मानव
सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है. उसने अपने आश्रय के
लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया,
और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश
किया. कभी-कभी तो मानव के यह अभिनव प्रयास सोचने पर विवश करते हैं. ईश्वर ने इस
सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों से किया है. पूरी कायनात इन पांच तत्वों का ही
मिश्रण है. जड़ से लेकर चेतन तक हम प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हैं और इस
सृष्टा की बनाई हुई कायनात के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हैं. यह क्रम मानव
विकास के इतिहास और उसकी प्रकृति विषयक जिज्ञासा की
पूरी जानकारी हमें देता है, और हमें अवगत करवाता है कि किस
तरह से मानव पहले इस खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था. प्रकृति का एक
अभिन्न अंग मानव स्वयं भी प्रकृति से जुड़कर इसके विभिन्न रूपों का आनंद लेता था.
लेकिन समय के साथ-साथ उसकी चेतना ने उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला
दिया. आग के आविष्कार ने उसकी जिन्दगी को बदल दिया. धीरे-धीरे
मानव खेती करने लगा, उसने अपना आश्रय एक जगह बना लिया और फिर
एक नया अध्याय शुरू हुआ. यह क्रम अनवरत चल रहा है और मानव जीवन के रहते तक यह चलता
रहेगा. क्योँकि इस सृष्टि के जितने भी जीव है उनमें से सृजन की शक्ति ईश्वर ने
सिर्फ और सिर्फ मानव को ही प्रदान की है. चेतना और बुद्धि की तमाम शक्तियां खुदा
ने मानव को प्रदान की हैं. इसलिए मानव स्वभाववश सृजन की तरफ प्रवृत होता है.
मानवीय सभ्यता के विकास में सृजन का यह पहलू उसे ईश्वर के समकक्ष ला देता है. पूरी
प्रकृति में मानव का परचम छाया है और इसके अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं.
ईश्वर ने
मानव को सृजन की शक्ति प्रदान कर उसके स्वरूप को और सुन्दर बनाने का प्रयास किया.
हम
मानव विकास के प्रारंभिक इतिहास से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो ऐसी बहुत
सी घटनाएँ हमारे सामने आती हैं. जिनमें मानव की सोच और समझ के प्रमाण हमें मिलते
हैं. लेकिन यह प्रमाण दोनों तरह के हैं, कहीं
पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना
स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा
तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की
जान ले ली. यह क्रम सदियों से चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगा. लेकिन मानव
को मानव से जोड़ने के जितने भी प्रयास हो सकें उन पर गंभीरता से विचार करने की
महती आवश्यकता है. क्योँकि चिरकाल से हम देखते आ रहे हैं कि जितनी भी हमने भौतिक
उन्नति की है, उसने मानव की सुख सुविधाओं को तो बढ़ाया है.
उसे शारीरिक सुख तो प्रदान किये हैं. लेकिन जितना-जितना वह इन सुखों को प्राप्त
करता गया है उतना ही उसका चरित्र गिरता जा रहा है.
विश्व
के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा अब जुदा हो गया है. उसके नामों पर लड़ाईयां
जारी हैं,
धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग एक दुसरे को नीचा दिखा रहे
हैं, वह वास्तविकता को समझे बिना झूठ को प्रश्रय देकर आम व्यक्ति को मुर्ख बना रहे हैं, उनके सामने चिंतन
कोई मायने नहीं रखता. बस उनका अपना स्वार्थ सिद्ध जिस तरह से होता है उनके लिए वह
महत्वपूर्ण हो गया है. मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता
था. लेकिन आज जितने भी धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले
व्यक्ति हैं. वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं. सबके अपने-अपने
स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है.
एक और महत्वपूर्ण बात जो मुझे अखरती है. वह यह कि आज धर्म और अध्यात्म ने एक
संस्था का रूप ले लिया है. जिस संस्था के जितने सदस्य होंगे वह उतनी ही सफल संस्था मानी जायेगी, वह छदम गुरु उतना ही
प्रमाणिक. ऐसी हालत में लोग गुटों में बंट रहे हैं. एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य
कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं. इससे
बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है? यह विचारणीय है.
राजनीति
की ही अगर बात करें तो हाल और भी बुरा है कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसे जनता का सेवक
समझा जाए. बल्कि जो लोग राजनीति में हैं उनकी सेवा करने के लिए देश के महत्वपूर्ण
व्यक्ति तैनात किये जाते हैं, उनके निजी
सचिव उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति होते हैं, लेकिन
नेता तो अनपढ़ भी हो सकता है. इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है? विदेश में पढ़ा एक व्यक्ति यहाँ की स्थितियों
को समझे बगैर किसी महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया जाता है. ऐसे कई नेता आज हमरी संसद
में हैं जो देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं. लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण दायित्व
संभाले हुए हैं. ऐसी स्थिति में क्या नीतियाँ बन सकती हैं, और
कैसे उनको क्रियान्वित किया जा सकता है. यह सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसा अनुभव रहा है कि कोई भी नीति यहाँ ज्यादा समय तक नहीं चल सकती. जैसे
ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज
तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है.
जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. शेष अगले अंक में....!!!
