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09 जुलाई 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 3 ..

17 टिप्‍पणियां:
काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
गतांक से आगे .....!

आज के परिप्रेक्ष्यों पर विचार किया जाये तो बहुत गंभीर सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं . कोई ऐसा चिराग सच में नहीं जो आम व्यक्ति का आदर्श हो , जिसका अनुसरण किया जाये , हम जिसके विचारों पर मंथन कर सकें , सब और शोर ही शोर है . ऐसे हालात में आम व्यक्ति क्या करे उसके सामने बड़े अँधेरे रास्ते हैं और उनकी मंजिलें कहाँ तक जाती हैं यह उसे मालूम नहीं . मानसिक प्रदूषण के साथ - साथ यहाँ वैचारिक प्रदूषण बहुत तेजी से फ़ैल रहा है और उसे फ़ैलाने के लिए लोग तरह - तरह के साधनों का प्रयोग करते हैं . इस वैचारिक प्रदूषण के कई आयाम हैं और यह सबसे खतरनाक साबित हो रहा है . लोग गुटों में बंट रहे हैं , हर तरफ अस्थिरता का माहौल है और इन दूषित विचारों के कारण दिन प्रतिदिन हमारे देश और समाज की तस्वीर बदल रही है और इसके भयंकर परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं . व्यवस्था चाहे कोई भी हो सब जगह विचारों की टकराहट है. किसी हद तक तो यह होनी भी चाहिए लेकिन जब यही विचार टकराकर आग का रूप ले लेते हैं , जानमाल का नुक्सान करते हैं , आदमी का शोषण करते हैं , उसे मानसिक क्षति पहुंचाते हैं तो फिर ऐसे विचारों का क्या किया जाए ??? यह सबसे बड़ा सवाल है हम सबके सामने और इसका उत्तर भी हम सभी को खोजना है , लेकिन इस दिशा में बढ़ने की बजाय हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं और अगर यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपना अस्तिव खो देंगे . 

आज हर स्तर पर वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . हम अपनी राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को देख लें सब जगह वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . यहाँ जितनी भी व्यवस्थाएं हैं यह सब हमारे उत्तम विचारों की व्यवस्थाएं हैं . लेकिन आप किसी भी व्यवस्था का गहराई से आकलन करें तो वह अपने लक्ष्यों की तरफ हमें नहीं बढाती हुई लगती है . राजनीति की अगर हम बात करें तो इसका तो सबसे बुरा हाल है . हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शासन व्यवस्था और राजनीति बेशक एक दूसरे से गहरे से जुड़े होते हैं लेकिन क्रियात्मक रूप से यह दोनों अलग हैं . लेकिन आज के दौर में जो राजनीति करता है, जिसकी सत्ता होती है, वह शासन को अपने अनुकूल बना देता है और यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है और हो रही है . राजनीतिज्ञों और प्रशासकों की सांठगाँठ ने आम व्यक्ति का जीना दूभर कर दिया है . अगर हमारे पास स्वस्थ विचार होता तो हम  कदापि ऐसा नहीं करते . दूसरी बात राजनीति की कोई स्पष्ट दिशा नहीं और राजनेता का कोई चरित्र नहीं, ऐसे में एक व्यक्ति ही समूची राजनीति को प्रभावित कर रहा है . सबके अपने - अपने स्वार्थ हैं और सभी मौके की तलाश में हैं कि कब उन्हें लोगों और इस देश को लूटने का अवसर प्राप्त हो . इससे गन्दी राजनीति और क्या हो सकती है ? यह सब हमारे विचारों के कारण है . हमारे यहाँ जितनी भी राजनितिक पार्टियाँ अस्तित्व में हैं वह देश और समाज को नई दिशा देने के नज़रिये से नहीं , बल्कि अपने स्वार्थों के कारण अस्तित्व में हैं.  किसी का भी कोई चरित्र नहीं जिसको जहाँ जैसे अवसर प्राप्त हो रहा है वह अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है .
 
समाज व्यक्तियों से बनता है , व्यक्ति समाज की एक सशक्त ईकाई है लेकिन आज जैसे - जैसे व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है वैसे - वैसे समाज रुपी यह व्यवस्था समाप्त होती जा रही है . संकीर्ण विचारों ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है उसे अपने सिवाय किसी से कुछ लेना देना नहीं , उसे यह आभास नहीं कि उसके पड़ोस में क्या हो रहा है . वह अपने आसपास की हलचल से कोई मतलब नहीं रखना चाहता . उसका मतलब तो सिर्फ वहां है जहाँ उसका स्वार्थ पूरा हो रहा है . दूसरी तरफ हमारी सोच के कारण हमारे समाज में कई कुरीतियाँ आ गयी हैं . कन्या भ्रूण ह्त्या , दहेज के लिए किसी अबला का कत्ल, किसी नारी के शोषण की दास्ताँ , ऐसे कई पहलू हैं जो सीधे ही हमारे समाज से जुड़े होते हैं . लेकिन आज हमारे विचारों के कारण सामाजिक नाम की यह संस्था ही समाप्त होती जा रही है . धर्म से व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं रह गया है . उसे आचरण से कोई सरोकार नहीं और जो धर्म के प्रतिनिधि हैं वह भी इसे सही दिशा की तरफ ले जाने के बजाय इसे पतन की तरफ ले जा रहे हैं . यहाँ तो हर जगह नित्यानंद , निर्मल बाबा और ना जाने क्या - क्या पैदा हो रहे हैं . धर्म जो व्यक्ति को जीने की कला सिखाता था . वही आज गर्त में जा रहा है और लोग हैं कि अंधश्रद्धा के वशीभूत होकर अपना सब कुछ लूटा रहे हैं और यह जो लोग खुद को बड़ा भक्त कह रहे हैं वह भी एक स्वार्थ के कारण ऐसे लोगों से जुड़े हैं , भौतिक साधनों की प्राप्ति के लिए , मतलब सोच और विचार दोनों तरफ से गलत . ऐसे में किसी से क्या आशा कर सकते हैं ?

अर्थ की तो बात ही छोडिये जिसको जैसे मौका मिल रहा है वह इसका अर्जन कर रहा है . जीवन चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है , यह तो सबकी समझ में आता है . लेकिन पूँजी के लिए जीवन का सब कुछ दावं पर लगा देना कैसी समझदारी है ?? आज इस देश में कोई ऐसा नजर नहीं आता जो गलत तरीकों से धन अर्जन की अपेक्षा नहीं रखता हो . यानि के हमारे विचारों में बहुत परिवर्तन आ गया है हम उत्तम विचारों से गिर रहे हैं . साहित्य की तो बात ही छोडिये यहाँ भी स्थिति ठीक नहीं है . कहीं पर पूरी कायनात को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाने वाला रचनाकार अब दलित विमर्श , स्त्री विमर्श , आदिवासी विमर्श की कल्पित धारणाओं तक ही सीमित हो गया है और कुछ लोग विचारधाराओं के नाम पर उल जलूल लिखने से भी नहीं हिचक रहे हैं . और दूसरी तरफ मनोहर कहानियां , जीजा साली के किस्से, अखबारों में छपते काम शक्ति बढाने के विज्ञापन सब खोखला कर रहे हैं इस देश को ?? 

संगीत में पॉप कल्चर के नाम पर कुछ भी गाया जा रहा है और फिल्मों में देह दिखाने के आलावा कोई दृष्टि नहीं बची है , चित्रकार देवी देवताओं की नग्न और अश्लील तस्वीरें बनाकर क्या दिखाना चाह रहे हों यह समझ से बाहर की बात है . इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया भी अपने तरीके से प्रदूषण फ़ैलाने की भूमिका निभा रहा है . कोई नेता जब किसी को गाली देता है तो वह इनके समाचारों की हेडलाइन बन जाती है . इधर कुछ वर्षों से ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की नयी क्रांति या स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का माध्यम माना जा रहा था . लेकिन यहाँ भी कुछ लोग ऐसे आ गए हैं जो अपने तरीके से इसे प्रदूषित कर रहे हैं . 

अगर जिसे देश की राजनितिक , सामाजिक , धार्मिक और आर्थिक स्थिति ही दयनीय हो कोई स्पष्ट विचार जहाँ ना हो वहां की संस्कृति क्या हो सकती है ? यह बड़ा विचारणीय पहलू है . अगर जहाँ कोई संस्कृति ही ना हो वहां फिर प्रदूषण के सिवा क्या हो सकता है ? अब हर जगह प्रदूषण ही प्रदूषण है तो जी लो कैसे जीना है आपको , एक तनाव भरे माहौल में संभवतः ऐसे में खुद को पाक साफ़ रखना ही एक बड़ी चुनौती है और जो अपने दामन को पाक साफ़ रखकर जीवन जी रहा है समझो वह बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है . उसका जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं .

08 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए .. 1

35 टिप्‍पणियां:
मानव सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है. उसने अपने आश्रय के लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया, और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश किया. कभी-कभी तो मानव के यह अभिनव प्रयास सोचने पर विवश करते हैं. ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों से किया है. पूरी कायनात इन पांच तत्वों का ही मिश्रण है. जड़ से लेकर चेतन तक हम प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हैं और इस सृष्टा की बनाई हुई कायनात के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हैं. यह क्रम मानव विकास के इतिहास और उसकी प्रकृति विषयक जिज्ञासा की पूरी जानकारी हमें देता है, और हमें अवगत करवाता है कि किस तरह से मानव पहले इस खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था. प्रकृति का एक अभिन्न अंग मानव स्वयं भी प्रकृति से जुड़कर इसके विभिन्न रूपों का आनंद लेता था. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी चेतना ने उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला दिया. आग के आविष्कार ने उसकी जिन्दगी को बदल दिया. धीरे-धीरे मानव खेती करने लगा, उसने अपना आश्रय एक जगह बना लिया और फिर एक नया अध्याय शुरू हुआ. यह क्रम अनवरत चल रहा है और मानव जीवन के रहते तक यह चलता रहेगा. क्योँकि इस सृष्टि के जितने भी जीव है उनमें से सृजन की शक्ति ईश्वर ने सिर्फ और सिर्फ मानव को ही प्रदान की है. चेतना और बुद्धि की तमाम शक्तियां खुदा ने मानव को प्रदान की हैं. इसलिए मानव स्वभाववश सृजन की तरफ प्रवृत होता है. मानवीय सभ्यता के विकास में सृजन का यह पहलू उसे ईश्वर के समकक्ष ला देता है. पूरी प्रकृति में मानव का परचम छाया है और इसके अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं. 

ईश्वर ने मानव को सृजन की शक्ति प्रदान कर उसके स्वरूप को और सुन्दर बनाने का प्रयास किया. हम
मानव विकास के प्रारंभिक इतिहास से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो ऐसी बहुत सी घटनाएँ हमारे सामने आती हैं. जिनमें मानव की सोच और समझ के प्रमाण हमें मिलते हैं. लेकिन यह प्रमाण दोनों तरह के हैं, कहीं पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की जान ले ली. यह क्रम सदियों से चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगा. लेकिन मानव को मानव से जोड़ने के जितने भी प्रयास हो सकें उन पर गंभीरता से विचार करने की महती आवश्यकता है. क्योँकि चिरकाल से हम देखते आ रहे हैं कि जितनी भी हमने भौतिक उन्नति की है, उसने मानव की सुख सुविधाओं को तो बढ़ाया है. उसे शारीरिक सुख तो प्रदान किये हैं. लेकिन जितना-जितना वह इन सुखों को प्राप्त करता गया है उतना ही उसका चरित्र गिरता जा रहा है. 

विश्व के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा अब जुदा हो गया है. उसके नामों पर लड़ाईयां जारी हैं, धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग एक दुसरे को नीचा दिखा रहे हैं, वह वास्तविकता को समझे बिना झूठ को प्रश्रय देकर आम व्यक्ति को मुर्ख बना रहे हैं, उनके सामने चिंतन कोई मायने नहीं रखता. बस उनका अपना स्वार्थ सिद्ध जिस तरह से होता है उनके लिए वह महत्वपूर्ण हो गया है. मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था. लेकिन आज जितने भी धर्म  का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं. वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं. सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है. एक और महत्वपूर्ण बात जो मुझे अखरती है. वह यह कि आज धर्म और अध्यात्म ने एक संस्था का रूप ले लिया है. जिस संस्था के जितने सदस्य होंगे वह उतनी ही सफल संस्था मानी जायेगी, वह छदम गुरु उतना ही प्रमाणिक. ऐसी हालत में लोग गुटों में बंट रहे हैं. एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं. इससे बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है? यह विचारणीय है.

राजनीति की ही अगर बात करें तो हाल और भी बुरा है कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसे जनता का सेवक समझा जाए. बल्कि जो लोग राजनीति में हैं उनकी सेवा करने के लिए देश के महत्वपूर्ण व्यक्ति तैनात किये जाते हैं, उनके निजी सचिव उच्च शिक्षा प्राप्त  व्यक्ति होते हैं, लेकिन नेता तो अनपढ़ भी हो सकता है. इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है? विदेश  में पढ़ा एक व्यक्ति यहाँ की स्थितियों को समझे बगैर किसी महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया जाता है. ऐसे कई नेता आज हमरी संसद में हैं जो देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं. लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण दायित्व संभाले हुए हैं. ऐसी स्थिति में क्या नीतियाँ बन सकती हैं, और कैसे उनको क्रियान्वित किया जा सकता है. यह सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसा अनुभव रहा है कि कोई भी नीति यहाँ ज्यादा समय तक नहीं चल सकती. जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. शेष अगले अंक में....!!!