08 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए .. 1

मानव सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है. उसने अपने आश्रय के लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया, और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश किया. कभी-कभी तो मानव के यह अभिनव प्रयास सोचने पर विवश करते हैं. ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों से किया है. पूरी कायनात इन पांच तत्वों का ही मिश्रण है. जड़ से लेकर चेतन तक हम प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हैं और इस सृष्टा की बनाई हुई कायनात के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हैं. यह क्रम मानव विकास के इतिहास और उसकी प्रकृति विषयक जिज्ञासा की पूरी जानकारी हमें देता है, और हमें अवगत करवाता है कि किस तरह से मानव पहले इस खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था. प्रकृति का एक अभिन्न अंग मानव स्वयं भी प्रकृति से जुड़कर इसके विभिन्न रूपों का आनंद लेता था. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी चेतना ने उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला दिया. आग के आविष्कार ने उसकी जिन्दगी को बदल दिया. धीरे-धीरे मानव खेती करने लगा, उसने अपना आश्रय एक जगह बना लिया और फिर एक नया अध्याय शुरू हुआ. यह क्रम अनवरत चल रहा है और मानव जीवन के रहते तक यह चलता रहेगा. क्योँकि इस सृष्टि के जितने भी जीव है उनमें से सृजन की शक्ति ईश्वर ने सिर्फ और सिर्फ मानव को ही प्रदान की है. चेतना और बुद्धि की तमाम शक्तियां खुदा ने मानव को प्रदान की हैं. इसलिए मानव स्वभाववश सृजन की तरफ प्रवृत होता है. मानवीय सभ्यता के विकास में सृजन का यह पहलू उसे ईश्वर के समकक्ष ला देता है. पूरी प्रकृति में मानव का परचम छाया है और इसके अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं. 

ईश्वर ने मानव को सृजन की शक्ति प्रदान कर उसके स्वरूप को और सुन्दर बनाने का प्रयास किया. हम
मानव विकास के प्रारंभिक इतिहास से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो ऐसी बहुत सी घटनाएँ हमारे सामने आती हैं. जिनमें मानव की सोच और समझ के प्रमाण हमें मिलते हैं. लेकिन यह प्रमाण दोनों तरह के हैं, कहीं पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की जान ले ली. यह क्रम सदियों से चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगा. लेकिन मानव को मानव से जोड़ने के जितने भी प्रयास हो सकें उन पर गंभीरता से विचार करने की महती आवश्यकता है. क्योँकि चिरकाल से हम देखते आ रहे हैं कि जितनी भी हमने भौतिक उन्नति की है, उसने मानव की सुख सुविधाओं को तो बढ़ाया है. उसे शारीरिक सुख तो प्रदान किये हैं. लेकिन जितना-जितना वह इन सुखों को प्राप्त करता गया है उतना ही उसका चरित्र गिरता जा रहा है. 

विश्व के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा अब जुदा हो गया है. उसके नामों पर लड़ाईयां जारी हैं, धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग एक दुसरे को नीचा दिखा रहे हैं, वह वास्तविकता को समझे बिना झूठ को प्रश्रय देकर आम व्यक्ति को मुर्ख बना रहे हैं, उनके सामने चिंतन कोई मायने नहीं रखता. बस उनका अपना स्वार्थ सिद्ध जिस तरह से होता है उनके लिए वह महत्वपूर्ण हो गया है. मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था. लेकिन आज जितने भी धर्म  का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं. वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं. सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है. एक और महत्वपूर्ण बात जो मुझे अखरती है. वह यह कि आज धर्म और अध्यात्म ने एक संस्था का रूप ले लिया है. जिस संस्था के जितने सदस्य होंगे वह उतनी ही सफल संस्था मानी जायेगी, वह छदम गुरु उतना ही प्रमाणिक. ऐसी हालत में लोग गुटों में बंट रहे हैं. एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं. इससे बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है? यह विचारणीय है.

राजनीति की ही अगर बात करें तो हाल और भी बुरा है कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसे जनता का सेवक समझा जाए. बल्कि जो लोग राजनीति में हैं उनकी सेवा करने के लिए देश के महत्वपूर्ण व्यक्ति तैनात किये जाते हैं, उनके निजी सचिव उच्च शिक्षा प्राप्त  व्यक्ति होते हैं, लेकिन नेता तो अनपढ़ भी हो सकता है. इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है? विदेश  में पढ़ा एक व्यक्ति यहाँ की स्थितियों को समझे बगैर किसी महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया जाता है. ऐसे कई नेता आज हमरी संसद में हैं जो देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं. लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण दायित्व संभाले हुए हैं. ऐसी स्थिति में क्या नीतियाँ बन सकती हैं, और कैसे उनको क्रियान्वित किया जा सकता है. यह सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसा अनुभव रहा है कि कोई भी नीति यहाँ ज्यादा समय तक नहीं चल सकती. जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. शेष अगले अंक में....!!!  

35 टिप्‍पणियां:

dheerendra ने कहा…

और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है . जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है .
बहुत सुंदर सार्थक सटीक ,अच्छी प्रस्तुति.....

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दीवारें बाटती हैं, पुल जोड़ते हैं

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सृजन भी जब अपनी अति तक पहुँच जाता है तो सोचने वाले को पंगु बना देता है ... और इश्वर को न चाहते हुवे भी अपना कर्म करना पढता है ...
दीवारों की जगह अगर इंसान पुल बनाना सीख जाए तो इश्वर के करीब भी तो जा सकता है उसी पुल से ...

Maheshwari kaneri ने कहा…

आज हमें दीवार नही पुल चाहिए जुड़्ने के लिए.... सार्थक और सटीक आलेख...

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

जी, बिल्कुल सही

पुल ही जरूरी है, सार्थक लेख

Ramakant Singh ने कहा…

ALWAYS BE A BRIDGE .
BUILD A WALL TO PROTECT THE WORLD
NOT TO DEVIDE EACH OTHER.
NICE POST BADHAI.

udaya veer singh ने कहा…

दीवारें व पुल मानव प्रगति सुन्दर आयाम हैं , दोनों की स्थिति सुरक्षात्मक ही होती है पर,एक की स्थैतिक तो दूजे की लय गत्यात्मक होती है ,वांछित दोनों ही हैं ,पाष्चात्य व भारतीय दर्शन के मुताबिक ... सुन्दर लेख ..

वन्दना ने कहा…

्सार्थक विश्लेषण किया है।

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत बढिया प्रस्तुति।

सुबीर रावत ने कहा…

समसामयिक चिंतन युक्त एक और पोस्ट. आभार ! आपके लेख के एक-एक शब्द भीतर ही भीतर उद्वेलित करते हैं......
इस लेख के अंतिम पैरा में आपने सही व वास्तविक मूल्यांकन किया है की धर्म व राजनीति आज जनहित नहीं व्यक्तिगत हित साधती है और इसीलिए राज्य व देश विकासोन्मुख नहीं हो रहा है अपितु पतन की और जा रहा है....
उत्तराखंड में ही कुछ साल पहले सरकार द्वारा एक विधायक दल का गठन किया गया कि वे दूसरे राज्य में जाकर वहां के विविध विषयों पर अध्ययन कर यह रिपोर्ट दें की उत्तराखंड राज्य का विकास कैसे संभव है और इसके लिए दल ने केरल, तमिलनाडु व कर्नाटक राज्य का भ्रमण किया. रिपोर्ट तो क्या देनी थी.....
क्या इसे विडम्बना नहीं कहा जाएगा कि पर्वतीय राज्य के विकास की संभावनाओं को तलाशने के लिए दल तटीय प्रदेशों का भ्रमण करे ?..... सभी जगह कमोवेश यही स्थिति है.

संध्या शर्मा ने कहा…

सही बात है, विश्व के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा भी अब जुदा हो गया है. दिलों के बीच दीवारें बन गयी हैं. इन्हें जोड़ने के लिए आज दीवारों की नहीं पुलों की आवश्यकता है... सार्थक विश्लेषणयुक्त लेख...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच है .....आपस में जुड़कर ही जीवन बनता है ...... सुंदर चिंतन

babanpandey ने कहा…

in the conclusion .. we reach at this point .. that .. not only road , but bridge are also useful and important tools for growing humanity ../
... pilitical leadres are .. not making bridges among thier voters..so they ... not get honour in our society ../
come to my blog kewal jee ...

lokendra singh rajput ने कहा…

कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था . लेकिन आज जितने भी धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं . वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं
राजनीति की दशा बिगड़ने के पीछे यह एक बड़ा कारन है...

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं . इससे बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है ?? ..........सार्थक विश्लेषण किया है।

Manoj Sharma ने कहा…

बहुत खूब ,मगर उन गुरुओं के ग्रुप में झांके तो वह भी राजनीती का ही दूसरा रूप है ,फर्क है तो बस क्षेत्र का ,

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

केवल राम जी!
एक बहुत ही संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दा उठाया है आपने.. और जिस प्रकार आपने विषय का ट्रीटमेंटट (क्षमा चाहता हूँ अंग्रेज़ी शब्द के प्रयोग के लिए, किन्तु यही शब्द सूझा मुझे) किया है वो प्रशंसनीय है..!

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

सार्थक लेख...
सशक्त प्रस्तुति....

Rajput ने कहा…

बहुत बढिया प्रस्तुति।
दीवारें बाटती हैं, पुल जोड़ते हैं

सुज्ञ ने कहा…

मानव सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है . उसने अपने आश्रय के लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया , और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश किया .

सार्थक!!!

कहीं पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की जान ले ली .

सत्य वचन!!

दीवारें और पुल

दीवारें हो तो बांध या पाल समान जो स्वच्छ जलराशी में गंदे जल को मिलने से रोके।

पुल हो तो संवेदनाओ जैसा जो सभी से करूणा सेतू जोडे।

सदा ने कहा…

बहुत ही सार्थकता है इस आलेख में ... सटीक लेखन के लिए आभार

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

यह सत्य वचन है कि अब धर्म को भी राजनीति नियंत्रित करती है.. बहुत बड़ी विडम्बना और शोचनीय पहलू है..
और कलयुग के प्रमाण भी यही हैं.. अब यह बदलेगा नहीं.. धरती के अंत पर ही यह ख़त्म होगा..

संजय भास्कर ने कहा…

दीवारे और पुल दोनों की मानव सभ्यता के विकास में महत्व पूर्ण भूमिका है परन्तु समय के साथ उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला दिया है
केवल जी ...आप की सोच और जज़्बे को सलाम और आपकी पोस्ट सार्थक और विचारणीय है.....!!!

रचना दीक्षित ने कहा…

सुंदर विष्लेषण. सुंदर आलेख.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

jodne ka kam to pul hi karti hai ...very nice...

expression ने कहा…

एक पुल हो प्यार का................
जिस पर से होकर मैं पहुंचु तुम तक....
तुम्हारे दिल तक....


बहुत सुंदर एवं सार्थक अभिव्यक्ति...

सादर.

मनोज कुमार ने कहा…

जोड़ने का सेतु हमें हर कदम पर चाहिए।

Dr. sandhya tiwari ने कहा…

bahut achcha aalekh, visleshan pasand aaya

सतीश सक्सेना ने कहा…

पुल आवश्यक हैं , सुखद हैं !
शुभकामनायें आपको !

Saras ने कहा…

इश्वर ने मानव को एक बहुत ही बड़ी नेमत दी ,वह है दिमाग ..अगर वह चाहे तो उसे पुल बनाने के काम ला सकता है ...या फिर दीवार जैसी जिसकी नियत हो ....हाँ अगर दीवारों की बनिस्बत पुल ज्यादा बनें ...तो दीवारों की ज़रुरत ही न हो .....सार्थक लेख .....

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था . लेकिन आज जितने भी धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं . वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं . सबके अपने - अपने स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है .
प्रिय केवल राम जी एक और सुन्दर लेख आप का ..काश लोग स्वार्थ से परे हट कर देश और समाज की भी बातें सोचना शुरू करें .....जय श्री राधे
भ्रमर ५
भ्रमर का दर्द और दर्पण
प्रतापगढ़

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत खूब...बहुत सुंदर एवं सार्थक अभिव्यक्ति
आपकी हर पोस्ट ने बहुत प्रभावित कि है
आदर.श्री केवल भाई
आभार आपका

Amrita Tanmay ने कहा…

केवल जी , आज सभी इतने हलके हो गये हैं कि हर चीज़ को मज़ाक का विषय बना दिए हैं . चाहे वह आपसी सम्बन्ध हो , धर्म हो या सर्वजन हिताय की कोई बात ही . एक तरफ तो पुल का निर्माण करते दिखाते हैं दूसरी तरफ उसका पाया ही उखाड़ने में लगे रहते हैं . ऐसे समय में आपकी इतनी सुन्दर ,सार्थक चिंतन अपने ही अन्दर झांकने को प्रेरित करती है. ताकि हम कम से कम अपनी उन मूल्यों की रक्षा कर सके जो हमारा अस्तित्व है . एक बार फिर से आपको शुभकामनाएं इस आलेख के लिए .

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

बिलकुल सामयिक लिखा है आपने आज देश जाति पाति की गहरी खाइयों में उलझ गया है ......अब देखिये ना मायावती जी अरबों रूपये सिर्फ हाथी लगवाने में खर्च कर दिए ....विकास की स्थिति नाजुक है | कमोवेश हर नेता किसी जाति का प्रतीक चुनता है और वोट के लिए अरबों रुपये बर्बाद कर देता है .....विकास की बात अब लोग मुद्दा ही नहीं बनाते हैं | अच्छे पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई केवल जी |

वाणी गीत ने कहा…

नफरत की खाईंयां इंसानों को एक दूसरे से दूर करती है , जोड़े रखने के लिए पुल ही ज़रूरी है ..
सही है!