलन हुए हैंबहुत कुछ लिखा गया हैलेकिन फिर भी जाति का जिन्न ऐसा है कि यह अन्दर ही अन्दर अपना विकास करता रहता है और समय आने पर अपना रूप दिखा देता है. मुझे लगता है कि मनुष्य से मनुष्य को दूर करने का सबसे बड़ा उपकरण जाति व्यवस्था के रूप में समाज में ऐसा पल्लवित-पुष्पित किया गया है कि इससे बाहर कोई आना ही नहीं चाहता. लेकिन जाति का बजूद क्या हैइस पर कोई तार्किक उत्तर भी नहीं मिल पाता. भारत के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि यहाँ कि सबसे छोटी समझे जाने वाली जाति भी अपने से छोटी जाति ढूंढ लेती है. ऐसी स्थिति में समाज में विघटन की स्थिति पैदा होती रही है. जाति की यह व्यवस्था किसी एक देश में ही व्याप्त नहीं हैकमोवेश इसकी उपस्थिति दुनिया के हिस्से में है. लेकिन हमारे देश में तो यह इतनी विकराल रूप से व्याप्त है कि हम जितनी जल्दी इस जाति से छुटकारा पा लेंउतना ही हमारे लिए अच्छा है. क्योँकि आज जितनी भी विसंगतियां हमारे समाज में मौजूद हैंउनके मूल में जाति एक बड़ा आधार है. जब हम इस प्रश्न पर तर्क के साथ सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि जाति का अस्तित्व सिर्फ मानसिक हैइसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है. हमें जितनी जल्दी या बात समझ आएगी उतना ही हमारे लिए भी यह अच्छा होगा. यूवाओं से यह अपेक्षा है कि वह इस रूढ़ि को समाज से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास करे. शेष अगले अंक में..!!! 

08 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...2

1 टिप्पणी:
गत अंक से आगे...हम अपने आसपास की चीजों को जब समझने की कोशिश करते हैं तो हमें समझ आता है कि इस समाज में कितना कुछ है जिसका हमारी जिन्दगी से कोई सीधा सरोकार नहीं है, और कितना कुछ ऐसा है जिसे हमें अपनाने की जरुरत है. अमूमन तो ऐसा होता है कि हम अपने सामाजिक परिवेश में जो कुछ घटित हो रहा होता है उससे खुद को अलग ही रखते हैं और अगर कहीं ध्यान भी जाता है तो हम उसे बदलने का प्रयास भी नहीं करते. ऐसे माहौल में कई पीढियां जीवन जी लेती हैं, लेकिन समाज वहीँ का वहीँ खड़ा रहता है. अगर कोई समाज की गैर जरुरी मान्यताओं पर प्रश्न करता है तो उसे वह समाज ही बहिष्कृत कर देता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि समाज में कोई बुराई व्याप्त नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि उस बुराई को हटाने के लिए किसी ने प्रयास नहीं किये हैं. समाज में बुराइयों को जन्म देने वाले लोग भी रहे हैं और उन बुराइयों को मिटाने वाले भी पैदा होते रहे हैं. लेकिन बुराइयां पैदा करने वाले और उन्हें मानने वाले लोगों की संख्या हमेशा अधिक रही है और उन्हें मिटाने वाले और उनका अनुसरण करने वालों की संख्या बहुत कम रही है. इसलिए दुनिया में जितने भी महामानव पैदा हुए हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में जिन बुराईयों को मिटाने का प्रयास किया, उनके जाने के बाद लोग फिर उन्हीं बुराईयों की तरफ प्रवृत होने लगे. इसलिए दुनिया में सामाजिक स्तर पर बहुत कम परिवर्तन देखने को मिलते हैं.
हम अगर दुनिया का पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखें तो हमें समझ आता है कि इस काल का इतिहास मानव जीवन में सबसे ज्यादा उथल-पुथल का इतिहास रहा है. इन हजार वर्षों में मानव ने एक और जहाँ भौतिक-तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से काफी उन्नति की, वहीँ दूसरी और कुछ ऐसी परम्पराओं को भी उखाड़ फैंका जो मनुष्य को मनुष्य से दूर करने का कारण बनी हुई थी. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हजार वर्षों में जो कुछ भी हुआ वह सकारात्मक ही हुआ, इस कालखंड में बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ और उसने ऐसा वातावरण मनुष्य के सामने पेश किया कि मानवता की पैरवी करने वाले दांतों तले ऊँगली दबाते ही रह गए. लेकिन यह हुआ किस कारण, उसका एक सटीक सा जबाब है, मनुष्य की नासमझी के कारण. कुछ सत्ता लोलप और अपने अहम् में डूबे लोगों के कारण. जिन्होंने पूरी मानवता को ही विनाश के कगार पर ला खडा कर दिया. अगर हम भारत के ही इतिहास को देखें तो कौन भूला है मुगल आक्रमणकारियों की लूट-पाट को, कौन भूला है सत्ती प्रथा के दर्दनाक मंजर को, कौन भूला है सिक्ख गुरुओं के साथ हुए सलूक को, और कौन भूला है आजादी के दौर में शहीद हुए उन लाखों नौजवान वीर और वीरांगनाओं को. विश्व के इतिहास में भी ऐसे दर्दनाक पहलू भरे पड़े हैं. कुछ हादसे रुढियों के नाम पर हुए हैं, तो कुछ प्रगतिशीलता के नाम पर. लेकिन इन सबके बीच जो चीज सबसे महत्वपूर्ण रही है, वह है मनुष्य की स्वार्थ की प्रवृति और इसी प्रवृति के कारण कुछ लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं, जिनके कारण पूरी मानवता और मानवीय चेतना पर संकट पैदा हुए हैं. ऐसा नहीं है कि आज यह संकट नहीं है, आज भी ऐसे संकटों का माहौल बदस्तूर जारी है और उसके परिणाम बीती सदी में हुई घटनाओं से कहीं ज्यादा गंभीर हैं. लेकिन आज हमारा ध्यान उस तरफ जा कहाँ रहा है? हम एक तरह से गुमराह दौर में जी रहे हैं और अपनी सुविधाओं और स्वार्थों की पूर्ति से आगे हमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है. आज फिर वही दौर और वही घटनाएँ नए अंदाज में घट रही हैं, जो पूर्व काल में घट चुकी हैं. लेकिन किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं है. जो थोड़े बहुत प्रयास ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हुए भी हैं, वह भी आज के दौर में नाकाफी हैं.    
ऐसे में युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. क्योँकि आज तक जिनती भी क्रांतियाँ इस धरा पर हुई हैं उनमें युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. युवा किसी भी देश की अमूल्य धरोहर होते हैं, अगर वह अपने समाज और परिवेश के प्रति सजग रहते हैं तो फिर विश्व की ऐसी कोई ताकत नहीं जो युवाओं को उनके मंतव्यों से पीछे हटा दें. इतिहास में हुई अनेक सफल क्रांतियों का नेतृत्व युवाओं ने किया है. इसलिए आज वैश्विक स्तर पर यह जरुरत महसूस की जा रही है कि युवा अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति सचेत रहें और जो कुछ समाज में विघटन का कारण बन रहा है उसे हटा देने के लिए प्रयास करें. आज जहाँ दुनिया अनेक खेमों-विचारधाराओं में बंट चुकी है, उसके कारण कई तरफ के नकारात्मक भाव मानव के जहन में भरे जा रहे हैं तो ऐसे में हमें दुनिया को वास्तविक रूप से समझने के लिए पुनः प्रयास करने की जरुरत है. हालाँकि आज हम यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं, लेकिन ऐसे दौर में भी ऐसी अनेक बंदिशें मनुष्य से मनुष्य के बीच में पैदा की गयी हैं कि आये दिन विश्व में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहता है जो मानवीय भावों के विपरीत होता है. दुनिया एक और बारूद के ढेर में तब्दील होती जा रही है, और दूसरी ओर हर कोई अपने आप को समृद्ध और शक्तिशाली घोषित करने की फिराक में है. वह विकास की बात कह कर दुनिया को विनाश के रास्ते पर धकेल रहा है. यह कुछ ऐसे पहलू हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं. हमें देश और दुनिया में जो समस्याएं पैदा हुई हैं उनके सतही और कानूनी हल खोजने की बजाय वास्तविक हल खोजने की जरुरत है और उसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हम अपने आप से शुरुआत करें, अपने परिवेश और समाज से शुरुआत करें. जब हम और हमारा समाज बदल जाएगा तो फिर दुनिया अपने आप ही बदल जायेगी. शेष अगले अंक में...!!! 

04 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...1

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‘आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है’. सन 1977 में आई फिल्म ‘अपनापन’ का यह गीत काफी लोकप्रिय गीत रहा है और मनुष्य जीवन के सन्दर्भ में काफी प्रासंगिक है. इस गीत का मुखड़ा मनुष्य जीवन के सफ़र के साथ भी जोड़ा जा सकता है. आदमी इस दुनिया में एक मुसाफिर की तरह जीवन जीता है, जो चंद साल इस धरती पर मनुष्य के रूप में रहता है और फिर इस धरती से रुखसत हो जाता है. वह जाता कहाँ हैं? इस विषय में दुनिया में तमाम तरह के विचार प्रचलित हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि मनुष्य का शरीर यहीं रहता है, लेकिन उस शरीर को चलायमान रखने वाली चेतना उससे कहीं अलग हो जाती है. जैसे ही वह चेतना शरीर से अलग होती है, शरीर निढाल हो जाता है, वह सभी तरह की गतिविधियाँ करना बंद कर देता है. दूसरे शब्दों में हम उसे मृत्यु कहते हैं.
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह शारीरिक रूप से अक्षम होता है और धीरे-धीरे वह धरा पर अपने परिवेश के अनुसार उपलब्ध वस्तुओं का उपभोग करते हुए अपने शरीर की यात्रा को तय करता है. उसके शरीर की यात्रा कितनी है इस विषय में उसे कभी कोई जानकारी नहीं रहती. फिर हम अनुमान लगाते हैं कि एक स्वस्थ मनुष्य औसतन 60 से लेकर 80-90 वर्ष तक जीवन जी लेता है. मनुष्य का यह सफ़र इस धरा पर रोचक सफ़र होता है. वह तरह-तरह की गतिविधियाँ करता है और उनके माध्यम से वह ऐसा प्रयास करता है कि अपने समाज और देश की परम्पराओं-विश्वासों और मान्यताओं का पालन करते हुए अपने जीवन के सफ़र को तय कर सके. हमारा समाज भी ऐसी ही अपेक्षा एक व्यक्ति से करता है कि जो कुछ भी उसने तय किया है, अगर व्यक्ति उसके अनुसार जीवन जीता है तो उस जीवन को सफल और सम्मानजनक माना जाता है, और अगर कोई व्यक्ति समाज के बने-बनाये नियमों को तोड़ने की कोशिश करता है तो समाज उसे हिकारत की नजर से देखता है.
कई बार लगता है कि समाज और मनुष्य को एक सही दिशा देने के लिए यह नियम आवश्यक हैं और ऐसा भी महसूस किया जाता है कि इन नियमों के बिना समाज आगे बढ़ ही नहीं सकता. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. लेकिन यह भी एक प्रश्न है कि दुनिया में मनुष्य किस तरह से जीवन जिए? क्योँकि पूरी दुनिया में हम देखते हैं तो हमें पता चलता है कि दुनिया के हर हिस्से में जीवन को जीने के नियम अलग हैं. हर हिस्से में अपनी मान्यताएं हैं, अपनी परम्पराएं हैं, भाषा है, पहरावा है, खान-पान है, रहन-सहन है, ऐसी तमाम चीजें हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदल जाती हैं. फिर हम इस उलझन में उलझते हैं कि यह श्रेष्ठ है और यह बेकार है. हालाँकि अगर हम गहराई से सोचें तो हमें समझ आएगा कि दुनिया में जो कुछ भी परम्पराओं-रुढियों और विश्वासों के नाम पर प्रचलित है वह सिर्फ उस विशेष समुदाय-जाति-वर्ग या उस स्थान पर रहने वाले लोगों की मान्यता है. अगर कोई उसे नहीं भी मानता है तो उससे कोई ख़ास नुकसान किसी को होने वाला नहीं है. लेकिन हम जिस परिवेश में रहते हैं, उस परिवेश को बेहतर बनाने के प्रयास किये जा सकते हैं. ताकि हर मनुष्य इस धरा पर शान से जीवन को जी सके. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम दुनिया के किसी भी हिस्से पर नजर दौड़ाकर देखें असमानता-शोषण-भेदभाव आदि कुरीतियों के चिन्ह हमें व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं.
अब अगर हम विचार करें कि ऐसा क्योँ है तो हमें इसका कोई सटीक जबाब नहीं मिल पायेगा. दुनिया में इतने धर्म, इतनी जातियां, इतनी भाषाएँ, इतनी परम्पराएँ, इतनी मान्यताएं आखिर क्योँ अस्तित्व में है? इसका कोई जबाब नहीं है. हालाँकि इन सबका होना कोई बुरी बात नहीं है. आज जितना कुछ है इससे अधिक भी अगर इस धरा पर होता तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी, लेकिन थोडा रुककर सोचें तो समझ आता है कि इन सबने मनुष्य को मनुष्य से अलग करने का काम किया है. जब एक प्रांत का मनुष्य दूसरे प्रांत के मनुष्य से घृणा करता है, जब एक भाषा को बोलने वाला दूसरे की भाषा को कमतर आंकता है, जब एक मनुष्य की परम्पराएँ दूसरे के लिए सरदर्द बन जाती हैं, जब एक मनुष्य का पहरावा दूसरे मनुष्य के लिए नफरत का कारण बन जाता है तो हमें फिर इस विविधता पर गम्भीरता से विचार करने की जरुरत है. आखिर क्योँ ऐसा हो रहा है? हमें किसी से नफरत करने का अधिकार किसने दिया है? कौन हमें किसी भाषा और रंग से नफरत करने की सलाह दे रहा है? हमें किसने कह दिया कि मनुष्य जन्म से छोटा और बड़ा है, स्वर्ण और शुद्र है? यह तमाम प्रश्न हैं जो आज के दौर में ही नहीं, बल्कि हजार वर्षों से हमारे बीच में उठ रहे हैं और हम इन प्रश्नों का हल खोजने के लिए किसी हजार वर्ष पुराने सन्दर्भ का सहारा लेकर खुद को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हमें हासिल क्या हो रहा है, इस पहलू पर कोई विचार नहीं कर रहा है.
परम्पराएं और मान्यताएं किसी समाज की पहचान हैं और यह होना भी चाहिए, लेकिन वहीँ तक जहाँ तक कि यह किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान न पहुंचाएं. अगर कोई ऐसी मान्यता या परम्परा किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान पहुंचा रही है तो हमें उसे तुरन्त बदल देने की जरुरत है. क्योँकि आखिर हम सब पञ्च भौतिक शरीर में रहकर ही जीवन के सफ़र को तय कर रहे हैं. तो ऐसी अवस्था में कौन छोटा, और कौन बड़ा, कौन गोरा, और कौन काला, कौन ऊँचा और कौन नीचा? जब हम इस तरह से सोचना शुरू करते हैं तो दुनिया में जो भी उलझन भरी हुई है, वह धीरे-धीरे सुलझती हुई नजर आती है. कुछ एक ऐसे पहलू हैं जो हमारे समाज को निरन्तर विकृत किये जा रहे हैं. लकिन हम हैं कि उनके विषय में सोचते ही नहीं हैं. कहीं न कहीं पर हम भी ऐसे पहलूओं को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभा रहे होते हैं. अब जब दुनिया बदल रही है तो क्योँ न हम नए सिरे से सोचें इस दुनिया के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी सभ्यता के बारे में. अगर हम गहराई से सोचेंगे तो हमें बहुत से ऐसे पहलू मिलेंगे जो हमारे लिए सार्थक हैं, और कुछ ऐसे भी मिलेंगे जो हमारे लिए निरर्थक हैं, हमें उनकी पहचान करनी है और उन्हें बदलने का प्रयास करना है. शेष अगले अंक में...!!!              

10 सितंबर 2013

आजादी पर आत्मचिन्तन ... 2

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आजादी का अगर सीधा सा अर्थ किया जाए तो इस मतलब होगा अपनी व्यवस्थाओं में जीना, लेकिन जिस भारत की आजादी का जश्न हम बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं (यह तो होना भी चाहिए) उसमें अगर हम आज तक के  (66 वर्षों) समय को गहराई से विश्लेषित करें तो पूरी सच्चाई एकदम स्पष्ट रूप से सामने आती है कि आजादी के बाद हम कोई ऐसी व्यवस्था कायम नहीं कर पाए जो हमारे देश के अनुकूल हो, बल्कि पिछले 15-20 वर्षों से तो हमने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया है कि हम कितनी विदेशी व्यवस्थाएं इस देश में लागू कर पाते हैं और हम पुरजोर इसी कोशिश में हैं. फिर यह आजादी कैसी यह एक बड़ा प्रश्न है ? गतांक से आगे    

वर्तमान आजादी के दौर को समझने से पहले हमें अपने देश के इतिहास पर नजर डालने की जरुरत है. अगर आज तक के उपलब्ध इतिहास का विश्लेषण करते हैं तो इस देश की एक उच्च सांस्कृतिक, सामाजिक और अध्यात्मिक परम्परा रही है. इस देश के ही एक समय में विश्व गुरु का दर्जा दिया जाता था. यह वही भारत है जो विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में दुनिया के तमाम देशों को राह दिखा रहा था, दुनिया के देश अभी ढंग से अपने जीवनयापन के साधनों की तलाश भी नहीं कर पाए थे और इस देश के लोग अआत्मिक चिंतन की तरफ प्रवृत थे, भौतिक सुख सुविधाओं से संपन्न इस भारत के लोग पूरी दुनिया में शांति और संतोष के अग्रदूत बनकर उभरे थे, आज भी कई ऐसे प्रमाण हमारे सामने हैं, जिनके आधार पर हम इन सब बातों के तथ्यात्मक रूप से कह सकते हैं और प्रमाणित कर सकते हैं. यह भारत के इतिहास का एक पहलू है, मुगलों का शासन जब इस देश में स्थापित हुआ तो भी यहाँ संस्कृति और सभ्यता का विकास होता रहा, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी ने इसे गहरे गर्त में धकेल दिया. हालाँकि मुगलों के शासन के दौरान भी इस आर्यवर्त की सभ्यता और संस्कृति के साथ काफी खिलवाड़ किया गया, उन्होंने भी इस देश को जमकर लूटा, यहाँ पर शासन व्यवस्था कायम की और इस देश को अपने तरीके से चलाने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन अंग्रेजों ने तो इस देश को ऐसे कगार पर ला खड़ा किया जहाँ से इस देश का हर प्रकार से पतन होना शुरू हुआ. आर्यवर्त दुनिया को शांति का सन्देश देता रहा है और यह अंग्रेजी शासक कलुषित मासिकता के कारण पूरी दुनिया में व्यक्ति के साथ छल, कपट और धोखे के लिए मशहूर रहे हैं और संभवतः आज भी इनके हालात ऐसे ही हैं.

खैर भारतीयों को जब अंग्रेजी शासन में घुटन महसूस होने लगी तो उन्होंने आजादी का बिगुल बजा दिया. 10
मई 1857 को भारतीय आजादी की क्रांति का शंखनाद मेरठ से हुआ, इस आन्दोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दीं, असंगठित आन्दोलन होने के कारण अंग्रेज इसे दबाने में बेशक सफल रहे हों, लेकिन स्वतंत्रता के लिए जल चुकी चिंगारी को बुझाने में वह कामयाब नहीं हो सके और रह रहकर उनके खिलाफ आन्दोलन होते रहे और अंततः 90 वर्षों के कठोर संघर्ष के बाद भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ. लेकिन इस देश के दो टुकड़े हो गए, भारतीयों को लगा कि वह अपने मकसद में कामयाब हो गए लेकिन यह सिर्फ एक कल्पना थी. हमने अगर आजादी अगर प्राप्त की तो वह कानून के माध्यम से प्राप्त हुई. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जो अंग्रेजों की गुलामी से स्वतन्त्र हुआ हो और उसे कानून बनाकर आजादी दी गयी हो. इतना ही नहीं अंग्रेज जिस मकसद को हासिल करना चाहते थे वह अंत में उस मकसद को हासिल करने में भी कामयाब हो गए. एक देश के दो टुकड़े कर गए और ऐसी भावना भर गए कि आज उसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं और आने वाले समय में भी कमोबेश यह स्थिति जारी रहेगी. 

यह तो आजादी का एक पहलू है, भारत में आजादी के बाद क्या कुछ परिवर्तन आया उसे पुरे सन्दर्भ में अगर देखा जाए तो स्थिति बहुत नाजुक सी लगती है और कई बार मन यह सोचकर उदास हो जाता है कि हम कैसे आजाद भारत में रह रहे हैं. कोई भी ऐसा पक्ष नहीं जो हमें महसूस करवा सके कि हम आजादी में जी रहे हैं. आज भी हम उस गुलाम मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं, इसलिए हम अपने कार्यक्रमों और नीतियों का निर्धारण भी विदेशी हितों के अनुकूल करने लगे हैं. बड़े व्यापक पैमाने पर अगर हम अपने देश कि स्थितियों का विश्लेषण करें तो यहाँ की चाहे राजनीतिक स्थिति हो या आर्थिक स्थिति सब कुछ अब भी विदेशी नीतियों पर निर्भर करता है तो फिर आजादी कहाँ और कैसी आजादी? हम आजादी के बाद कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाए जो हमारे देश के अनुकूल हो, जो हमारी संस्कृति, सभ्यता, समाज, धर्म को संरक्षित कर सके और इस देश की जनता को यह अहसास दिला सके कि जो कुर्बानियां उनके पूर्वजों ने की हैं उनका लाभ उन्हें मिल रहा है, उनकी कुर्बानियां देश और समाज के लिए लाभदायक साबित हुई हैं. लेकिन ऐसा किसी स्तर पर महसूस नहीं होता तो फिर आजादी पर ही एक आत्मचिंतन करने की जरुरत पड़ जाती है. 

हम किस तरह की आजादी चाहते हैं और क्योँ? यह एक बड़ा सवाल है और इस सवाल का उत्तर जिसे भी खोजना होगा उसे पहले अपनी सभ्यता और संस्कृति को समझना होगा. समाज की संरचना और धर्म के नियमों का अध्ययन करना होगा और वह भी सापेक्ष दृष्टि से और तब जो निष्कर्ष हमारे सामने आयेंगे वह हमें निश्चित रूप से यह अहसास तो दिला ही देंगे कि आजादी होती क्या है ? और जब हमें वैसी वास्तविक आजादी का अहसास होगा तो फिर हम निर्णय कर पायेंगे कि हमें अभी कितना सफ़र तय करना है और हमारी मंजिल कितनी दूर है और फिर उस दूरी को भांपते हुए यह भी निर्णय करना होगा कि हम उस मंजिल तक पहुँच पायेंगे या नहीं, अगर पहुंचना है तो फिर किस तरह से और कब हम पहुंच सकते हैं. 

आजादी सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह एक भाव है, एक व्यवस्था है, एक जीवन पद्धति है, लेकिन क्या हमारे देश में या दुनिया में कहीं ऐसा है, मुझे बहुत कम मात्रा में ऐसा देखने को मिला कि कोई व्यक्ति उस आजाद सोच से जीता है, जिसकी मनुष्य से अपेक्षा की जाती है. हम अपने आस पास ही देख लें, विज्ञान और तकनीक की इतनी उन्नति होने के बाबजूद भी हमारे मनों में ऐसी दीवारें हैं जो आजतक हमें उसी गर्त में धकेले हुए हैं जहाँ पर हम आज से दो-तीन सौ वर्ष पहले थे. कहाँ हम जाति-पाति के भेद को मिटा पाए हैं, कहाँ हम मंदिर-मस्जिद को एक समझते हैं, कहाँ हम हिन्दू, मुस्लमान, सिक्ख, ईसाई आदि के दायरों से बाहर निकलकर इंसानियत का भाव कायम कर पाए हैं. कहाँ हमें सबकी बोली प्यारी लगती है, कहाँ हमें किसी के खान पान, रहन सहन से नफरत नहीं होती, कहाँ पर हम साम्प्रदायिकता का शिकार नहीं हैं, हमें कब लगता है कि इको नूर ते सब जग उपज्या, कौण चंगे ते कौण मंदे, जब हमें ऐसा कुछ आभास होता ही नहीं है तो फिर हम इसे कर्म रूप में कैसे देखने की कोशिश करते हैं. अभी हमें आजादी पर गहन आत्मचिंतन करने की जरुरत है, हर एक उस देशभक्त की कुर्बानी को याद करके उसकी महता को समझने की जरुरत है, तभी कहीं हम एक आजादी वाला वातावरण कायम कर पायेंगे....लेकिन ऐसा वातावरण सिर्फ सोचा जा सकता है, इस पर विचार किया जा सकता है, क्रियात्मक रूप में ऐसा जब संभव हो जाएगा तो निश्चित रूप से धरती से सुंदर और कोई जहान नहीं होगा, फिर शायद व्यक्ति जिस काल्पनिक स्वर्ग की कल्पना करता आ रहा है उसे भी करना छोड़ देगा एक आजाद सोच के साथ जीवन व्यतीत करेगा और जब इस दुनिया से रुखसत होगा एक आजादी से भरा वातावरण इस दुनिया को दी जाएगा.