गतांक से आगे वह
बात तो भविष्य को बदलने की करते हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान और इतिहास की कोई ख़ास
समझ नहीं होती,
बस वह एक राग अलापते हैं और उसी के बल पर अपना प्रभुत्व कायम करने
की कोशिश करते हैं. उनका सिर्फ एक ही मकसद है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी आवाज
पहुंचाना, ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रभावित करना, उनसे समाज सेवा के नाम पर धन
इक्कठा करना, उन्हें मानसिक रूप से ऐसा तैयार करना कि वह अपना सर्वस्व अर्पित करने
के लिए तत्पर हो जाएँ. कुछ को तो मैंने बहुत बड़े-बड़े दावे करते हुए सुना है, वह
कुछ ऐसी काल्पनिक कहानियाँ लोगों के बीच प्रचारित करते हैं जिनसे इनके सब कुछ होने
की ख़बरें चारों और फैलती रहती हैं और आम जनता भ्रमित होती रहती है. आम लोग इसे ही
बदलाव का नाम दे रहे हैं. लेकिन बहुत गहरे में उतरकर जब देखा जाता है तो स्थितियां
बद से बदतर होती जा रही हैं, लोग सिर्फ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी को
अपना मार्गदर्शक समझ रहे हैं, कई बार तो मुझे ऐसा लगता है कि लोगों के लिए अब किसी
तथाकथित “स्वयम्भू प्रभु” या नेता के पीछे चलना शान की बात हो गया है और लोगों की
इसी मानसिकता का लाभ यह तथाकथित समाज सुधारक, अध्यात्म और धर्म, राजनीति आदि के
नाम पर सुधार करने वाले लोग उठाते हैं. मैं बहुत बार सोचता हूँ कि अगर कहीं किसी
के पीछे चलकर ही बदलाव आता तो आज हर कोई किसी न किसी का अनुसरण कर रहा है तो फिर
दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता. क्योँकि जितने भी महान लोग इस धरा पर हुए हैं और
ज्यादातर लोग जिनका अनुसरण करते हैं उन्होंने सदैव मानवता का ही पाठ पढ़ाया है और
उनके विचारों में तो कोई भी बैर नहीं, कहीं किसी से कोई द्वेष नहीं, उन्होंने तो
सम्पूर्ण सृष्टि को खुदा का कुनवा कहा है, फिर यह विरोध और प्रतिरोध कहाँ और कैसा,
यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है और हम सबको इस प्रश्न पर गहराई से विचार करने की
आवश्यकता है.
अतीत
को याद करके हम वर्तमान को नहीं संवार सकते, लेकिन वर्तमान में अतीत को याद करके,
उसमें हुई
महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण करके हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. उस सीख
को हम अगर वर्तमान में अपना लें और उसी अनुरूप कार्य करें तो निश्चित रूप से
भविष्य सुखद हो सकता है, उसी आधार पर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना
सकते हैं, उनके लिए कोई मानक बना सकते हैं. लेकिन आज ऐसा नहीं है, काम कम किया जाए
उसका प्रचार ज्यादा हो, सोचा समझा कम जाए, लेकिन बखान ज्यादा हो, आज ज्यादातर लोगों
में प्रसिद्धि की इतनी भूख है कि वह उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं,
ऐसी स्थिति में उनका जो मकसद होता है वह तो पूरा हो जाता है. लेकिन जिस मकसद से
जनता उनके साथ जुडी होती है उन्हें धोखा ही मिलता है. पूरे परिदृश्य पर अगर हम नजर
डालें तो स्थिति समझ आ जायेगी और फिर हम समझ सकते हैं कि हालात किस कदर बदतर हैं.
हमें इन हालतों से निबटने के लिए कितने शीघ्र प्रयास करने की जरुरत है. लेकिन अब
सिर्फ प्रयास करने से ही नहीं बल्कि कुछ ऐसा ठोस करना होगा जिससे इस परिदृश्य को
बदलने की एक मजबूत नींव डाली जा सके. ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि अब कौन ऐसा
कुछ नया करेगा, जिससे कि सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा. तो इस सवाल का सीधा सा उत्तर
है कि यह सब हमें ही करना पडेगा और हम तक हम सब इन अभियानों में सक्रीय रूप से शामिल
नहीं होते तब तक चाहे कोई कितने भी बदलावों की बात करे, सतही तौर पर कैसे भी प्रयास
करे, सफलता किसी भी स्तर तक नहीं मिल सकती और अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर
नहीं हमें इस धरा पर मानव की मानवीयता के सिर्फ उदहारण ही सुनने, पढने को मिलेंगे.
क्योँकि जैसे–जैसे हम विज्ञान और तकनीक के क्ष्रेत्र में उन्नति करते जा रहे हैं
वैसे ही हमरा संपर्क समाज से कटता जा रहा है, हम सामाजिक सोच की अपेक्षा
व्यक्तिवादी सोच को अपना रहे हैं, हम सामूहिक हितों की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को
ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, अब तो स्थिति ऐसी भी आ गयी है कि हमारे लिए परिवार नाम की
संस्था के मायने भी ख़त्म होते जा रहे हैं, अब हम निकृष्ट व्यक्तिवादी हो गए हैं और
इसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं, और अगर ऐसा ही होता रहा तो व्यक्ति की
हालत क्या हो सकती है, इसके विषय में सिर्फ सोचा जा सकता है.
आज
जैसा माहौल हमारे सामने है उस पर समग्र रूप से विश्लेषण करने की जरुरत है. हर कोई
कहता है कि खामियां हैं. किसी को सामाजिक संरचना में खामी नजर आती है, किसी को
राजनीति में, कहीं पर धर्म की खामियां गिनाई जा रही हैं तो कोई साहित्य की बात कर
रहा है. हर कहीं खामी है और हर खामी को बदलने की बात की जा रही है. इसके लिए बहुत
से लोग प्रयास कर रहे हैं, और उनके प्रयास निरंतर जारी हैं. लेकिन जिस बदलाव की
बात वह करते हैं वह कहीं नजर नहीं आते, बल्कि स्थिति इसके उलट होती जा रही है. कोई
एक सच्चा व्यक्ति विचार पैदा करता है लोग उसका अनुसरण करते हैं और फिर उसके जाने
के बाद स्थिति वहीँ की वहीँ रह जाती हैं, और ऐसे में भ्रष्ट बुद्धि लोग अपना
स्वार्थ सिद्ध करते जाते हैं और उनका बोलबाला वैसा ही बना रहता है. हम यह नहीं कह
सकते कि आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसने इस सली गडी व्यवस्था को
परिवर्तित करने की जी जान से कोशिश न की हो, ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं. महात्मा
बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, कबीर, रैदास, मीरा, स्वामी दयानंद, विवेकाननद, महात्मा
ज्योतिबा फुले, विद्यासागर, महात्मा गांधी, भगत सिंह ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने भ्रष्ट
व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें मिटाने के लिए जी जान से प्रयास किये. आज
अफ़सोस इस बात का है कि इनके नामों का प्रयोग करके हर कोई अपनी दुकान तो चमका रहा
है, लेकिन इनके विचारों और कार्यों का अनुसरण करने वाला कोई विरला ही नजर आता है.
ऐसे में जिसे हम बदलाव का नाम दे रहे हैं उसकी सिर्फ आहट सुनाई दे रही है, वह भी
इन नामों के कारण और वास्तविक बदलाब आना अभी बहुत दूर का काँटों का सफ़र है.
आज
जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, जैसा वातावरण हमारे सामने है उससे तो लगता है कि
दुनिया में कहीं
कोई समस्या नहीं है. सूचना-तकनीक के साधनों से हमारा सीधा संपर्क है. हम उनका बखूबी इस्तेमाल भी कर रहे हैं, आज के विज्ञान ने जितना कुछ हमें दिया है वह हमारे लिए लाभकारी है. दुनिया के सारे देश एक दूसरे के संपर्क में हैं, कुछ ऐसी वैश्विक संस्थाएं गठित की गयी गयी हैं जिनके नियम और कायदे पूरी दुनिया पर लागू होते हैं और इन संस्थाओं के निर्णयों का प्रभाव पूरी दुनिया पर पढता है. इसे हम वैश्वीकरण का नाम दे रहे हैं. दुनिया पूरी एक गाँव बन गयी है, अब कोई समस्या नहीं, पूरी दुनिया के लोग एक हो गए हैं, ऐसा प्रचार वैश्वीकरण के समर्थक करते हैं और इस माध्यम से एक आस जगाते हैं कि अब तो दुनिया का स्वरूप बदल कर ही रहेगा. क्योँकि अब कोका कोला पूरी दुनिया में बिकता है, जहाँ पानी पीने को नहीं मिलता वहां कोक की बोतलें मिल जाती हैं, चाइनीस फ़ूड अब गली मोहल्लों, सड़कों में खाने को मिल जाता है, आधुनिकता के नाम पर बदन दिखाने की कोशिश की जा रही हैं, लोगों ने लिव इन रिलेशनशिप को तरजीह देना शुरू किया है, समलैंगिक सम्बन्ध जरुरी हो गए हैं, ऐसे सम्बन्धों की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, बहुत बड़े-बड़े स्टार फिल्मों के माध्यम से कामुक अदाओं का बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, साहित्य ज्यादातर कामुक चरित्रों से भर गया है, बहुत बड़े शक्तिशाली बम बन गए हैं जो एक मिनट में पूरी दुनिया को समाप्त कर सकते हैं, मिसाइलों का निर्माण जोरों से किया जा रहा है, विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, चिकित्सा के नाम पर व्यक्ति के शरीर को प्रयोगशाला समझ लिया गया है, और ऐसे में कुछ लोग ताली पीट रहे हैं, उनके चेहरे पर बहुत खुशी है. क्योँकि उन्हें लग रहा है कि सच में बदलाव आ गया है. व्यक्ति आधुनिक हो गया है. आधुनिकता और उतर-आधुनिकता का विमर्श जोरों पर है, बस ऐसा लगा रहा है कि सब कुछ बदल गया है, अब कोई समस्या नहीं, वह बहुत प्रचार कर रहे हैं और ऐसा कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन और जगत दोनों को बदल कर रख दिया है. पर स्थितियां बहुत विपरीत नजर आती हैं और हम सब उनसे रोज ही जूझते हैं, ऐसे में हम सब यह महसूस कर सकते हैं कि कितना बदलाव आया है और कैसे बदलाव की आवश्यकता हमें है.
कोई समस्या नहीं है. सूचना-तकनीक के साधनों से हमारा सीधा संपर्क है. हम उनका बखूबी इस्तेमाल भी कर रहे हैं, आज के विज्ञान ने जितना कुछ हमें दिया है वह हमारे लिए लाभकारी है. दुनिया के सारे देश एक दूसरे के संपर्क में हैं, कुछ ऐसी वैश्विक संस्थाएं गठित की गयी गयी हैं जिनके नियम और कायदे पूरी दुनिया पर लागू होते हैं और इन संस्थाओं के निर्णयों का प्रभाव पूरी दुनिया पर पढता है. इसे हम वैश्वीकरण का नाम दे रहे हैं. दुनिया पूरी एक गाँव बन गयी है, अब कोई समस्या नहीं, पूरी दुनिया के लोग एक हो गए हैं, ऐसा प्रचार वैश्वीकरण के समर्थक करते हैं और इस माध्यम से एक आस जगाते हैं कि अब तो दुनिया का स्वरूप बदल कर ही रहेगा. क्योँकि अब कोका कोला पूरी दुनिया में बिकता है, जहाँ पानी पीने को नहीं मिलता वहां कोक की बोतलें मिल जाती हैं, चाइनीस फ़ूड अब गली मोहल्लों, सड़कों में खाने को मिल जाता है, आधुनिकता के नाम पर बदन दिखाने की कोशिश की जा रही हैं, लोगों ने लिव इन रिलेशनशिप को तरजीह देना शुरू किया है, समलैंगिक सम्बन्ध जरुरी हो गए हैं, ऐसे सम्बन्धों की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, बहुत बड़े-बड़े स्टार फिल्मों के माध्यम से कामुक अदाओं का बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, साहित्य ज्यादातर कामुक चरित्रों से भर गया है, बहुत बड़े शक्तिशाली बम बन गए हैं जो एक मिनट में पूरी दुनिया को समाप्त कर सकते हैं, मिसाइलों का निर्माण जोरों से किया जा रहा है, विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, चिकित्सा के नाम पर व्यक्ति के शरीर को प्रयोगशाला समझ लिया गया है, और ऐसे में कुछ लोग ताली पीट रहे हैं, उनके चेहरे पर बहुत खुशी है. क्योँकि उन्हें लग रहा है कि सच में बदलाव आ गया है. व्यक्ति आधुनिक हो गया है. आधुनिकता और उतर-आधुनिकता का विमर्श जोरों पर है, बस ऐसा लगा रहा है कि सब कुछ बदल गया है, अब कोई समस्या नहीं, वह बहुत प्रचार कर रहे हैं और ऐसा कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन और जगत दोनों को बदल कर रख दिया है. पर स्थितियां बहुत विपरीत नजर आती हैं और हम सब उनसे रोज ही जूझते हैं, ऐसे में हम सब यह महसूस कर सकते हैं कि कितना बदलाव आया है और कैसे बदलाव की आवश्यकता हमें है.
आज
बेशक भौतिक रूप से हमने बहुत उन्नति कर ली है और इसके लिए मानव बधाई का पात्र है.
लेकिन इसके साथ एक और पहलू भी जुडा है वह यह कि आज जितना भी भौतिक विकास मानव ने
किया है वह उसे और ज्यादा स्वार्थी बना रहा है, इसलिए मनुष्य के पास सब कुछ होते
हुए भी वह दूसरों का शोषण करने की फिराक में रहता है, वह अपने स्वार्थ के कारण ही
प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, और उसे विकास का नाम देकर प्रचारित कर रहा है.
ऐसे कई पहलू हैं जो आज व्यक्ति के स्वार्थ का परिचय देते हैं, लेकिन दुसरे शब्दों
में हम उसे ही बदलाव का नाम देते हैं. लेकिन हमें इस बात को बहुत गहरे से समझना
होगा कि जरुरी नहीं ऊँचे महलों में रहने वालों का चरित्र और कर्म भी उंचा ही हो,
जिन्होंने वास्तविक बदलाव के साथ जीवन को जिया है, वह सड़कों पर रहे हैं, गुफाओं से
संचालन किया है अपने मंतव्यों को पूरा करने के अभियाओं का, उनके पास बस एक ही
शक्ति थी जिसके बल पर उन्होंने पूरी दुनिया को जीता है वह शक्ति थी संकल्प की
शक्ति. आओ हम सब मिलकर ऐसा संकल्प ले कि इस दुनिया का स्वरूप बदल जाए और इसके लिए
मानव की सोच को बदलना बहुत जरुरी है, मानव की सोच बदल गयी, कर्म बदल जाएगा और जब
कर्म बदल जाएगा तो वास्तविक बदलाव अपने आप ही आयेगा, और जब तक ऐसा नहीं हो पाता तब
तक बदलाव की सिर्फ आहट ही सुनाई देगी, वह सकारात्मक दिशा में आएगा इस पर बहुत बड़ा
प्रश्न चिन्ह अभी तक बरकरार है .

