04 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...1

‘आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है’. सन 1977 में आई फिल्म ‘अपनापन’ का यह गीत काफी लोकप्रिय गीत रहा है और मनुष्य जीवन के सन्दर्भ में काफी प्रासंगिक है. इस गीत का मुखड़ा मनुष्य जीवन के सफ़र के साथ भी जोड़ा जा सकता है. आदमी इस दुनिया में एक मुसाफिर की तरह जीवन जीता है, जो चंद साल इस धरती पर मनुष्य के रूप में रहता है और फिर इस धरती से रुखसत हो जाता है. वह जाता कहाँ हैं? इस विषय में दुनिया में तमाम तरह के विचार प्रचलित हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि मनुष्य का शरीर यहीं रहता है, लेकिन उस शरीर को चलायमान रखने वाली चेतना उससे कहीं अलग हो जाती है. जैसे ही वह चेतना शरीर से अलग होती है, शरीर निढाल हो जाता है, वह सभी तरह की गतिविधियाँ करना बंद कर देता है. दूसरे शब्दों में हम उसे मृत्यु कहते हैं.
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह शारीरिक रूप से अक्षम होता है और धीरे-धीरे वह धरा पर अपने परिवेश के अनुसार उपलब्ध वस्तुओं का उपभोग करते हुए अपने शरीर की यात्रा को तय करता है. उसके शरीर की यात्रा कितनी है इस विषय में उसे कभी कोई जानकारी नहीं रहती. फिर हम अनुमान लगाते हैं कि एक स्वस्थ मनुष्य औसतन 60 से लेकर 80-90 वर्ष तक जीवन जी लेता है. मनुष्य का यह सफ़र इस धरा पर रोचक सफ़र होता है. वह तरह-तरह की गतिविधियाँ करता है और उनके माध्यम से वह ऐसा प्रयास करता है कि अपने समाज और देश की परम्पराओं-विश्वासों और मान्यताओं का पालन करते हुए अपने जीवन के सफ़र को तय कर सके. हमारा समाज भी ऐसी ही अपेक्षा एक व्यक्ति से करता है कि जो कुछ भी उसने तय किया है, अगर व्यक्ति उसके अनुसार जीवन जीता है तो उस जीवन को सफल और सम्मानजनक माना जाता है, और अगर कोई व्यक्ति समाज के बने-बनाये नियमों को तोड़ने की कोशिश करता है तो समाज उसे हिकारत की नजर से देखता है.
कई बार लगता है कि समाज और मनुष्य को एक सही दिशा देने के लिए यह नियम आवश्यक हैं और ऐसा भी महसूस किया जाता है कि इन नियमों के बिना समाज आगे बढ़ ही नहीं सकता. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. लेकिन यह भी एक प्रश्न है कि दुनिया में मनुष्य किस तरह से जीवन जिए? क्योँकि पूरी दुनिया में हम देखते हैं तो हमें पता चलता है कि दुनिया के हर हिस्से में जीवन को जीने के नियम अलग हैं. हर हिस्से में अपनी मान्यताएं हैं, अपनी परम्पराएं हैं, भाषा है, पहरावा है, खान-पान है, रहन-सहन है, ऐसी तमाम चीजें हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदल जाती हैं. फिर हम इस उलझन में उलझते हैं कि यह श्रेष्ठ है और यह बेकार है. हालाँकि अगर हम गहराई से सोचें तो हमें समझ आएगा कि दुनिया में जो कुछ भी परम्पराओं-रुढियों और विश्वासों के नाम पर प्रचलित है वह सिर्फ उस विशेष समुदाय-जाति-वर्ग या उस स्थान पर रहने वाले लोगों की मान्यता है. अगर कोई उसे नहीं भी मानता है तो उससे कोई ख़ास नुकसान किसी को होने वाला नहीं है. लेकिन हम जिस परिवेश में रहते हैं, उस परिवेश को बेहतर बनाने के प्रयास किये जा सकते हैं. ताकि हर मनुष्य इस धरा पर शान से जीवन को जी सके. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम दुनिया के किसी भी हिस्से पर नजर दौड़ाकर देखें असमानता-शोषण-भेदभाव आदि कुरीतियों के चिन्ह हमें व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं.
अब अगर हम विचार करें कि ऐसा क्योँ है तो हमें इसका कोई सटीक जबाब नहीं मिल पायेगा. दुनिया में इतने धर्म, इतनी जातियां, इतनी भाषाएँ, इतनी परम्पराएँ, इतनी मान्यताएं आखिर क्योँ अस्तित्व में है? इसका कोई जबाब नहीं है. हालाँकि इन सबका होना कोई बुरी बात नहीं है. आज जितना कुछ है इससे अधिक भी अगर इस धरा पर होता तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी, लेकिन थोडा रुककर सोचें तो समझ आता है कि इन सबने मनुष्य को मनुष्य से अलग करने का काम किया है. जब एक प्रांत का मनुष्य दूसरे प्रांत के मनुष्य से घृणा करता है, जब एक भाषा को बोलने वाला दूसरे की भाषा को कमतर आंकता है, जब एक मनुष्य की परम्पराएँ दूसरे के लिए सरदर्द बन जाती हैं, जब एक मनुष्य का पहरावा दूसरे मनुष्य के लिए नफरत का कारण बन जाता है तो हमें फिर इस विविधता पर गम्भीरता से विचार करने की जरुरत है. आखिर क्योँ ऐसा हो रहा है? हमें किसी से नफरत करने का अधिकार किसने दिया है? कौन हमें किसी भाषा और रंग से नफरत करने की सलाह दे रहा है? हमें किसने कह दिया कि मनुष्य जन्म से छोटा और बड़ा है, स्वर्ण और शुद्र है? यह तमाम प्रश्न हैं जो आज के दौर में ही नहीं, बल्कि हजार वर्षों से हमारे बीच में उठ रहे हैं और हम इन प्रश्नों का हल खोजने के लिए किसी हजार वर्ष पुराने सन्दर्भ का सहारा लेकर खुद को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हमें हासिल क्या हो रहा है, इस पहलू पर कोई विचार नहीं कर रहा है.
परम्पराएं और मान्यताएं किसी समाज की पहचान हैं और यह होना भी चाहिए, लेकिन वहीँ तक जहाँ तक कि यह किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान न पहुंचाएं. अगर कोई ऐसी मान्यता या परम्परा किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान पहुंचा रही है तो हमें उसे तुरन्त बदल देने की जरुरत है. क्योँकि आखिर हम सब पञ्च भौतिक शरीर में रहकर ही जीवन के सफ़र को तय कर रहे हैं. तो ऐसी अवस्था में कौन छोटा, और कौन बड़ा, कौन गोरा, और कौन काला, कौन ऊँचा और कौन नीचा? जब हम इस तरह से सोचना शुरू करते हैं तो दुनिया में जो भी उलझन भरी हुई है, वह धीरे-धीरे सुलझती हुई नजर आती है. कुछ एक ऐसे पहलू हैं जो हमारे समाज को निरन्तर विकृत किये जा रहे हैं. लकिन हम हैं कि उनके विषय में सोचते ही नहीं हैं. कहीं न कहीं पर हम भी ऐसे पहलूओं को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभा रहे होते हैं. अब जब दुनिया बदल रही है तो क्योँ न हम नए सिरे से सोचें इस दुनिया के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी सभ्यता के बारे में. अगर हम गहराई से सोचेंगे तो हमें बहुत से ऐसे पहलू मिलेंगे जो हमारे लिए सार्थक हैं, और कुछ ऐसे भी मिलेंगे जो हमारे लिए निरर्थक हैं, हमें उनकी पहचान करनी है और उन्हें बदलने का प्रयास करना है. शेष अगले अंक में...!!!              

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "अंधा घोड़ा और हम - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर पोस्ट ।