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18 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...1

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गाँव से बाहर रहते हुए मुझे लगभग 16 वर्ष हुए हैं. 2000 से 2005 के बीच के समय में साल में लगभग दो से तीन महीने गाँव में गुजरते थे. लेकिन 2005 के बाद यह सिलसिला महीने भर का हो गया और अब पिछले तीन-चार सालों से कुछ ऐसा सबब बना है कि साल दो साल में 10-15 दिनों के लिए ही गाँव जाना होता है. ऐसा नहीं है कि मुझे गाँव की याद नहीं आती. शुरू में जब गाँव से बाहर कॉलेज में अध्ययन करने आये थे तो 10-15 दिन की छुट्टी में भी गाँव जाने का मन होता. लेकिन गाँव जाना दुष्कर था. फिर भी जब परीक्षाएं समाप्त होती तो उसी दिन ही गाँव की तरफ चल पड़ते. कॉलेज में पढने वाले सभी साथी उन्हीं दिनों ही टोली में अपने-अपने गाँव की तरफ लौटते, रास्ते में एक दो जगह रात गुजारनी पड़ती, सब साथ ही रहते. लड़के-लडकियां सब साथ चलते किसी को किसी तरह का भय नहीं, जान-पहचान हो न हो, लेकिन रास्ते में सब एक दूसरे के चहेते हो जाते. कहीं पैदल भी चलना पड़ता तो सब एक दूसरे का सहयोग करते. कठिन और दुर्गम रास्तों में सबका सफर हंसी-ख़ुशी से कटता और घाटी में पहुँचने के बाद सब अपने-अपने घरों में पहुँच कर ख़ुशी से सरावोर हो जाते. फिर जब साथियों से मुलाक़ात होती तो उस सफर पर ही अधिकतर चर्चा होती और फिर अगले सफर में साथ चलने की तारीख निश्चित की जाती. ऐसा रोमांचक दौर था हमारे कॉलेज के दिनों का.
जब मैं कॉलेज में पढ़ने के लिए घर से निकला तो एक भरे पूरे परिवार की यादें भी मेरे साथ ही रही. गाँव में जो प्यार मुझे सबसे मिलता, मुझे उसकी कमी अब भी महसूस होती है. घर में दादा-दादी से लेकर भाई-बहन सब थे. इसलिए मेरे पास यादों का पिटारा ज्यादा बड़ा था. मेरे बचपन के दोस्त और गाँव के बुजुर्ग सबकी याद मेरे जहन में थी. कुछ महीने तो ऐसे गुजरे कि जैसे मुझे अस्तित्वहीन कर दिया गया हो. मेरे लिए कॉलेज में पढ़ना तो सजा के समान हो गया. मैं अकेले में कई बार गाँव में गुजरी हर रात को याद करता तो आँखों में आंसू आ जाते, दिल वापस गाँव लौट जाने को कहता. मेरा बचपन मेरे ननिहाल में बीता था तो वह एक अलग ही अहसास था मेरे लिए. मुझे ननिहाल के हर व्यक्ति से प्रेम मिला था, इसलिए वहां की यादें मेरे लिए और भी भावुक करने वाली होती. कुल मिलाकर मैं जब गाँव से बाहर शहर की तरफ आया तो बहुत कुछ ऐसा था जिसे मैंने उसी दिन खो दिया था. इसी बीच कुछ महीनों में नानी जी का देहांत हो गया और मैं उनके अन्तिम दर्शन भी नहीं कर सका, जो मेरे लिए दुखद था.
खैर धीरे-धीरे यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा और मैं खुद को गाँव से बाहर की दुनिया से जोड़ने की कोशिश करता रहा. अब कॉलेज में दोस्त भी बन गए और कुछ स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध भी बन गए तो सुख-दुःख उन्हीं के साथ कटने लगा और मैं खुद को अध्ययन के लिए तैयार करने लगा. क्योंकि जिस मकसद से गाँव से इतने दूर आये थे उस पर ध्यान केन्द्रित करना जरुरी था और अब मन उसी  में रम जाना चाहता था. मैं कोशिश करता रहा और धीरे-धीरे मन गाँव से हटकर अब किताबों की दुनिया में खोने लगा. जैसे ही किताबों से मेरा प्रेम बंधा तो फिर अधिकतर समय या तो पुस्तकालय में बीतता या फिर पुस्तकों को खोजने के लिए पुस्तकों की दुकानों पर. अपने कॉलेज के दिनों में मैंने पाठ्यक्रम की पुस्तकें कम ही पढ़ी, लेकिन पाठ्यक्रम से बाहर जो भी बेहतर पुस्तक मिलती उसे पढ़ने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता. उसका लाभ यह हुआ कि मैं कभी पुस्तकों और अध्ययन के प्रति उदासीन नहीं हुआ और मैं जितना पढ़ता जाता, उतना मुझे खुद की कमी का अहसास होता. फिर मेरा मन और भी मेहनत करने को करता, धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आने लगी कि मैं गाँव की यादें भूल सी गया और पुस्तकों की दुनिया मेरे लिए सब कुछ हो गयी. जीवन भी क्या खेल खेलता है, मैं सोचकर ही असमंजस में पड़ जाता हूँ.
कॉलेज के सफर के तीन साल काफी कुछ अनुभव दे गए. अब मुझे कुछ समझ आने लगी थी. मैं अब कुछ चीजों के बारे में सोचने लगा था. मैं चाहे जो कुछ भी करने की सोचूं, गाँव हमेशा मेरी सोच के केन्द्र में रहता, हालाँकि वह आज भी है. फिर भी उस समय हर निर्णय गाँव को ध्यान में रखकर ही लिया जाता. मुझे शहर के जीवन में कोई ख़ास रोमांच नजर नहीं आया, सब औपचरिकता और बनावटीपन सा लगता. किसी के पास किसी के लिए समय नहीं. किसी भी घर में दो-चार से ज्यादा सदस्य नहीं, और उन सदस्यों में भी दो पति-पत्नी और दो बच्चे. लेकिन किसी के पास किसी के लिए वक़्त नहीं. कोई किसी की खबर नहीं रखता, किसी को किसी की ख़ुशी और गम से कोई लेना देना नहीं. कुल मिलाकर शहर के विषय में बहुत कुछ मुझे ऐसा लगा जो अमानवीय जैसा है, फिर भी लोग शहर को क्यों पसंद करते हैं? यह प्रश्न मेरे जहन में बार-बार उठता. इधर मैं गाँव के विषय में सोचता तो मुझे बड़ा आनन्द आता. वहां लोगों के पास एक दूसरे के लिए समय ही समय है. गाँव में जहाँ 15-20 सदस्यों का संयुक्त परिवार हो तो वह लोग बहुत भले और सम्मानीय माने जाते, उनका अपना ही रुतवा होता. इसके साथ ही सबके घर एक ही समूह में होते. सुबह-शाम बच्चे किसी के भी घर के अन्दर या बाहर हल्ला मचा सकते हैं, खेल सकते हैं, नाच-गा सकते हैं. बच्चों के लिए तो ऐसा माहौल होता कि पूरा गाँव ही उनका है. वह किसी के भी घर में जाएँ उन्हें वहां वह सब कुछ मिल जाएगा जिसकी जरुरत उन्हें अपने माता-पिता से होती. सब एक साथ रहते, खेलते-कूदते, लड़ते-झगड़ते और अपने बचपन को सहेजते.
इसी तरह गाँव में बुजुर्गों की भी अपनी ही दुनिया होती, वह बचपन और बुढ़ापे का आनन्द साथ-साथ ले रहे होते. क्योंकि घर के काम-काजी महिला-पुरुष अपने बच्चों को इन्हीं बुजुर्गों के हवाले रखते. एक ही घर में बच्चों के लिए बुजुर्गों के साथ अलग-अलग रिश्ते होते. वह किसी के दादा-दादी लगते तो किसी के नाना-नानी, बच्चे भी अपने बालपन में भूल से जाते कभी दादा-दादी को नाना-नानी कह देते तो, कभी कुछ जो उन्होंने किसी बड़े से सुन लिया उसका ही सम्बोधन वह घर के किसी भी सदस्य के लिए करते. बच्चों के साथ रहते हुए बुजुर्गों को अपना जीवन एकाकी नहीं लगता. वह हमेशा प्रसन्न रहते. सुबह और शाम का खाना सब मिलकर खाते और रात के खाने के बाद सभी मिलकर एक दूसरे से बातचीत भी कर लेते और अगले दिन की योजना बनाकर सभी आराम करते....शेषअगले अंकों में.

25 मई 2011

यादें जो आज भी

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कॉलेज से पास आउट होने के बाद मैं कभी उस कॉलेज में नहीं गया जहाँ मैंने जिन्दगी के तीन महत्वपूर्ण वर्ष बहुत कुछ सीखने में गुजारे थे. मेरा कॉलेज एक नदी के किनारे स्थित था. कॉलेज के बाहर एक बड़ा मैदान था. मैदान तथा कॉलेज दोनों ऐतिहासिक थे. कभी-कभी मुझे कॉलेज की भव्यता तथा नक्काशी पर सोचने का मौका मिलता तो मैं सहज ही उस अदृश्य सत्ता के प्रति आस्थाबोध से समर्पित हो जाता. मेरा सोचना सिर्फ सोचना होता! परन्तु मेरे जहन में कई प्रश्न जरुर पैदा करता. कभी-कभी तो मेरा मन एक कल्पना लोक तक जा पहुँचता. मैं सब बर्दाश्त कर लेता.....बस यही संतोष था.
कॉलेज से पूर्व जब मैं स्कूल में पढता था तो यहाँ आकर स्कूल की यादें रह रहकर जब भी मेरे जहन में उमड़ती तो मैं रोमांचित हो जाता. मेरे स्कूल का भवन बहुत ही दयनीय हालत में था लेकिन कॉलेज एकदम भव्यसुन्दर तथा व्यवस्थित. मेरे गाँव के लोग बहुत भोले-भाले मेहनती न्यायप्रिय तथा ईमान्दार थे. वहां का वातावरण तथा आबोहवा इस वातावरण से भिन्न थी. जहां मेरे गाँव में हर किसी को एक दुसरे की चिंता रहती थी, वहीँ पर मेरे कॉलेज में किसी का किसी से कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था. सबको अपनी-अपनी पड़ी होती यहाँ पर हर किसी को अपने काम से मतलब होता. बेबजह वक़्त बर्बाद करने की प्रवृति किसी में नहीं थी. मेरे कॉलेज के प्राध्यापकों के पास डिग्रियांउपाधियाँ और उपलब्धियां सब कुछ था. हर कोई अपने उपर गर्व  करता थाहर कोई खुद को दुसरे से श्रेष्ठ समझता. खैर!! मुझे इन बातों से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन इन सबसे मेरा वास्ता पड़ता था तो एक उत्सुकता सी बनी रहती इन सबसे बात करने की और इनसे कुछ सीखने की. मुझे कॉलेज की हर चीज अच्छी लगती प्राध्यापकव्यवस्था और छात्र.
सबसे अच्छे  मुझे मेरे दोस्त लगते जिनमें संजीव और शालिनी को मैं बहुत पसंद करता. मेरे दोस्तों की और मेरी एक अलग पहचान थी. मैं उन सबसे भिन्न प्रवृति का था. लेकिन दोस्त तो आखिर दोस्त ही हैं ना. संजीव और शालिनी से मेरी खूब बनती थी. दोनों का बात करने का लहजा तथा ज्ञान का स्तर काफी ऊँचा था. संजीव हमेशा कल्पनापूर्ण बातें करता तथा भविष्य के लिए नयी योजनायें बनाने की इच्छा उसकी होती. वह व्यक्तिगतसामाजिक तथा राजनीतिक सुधार तथा बदलाव की बातें हमेशा किया करता था. शालिनी एक शान्त स्वभाव की लड़की थी. प्यार  से बात करना और सलीके से पेश आना उसकी खूबी थी. ऐसे लगता था कि वह काफी सुलझी हुई हो, परन्तु मैंने कभी उसे जानने की कोशिश ही नहीं की.
संजीव से जब भी मिलना होता मैं हमेशा उससे कुछ सामयिक मुद्दों पर बात करता. मेरी इच्छा हमेशा नए-नए विषयों पर चर्चा करने की होती. एक दिन मैंने और संजीव ने समाज की विसंगतियों पर चर्चा करना शुरू कर दिया. परत दर परत हम कई पहलुओं को खोलते गए. मैं आध्यात्मिक प्रवृति का व्यक्ति हूँ, इसलिए मैं प्रत्येक वस्तु को बहुत बड़े नजरिये और समग्र परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करता और संजीव भौतिकवादी दृष्टिकोण लेकर हमेशा अपने मत की स्थापना में बड़े से बड़ा तर्क  देता. पर अंततः वह मेरी कई बातों से सहमति जताता. इसका मुझे भी संतोष था.
मुझे इतिहास का ज्यादा ज्ञान नहीं परन्तु दर्शन पर मेरी अच्छी पकड़ हैइसलिए हम दोनों जब किसी घटना पर विचार करते तो वह घटना का इतिहास-दर्शन हो जाता. संजीव किसी भी घटित घटना के कारणों तथा उसके किसी ऐतिहासिक पक्ष को खोजने की कोशिश जरुर करता. आज की बहस में हमने कई मुद्दों पर चर्चा की लेकिन शहर के एक  प्रतिष्ठित  व्यक्ति द्वारा प्रताड़ित ‘रामदीन’ द्वारा की गयी  आत्महत्या की चर्चा पर हम जयादा केन्द्रित रहे.
खैर समय यूँ बीतता गया और हम अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ते रहे अब वह समय नजदीक था जब हमें इस कॉलेज से विदा लेनी थी. जब हम एक दूसरे से जुदाई के बारे में सोचते तो आँखें भर आती. लेकिन जब हम किसी से भी मिलते हैं तो जिन्दगी के किसी मोड़ पर बिछुड़ना स्वाभाविक है. जीवन का यह क्रम है इसलिए ज्यादा दुःख नहीं होता. अब वह दिन हमारे सामने था जब हमें कॉलेज से विदा किया गया, मैं संजीव और शालिनी एक दूसरे के आसपास ही बैठे थे और सारा समय हमने इन तीन वर्षों में बिताये हर एक क्षण को याद किया और भविष्य की योजनाओं के बारे में चर्चा की. हम तीनो का लक्ष्य स्पष्ट था. हम तीनो एक दूसरे के प्रेरणास्रोत थे लेकिन आगे की पढाई के लिए शायद ही अब साथ रह पातेकोशिश थी कि एक दुसरे से सम्पर्क बनाये रखा जाए लेकिन वक़्त की मार के साथ यह भी सम्भव नहीं हो पाया.
संजीव और शालिनी से कभी कोई सम्पर्क नहीं हुआ कॉलेज से पास आउट होने के बाद. मैंने कुछ सपने सजाये थे, उन्हें पूरा करने में लगा रहा कई वर्ष और काफी हद तक मुझे सफलता भी मिली. जब भी संजीव और  शालिनी के बारे में सोचता तो ऑंखें भर आती. मैंने उन्हें अपनी हर सफलता पर बहुत याद किया और हमेशा सोचा काश! आज वह मेरे साथ होते तो मेरी उपलब्धियों पर उन्हें मुझसे ज्यादा ख़ुशी होती.
जीवन आगे बढ़ता गया. मुझे पता है धरती गोल है तो कहीं न कहीं किसी न किसी मोड़ पर कुछ न कुछ घटित होता है, जो आपको अचम्भित कर देता है. अब जब मैं कुछ समय पहले अपने कॉलेज के आसपास वाली गलियों में घूम रहा था तो अचानक मुझे संजीव दिख गया. वह मेरे सामने था और मैं उसके. लेकिन वह मुझे पहचान नहीं पाया. मैं जब कॉलेज में पढता था तो बहुत साधारण तरीके से रहता था. लेकिन अब थोडा बदलाब मुझ में भी आ चुका था हर एक चीज को लेकर. संजीव थोड़ी देर किसी अपरिचित की तरह मुझे देखता रहा, लेकिन मैंने जब उसे उसके नाम के साथ पुकारा तो वह सोच में पड़ गया. मैंने ज्यादा देर किये बिना उसे गले से लगा लिया, वह और भी हतप्रभ! फिर मैंने उसे अपना नाम बताया और वह रो पड़ा.
देखने वाले सब देखते रहे मैं और संजीव ख़ुशी के आंसुओं से भीग गए. हालाँकि संजीव का घर उस शहर में नहीं था. फिर भी हम दोनों ने साथ रहने का मन बना लिया. संजीव ने शालिनी के बारे में बताया मैंने बिना देर किये उससे मिलने की इच्छा जाहिर की. शालिनी से सम्पर्क साधा गया. बात संजीव ने कीकि आज आपके यहाँ आ रहा हूँ. जब हम वहां पहुंचे तो मुझे देखकर शालिनी एकदम पहचान गयी और गले लग गयी. दो दिन तक मैं संजीव और शालिनी एक साथ रहे. खूब सारी बातें की और एक दूसरे के बारे में जाना.
जीवन भी क्या हैएक यक्ष प्रश्न. लेकिन हमें हमेशा संजीदा रहना चाहिए, जीवन में मानवीय भावनाओं के प्रतिहमारी जिन्दगी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आने वाला हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है. बस हम उसकी कदर कर पायें. यह जिन्दगी कितनी है यह किसी को पता नहीं. लेकिन जितने लम्हें हम जियें जीवन को खूबसूरती प्रदान करते हुए जियें.