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01 जनवरी 2017

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...1

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पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल हमारी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गया है. अंतर्जाल पर उपलब्ध कुछ माध्यम हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल हो गए हैं. मेलब्लॉगफेसबुकट्विटरव्हाट्स एप्पइन्स्टाग्राम जैसे ठिकानों ने हमारी दैनिक जीवन की गतिविधियों और क्रियाकलापों को काफी हद तक प्रभावित किया है. इनके अलावा अनेक ऐसी वेबसाइट्स और मोबाइल एप्लीकेशन्स हैं जिनका प्रयोग हम अपनी जरूरतों के अनुसार करते हैं. भारत में जब से इन्टरनेट की शुरुआत (15 अगस्त 1995) हुई हैतब से लेकर आज तक भारत में इन्टरनेट का निरन्तर विस्तार होता चला गया है. सन 1992 में जब वर्ल्ड वाइड वेव (www) अस्तित्व में आया तब भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या शून्य  थी. 1995 में जब भारत में इन्टरनेट की शुरुआत हुई उस समय भारत प्रति सौ व्यक्तियों में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या 0.026 थी,सन 2000 में यह संख्या 0.528 हो गयी. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि सन 2000 में भारत की कुल आबादी का मात्र 0.5% प्रतिशत आबादी ही इन्टरनेट के सम्पर्क में आई थी. सन 2005 में भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल जनसंख्या का 2.4% थी. 2010 में भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों का प्रतिशत 7.5 था और 2015 में यह 27% प्रतिशत तक पहुँच गया. भारत में 2016 की स्थिति देखें तो कुल जनसंख्या का 34.8% इन्टरनेट का प्रयोग करता है. इन आंकड़ों पर अगर हम गौर करें तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या में सन 2010 के बाद एकदम से उछाल आ गया है. इसके कई सारे कारणों में से मोबाइल पर इन्टरनेट की उपलब्धता को सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है. आज भारत में प्रति 100 व्यक्तियों में से 26 व्यक्ति इन्टरनेट का प्रयोग कर रहे हैं.
आम जनता का इन्टरनेट से जुड़ना सूचना-तकनीक की क्रान्ति की सार्थकता का सूचक है. सूचना क्रान्ति के इस दौर में पूरे विश्व का भूगोल बदल सा गया है. सूचना और सूचना की तकनीक ने वैश्विक रूप ले लिया है. इस कारण आम व्यक्ति का झुकाव भी इस माध्यम की तरफ सबसे ज्यादा है. सन 1995 में जहाँ पूरे विश्व की 1% आबादी इन्टरनेट के साथ जुडी थी,वहीँ सन 2016 के आते-आते पूरे विश्व की लगभग 40% आबादी इन्टरनेट से जुड़ चुकी है. देशों के हिसाब से अगर पूरे विश्व में इन्टरनेट प्रयोगकर्ताओं का आकलन करें तो हमें यह आंकड़े मिलते हैं कि Iceland की 100% आबादी इन्टरनेट का प्रयोग करती है. विश्व के छोटे-छोटे देश जिनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल बहुत कम है वह इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों में सबसे आगे हैं. सबसे अधिक आबादी वाले देशों के हिसाब से अगर देखा जाए तो चीन की आबादी विश्व में सबसे ज्यादा है और वहां की 52.2% जनसंख्या इन्टरनेट का प्रयोग करती है. आबादी के हिसाब से भारत विश्व में दूसरे स्थान पर आता है और यहाँ की कुल आबादी में से 34.8% जनता इन्टरनेट का प्रयोग करती है. सबसे आधुनिक और तकनीक के मामले में श्रेष्ठ माने जाने वाले देश अमरीका की 88.5% आबादी इन्टरनेट का प्रयोग करती है. इसके साथ ही यू. के. में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या 92.6% है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इन्टरनेट पूरे विश्व में प्रचलन में है और इसने पूरी दुनिया के भूगोल को बदल कर रख दिया है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है इसका तकनीकी रूप से विकास हो रहा हैतथा यह आम जनता की पहुँच में आसानी से पहुँच रहा है. इन्टरनेट के माध्यम से ही हमें अनेक ऐसे तमाम साधन (जैसे वेबसाइटपोर्टलसोशल नेटवर्किंग साइट्समोबाइल एप्लीकेशन्स) उपलब्ध हुए हैंजिन्होंने पूरे विश्व को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया है.
इन्टरनेट की बढ़ती उपयोगिता और सोशल सोशल नेटवर्किंग के इस दौर में व्यक्ति जी जिन्दगी में कई तरह के परिवर्तन आये हैं. आज एक सामान्य से इनसान के हाथ में भी स्मार्टफोन है और वह उसी के माध्यम से पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है. अब तो स्थिति यह है कि संवाद-विवाद-समर्थन-विरोध जैसे कम भी वह इन्टरनेट के माध्यम से करने लगा है. आम इनसान के हाथ में स्मार्टफोन का होनासिर्फ सम्पर्क स्थापित करने के साधन तक ही सीमित नहीं हैबल्कि स्मार्टफोन के रूप में उपलब्ध यह छोटी सी डिवाइस उसके सम्पूर्ण क्रियाकलापों का एक जीवन्त दस्तावेज है. इसके माध्यम से वह अपने जीवन के अनेक महत्वपूर्ण कार्यों को अन्जाम देता है. स्मार्टफोन में इन्टरनेट की उपलब्धता उसकी कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा देती है. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि इन्टरनेट स्मार्टफोन में आत्मा की तरह कार्य करता है. स्मार्टफोन अगर इन्टरनेट के साथ जुड़ा हुआ है तो वह एक तरह से व्यक्ति का जीवन्त साथी हो जाता है और इसके माध्यम से व्यक्ति उस हर कार्य को अन्जाम दे सकता है जो उसकी तात्कालिक जरुरत हो. इस तरह से हम यह समझ सकते हैं कि वर्तमान दौर में इन्टरनेट और इससे जुड़े हुए अनेक साधन व्यक्ति के जीवन का अहम् हिस्सा हैं और व्यक्ति जितना इन साधनों के साथ जुड़ता चला जाता है उतना ही उसका जीवन सुगम होता चला जाता है. शेष अगले अंक में...!!!

10 सितंबर 2013

आजादी पर आत्मचिन्तन ... 2

9 टिप्‍पणियां:
आजादी का अगर सीधा सा अर्थ किया जाए तो इस मतलब होगा अपनी व्यवस्थाओं में जीना, लेकिन जिस भारत की आजादी का जश्न हम बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं (यह तो होना भी चाहिए) उसमें अगर हम आज तक के  (66 वर्षों) समय को गहराई से विश्लेषित करें तो पूरी सच्चाई एकदम स्पष्ट रूप से सामने आती है कि आजादी के बाद हम कोई ऐसी व्यवस्था कायम नहीं कर पाए जो हमारे देश के अनुकूल हो, बल्कि पिछले 15-20 वर्षों से तो हमने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया है कि हम कितनी विदेशी व्यवस्थाएं इस देश में लागू कर पाते हैं और हम पुरजोर इसी कोशिश में हैं. फिर यह आजादी कैसी यह एक बड़ा प्रश्न है ? गतांक से आगे    

वर्तमान आजादी के दौर को समझने से पहले हमें अपने देश के इतिहास पर नजर डालने की जरुरत है. अगर आज तक के उपलब्ध इतिहास का विश्लेषण करते हैं तो इस देश की एक उच्च सांस्कृतिक, सामाजिक और अध्यात्मिक परम्परा रही है. इस देश के ही एक समय में विश्व गुरु का दर्जा दिया जाता था. यह वही भारत है जो विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में दुनिया के तमाम देशों को राह दिखा रहा था, दुनिया के देश अभी ढंग से अपने जीवनयापन के साधनों की तलाश भी नहीं कर पाए थे और इस देश के लोग अआत्मिक चिंतन की तरफ प्रवृत थे, भौतिक सुख सुविधाओं से संपन्न इस भारत के लोग पूरी दुनिया में शांति और संतोष के अग्रदूत बनकर उभरे थे, आज भी कई ऐसे प्रमाण हमारे सामने हैं, जिनके आधार पर हम इन सब बातों के तथ्यात्मक रूप से कह सकते हैं और प्रमाणित कर सकते हैं. यह भारत के इतिहास का एक पहलू है, मुगलों का शासन जब इस देश में स्थापित हुआ तो भी यहाँ संस्कृति और सभ्यता का विकास होता रहा, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी ने इसे गहरे गर्त में धकेल दिया. हालाँकि मुगलों के शासन के दौरान भी इस आर्यवर्त की सभ्यता और संस्कृति के साथ काफी खिलवाड़ किया गया, उन्होंने भी इस देश को जमकर लूटा, यहाँ पर शासन व्यवस्था कायम की और इस देश को अपने तरीके से चलाने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन अंग्रेजों ने तो इस देश को ऐसे कगार पर ला खड़ा किया जहाँ से इस देश का हर प्रकार से पतन होना शुरू हुआ. आर्यवर्त दुनिया को शांति का सन्देश देता रहा है और यह अंग्रेजी शासक कलुषित मासिकता के कारण पूरी दुनिया में व्यक्ति के साथ छल, कपट और धोखे के लिए मशहूर रहे हैं और संभवतः आज भी इनके हालात ऐसे ही हैं.

खैर भारतीयों को जब अंग्रेजी शासन में घुटन महसूस होने लगी तो उन्होंने आजादी का बिगुल बजा दिया. 10
मई 1857 को भारतीय आजादी की क्रांति का शंखनाद मेरठ से हुआ, इस आन्दोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दीं, असंगठित आन्दोलन होने के कारण अंग्रेज इसे दबाने में बेशक सफल रहे हों, लेकिन स्वतंत्रता के लिए जल चुकी चिंगारी को बुझाने में वह कामयाब नहीं हो सके और रह रहकर उनके खिलाफ आन्दोलन होते रहे और अंततः 90 वर्षों के कठोर संघर्ष के बाद भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ. लेकिन इस देश के दो टुकड़े हो गए, भारतीयों को लगा कि वह अपने मकसद में कामयाब हो गए लेकिन यह सिर्फ एक कल्पना थी. हमने अगर आजादी अगर प्राप्त की तो वह कानून के माध्यम से प्राप्त हुई. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जो अंग्रेजों की गुलामी से स्वतन्त्र हुआ हो और उसे कानून बनाकर आजादी दी गयी हो. इतना ही नहीं अंग्रेज जिस मकसद को हासिल करना चाहते थे वह अंत में उस मकसद को हासिल करने में भी कामयाब हो गए. एक देश के दो टुकड़े कर गए और ऐसी भावना भर गए कि आज उसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं और आने वाले समय में भी कमोबेश यह स्थिति जारी रहेगी. 

यह तो आजादी का एक पहलू है, भारत में आजादी के बाद क्या कुछ परिवर्तन आया उसे पुरे सन्दर्भ में अगर देखा जाए तो स्थिति बहुत नाजुक सी लगती है और कई बार मन यह सोचकर उदास हो जाता है कि हम कैसे आजाद भारत में रह रहे हैं. कोई भी ऐसा पक्ष नहीं जो हमें महसूस करवा सके कि हम आजादी में जी रहे हैं. आज भी हम उस गुलाम मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं, इसलिए हम अपने कार्यक्रमों और नीतियों का निर्धारण भी विदेशी हितों के अनुकूल करने लगे हैं. बड़े व्यापक पैमाने पर अगर हम अपने देश कि स्थितियों का विश्लेषण करें तो यहाँ की चाहे राजनीतिक स्थिति हो या आर्थिक स्थिति सब कुछ अब भी विदेशी नीतियों पर निर्भर करता है तो फिर आजादी कहाँ और कैसी आजादी? हम आजादी के बाद कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाए जो हमारे देश के अनुकूल हो, जो हमारी संस्कृति, सभ्यता, समाज, धर्म को संरक्षित कर सके और इस देश की जनता को यह अहसास दिला सके कि जो कुर्बानियां उनके पूर्वजों ने की हैं उनका लाभ उन्हें मिल रहा है, उनकी कुर्बानियां देश और समाज के लिए लाभदायक साबित हुई हैं. लेकिन ऐसा किसी स्तर पर महसूस नहीं होता तो फिर आजादी पर ही एक आत्मचिंतन करने की जरुरत पड़ जाती है. 

हम किस तरह की आजादी चाहते हैं और क्योँ? यह एक बड़ा सवाल है और इस सवाल का उत्तर जिसे भी खोजना होगा उसे पहले अपनी सभ्यता और संस्कृति को समझना होगा. समाज की संरचना और धर्म के नियमों का अध्ययन करना होगा और वह भी सापेक्ष दृष्टि से और तब जो निष्कर्ष हमारे सामने आयेंगे वह हमें निश्चित रूप से यह अहसास तो दिला ही देंगे कि आजादी होती क्या है ? और जब हमें वैसी वास्तविक आजादी का अहसास होगा तो फिर हम निर्णय कर पायेंगे कि हमें अभी कितना सफ़र तय करना है और हमारी मंजिल कितनी दूर है और फिर उस दूरी को भांपते हुए यह भी निर्णय करना होगा कि हम उस मंजिल तक पहुँच पायेंगे या नहीं, अगर पहुंचना है तो फिर किस तरह से और कब हम पहुंच सकते हैं. 

आजादी सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह एक भाव है, एक व्यवस्था है, एक जीवन पद्धति है, लेकिन क्या हमारे देश में या दुनिया में कहीं ऐसा है, मुझे बहुत कम मात्रा में ऐसा देखने को मिला कि कोई व्यक्ति उस आजाद सोच से जीता है, जिसकी मनुष्य से अपेक्षा की जाती है. हम अपने आस पास ही देख लें, विज्ञान और तकनीक की इतनी उन्नति होने के बाबजूद भी हमारे मनों में ऐसी दीवारें हैं जो आजतक हमें उसी गर्त में धकेले हुए हैं जहाँ पर हम आज से दो-तीन सौ वर्ष पहले थे. कहाँ हम जाति-पाति के भेद को मिटा पाए हैं, कहाँ हम मंदिर-मस्जिद को एक समझते हैं, कहाँ हम हिन्दू, मुस्लमान, सिक्ख, ईसाई आदि के दायरों से बाहर निकलकर इंसानियत का भाव कायम कर पाए हैं. कहाँ हमें सबकी बोली प्यारी लगती है, कहाँ हमें किसी के खान पान, रहन सहन से नफरत नहीं होती, कहाँ पर हम साम्प्रदायिकता का शिकार नहीं हैं, हमें कब लगता है कि इको नूर ते सब जग उपज्या, कौण चंगे ते कौण मंदे, जब हमें ऐसा कुछ आभास होता ही नहीं है तो फिर हम इसे कर्म रूप में कैसे देखने की कोशिश करते हैं. अभी हमें आजादी पर गहन आत्मचिंतन करने की जरुरत है, हर एक उस देशभक्त की कुर्बानी को याद करके उसकी महता को समझने की जरुरत है, तभी कहीं हम एक आजादी वाला वातावरण कायम कर पायेंगे....लेकिन ऐसा वातावरण सिर्फ सोचा जा सकता है, इस पर विचार किया जा सकता है, क्रियात्मक रूप में ऐसा जब संभव हो जाएगा तो निश्चित रूप से धरती से सुंदर और कोई जहान नहीं होगा, फिर शायद व्यक्ति जिस काल्पनिक स्वर्ग की कल्पना करता आ रहा है उसे भी करना छोड़ देगा एक आजाद सोच के साथ जीवन व्यतीत करेगा और जब इस दुनिया से रुखसत होगा एक आजादी से भरा वातावरण इस दुनिया को दी जाएगा.

14 अगस्त 2013

आजादी पर आत्मचिन्तन... 1

6 टिप्‍पणियां:
किसी पक्षी को जब पिंजरे से बाहर की दुनिया में प्रवेश करते हुए देखता हूँ तो उसकी चहचहाहट का स्वर ही इतना मोहक और आनन्ददायक होता है कि मन झूम जाता है . उस पक्षी को हालाँकि उस पिंजरे में तमाम सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जो उसके जीवन को चलाने में सहायक होती हैं, लेकिन जब वह उस पिंजरे से बाहर दुनिया में प्रवेश करता है तो उसके पास एक अनन्त आकाश होता है, उसके साथी होते हैं, जिनके साथ मिलकर वह अपने तमाम जीवन के रंग पूरी शिद्दत से जीता है और जीवन को हर परिस्थिति में स्वायत बनाये रखता है. पिंजरे में लाखों सुविधाएं होने के बाबजूद भी वह प्रकृति की तरफ देखकर ही हर्षित होता है. एक पक्षी जब पिंजरे से आजाद होता है तो वह दूर तक उड़ान भरता है और फिर अपने को मुक्त महसूस करता है. जब उसे यह निश्चित हो जाए कि अब वह दुबारा इस गिरफ्त में नहीं आ सकता तो फिर कहीं आराम करता है, अपने बिछड़े हुए संगी-साथियों से मिलता है, उनके साथ अपने जीवन के अनुभव साझा करता है और उन्हें प्रकृति के साथ ही रहने की नसीहत देता है.
यह एक पक्षी के मन की स्थिति है. मैंने कई बार मनुष्यों को भी ऐसे हालातों से गुजरते हुए देखा है और जब वह उन हालातों से उभरते हैं तो वह जीवन के विषय में कुछ ठोस निर्णय लेते हैं और यहाँ तक भी सोच लेते हैं कि उनकी आने वाली पीढियां ऐसे दंशों को ना झेलें, इसलिए वह अपना जीवन रहते एक मजबूत आधार उन्हें देने की कोशिश करते हैं और अपने अनुभव उनके साथ सांझा करते हैं. जीवन का कोई भी पहलू हो उसमें आजादी की महता का वर्णन वह हर हाल में करते हैं. मतलब कि आजादी जीवन और जगत का अनिवार्य आवश्यकता है. पूरी कायनात को जब हम देखते हैं तो ऐसा लगता है कि यह आजादी के सिद्धांत का पर ही टिकी हुई है, हर एक चीज दूसरे पर आश्रित है, लेकिन वह एक दूसरे की सत्ता का अतिक्रमण कभी नहीं करती, इसलिए वह हमेशा पल्लवित और पुष्पित होती रहती है. लेकिन इन सब के बीच में मनुष्य की हालत हम देखते हैं तो स्थिति बिलकुल उलट नजर आती है और यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर किस आधार पर इसे श्रेष्ठ कहा जाता है?? 

आजादी का जहाँ तक प्रश्न है इसकी सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, लेकिन यह कहा जा सकता है कि
यह हर किसी के लिए अनिवार्य है, इससे भी बड़ी बात तो यह है कि यह हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है और इसका हनन किसी भी स्तर पर किसी के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन दुनिया के इतिहास को जब हम देखते हैं तो यह बात उभर कर सामने आती है कि मनुष्य ने हर किसी की आजादी को छीनने की कोशिश की है और अपना रुतवा कायम करने की हमेशा उसकी मंशा रही है. उसने पशु, पक्षियों और प्रकृति की आजादी के साथ तो खिलवाड़ किया ही है लेकिन मनुष्य को भी मनुष्य के कोप का शिकार होना पडा है. जब भी किसी को अपने में थोड़ी सी ताकत का अहसास हुआ उसने दूसरे की आजादी को छीनने का प्रयास जरुर किया है, और अगर उसे सफलता मिली है तो वह आगे बढ़ा है. यह प्रक्रिया व्यक्तिगत स्तर से शुरू होकर देश और दुनिया के स्तर तक अनवरत रूप से जारी है , और आज भी हमें मनुष्य की मानसिकता के ऐसे प्रमाण मिलते रहते हैं. कहने को तो यह कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया के एक गांव है , लेकिन यह बात भी वह लोग कह रहे हैं जो कभी गांव में रहे ही नहीं, जिन्होंने गांव की जिन्दगी जी ही नहीं, जिन्हें गांव के वातावरण का पता ही नहीं. जो लोग ऐसा कह रहे हैं उनकी मंशा तो इतनी भर है कि किस तरह से लोगों को भ्रमित करते हुए दुनिया के देशों पर अपना अधिकार जमाया जाए, किस तरह से उनकी आजादी को कब्जे में लिया जाये और ऐसे प्रयास आये दिन हो रहे हैं . 
आजादी का अगर सीधा सा अर्थ किया जाए तो इस मतलब होगा अपनी व्यवस्थाओं में जीना, लेकिन जिस भारत की आजादी का जश्न हम बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं (यह तो होना भी चाहिए) उसमें अगर हम आज तक के  (66 वर्षों) समय को गहराई से विश्लेषित करें तो पूरी सच्चाई एकदम स्पष्ट रूप से सामने आती है कि आजादी के बाद हम कोई ऐसी व्यवस्था कायम नहीं कर पाए जो हमारे देश के अनुकूल हो, बल्कि पिछले 15-20 वर्षों से तो हमने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया है कि हम कितनी विदेशी व्यवस्थाएं इस देश में लागू कर पाते हैं और हम पुरजोर इसी कोशिश में हैं. फिर यह आजादी कैसी यह एक बड़ा प्रश्न है ? फिलहाल हम सब इस आजादी के दिवस को मनाएं परत दर परत हम फिर अपनी बात रखेंगे ..!!! शेष अगले अंक में...!!!! 

23 अगस्त 2011

आजादी से मुक्ति की ओर .. 2 ..

40 टिप्‍पणियां:

गतांक से आगे ..........!
आज भी जब इंसान को इंसान की तरफ तलवार, गोला बारूद , और भी ना जाने क्या -क्या  लिए देखता हूँ तो आँखें चुंधिया जाती हैं . कोई धर्म को लेकर लड़ रहा है तो कोई जाति को लेकर , किसी का राम बड़ा है, तो किसी का अल्लाह , किसी को मस्जिद चाहिए तो, किसी को मंदिर . ना जाने कितनी  बिडम्बनाएँ आज हमारे सामने हैं , और फिर भी हम आजादी की बात करते हैं . हमने कभी "आजादी"  शब्द को विचारा ही नहीं, कि क्या सच में हम आजाद हैं ? अगर थोडा सा भी विचार किया होता तो आज ना तो कश्मीर का मुद्दा होता और ना अयोध्या का . लेकिन हमने क्या किया  , "जीवन क्या जिया बहुत - बहुत ज्यादा लिया , दिया बहुत बहुत कम , मर गया देश , अरे जीवित रह गए तुम"   ( मुक्तिबोध ) . हमारा  जीवित रहना और देश का मरना कहाँ की आजादी है , किस तरह की आजादी है . जबकि इस आजादी को प्राप्त करने के लिए हमारे देश के लाखों वीरों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी थी . क्या सच में हम उनकी कुर्बानियों की कद्र कर पाए . किसी भी हालत में नहीं , अगर की होती तो आज हमारे सामने यह स्थितियां पैदा नहीं होती .हम आजादी का जश्न मनाते हैं बस एक औपचारिकता को निभाते हैं .

आजादी शब्द पर गहराई से विचार करें तो आजादी का मतलब है "बंधन रहित होना" अब यहाँ बंधन कितनी तरह के हैं . हमें किन बन्धनों से आजाद होने की जरुरत है  . यह विचारना जरुरी है . जब तक हम यह नहीं विचार पाएंगे आजादी के सही मायने नहीं समझ पायेंगे . जब हमारे सामने कोई  बंधन ही नहीं है तो फिर कहाँ की विसंगतियां हैं और कौन सी बिडम्बनाएँ , फिर तो हमारे सामने एक उन्मुक्त आकाश है जहाँ हम विचर सकते हैं अपनी मस्ती में, कर सकते हैं सभी के हितों का ख्याल, लगता है सामने वाला भी अपना ही प्रतिरूप , अगर यह आभास होता है तो फिर तो आजादी है , फिर तो जीवन को नैसर्गिक रूप से जिया जा रहा है , जैसा हमें खुदा ने बख्शा था वैसे ही जीवन हम जी रहे हैं और पूरी कायनात के लिए हम वरदान साबित हो रहे हैं . लेकिन ऐसा दिखता नहीं , बस यही अफ़सोस है और यही दुःख !!

जीवन में सबसे पहले हमें आजाद होने की जरुरत है , अगर यह नहीं हो पाता तो फिर वही बात " भोजन, भोग , निद्रा, भय यह सब पशु पुरख सामान " तो फिर हमारी हालत पशु से अलग नहीं है . अगर हम कहीं अलग हैं तो हमारी समझ के कारण और अगर हममें यह समझ है तो फिर तो हम आजाद हैं . ना हमें कोई हिन्दू नजर आता है , ना कोई मुसलमान , ना कोई सिक्ख  है , ना कोई ईसाई, ना कोई देश है , ना कोई सरहद है , ना कोई दीवार है , ना कोई भ्रम . बस अगर है तो एक ऐसा उदात दृष्टिकोण जहाँ पर सब अपने नजर आते हैं . " एक पिता एक्स के हम बारक " फिर कहाँ भिन्नताएं  हैं  . और यह सच में जीवन में आजादी है , जीवन को जीने का आनंद ही अलग है . थोडा सा समय मनुष्य रूप में  हमें इस धरती पर रहने को मिला है और इस समय का हम पूरा सदुपयोग कर रहे हैं . मतलब हम आजाद है , हर पल , हमारे लिए कोई एक दिन आजादी का नहीं बल्कि हर पल आजादी  है .
अब हमें आजादी  से मुक्ति की और बढ़ना है . हमारे धर्म ग्रंथों में मुक्ति को जीवन का साध्य माना गया है . और ज्ञान को मुक्ति तक पहुँचने का साधन ....ज्ञान को समझ कहा गया है और समझ भीतर की वस्तु  है , ह्रदय का प्रकाश है . हमारे धर्म ग्रंथों में जो जीवन के चार वर्ग ( धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष ) निर्धारित किये गए हैं , उनमें से मोक्ष भी एक है . हमें जीवन रहते  इसे प्राप्त करना हैअब हमें शरीरों से के बंधन से मुक्त होना है . "मानुष जन्म आखिरी पौड़ी , तिलक गया ते बारी गयी" यानि मनुष्य जन्म आखिरी जन्म है, अगर इस जन्म में हम अपनी मुक्ति का मार्ग नहीं खोज पाए तो फिर जीवन व्यर्थ चला गया , फिर हमें चौरासी लाख योनियों के चक्कर में पड़ना पड़ेगा . और फिर वही हालत . हम मोक्ष या मुक्ति के मामले में काल्पनिक बने रहते हैं , कि जीवन के बाद  कहीं मोक्ष है लेकिन वास्तविकता इससे कहीं दूर है . वास्तविकता में मोक्ष या मुक्ति आत्मा से परमात्मा से मिलन है , आत्मा जब परमात्मा से मिल जायेगी तो मुक्ति संभव है . दुसरे शब्दों  में हम इसे बैकुंठ भी कहते हैं , और बैकुंठ का मतलब है जहाँ कोई कुंठा नहीं , जहाँ कोई चिंता नहीं बस आनंद ही आनंद है . और यही आजादी  भी है . काश हम जीवन को नैसर्गिक रूप से जीते , आत्मिक स्तर से सोचते आजादी मनाते , मुक्ति पाते ....और सही मायनों में  इंसान कहलाते ...!!!

16 अगस्त 2011

आजादी से मुक्ति की ओर ..1 ..

59 टिप्‍पणियां:

पिछले दो दिनों से देख रहा हूँ कि हर तरफ शुभकामनाओं को बांटने का सिलसिला अनवरत रूप से जारी है , और यह होना भी चाहिए . क्योँकि हम सब समाज का हिस्सा हैं और समाज के हर व्यक्ति के हितों की चिंता करना हमारा कर्तव्य है . किसी हद तक जब किसी को शुभकामनायें देते देखता हूँ तो अक्सर उसके चेहरे के भाव जरुर पढता हूँ और पता चल जाता है कि सामने वाला व्यक्ति किस भाव से इस व्यक्ति के सामने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा है . खैर यह हर व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत मामला हो सकता है और मुझे कोई हक नहीं किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का और मैं करना भी नहीं चाहता . क्योंकि मेरे लिए स्वतंत्रता का मतलब कुछ अलग है जिसे मैं कुछ इस प्रकार से सोचता हूँ . स्वतंत्रता शब्द को देखें तो यह स्व और तंत्र के मेल से बना है ...स्व का मतलब है निजी या व्यक्तिगत , और तंत्र का मतलब है व्यवस्था, यानि स्वतंत्रता शब्द का  मतलब हुआ अपनी एक व्यवस्था . एक ऐसी व्यवस्था जिसके तहत हम अपना कार्य करते हैं और अगर हमें कुछ सही नहीं लगता तो हम उसे बदल देते है . जिस व्यवस्था में किसी के हित को ठेस पहुँच रही है , कोई असहज महसूस कर रहा है हम उस व्यवस्था में परिवर्तन कर देते हैं  तो काफी हद तक तो स्वतंत्रता भी सही है और यहाँ पर जब शुभकामनाओं दी जा रही है तो उन शुभकामनाओं में "स्वतंत्रता" शब्द का प्रयोग बहुतायत रूप से किया गया है . हर किसी का अपना नजरिया है और हर किसी की अपनी सोच है और यह अच्छी बात भी है होना भी चाहिए यह सब , हम सब को एक सूत्र में बाँधने के लिए यह सब जरुरी भी है .
लेकिन जब गहराई से सोचता हूँ तो पाता हूँ कि  आखिर हम किस स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं ? क्या उस स्वतंत्रता की जिस स्वतंत्रता का सपना रानी लक्ष्मी बाई , तांत्या टोपे , भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव , चंद्रशेखर आजाद , महात्मा गाँधी , सुभाष चन्द्र बोस , सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे ना जाने कितने आजादी के दीवानों ने देखा था . क्या हम उस स्वतंत्रता को मना रहे हैं ? या जो स्वतंत्रता आज हमारे सामने है उसे मना रहे हैं ? यह बहुत विचारणीय बिंदु है . स्वतंत्रता के ६५ वर्षों में हमने क्या उन लक्ष्यों की तरफ कदम बढाया जिन लक्ष्यों के लिए उन वीरों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था ? आखिर हमें ऐसी स्वतंत्रता की आवश्यकता क्योँ महसूस हुई थी जिसके लिए हमने अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की , इन बातों पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है और फिर विचार के बाद जो निष्कर्ष निकलेगा उस पर त्वरित अमल करने की आवश्यकता है .समय और स्थिति के अनुसार हर किसी का निष्कर्ष अलग हो सकता है लेकिन जो मूल बात होगी वह यही कि जिस स्वतंत्रता के तहत हम अपना जीवन जी रहे हैं क्या वास्तविकता में यह सही है . जब कोई व्यक्तिगत रूप से सोचेगा तो हो सकता है कि यह उसे सही भी लगे या ना भी लगे लेकिन जब हम सामूहिक परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो पायेंगे कि काफी हद तक उन लक्ष्यों की तरफ नहीं बढ़ पाए जिन लक्ष्यों को हमने स्वतंत्रता की जंग के वक़्त अपने सामने रखा था ? लेकिन इसके लिए कौन जिम्मेवार है , हम ,समाज ,सरकार, या फिर हमारा प्रशासन . सबकी अपनी अपनी भूमिका है ,सबके अपने अपने कर्तव्य हैं .
हमने अंग्रेजों से लड़ कर राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता का जिम्मा हमारे हाथ में था ? स्वतंत्रता के दिन से लेकर आज तक हम राजनीति में ही पड़े रहे और सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के बारे में हमने सोचा ही नहीं , आज हमारे देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है यह आप भली प्रकार जानते हैं . आर्थिक रूप से अगर आज भी हम देखें तो हम तब तक खुद को आर्थिक रूप से संपन्न नहीं कह सकते जब तक हमारे देश में एक गरीब व्यक्ति दो वक़्त की रोटी के लिए किसी के सामने हाथ फैला रहा है , एक मजदूर को उसकी मेहनत के बदले मजदूरी कम दी जा रही है , एक अबोध बालक का अपहरण हो रहा है , और भी ना जाने कितनी समस्याएं हैं जो आये दिन हम जिनसे रूबरू होते हैं . अगर सामाजिक स्थिति की बात की जाये तो आज भी हमारे देश में जाति - पाति के नाम पर , वर्ग के नाम पर , ऊँच - नीच के नाम पर , भाषा के नाम पर ,धर्मों के नाम पर लोग एक दुसरे का विरोध करते हैं , और फिर भी हम खुद को स्वतन्त्र कहते हैं .जहाँ तक सिर्फ अपने नियमों के दृष्टिकोण से देखें तो वहां तक "स्वतंत्रता" सही लग रही है . क्योँकि हमारा अपना नियम है , हम अपने नियम को मनवाने के लिए किसी का भी कतल कर सकते हैंहम किसी को भी लूट सकते हैं और भी ऐसा बहुत कुछ कर सकते हैं जिससे हमारे व्यक्तिगत हितों कि पूर्ति हो और काफी हद तक हर स्तर पर यह हो भी रहा है , और ना जाने कब तक होता रहेगा .
होना तो हमें "आजाद" था ..लड़ी तो हमने आजादी की लड़ाई थी . लेकिन आज तक हम आजादी की तरफ कदम नहीं बढ़ा पाए , हम सोच ही नहीं पाए कि हमें उन्मुक्त जीवन जीना है  जिस "वसुधैव कुटुम्बकम" की बात यहाँ की जाती थी उसे साकार करना है . लेकिन अफ़सोस होता है मुझे, हम आज तक उस दिशा में बढ़ ही नहीं पाए हमने कभी प्रयास ही नहीं किया . बस एक राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गयी , हम  संतुष्ट हो गए और उस राजनीतिक स्वतंत्रता का लाभ आखिर किसे मिला यह आज हमारे सामने है . आजादी तो दूर रह गयी हमसे उसकी तरफ हमने  सोचा ही नहीं . अगर आज हम आजाद होते तो सामने वाले व्यक्ति का चेहरा हमें विद्रूप नहीं लगता , हम अपने घरों के सामने इतनी बड़ी दीवारें खड़ी नहीं करते , सरहदों  पर यह खून खराबा नहीं होता ........!
शेष अगले अंक में ......!