साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

16 जुलाई 2017

हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...3

12 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.....हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर बहुत ही रचनात्मक था. इस दौर में जो भी ब्लॉगर ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय थे, वह इस माध्यम के प्रति काफी रचनात्मक और गम्भीर थे. हालाँकि उस समय अंतर्जाल पर हिन्दी को लेकर कुछ तकनीकी बाधाएं जरुर थीं, लेकिन हिन्दी को अन्तर्जाल पर स्थापित करने की दिशा में बड़ी गम्भीरता से काम किया जा रहा था. जैसे ही इन तकनीकी बाधाओं से थोड़ी सी राहत मिली, ब्लॉग जैसे प्लेटफ़ॉर्म का प्रचार हुआ तो हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में नए और उर्जावान लोगों का पदार्पण हुआ. यह लोग नयी भाषा-भाव और अभिव्यक्ति के नए तरीकों से सरावोर थे. यह वही लोग थे जो किसी अकादमिक दुनिया में अपना परचम लहराने के लिए नहीं लिख रहे थे, और न ही इन्हें कोई ऐसी मजबूरी थी कि इन्हें लिखना ही है. यह वह लोग थे जो अपने निजी जीवन के समय में से कुछ समय निकालकर हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए समर्पित कर रहे थे.  हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में पदार्पण करने वाले यह लोग अपने अध्ययन और रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव को हिन्दी भाषा के माध्यम से साँझा कर रहे थे. बहुत ही कम समय में अंतर्जाल पर ब्लॉगिंग के माध्यम से साहित्य-इतिहास-पुरातत्व-अर्थशास्त्र-राजनीतिविज्ञान-मनोविज्ञान-खगोलशास्त्र-ज्योतिष आदि अनेक विषयों की जानकारी हिन्दी भाषा में प्राप्त होने लगी. ब्लॉग अब एक मंच बन गया अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों का. यहाँ पर मुख्यधारा के पत्रकारों का एक समूह सक्रिय हो गया, और वह उस खबर का विश्लेषण नए अंदाज में करने लगा, जिसे वह सम्पादकीय दवाब के चलते अपने अखबार या टीवी चैनल के माध्यम से नहीं कर सकता था. इसी दौर में काफी सामूहिक ब्लॉग भी बने, जो किसी एक खास मकसद के लिए स्थापित किये गए थे. कुछ ही दिनों बाद यह नारा दिया गया कि ‘ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति है’.
यह बात तो सही भी है कि ब्लॉगिंग ने अभिव्यक्ति के क्षेत्र में काफी बदलाव किये हैं. पाठक और रचनाकार के बीच की दूरी को कम किया है. पाठक किसी रचना के विषय में क्या सोचता है, उसकी क्या राय है, उससे रचनाकार सहज ही अवगत हो जाता है. इसे अभिव्यक्ति के क्षेत में हुए बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू कहा जा सकता है. लेकिन जिस मायने में ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति है, उसका प्रतिफल आना अभी बाकी है. सिर्फ माध्यम के बदलने से कोई क्रान्ति घटित नहीं होती, क्रान्ति जब घटित होती है, तब वह समूल परिवर्तन करती है. हमें इस बात को समझना होगा कि ब्लॉगिंग के माध्यम से हम क्या कुछ नया हासिल कर पाए और आगे हम क्या कुछ नया हासिल करने की इच्छा रखते हैं. ब्लॉगिंग का उद्देश्य हर किसी के लिए अलग हो सकता है. लेकिन जब हम ब्लॉगिंग को समाज और राष्ट्र के सरोकारों से जोड़ेंगे तो यक़ीनन हमें वह लाभ प्राप्त होंगे, जिनकी हम परिकल्पना कर रहे हैं. लेकिन इसके लिए हमें सतत प्रयास करने की जरुरत है. ब्लॉगिंग को और धार देने की आवश्यकता है. इस माध्यम के माध्यम से अपने निजी भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों की दिशा में भी काम करने की जरुरत है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि हिन्दी ब्लॉगों पर सामाजिक सरोकारों से जुड़ सामग्री नहीं मिलती, या लोग समाज और राष्ट्र को लेकर कुछ नहीं लिख रहे हैं, लोग लिख रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों को ‘नोटिस’ कौन कर रहा है, यह सबसे बड़ा प्रश्न है? हमारा अधिकतर ध्यान हिन्दी ब्लॉगों और ब्लॉगरों की संख्या पर केन्द्रित है, उनकी सक्रियता पर केन्द्रित है. लेकिन सही मायने में हमें यह भी परख करनी होगी कि कौन क्या लिख रहा है? और बेहतर लिखने वालों को प्रोत्साहित भी करना होगा. हमें सही मायने में किसी भी मुद्दे को विमर्श के केन्द्र में लाना होगा. लेकिन यह होगा तब ही जब हम लेखन के प्रति जागरूक होंगे.             
अभी जो विचार किया जा रहा है कि हिन्दी ब्लॉगिंग को किस तरह से पुनः पटरी पर लाया जाए . तो इसका एक सीधा सा जबाब है कि हम अपने लेखन के प्रति गम्भीर हो जाएँ. अब हमें मात्र सक्रिय रहने के लिए ही नहीं लिखना है. अब हमें जो कुछ भी लिखना है वह लेखकीय जिम्मेवारी के साथ लिखना है. बहस-सहमति-असहमति लेखन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, हमें हर एक टिप्पणी को, किसी के दृष्टिकोण को, तथा किसी नवीन जानकारी के प्रति बहुत सजगता से विचार करते हुए आगे बढ़ना होगा. बहुत जरुरी है कि हम एक सकारात्मक वातावरण तैयार करें और अपने ब्लॉगों को ऐसी सामग्री से सरावोर करें, जो सही मायने में पाठक के लिए लाभप्रद हो. मात्र टिप्पणी की संख्या के हिसाब से यह अन्दाजा लगाने की कोशिश न की जाये कि मेरी यह रचना काफी महत्वपूर्ण हो गयी है. हमारी किसी रचना की क्या महता है, वह उसके पाठकों से पता चलती है, और यह निर्णय हम एक दिन में नहीं कर सकते. इसके लिए थोडा वक़्त लगता है. सर्च इंजन से जो पाठक आपकी रचना तक पहुंचता है, वह उस पर कितना समय बिताता है वहीँ से हम एक अंदाजा लगा सकते हैं कि हमें अपने लेखन में किस तरह के बदलाव करने की जरुरत है. हालाँकि यह सब तकनीकी पहलू हैं, आम ब्लॉगर इनकी तरफ ध्यान नहीं दे पाता. ऐसे में उसके लिए टिप्पणी की संख्या बहुत मायने रखती है. मैंने टिप्पणी करने के खिलाफ नहीं हूँ, यक़ीनन टिप्पणी बहुत प्रोत्साहन देती है. लेकिन कोशिश यह भी होनी चाहिए कि हम वाह!! वाह !!! वाली टिप्पणियों के प्रति सतर्क हो जाएँ. लेखन और रचना के सन्दर्भ में अगर हम टिप्पणी करते हैं तो यक़ीनन वह रचनाकार को खुद का विश्लेषण करने का मौका देती है. इससे उसका भी लेखन परिष्कृत होता है, जिसका लाभ निकट भविष्य में उसी रचनाकार को होता है. जरुरी नहीं कि हमें सब विषयों की जानकारी हो, लेकिन हम जिन विषयों पर लिखें, या जिस पोस्ट पर टिप्पणी करें, जो कुछ भी लिखें उसके प्रति हम पूरी तरह से सजग हों. अगर हम इस विमर्श को और आगे ले जाने में सहायक हो पायें तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी ब्लॉगिंग अब तक हुए रचनात्मक क्षेत्र में एक नयी मशाल बनकर उभरेगी. 

09 जुलाई 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 3 ..

17 टिप्‍पणियां:
काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
गतांक से आगे .....!

आज के परिप्रेक्ष्यों पर विचार किया जाये तो बहुत गंभीर सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं . कोई ऐसा चिराग सच में नहीं जो आम व्यक्ति का आदर्श हो , जिसका अनुसरण किया जाये , हम जिसके विचारों पर मंथन कर सकें , सब और शोर ही शोर है . ऐसे हालात में आम व्यक्ति क्या करे उसके सामने बड़े अँधेरे रास्ते हैं और उनकी मंजिलें कहाँ तक जाती हैं यह उसे मालूम नहीं . मानसिक प्रदूषण के साथ - साथ यहाँ वैचारिक प्रदूषण बहुत तेजी से फ़ैल रहा है और उसे फ़ैलाने के लिए लोग तरह - तरह के साधनों का प्रयोग करते हैं . इस वैचारिक प्रदूषण के कई आयाम हैं और यह सबसे खतरनाक साबित हो रहा है . लोग गुटों में बंट रहे हैं , हर तरफ अस्थिरता का माहौल है और इन दूषित विचारों के कारण दिन प्रतिदिन हमारे देश और समाज की तस्वीर बदल रही है और इसके भयंकर परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं . व्यवस्था चाहे कोई भी हो सब जगह विचारों की टकराहट है. किसी हद तक तो यह होनी भी चाहिए लेकिन जब यही विचार टकराकर आग का रूप ले लेते हैं , जानमाल का नुक्सान करते हैं , आदमी का शोषण करते हैं , उसे मानसिक क्षति पहुंचाते हैं तो फिर ऐसे विचारों का क्या किया जाए ??? यह सबसे बड़ा सवाल है हम सबके सामने और इसका उत्तर भी हम सभी को खोजना है , लेकिन इस दिशा में बढ़ने की बजाय हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं और अगर यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपना अस्तिव खो देंगे . 

आज हर स्तर पर वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . हम अपनी राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को देख लें सब जगह वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . यहाँ जितनी भी व्यवस्थाएं हैं यह सब हमारे उत्तम विचारों की व्यवस्थाएं हैं . लेकिन आप किसी भी व्यवस्था का गहराई से आकलन करें तो वह अपने लक्ष्यों की तरफ हमें नहीं बढाती हुई लगती है . राजनीति की अगर हम बात करें तो इसका तो सबसे बुरा हाल है . हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शासन व्यवस्था और राजनीति बेशक एक दूसरे से गहरे से जुड़े होते हैं लेकिन क्रियात्मक रूप से यह दोनों अलग हैं . लेकिन आज के दौर में जो राजनीति करता है, जिसकी सत्ता होती है, वह शासन को अपने अनुकूल बना देता है और यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है और हो रही है . राजनीतिज्ञों और प्रशासकों की सांठगाँठ ने आम व्यक्ति का जीना दूभर कर दिया है . अगर हमारे पास स्वस्थ विचार होता तो हम  कदापि ऐसा नहीं करते . दूसरी बात राजनीति की कोई स्पष्ट दिशा नहीं और राजनेता का कोई चरित्र नहीं, ऐसे में एक व्यक्ति ही समूची राजनीति को प्रभावित कर रहा है . सबके अपने - अपने स्वार्थ हैं और सभी मौके की तलाश में हैं कि कब उन्हें लोगों और इस देश को लूटने का अवसर प्राप्त हो . इससे गन्दी राजनीति और क्या हो सकती है ? यह सब हमारे विचारों के कारण है . हमारे यहाँ जितनी भी राजनितिक पार्टियाँ अस्तित्व में हैं वह देश और समाज को नई दिशा देने के नज़रिये से नहीं , बल्कि अपने स्वार्थों के कारण अस्तित्व में हैं.  किसी का भी कोई चरित्र नहीं जिसको जहाँ जैसे अवसर प्राप्त हो रहा है वह अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है .
 
समाज व्यक्तियों से बनता है , व्यक्ति समाज की एक सशक्त ईकाई है लेकिन आज जैसे - जैसे व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है वैसे - वैसे समाज रुपी यह व्यवस्था समाप्त होती जा रही है . संकीर्ण विचारों ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है उसे अपने सिवाय किसी से कुछ लेना देना नहीं , उसे यह आभास नहीं कि उसके पड़ोस में क्या हो रहा है . वह अपने आसपास की हलचल से कोई मतलब नहीं रखना चाहता . उसका मतलब तो सिर्फ वहां है जहाँ उसका स्वार्थ पूरा हो रहा है . दूसरी तरफ हमारी सोच के कारण हमारे समाज में कई कुरीतियाँ आ गयी हैं . कन्या भ्रूण ह्त्या , दहेज के लिए किसी अबला का कत्ल, किसी नारी के शोषण की दास्ताँ , ऐसे कई पहलू हैं जो सीधे ही हमारे समाज से जुड़े होते हैं . लेकिन आज हमारे विचारों के कारण सामाजिक नाम की यह संस्था ही समाप्त होती जा रही है . धर्म से व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं रह गया है . उसे आचरण से कोई सरोकार नहीं और जो धर्म के प्रतिनिधि हैं वह भी इसे सही दिशा की तरफ ले जाने के बजाय इसे पतन की तरफ ले जा रहे हैं . यहाँ तो हर जगह नित्यानंद , निर्मल बाबा और ना जाने क्या - क्या पैदा हो रहे हैं . धर्म जो व्यक्ति को जीने की कला सिखाता था . वही आज गर्त में जा रहा है और लोग हैं कि अंधश्रद्धा के वशीभूत होकर अपना सब कुछ लूटा रहे हैं और यह जो लोग खुद को बड़ा भक्त कह रहे हैं वह भी एक स्वार्थ के कारण ऐसे लोगों से जुड़े हैं , भौतिक साधनों की प्राप्ति के लिए , मतलब सोच और विचार दोनों तरफ से गलत . ऐसे में किसी से क्या आशा कर सकते हैं ?

अर्थ की तो बात ही छोडिये जिसको जैसे मौका मिल रहा है वह इसका अर्जन कर रहा है . जीवन चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है , यह तो सबकी समझ में आता है . लेकिन पूँजी के लिए जीवन का सब कुछ दावं पर लगा देना कैसी समझदारी है ?? आज इस देश में कोई ऐसा नजर नहीं आता जो गलत तरीकों से धन अर्जन की अपेक्षा नहीं रखता हो . यानि के हमारे विचारों में बहुत परिवर्तन आ गया है हम उत्तम विचारों से गिर रहे हैं . साहित्य की तो बात ही छोडिये यहाँ भी स्थिति ठीक नहीं है . कहीं पर पूरी कायनात को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाने वाला रचनाकार अब दलित विमर्श , स्त्री विमर्श , आदिवासी विमर्श की कल्पित धारणाओं तक ही सीमित हो गया है और कुछ लोग विचारधाराओं के नाम पर उल जलूल लिखने से भी नहीं हिचक रहे हैं . और दूसरी तरफ मनोहर कहानियां , जीजा साली के किस्से, अखबारों में छपते काम शक्ति बढाने के विज्ञापन सब खोखला कर रहे हैं इस देश को ?? 

संगीत में पॉप कल्चर के नाम पर कुछ भी गाया जा रहा है और फिल्मों में देह दिखाने के आलावा कोई दृष्टि नहीं बची है , चित्रकार देवी देवताओं की नग्न और अश्लील तस्वीरें बनाकर क्या दिखाना चाह रहे हों यह समझ से बाहर की बात है . इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया भी अपने तरीके से प्रदूषण फ़ैलाने की भूमिका निभा रहा है . कोई नेता जब किसी को गाली देता है तो वह इनके समाचारों की हेडलाइन बन जाती है . इधर कुछ वर्षों से ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की नयी क्रांति या स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का माध्यम माना जा रहा था . लेकिन यहाँ भी कुछ लोग ऐसे आ गए हैं जो अपने तरीके से इसे प्रदूषित कर रहे हैं . 

अगर जिसे देश की राजनितिक , सामाजिक , धार्मिक और आर्थिक स्थिति ही दयनीय हो कोई स्पष्ट विचार जहाँ ना हो वहां की संस्कृति क्या हो सकती है ? यह बड़ा विचारणीय पहलू है . अगर जहाँ कोई संस्कृति ही ना हो वहां फिर प्रदूषण के सिवा क्या हो सकता है ? अब हर जगह प्रदूषण ही प्रदूषण है तो जी लो कैसे जीना है आपको , एक तनाव भरे माहौल में संभवतः ऐसे में खुद को पाक साफ़ रखना ही एक बड़ी चुनौती है और जो अपने दामन को पाक साफ़ रखकर जीवन जी रहा है समझो वह बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है . उसका जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं .

02 अगस्त 2011

सृजन और समाज

48 टिप्‍पणियां:
मानव अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए चिरकाल से नए-नए माध्यमों को अपनाता रहा है. सृष्टि के प्रारम्भिक दिनों में ही उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ साधनों की तलाश करनी पड़ी होगी. जिनमें से भाषा का विकास और उसे भावनाओं से जोड़ने का उसका प्रयत्न पहला कार्य रहा होगा. भाषा को स्थायी  रूप देने के लिए उसे लिपि की आवश्यकता महसूस हुई और लिपि को सुरक्षित रखने और उसके प्रचार के लिए उसे साहित्य की आवश्यकता महसूस हुई होगी. यह क्रम रहा होगा इनसान की भाषा, लिपि और साहित्य के विकास का. लेकिन समय सदा एक सा नहीं रहता उसमें परिवर्तन आने लाजमी हैं और यह प्रकृति का नियम भी है. जब तक कुछ परिवर्तित नहीं होता तब तक कुछ नया भी नहीं आता, और जब कुछ नया आता  है तो उससे मानव के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है. चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, लेकिन प्रभाव का पड़ना लाजमी है. हालाँकि हमारा भाषा विज्ञान और व्याकरण इस विषय में तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध करवाते हैं, लेकिन किसी एक मत तक वह भी नहीं पहुँच पाते और जहाँ तक मुझे लगता है किसी एक मत तक पहुंचना सम्भव भी नहीं है. लेकिन सृजन का यह क्रम अनवरत रूप से जारी है, यह संतोष की बात है. आज भी हम सृजन के नए-नए  आयामों को सामने लाते हैं, और उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनाने का प्रयत्न करते हैं. सृजन के मूल में मानवीय पहलु अधिक रहा है. तभी तो सृजन के मायने बहुत अधिक हैं और सर्जक के भी. अगर सृजन नहीं होगा तो सर्जक कैसा और सर्जक नहीं होगा तो सृजन कैसा? दोनों का एक दूसरे के साथ अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं. इसलिए जब कोई व्यक्ति सृजन करता है तो वह मात्र अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त ही नहीं करता, बल्कि उसके सृजन के दायरे में सम्पूर्ण मानव होता है. क्योँकि सर्जक भी उस समाज का अंग होता है जिस समाज के लिए वह साहित्य रच रहा है, किसी नयी वस्तु का अविष्कार  कर रहा है.
सृजन का एक पहलू यह भी है कि हम कितने उदात भावों  को लेकर सृजन कर्म में रत हैं. भावों की उदातता रचनाकार के संवेदना पक्ष से सम्बन्धित है. जिस रचनाकार की संवेदना जितनी गहरी होगी उसका रचनाकर्म उतना ही मार्मिक और समाजोपयोगी होगा. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के माध्यमों की तलाश करता रहा है, और इस दिशा में उसने काफी प्रगति भी की है. चाहे कला हो या साहित्य इन दोनों माध्यमों से उसने अपनी संवेदनाओं को समाज की संवेदनाओं के साथ जोड़ने की भरपूर कोशिश की है. और काफी हद तक उसे सफलता प्राप्त भी हुई है. मानव विकास के चरम सोपान तक बेशक पहुच गया है, लेकिन जहाँ तक सृजन की बात है उसे इस दिशा में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है. आज भी मानव मन की कई ऐसी भावनाएं हैं जिन्हें शब्द नहीं दिए जा सके हैं, कुछ ऐसे अनुभव हैं जिन्हें शब्दबद्ध नहीं किया जा सका है, और उन्हें हम सिर्फ संकेत मात्र से किसी व्यक्ति या समाज तक पहुँचाने का कार्य करते हैं. हमारे अंतर्मन में चलने वाली हलचल और उससे होने वाले अनुभव कहाँ पूरी तरह से अभिव्यक्त हो पाते हैं. लेकिन फिर भी जो कुछ भी आज सृजन के रूप में हमारे सामने हैं वह काफी हद तक संतोषजनक हैं और हम अपनी अभिव्यक्ति की क्षमता को बढ़ाने का निरन्तर प्रयास कर भी रहे हैं.
सृजन मानव जीवन का महत्वपूर्ण कर्म है. हालाँकि हमारे धर्म ग्रन्थ यह मानते हैं कि इस सृष्टि का सृजन परमात्मा ने किया है. यह बात तो सही है और उसने सृजन के इतने आयाम हमारे सामने रखें हैं कि हम उसकी सृजन शक्ति और कला की विविधता को देखकर दांतों तले अंगुली दबाने  को मजबूर हो जाते हैं, और काफी हद तक हमने सृजन को इस प्रकृति से ही सीखा है. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि सृजन की मूल प्रेरणा प्रकृति है और हम उसका अनुकरण करते हैं. पाश्चात्य विचारक प्लूटो ने सृजन पर विचार करते हुए लिखा है कि "सृजन प्रकृति का हुबहू अनुकरण है". लेकिन उनकी इस बात को उनके शिष्य अरस्तु नकार देते हैं वह कहते हैं कि हम सृजन करते वक़्त किसी चीज का हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते, बस उसकी अनुकृति बनाने का प्रयास करते हैं . यहाँ पर अगर हम देखें तो प्लूटो और अरस्तु के शब्द बेशक अलग-अलग हों, लेकिन अनुकरण शब्द यह प्रमाणित करता है कि हम सृजन के लिए प्रकृति का अनुकरण करते हैं. लेकिन किसी भी परिस्थिति में हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते. अगर हम प्रकृति का हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते तो फिर हम कहाँ अपनी भावनाओं को जैसे हमने महसूस की हैं वैसे ही अभिव्यक्त भी कर सकते हैं. तभी तो वेद भी ईश्वर को "नेति-नेति" कहता है.
हालाँकि सृजन के मूल में व्यक्ति की  भावनाएं हैं, लेकिन जब तक भावनाएं व्यक्ति सापेक्ष और समाज निरपेक्ष बनी रहती हैं तो सृजन का उद्देश्य सिद्ध नहीं होता. सृजन का उद्देश्य है समाज को दिशा देना, समाज के लिए वह करना जिससे व्यक्ति की सोच और समझ का स्तर बढ़ पाए और वह मानवीय जीवन मूल्यों को पहचान कर अपने हित का कार्य कर सके. सृजन और समाज का गहरा नाता है. सृजनकर्ता समाज का जिम्मेवार व्यक्ति है उसके जीवन दर्शन और कर्म का प्रभाव व्यक्ति के जीवन को गहरे तक प्रभावित करता है. इसलिए सर्जक को बहुत सम्भल कर कार्य करना होता है, उसे एक-एक शब्द गहरे से सोच समझ कर कहना होता है और उसका कहा हुआ शब्द अगर उसके कर्म में उतरा है तो निश्चित रूप से वह कालजयी है वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है, और ऐसी स्थिति में सर्जक समाज के लिए पथप्रदर्शक बन जाता है. 

04 जुलाई 2011

सुर और साहित्य

55 टिप्‍पणियां:
जब भी मुझे कहीं अकेले में बैठने का अवसर मिलता है तो मैं महसूस  हूँ कि इस सृष्टि के कण - कण में संगीत है. इसमें सुर समाया है . लेकिन हम उस संगीत को अनुभव नहीं कर पाते . आज हम भौतिकता में इतने रम चुके हैं कि हमारे पास कहाँ वक्त है उस संगीत को सुनने, का अनुभव करने का , और दूसरी तरफ हमारी जीवन  शैली इस तरह की  बन चुकी है कि हम कहाँ ध्यान देते हैं कि इस अखंड ब्रह्माण्ड की रचना में संगीत का अपना महत्व है . "बिंग बैंग" सिद्धांत  की यह मान्यता है कि इस सृष्टि का निर्माण जब हुआ था तब भयंकर विस्फोट हुआ था . अगर विस्फोट हुआ तो ध्वनि तो निकली होगी ना और वही ध्वनि इस सृष्टि के निर्माण का आधार है और उस ध्वनि के कुछ अंशों को हम शब्दबद्ध कर संगीत के माध्यम से संगीतमय बनाकर उसका आनंद लेते हैं . यह बात भी कितनी रोचक है कि संगीत की विपुल राशि इन्हीं अक्षरों में समाहित है . सरगम यानि सा  , रे , , , , , नि , इन सात अक्षरों में संगीत समाहित है .

इस विषय पर कभी गंभीरता से बात करूँगा ...लेकिन आज आप मेरी पोस्ट "अक्षर साधना" को हिंदी  ब्लॉग जगत की चर्चित पॉडकास्टर आदरणीय अर्चना चावजी की कर्णप्रिय आवाज में सुनें . आदरणीय अर्चना जी से जब मैंने इस पोस्ट का पॉडकास्ट  तैयार करने  के लिए प्रार्थना की तो उन्होंने "मेरे मन की"  इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार कर लिया और इस पोस्ट को अपनी मधुर आवाज देकर मुझे कृतार्थ कर दिया . उनकी आवाज का कायल मैं ही नहीं बल्कि पूरा ब्लॉग जगत है . आवाज ही  नहीं बल्कि शब्दों को पढने का उनका अंदाज और वाक्य में शब्दानुरूप उतार - चढ़ाव का भी पूरा ध्यान जो उनकी इस विधा और विशेषज्ञता को सिद्ध करता है ...तो लीजिये प्रस्तुत है अक्षर साधना अब आदरणीय अर्चना चावजी जी कर्णप्रिय आवाज  में ....आप उनके प्रोत्साहन के लिए उनके ब्लॉग मेरे मन की  पर भी टिप्पणी कर सकते हैं .....!