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16 जनवरी 2014

बदलावों की आहट...3

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गतांक से आगे वह बात तो भविष्य को बदलने की करते हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान और इतिहास की कोई ख़ास समझ नहीं होती, बस वह एक राग अलापते हैं और उसी के बल पर अपना प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करते हैं. नका सिर्फ एक ही मकसद है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाना, ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रभावित करना, उनसे समाज सेवा के नाम पर धन इक्कठा करना, उन्हें मानसिक रूप से ऐसा तैयार करना कि वह अपना सर्वस्व अर्पित करने के लिए तत्पर हो जाएँ. कुछ को तो मैंने बहुत बड़े-बड़े दावे करते हुए सुना है, वह कुछ ऐसी काल्पनिक कहानियाँ लोगों के बीच प्रचारित करते हैं जिनसे इनके सब कुछ होने की ख़बरें चारों और फैलती रहती हैं और आम जनता भ्रमित होती रहती है. आम लोग इसे ही बदलाव का नाम दे रहे हैं. लेकिन बहुत गहरे में उतरकर जब देखा जाता है तो स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं, लोग सिर्फ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी को अपना मार्गदर्शक समझ रहे हैं, कई बार तो मुझे ऐसा लगता है कि लोगों के लिए अब किसी तथाकथित “स्वयम्भू प्रभु” या नेता के पीछे चलना शान की बात हो गया है और लोगों की इसी मानसिकता का लाभ यह तथाकथित समाज सुधारक, अध्यात्म और धर्म, राजनीति आदि के नाम पर सुधार करने वाले लोग उठाते हैं. मैं बहुत बार सोचता हूँ कि अगर कहीं किसी के पीछे चलकर ही बदलाव आता तो आज हर कोई किसी न किसी का अनुसरण कर रहा है तो फिर दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता. क्योँकि जितने भी महान लोग इस धरा पर हुए हैं और ज्यादातर लोग जिनका अनुसरण करते हैं उन्होंने सदैव मानवता का ही पाठ पढ़ाया है और उनके विचारों में तो कोई भी बैर नहीं, कहीं किसी से कोई द्वेष नहीं, उन्होंने तो सम्पूर्ण सृष्टि को खुदा का कुनवा कहा है, फिर यह विरोध और प्रतिरोध कहाँ और कैसा, यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है और हम सबको इस प्रश्न पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है.

अतीत को याद करके हम वर्तमान को नहीं संवार सकते, लेकिन वर्तमान में अतीत को याद करके, उसमें हुई
महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण करके हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. उस सीख को हम अगर वर्तमान में अपना लें और उसी अनुरूप कार्य करें तो निश्चित रूप से भविष्य सुखद हो सकता है, उसी आधार पर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना सकते हैं, उनके लिए कोई मानक बना सकते हैं. लेकिन आज ऐसा नहीं है, काम कम किया जाए उसका प्रचार ज्यादा हो, सोचा समझा कम जाए, लेकिन बखान ज्यादा हो, आज ज्यादातर लोगों में प्रसिद्धि की इतनी भूख है कि वह उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, ऐसी स्थिति में उनका जो मकसद होता है वह तो पूरा हो जाता है. लेकिन जिस मकसद से जनता उनके साथ जुडी होती है उन्हें धोखा ही मिलता है. पूरे परिदृश्य पर अगर हम नजर डालें तो स्थिति समझ आ जायेगी और फिर हम समझ सकते हैं कि हालात किस कदर बदतर हैं. हमें इन हालतों से निबटने के लिए कितने शीघ्र प्रयास करने की जरुरत है. लेकिन अब सिर्फ प्रयास करने से ही नहीं बल्कि कुछ ऐसा ठोस करना होगा जिससे इस परिदृश्य को बदलने की एक मजबूत नींव डाली जा सके. ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि अब कौन ऐसा कुछ नया करेगा, जिससे कि सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा. तो इस सवाल का सीधा सा उत्तर है कि यह सब हमें ही करना पडेगा और हम तक हम सब इन अभियानों में सक्रीय रूप से शामिल नहीं होते तब तक चाहे कोई कितने भी बदलावों की बात करे, सतही तौर पर कैसे भी प्रयास करे, सफलता किसी भी स्तर तक नहीं मिल सकती और अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं हमें इस धरा पर मानव की मानवीयता के सिर्फ उदहारण ही सुनने, पढने को मिलेंगे. क्योँकि जैसे–जैसे हम विज्ञान और तकनीक के क्ष्रेत्र में उन्नति करते जा रहे हैं वैसे ही हमरा संपर्क समाज से कटता जा रहा है, हम सामाजिक सोच की अपेक्षा व्यक्तिवादी सोच को अपना रहे हैं, हम सामूहिक हितों की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, अब तो स्थिति ऐसी भी आ गयी है कि हमारे लिए परिवार नाम की संस्था के मायने भी ख़त्म होते जा रहे हैं, अब हम निकृष्ट व्यक्तिवादी हो गए हैं और इसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं, और अगर ऐसा ही होता रहा तो व्यक्ति की हालत क्या हो सकती है, इसके विषय में सिर्फ सोचा जा सकता है. 

आज जैसा माहौल हमारे सामने है उस पर समग्र रूप से विश्लेषण करने की जरुरत है. हर कोई कहता है कि खामियां हैं. किसी को सामाजिक संरचना में खामी नजर आती है, किसी को राजनीति में, कहीं पर धर्म की खामियां गिनाई जा रही हैं तो कोई साहित्य की बात कर रहा है. हर कहीं खामी है और हर खामी को बदलने की बात की जा रही है. इसके लिए बहुत से लोग प्रयास कर रहे हैं, और उनके प्रयास निरंतर जारी हैं. लेकिन जिस बदलाव की बात वह करते हैं वह कहीं नजर नहीं आते, बल्कि स्थिति इसके उलट होती जा रही है. कोई एक सच्चा व्यक्ति विचार पैदा करता है लोग उसका अनुसरण करते हैं और फिर उसके जाने के बाद स्थिति वहीँ की वहीँ रह जाती हैं, और ऐसे में भ्रष्ट बुद्धि लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करते जाते हैं और उनका बोलबाला वैसा ही बना रहता है. हम यह नहीं कह सकते कि आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसने इस सली गडी व्यवस्था को परिवर्तित करने की जी जान से कोशिश न की हो, ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं. महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, कबीर, रैदास, मीरा, स्वामी दयानंद, विवेकाननद, महात्मा ज्योतिबा फुले, विद्यासागर, महात्मा गांधी, भगत सिंह ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने भ्रष्ट व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें मिटाने के लिए जी जान से प्रयास किये. आज अफ़सोस इस बात का है कि इनके नामों का प्रयोग करके हर कोई अपनी दुकान तो चमका रहा है, लेकिन इनके विचारों और कार्यों का अनुसरण करने वाला कोई विरला ही नजर आता है. ऐसे में जिसे हम बदलाव का नाम दे रहे हैं उसकी सिर्फ आहट सुनाई दे रही है, वह भी इन नामों के कारण और वास्तविक बदलाब आना अभी बहुत दूर का काँटों का सफ़र है. 

आज जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, जैसा वातावरण हमारे सामने है उससे तो लगता है कि दुनिया में कहीं
कोई समस्या नहीं है. सूचना-तकनीक के साधनों से हमारा सीधा संपर्क है. हम उनका बखूबी इस्तेमाल भी कर रहे हैं, आज के विज्ञान ने जितना कुछ हमें दिया है वह हमारे लिए लाभकारी है. दुनिया के सारे देश एक दूसरे के संपर्क में हैं, कुछ ऐसी वैश्विक संस्थाएं गठित की गयी गयी हैं जिनके नियम और कायदे पूरी दुनिया पर लागू होते हैं और इन संस्थाओं के निर्णयों का प्रभाव पूरी दुनिया पर पढता है. इसे हम वैश्वीकरण का नाम दे रहे हैं. दुनिया पूरी एक  गाँव बन गयी है, अब कोई समस्या नहीं, पूरी दुनिया के लोग एक हो गए हैं, ऐसा प्रचार वैश्वीकरण के समर्थक करते हैं और इस माध्यम से एक आस जगाते हैं कि अब तो दुनिया का स्वरूप बदल कर ही रहेगा. क्योँकि अब कोका कोला पूरी दुनिया में बिकता है, जहाँ पानी पीने को नहीं मिलता वहां कोक की बोतलें मिल जाती हैं, चाइनीस फ़ूड अब गली मोहल्लों, सड़कों में खाने को मिल जाता है, आधुनिकता के नाम पर बदन दिखाने की कोशिश की जा रही हैं, लोगों ने लिव इन रिलेशनशिप को तरजीह देना शुरू किया है, समलैंगिक सम्बन्ध जरुरी हो गए हैं, ऐसे सम्बन्धों की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, बहुत बड़े-बड़े स्टार फिल्मों के माध्यम से कामुक अदाओं का बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, साहित्य ज्यादातर कामुक चरित्रों से भर गया है, बहुत बड़े शक्तिशाली बम बन गए हैं जो एक मिनट में पूरी दुनिया को समाप्त कर सकते हैं, मिसाइलों का निर्माण जोरों से किया जा रहा है, विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, चिकित्सा के नाम पर व्यक्ति के शरीर को प्रयोगशाला समझ लिया गया है, और ऐसे में कुछ लोग ताली पीट रहे हैं, उनके चेहरे पर बहुत खुशी है. क्योँकि उन्हें लग रहा है कि सच में बदलाव आ गया है. व्यक्ति आधुनिक हो गया है. आधुनिकता और उतर-आधुनिकता का विमर्श जोरों पर है, बस ऐसा लगा रहा है कि सब कुछ बदल गया है, अब कोई समस्या नहीं, वह बहुत प्रचार कर रहे हैं और ऐसा कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन और जगत दोनों को बदल कर रख दिया है. पर स्थितियां बहुत विपरीत नजर आती हैं और हम सब उनसे रोज ही जूझते हैं, ऐसे में हम सब यह महसूस कर सकते हैं कि कितना बदलाव आया है और कैसे बदलाव की आवश्यकता हमें है. 

आज बेशक भौतिक रूप से हमने बहुत उन्नति कर ली है और इसके लिए मानव बधाई का पात्र है. लेकिन इसके साथ एक और पहलू भी जुडा है वह यह कि आज जितना भी भौतिक विकास मानव ने किया है वह उसे और ज्यादा स्वार्थी बना रहा है, इसलिए मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह दूसरों का शोषण करने की फिराक में रहता है, वह अपने स्वार्थ के कारण ही प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, और उसे विकास का नाम देकर प्रचारित कर रहा है. ऐसे कई पहलू हैं जो आज व्यक्ति के स्वार्थ का परिचय देते हैं, लेकिन दुसरे शब्दों में हम उसे ही बदलाव का नाम देते हैं. लेकिन हमें इस बात को बहुत गहरे से समझना होगा कि जरुरी नहीं ऊँचे महलों में रहने वालों का चरित्र और कर्म भी उंचा ही हो, जिन्होंने वास्तविक बदलाव के साथ जीवन को जिया है, वह सड़कों पर रहे हैं, गुफाओं से संचालन किया है अपने मंतव्यों को पूरा करने के अभियाओं का, उनके पास बस एक ही शक्ति थी जिसके बल पर उन्होंने पूरी दुनिया को जीता है वह शक्ति थी संकल्प की शक्ति. आओ हम सब मिलकर ऐसा संकल्प ले कि इस दुनिया का स्वरूप बदल जाए और इसके लिए मानव की सोच को बदलना बहुत जरुरी है, मानव की सोच बदल गयी, कर्म बदल जाएगा और जब कर्म बदल जाएगा तो वास्तविक बदलाव अपने आप ही आयेगा, और जब तक ऐसा नहीं हो पाता तब तक बदलाव की सिर्फ आहट ही सुनाई देगी, वह सकारात्मक दिशा में आएगा इस पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह अभी तक बरकरार है .

03 नवंबर 2012

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और मानवीय मूल्यों की सार्थकता

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मानव का स्वभाव है. वह हर कर्म करने से पहले सोचता है और आकलन करता है अपनी लाभ-हानि का. जब मानव में चिंतन की प्रवृति जागृत होती है तोवह जीवन के हर पहलू को उसी दृष्टिकोण से सोचता है और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर अपना कर्म करता है. मानव का यह कर्म उसके बुद्धि के सापेक्ष पक्ष की पहचान करवाता है. आज हम विकास के जिस पड़ाव पर हैं वह मानव की दूरदृष्टि और परिस्थितियों से हार न मानने के दृढ निश्चय के कारण है. इसी दृढ निश्चय के कारण उसने इस धरती पर रहते हुए अप्रतिम उपलब्धियां हासिल की हैं और निरंतर इस और अग्रसर है. धरती से लेकर आकाश तक उसने अपनी उपलब्धियों की गाथा लिखी है. किसी सीमा तक जब मैं  मानव के इस पक्ष पर सोचता हूँ तो एक अद्भुत सा अहसास मुझे होता है और मानवीय उपलब्धियों  पर गर्व महसूस होता है.
 
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर अगर दृष्टिपात करें तो हम यह महसूस कर सकते हैं कि दुनिया सीमा रहित हो गयी है. सूचना और तकनीक के साधनों के विकास के कारण हमारी जीवन शैली में परिवर्तन हुआ है. परिणामस्वरूप आज विश्व की प्रत्येक हलचल से हम शीघ्र ही रुबरु हो जाते हैं. हमारे आस-पास क्या कुछ घट रहा है, उसकी जानकारी हमें तत्काल मिल जाती है. हमारे सामने ऐसा बहुत कुछ अप्रत्याशित है जिसके बारे में सोचकर हम दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं यह सब अगर संभव हुआ है तो मानव की सोच और मेहनत के कारण. वैश्विक पटल पर हम जो भी परिवर्तन देख रहे हैं वह निश्चित रूप से मानव के प्रयासों का ही परिणाम हैं. मानव ने इस धरा पर बहुत से प्रयोग किये और निरंतर कर रहा है, उन प्रयोगों के बदले उसे बहुत कुछ प्राप्त हुआ भी है, और वह प्राप्त कर भी रहा है. यह इस दौर की ही बात नहीं यह सब आदिकाल से चला आ रहा है और अनवरत रूप से चलता रहेगा, मानवीय सभ्यता और संस्कृति के अंत तक

सूचना और तकनीक के अद्भुत विकास के कारण हमारा जीवन परिवर्तित हो गया है. कठिन चीजें जिन्हें प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी वह आज हमें आसानी से प्राप्त हो जाती हैं या फिर सहज में ही मिल जाती  हैं. आज ऐसा बहुत कुछ हमारे सामने है जिसके बारे में हम सिर्फ सोच ही सकते थे लेकिन आज उसे हम प्रायोगिक तौर पर देख भी रहे हैं. जिस ढर्रे पर मानव आगे बढ़  रहा था, लक्ष्य तो आज भी उसका वही है लेकिन चाल में परिवर्तन आ गया. वह अब और तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपने लक्ष्यों को हासिल कर रहा है. लेकिन मानव में जिस बदलाव को आज देखा जा रहा है. शायद इसके बारे में हम आगाह नहीं थे. आज जब हम 21 वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं. भौतिक रूप से तो मानव ने बहुत कुछ हासिल किया है. इस विकास के कारण समय और स्थिति के साथ-साथ हमारे सोचने समझने का तरीका बदला है. अगर हमारी सोच और समझ के स्तर में ही परिवर्तन आ गया तो यह निश्चित है कि हमारा रहन सहन बदल गया, हमारा आचारव्यवहार बदल गया. रिश्तों के प्रति हमारी सोच बदल गयी. अगर यह परिवर्तन आये हैं तो निश्चित रूप से हमें कहना चाहिए कि हमारी सोच मानवीय मूल्यों के प्रति भी बदली है. अगर नहीं बदली होती तो फिर यह परिवर्तन हमें नजर नहीं आते. कुल मिलाकर आज अगर पूरे विश्व के मानवीय पहलुओं पर अगर दृष्टिपात करें तो यह आभास होता है कि हम मानवीय मूल्यों को नजर अंदाज कर आगे तो बढ़ रहे हैं लेकिन  बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे हम खो चुके हैं और बहुत सी चीजों से निरंतर हाथ पीछे खींच रहे हैं. एक तरफ तो हमारा लक्ष्य मानव को भौतिक रूप से सुखी करना है और दूसरी तरफ देखें तो उसके सामने उतनी ही मानवीय समस्याएं भी. एक तरफ हमने आविष्कार किया सुख के साधनों का तो दूसरी तरफ वही सुख के साधन बने हमारे लिए चिंता का सबब. मानव ने अविष्कार किया बम का अपनी सुरक्षा के लिए लेकिन आज वही उसके लिए खौफ का कारण है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें अगर गहराई से  देखें तो बड़ी सोचनीय स्थिति हमारे सामने पैदा होती हैऔर फिर मन कहता है क्योँ न वैराग्य ही धारण किया जाये

विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहाँ आज मानवीय मूल्यों की समस्या नहीं हो. हम अपनी आम जिन्दगी में देखते हैं कि कहीं भी अगर हमारे मनों में खौफ पैदा होता है तो वह हमारे कर्मों के कारण होता है. हम कहीं भी हैं बस में, रेल में, सड़क में या फिर घर से कहीं बाहर तो हम खुद को अगर किसी से बचाने की कोशिश करते हैं तो वह है इंसान. अक्सर डर बना रहता है. कोई मेरा पर्स न चुरा ले, मेरे हाथ की घडी ना ले जाये कोई, मेरी जेब न लूट ले कोई और हम देखते हैं कि ऐसी वारदातें अक्सर हमें हर जगह देखने-सुनने को मिल जाती हैं. यह तो हुई बाहरी दुनिया की बात. अब हम अपने परिवेश की तरफ लौटते हैं. एक घर में सास बहु की नहीं बनती, बेटा माँ-बाप के कहने से बाहर है, पति और पत्नी आपस में मिलजुल कर नहीं रह सकते. दहेज़ के लिए किसी की बेटी का क़त्ल, मानसिक प्रताड़ना, सड़क पर किसी अबला की आबरू को लूटना, किसी बच्चे का कहीं से खो जाना, ना जाने कितनी समस्याएं हैं जिनका सामना अक्सर होता रहता है. ऐसी परिस्थिति में हम क्या सोचें ? क्या करें, यह हम पर निर्भर करता है. लेकिन हम खुद ही अगर ऐसी चीजों के शिकार हैं तो हम क्या कर सकते हैं? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है. 

विश्व के प्रत्येक देश में मानवीय मूल्यों का ह्रास और हमारा भौतिक उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहना,
दो अलग चीजें हैं. हालाँकि यह सही है कि दोनों का एक दुसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. भौतिक उन्नति जहाँ मानव जीवन के बाह्य पक्ष से सम्बंधित है, तो आध्यात्मिक उन्नति मानव जीवन के आंतरिक पक्ष से सम्बंधित है. लेकिन  अगर व्यक्ति के समझ के स्तर को ऊँचा उठाना है उसे पहले आत्मिक उन्नति के बारे में सोचना होगा और जब व्यक्ति की समझ का स्तर ऊँचा होगा तो निश्चित रूप से वह बहुत सी समस्याओं से निजात पा लेगा. लेकिन जहाँ तक आकर्षण की बात है तो वह हमारे मनों पर निर्भर करता है, और यह बात सही है कि इंसान का मन चंचल है. वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रह सकता. इस चंचलता के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि किसी हद तक यह सही भी है. लेकिन अगर हम अपनी अस्मिता को भूल कर लक्ष्य से भटक जाते हैं तो फिर सारी उन्नतियाँ हमारे लिए बेकार साबित होती हैं. आज के मानव के सामने यही तो यक्ष प्रश्न है कि उसे जीवन में किस चीज को तरजीह देनी है और किस को नहीं. लेकिन जिस तरह का परिवेश उसके सामने है उससे वह अमीर और भौतिक साधनों के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और यही कुछ आज हमारे सामने हो रहा है. आज का इंसान किसी भी हद पर अपनी सुविधा देखता है, इसलिए जिसे जहाँ मौका मिलता है वह मानवीय मूल्यों को ताक पर रख देता है अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए इसीलिए तो आज कोई ही ऐसा देश होगा जहाँ कोई घोटाला न होता हो, चोरी न होती हो, डकैती न होती हो. 

यह सब कब तक चलता रहेगा और मानव-मानव के खौफ से कब तक खौफजदा होता रहेगा. इस प्रश्न पर हमें गहराई से सोचने की आवश्यकता है. निरंकारी बाबा जी कहते हैं "कुछ भी बनो मुबारक है, लेकिन सबसे पहले इंसान बनो". इस पंक्ति को अगर गहराई से विचारते हैं तो हमें हमारे जीवन का सही लक्ष्य हासिल हो सकता है. हम जीवन में सब बनते हैं और बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन्सान कभी नहीं बन पाते और ना ही प्रयास करते हैं. हम अपने घरों में देखें हम अपने बच्चों को संस्कारों की शिक्षा देने से बेहतर भौतिकता की शिक्षा देना ज्यादा उचित समझते हैं और फिर आगे चलकर वही बच्चे तो देश और दुनिया को चलाते हैं जिनके संस्कार अच्छे होते हैं वह अच्छे कर्म करते हैं और जिनमें संस्कारों की कमी होती है वह भी अपना जलबा दिखाते, और फिर लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं यह तो हमारा अनुभव ही है. इसलिए हमें यह बात ध्यान देनी होगी "कि सिर्फ चलने का नाम प्रगति नहीं, दिशा भी देखनी पड़ती है"  और जब हमारी दिशा सही होगी तो निश्चित रूप से हमारी दशा भी बदल जायेगी. 

वर्तमान वैश्विक परिद्रश्य जो हमारे सामने है वह काफी रोचक और विविधता भरा है. और काफी हद तक बहुत सुखद भी है. लेकिन जहाँ पर मानवीय मूल्यों की बात है उनमें निरन्तर कमी होती जा रही हैबस यही एक दुखद पहलु है. हालाँकि यह सही है कि राम के साथ रावण, कृष्ण के साथ कंस हमेशा रहा है. फिर भी हमारे जो आदर्श हैं उन्हें तो हमें कायम रखना होगा. अगर हम उन्हें ऊंचाई नहीं दे सकते तो उनके मानकों को गिराने का अधिकार हमें भी नहीं है. यही कुछ हमें सोचना है और इस पहलु पर विचार कर आगे बढ़ना है. हम जितना मानवीय मूल्यों की तरफ ध्यान देंगे उतना ही हमारे जीवन उज्ज्वल और हमारा परिवेश उतना ही सुखद होगा. इसी आशा के साथ....!  यह पोस्ट यहाँ भी प्रकाशित हो चुकी है ....!

16 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए...2

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जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. गतांक से आगे...!!!! 

 व्यक्ति पर केन्द्रित होती राजनीति और उसके निर्णय को सर्वोपरि मानने जैसी प्रवृतियों ने हमारे सामने बड़ी विकट स्थिति पैदा की है. कुछ सत्ता के अभिलाषी लोग ऐसे लोगों को आश्रय देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में तो सफल हो रहे हैं लेकिन देश और समाज की दुर्गति हो रही है. लेकिन मेरा यह मानना है कि समाज भी ऐसी स्थितियों के लिए जिम्मेवार है और यह सब हो रहा है हमारी राजनितिक कट्टरता के कारण, (राजनितिक कट्टरता से मेरा अभिप्राय बिना सोचे समझे किसी राजनितिक पार्टी के भक्त हो जाना) और जब ऐसे हालात पैदा होते हैं तो फिर व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकार कहाँ हैं? यह सबसे बड़ा प्रश्न है. क्योँकि  उसने खुद को किसी विचारधारा के साथ जोड़ दिया और अब वह हर परिस्थिति में उस विचारधारा का ही होकर रहा गया. ऐसी परिस्थिति में वह नेता लाभ उठा रहे हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए राजनीति में आये हैं. यह तो एक पहलू है. 

अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो स्थिति और भी गंभीर है. राष्ट्रहित और राष्ट्रीय चेतना तो आज मुझे किसी पार्टी में नजर नहीं आती. सब राजनितिक पार्टियों में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र तो मुख्य रूप से छाये हुए हैं और इन्हीं आधारों पर देश की राजनीति की रूपरेखा तय होती है. मानवीय विकास, राष्ट्रहित, सामाजिक समस्याएं, सांस्कृतिक चेतना आदि किस राजनितिक पार्टी के विचार और घोषणापत्र में हैं यह प्रश्न गहन विश्लेषण की मांग करता है? यह सब बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं, क्योँकि राजनीति प्रत्यक्ष रूप से लोगों पर प्रभाव डालती है और नियम और क़ानून भी इन नेताओं की संसद से हो पास होकर आते हैं. हमारे देश की राजनीति में तो दीवारें ही दीवारें हैं, और इन दीवारों के कारण ही आज हम लुटने के लिए तैयार हैं.

विचार के धरातल पर अगर देखें तो एक गुलदस्ते को अगर एक ही तरह के फूलों से सजाया जाये तो वह
कितना सुंदर प्रतीत होगा? लेकिन एक ऐसा गुलदस्ता है जिसे कई प्रकार के फूलों से सजाया गया है, एक ही प्रकार के फूलों से सजाये गए गुलदस्ते की अपेक्षा मुझे लगता है अनेक प्रकार से सजाये गए फूलों का गुलदस्ता ज्यादा सुंदर प्रतीत होगाऔर उस अलग - अलग फूलों से सजाये गुलदस्ते से हमें एक सीख भी मिलती है, कि किस तरह से अलग-अलग होते हुए भी एक ही स्थान पर कैसे बेहतर तरीके से रहा जा सकता है. यही बात इंसान पर भी लागू होती है. खुदा ने इस धरती को एक गुलदस्ते की तरह बनाया है और इसमें अनेक प्रकार के प्राणी इसकी सुन्दरता को बढाने के लिए ही पैदा किये हैं और उनमें से सर्वश्रेष्ठ इंसान को बनाया है. लेकिन धरती पर जितना आतंक, जितनी अशांति, जितनी अव्यवस्था इंसान ने पैदा की है उतनी किसी और जीव ने नहीं. वह दूसरों को अपने उपभोग का साधन तो बनाता ही है लेकिन इंसान खुद इंसान से इंसानों वाला व्यवहार नहीं करता. वह जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, धर्म आदि ना जाने कितने आधारों पर  बंटा है और ना जाने कितने आधार हैं जिनके आधार पर इंसान बंटता चला जा रहा है और अपने अस्तित्व के लिए स्वयं ही खतरा बनता जा रहा है. नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति इंसान की इन सब भिन्नताओं का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं और आज तक यह प्रयास निरंतर होते आये हैं. मैं जब भी इन सब भिन्नताओं का विश्लेषण करता हूँ तो मुझे आज तक ऐसा कोई आधार नजर नहीं आया जिसके आधार पर इंसान को इंसान से दूर किया जा सके. लेकिन हमारे यहाँ इन आधारों पर जो खाईयां बनी हैं वह उतरोतर और ज्यादा गहरी होती जा रही हैं और अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा आएगा हम स्वयं ही इन खाईयों में अपना अस्तित्व गवां देंगे और तब हमारे पास सोचने का भी वक़्त नहीं होगा.

कितना सुंदर इस धरती का स्वरूप है और कितने तरह से खुदा ने इसे सजाया है. लेकिन हमारी संकीर्णताओं ने इस धरती को जीने लायक नहीं छोड़ा है. आज धरती का जो स्वरूप हमारे सामने है वह बहुत खतरनाक है. आये दिन जैविक हथियारों का परीक्षण किस लिए किया जा रहा है, क्योँ तकनीक का इस्तेमाल खतरनाक हथियारों को बनाने के लिए किया जा रहा है? क्योँ देशों की सरहदों पर निरंतर गोला बारूद इक्कठा किया जा रहा है? सिर्फ मानव को मिटाने के लिए. आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है कोई भी व्यक्ति घर से निकलते ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता. घर से निकलते ही क्या घर में भी वह सुरक्षित महसूस नहीं करता तो ऐसी हालात में हमें क्या करना चाहिए यह बहुत विचारणीय प्रश्न है? और इसका एक ही समाधान है इंसान अपनी वास्तविकता को समझे. जो बिना वास्तविकता की दीवारें हमने खड़ी की हैं उन सब दीवारों को गिराया जाये और उन्मुक्त आकाश में विचरण किया जाए. शरीर के आधार पर तो हमारी कोई सीमा है, यह समझ में आता है. लेकिन हमने खुद को सोच के आधार पर भी सीमित कर दिया है यह बहुत दुखदायी है. समय रहते ही हमें इन सब भिन्नताओं पर गहतना से सोचने की जरुरत है और किसी सार्थक निर्णय पर पहुंच कर उस निर्णय को पूरी शिद्दत से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है. हमारे सामने जो मानवीय मूल्य हैं इनके वास्तविक महत्व को पहचान कर सुंदर सा दीवारहीन संसार सजाया जा सकता है.

आज जब दुनिया के हालातों पर गहनता से सोचता हूँ तो ऐसा कोई साधन नजर नहीं आता जिससे यह यकीन किया जा सके कि आने वाले समय में हम एक विश्व कि परिकल्पना को साकार कर सकते हैं. आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में हम यह तो कह देते हैं कि विश्व को एक गांव का रूप दिया जा रहा है और विश्व का प्रत्येक मानव एक दुसरे के करीब आ रहा है. लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है. सूचना और तकनीक के इस दौर में ऐसा तो प्रतीत होता है. लेकिन वास्तविक धरातल पर ऐसा नहीं है. जिस वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की हम बात कर रहे हैं वह मात्र कुछ कम्पनियों द्वारा दिया गया एक शगूफा है और इसका लाभ चंद सत्तासीन और पूंजीवादी लोगों तक ही सीमित है. इसे तरह प्रचारित वैश्वीकरण को मेरी समझ से ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीति का बदला हुआ रूप कहना ज्यादा उचित प्रतीत होता है. 

वैश्वीकरण ने जितने बदलाब हमारे समाज और हमारी मानसिकता में लाये हैं उससे बहुत सी दीवारें खड़ी हो गयी हैं, उसने एक भाषा का वर्चस्व कायम करने की कोशिश की है, विज्ञापन के माध्यम से लोगों को गुमराह कर उनके निर्णयों को बार-बार बदलने की कोशिश की है और तो और आज धर्म और अध्यात्म जैसी अलौकिक विद्याएँ भी विज्ञापन से बच नहीं पायी हैं और कुछ लोग योग और ईश्वर कृपा के नाम पर लोगों का सीधे ही शोषण कर रहे हैं. समाज के एक वर्ग से दुसरे वर्ग में भिन्नताएं पैदा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे ऐसे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं. दुनिया में दीवारों के नाम पर ऐसा बहुत कुछ है जिसे विश्लेषित करने की महती आवश्यकता है. लेकिन हम हैं की आँखें मूंदें आगे बढ़ रहे हैं और अपनी बढती सुख सुविधाओं को देखकर प्रसन्न हो रहे हैं. लेकिन हमने कभी उस भिखारी के बारे में नहीं सोचा, कभी उस अबला के विषय में नहीं सोचा, कभी उस अनाथ के बारे में नहीं सोच पाए. हम खुद के बारे में सोचते रहे और खुद को भी खुश नहीं कर सके. इस जीवन की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? दुनिया में हर जगह दीवारें ही दीवारें हैं लेकिन हम उन्हें गिरा देंगे तो समाधान हमें खुद-ब-खुद ही मिल जायेंगे. लेकिन इन को गिराने के लिए हमें अपने से उपर उठने की आवश्यकता है. आपका क्या ख्याल है?