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25 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...3

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गत अंक से आगे... मन वचन और कर्म के पहलुओं को समझाने की कोशिश कई तरीकों से की जाती. गाँव के बुजुर्ग गाँव के हर बच्चे के साथ अपने बच्चे जैसा व्यवहार करते, इसलिए बच्चों के पास कोई अवकाश नहीं होता था कि वह किसी के साथ उदंडता से पेश आये. अगर कभी ऐसी भूल हो भी जाती थी तो वहीं बच्चे को उसकी भूल का अहसास करवा दिया जाता. अगर कहीं बात गलती से घर तक पहुँच जाती थी तो और भी डांट पड़ती. इसलिए गाँव में बुजुर्गों के प्रति सबके मन में सम्मान का भाव बना रहता और बुजुर्ग भी सबको हमेशा मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देते, सबका सम्मान और सहयोग करने की तरफ प्रेरित करते. हर घर में ऐसा माहौल होता कि वहां किसी भी तरह का कोई अनुशासन भंग नहीं होता. घर के सञ्चालन का मुख्य जिम्मा स्त्रियों के हाथ होता, उसमें सबसे बड़ी भूमिका घर में सबसे वरिष्ठ स्त्री की होती, कोई भी निर्णय मिल बैठकर सबकी सहमति से लिया जाता. उसके पीछे एक और भी कारण था कि गाँव में सभी लोग एक दूसरे के सम्मान के साथ-साथ अपने घर का सम्मान भी बनाये रखना बखूबी जानते थे. घर में कोई आपसी मन मुटाव हो तो उसे घर पर ही सुलझाने की कोशिश की जाती, अगर फिर भी कोई मामला नहीं सुलझता है तो गाँव के किसी वरिष्ठ और सम्मानीय व्यक्ति को बुलाकर सुलझाने की कोशिश की जाती और अधिकतर मामले वही शांत हो जाते. मन मुटाव वहीं समाप्त हो जाते और सभी एक ही छत के नीचे प्रेम और सहयोग से रहने की कोशिश करते. गाँव का माहौल मुझे इसलिए भी अच्छा लगता क्योंकि वहां व्यक्ति किसी के प्रति मन में इर्ष्या, द्वेष का भाव नहीं रखता, घर-परिवार से लेकर समाज तक सब एक दूसरे की इज्जत करते और सहयोग करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते.
कुल मिलाकर गाँव में जो वातावरण आज से 10-15 साल पहले तक था वह ऐसा ही था और इससे पहले और भी बेहतर, जैसा कि मुझे मेरे दादा जी बताया करते थे. वह अपने जीवन काल में भी गाँव के बदलते माहौल के लिए चिन्तित दिखाई देते थे. उनकी मृत्यु आज से 10 साल पहले हुई, उनके जाने के बाद मेरे जीवन में न भरा जाने वाला खालीपन आ गया. मेरे सबसे अच्छे दोस्त की तरह थे वह. मेरे जीवन को संवारने में उनकी भूमिका सबसे ज्यादा है. फिर धीरे-धीरे गाँव बदलने लगा. गाँव क्या बदला लोग बदलना शुरू हुए. हालाँकि इस बदलाव के बीज एकदम नहीं उगे थे, यह धीरे-धीरे हो रहा था. जैसे-जैसे भौतिक संसाधन लोगों के पास आना शुरू हुए, लोगों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव जाता रहा. पहले जहाँ सिर्फ जमीन-जायदाद और घर आदि को लेकर भाइयों में कहा सुनी होती थी अब उसके बीच में पैसा भी आ गया. लेकिन पुश्तैनी जायदाद के लिए पहले से नियम बना था तो वह ज्यादा परेशानी का कारण नहीं था किसी के लिए. जब भी किसी को अपने परिवार से अलग होना हो तो वह उन नियमों का पालन करते हुए अपनी नयी दुनिया बसा सकता था, लेकिन वहां पर गाँव की जो समीति होती, जिसे हम ‘प्रजा’ कहते हैं. उसमें वह घर के बड़े सदस्य या पिता की सहमति के बाद ही शामिल हो पाता. क्योंकि बहुत से ऐसे अधिकार जो व्यक्ति के लिए गाँव में जीवनयापन करने के लिए जरुरी होते हैं, वह प्रजा के पास सुरक्षित रहते. इसलिए परिवार से अलग होने का साहस वही करता, जिसे अपने परिवार से कोई ज्यादा परेशानी हो, वर्ना संयुक्त परिवार में आनन्द लेते हुए ही जीवन कट जाता. लेकिन आज गाँव में संयुक्त परिवार इक्का-दुक्का ही देखने को मिलते हैं. वर्ना माहौल ऐसा होता कि बच्चों को परदादा तक के दर्शन अपने जीवन काल में हो जाते, लेकिन आज बदलते दौर में परदादा के तो कहाँ माता-पिता के पास भी बच्चों के लिए समय नहीं है.
आज गाँव में बदलाब की बयार हर स्तर पर देखी जा रही है. उपरी स्तर पर देखने से लगता है कि गाँव की हालत सुधर रही है, विकास हो रहा है. हर गाँव तक सड़क पहुँच गयी है, आने जाने के साधन हैं. लोगों के घरों के बाहर गाड़ियां देखने को मिल जाती हैं. हर घर के हर कमरे में टीवी लगा हुआ है. 15 से ऊपर के हर व्यक्ति के पास मोबाइल फ़ोन हैं. इन्टरनेट की सुविधा भी धीरे-धीरे बेहतर होती जा रही है. लोग टीवी बहसों के आधार पर देश की दशा और दिशा पर चर्चा करने लगे हैं. राजनितिक पार्टी के समर्थन और विरोध के आधार पर दोस्त और दुश्मन बन रहे हैं, रिश्तों में बनावटीपन आता जा रहा है. महिलाओं का परिधान बदल गया है. पुरुष भी भौतिक चकाचौंध से दूर नहीं हैं, उन्होंने भी खुद को बदलते परिवेश के अनुरूप खुद को ढाल लिया है. गाँव में विद्यालय जरुर खुल गए हैं, लेकिन शिक्षा के नाम पर वहां लीपापोती के अलावा कुछ नहीं होता. गाँव का बचपन भी अब अठखेलियाँ नहीं करता, वह किसी बुजुर्ग का सम्मान नहीं करता. वह अब किसी के सामने श्रद्धा से नहीं झुकता. अब गाँव का बच्चा भी अपने पराये का भेद करने लगा है. गाँव का व्यक्ति अब टोली बनाकर घर से बार नहीं निकलता. वह पैसे के दम पर सब कुछ हासिल करने की कोशिश करता है. उसे भी लग रहा है कि भौतिक उन्नति ही जीवन का मूल लक्ष्य है और इसके लिए वह अपने सम्बन्धों को भी दरकिनार कर रहा है. अब उसके पास पडोसी से बात करने का समय नहीं वह अपनी ही धुन पर अपनी डपली बजा रहा है, चाहे किसी कोई परेशानी ही क्यों न हो.
आज गाँव और शहर में कोई अन्तर नहीं रहा गया है, बस एक ही अन्तर है भौगोलिक. इसी आधार पर अब गाँव और शहर में अन्तर किया जाता है. बाकी सब चीजें और व्यक्ति की फितरत वही है जो आज का इनसान कर रहा है और ऐसी फितरतों के आधार पर वह खुद को शिक्षित और बुद्धिमानी साबित करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन भीतर से देखें तो आज का इनसान बाहर से चमकीला जरुर है, लेकिन भीतर से वह खोखला है. गाँव का परिवेश भी इससे अछूता नहीं रहा. अब मेरा गाँव गाँव नहीं रहा, मिटटी वही है, लेकिन उस मिटटी से बने लोग बदल गए हैं और बदलने का यह क्रम हमें संवेदना विहीन कर रहा है. विकास का खोखला नारा हमें अपने बजूद से दूर कर रहा है. मनुष्य तू समझ क्योँ नहीं रहा है. अपने बजूद को बचाए रखने के लिए हमें मानवीय भावों को अपनाना होगा, वर्ना हमारे पास भौतिक साधन तो जरुर होंगे, लेकिन एक अदद इनसान की कमी जीवन में खलती रहेगी. हम गाँव को जरुर बदलें जो हमारे लिए सुविधाजनक हो, सुखद हो, लेकिन मानवीय भावों और संवेदनाओं को हमें जिन्दा रखना होगा, प्रेम और सहयोग को बढ़ाना होगा, सचमुच का इनसान बनना होगा. 

22 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...2

5 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.... गाँव में जीवन का क्रम जन्म से लेकर मृत्यु तक एक दूसरे के सहज सहयोग पर आधारित होता. लेकिन फिर भी कहीं पर मानवीय स्वभाव और स्वार्थ जरुर सामने आता, और यह जीवन की वास्तविकता भी है. फिर भी गाँव में जीवन सदा ही सुखद और सहज महसूस होता. कहीं कोई भागदौड नहीं, कोई लालसा नहीं, सब कुछ सहज और शान्ति से घटित होता. मैंने अपने जीवन काल में ही मनुष्य के स्वाभाव में बहुत परिवर्तन होते देखे हैं तो मैं कैसे सोच लूं कि गाँव के मनुष्य का स्वभाव नहीं बदलेगा. आज हम जिस भौतिक उन्नति को मानवीय विकास का आधार मान रहे हैं उसका प्रभाव गाँव पर भी पड़ा है और वहां भी उन सब चीजों पर प्रभाव देखने को मिलता है जो हमें शहरों में देखने को मिलता है.
मैं एक बार फिर अपने अतीत में झांककर देखने को कोशिश करते हुए गाँव के जीवन को याद कर रहा हूँ. मैं जिस क्षेत्र में पैदा हुआ हूँ, वहां पर अक्तूबर से मार्च-अप्रैल तक बर्फ पड़ने के कारण पूरी घाटी का सम्पर्क शेष विश्व से कट जाता. हालाँकि गर्मी के मौसम में भी घाटी से बाहर जाने के लिए दुर्गम रास्तों का सफर तय करना पड़ता, और यही वह मौसम होता जब घाटी के लोग अपने आवश्यक सामान आदि इकठ्ठा करना शुरू कर देते. पशुओं के लिए घास आदि इकठ्ठा करके रखा जाता. मेरे गाँव की दुनिया एक अलग ही दुनिया है. एक अलग तरह का अहसास मुझे अब भी उस दौर में ले जाता है तो मैं रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकता. हालाँकि यहाँ के जीवन की अपनी परेशानियां और संघर्ष हैं. लेकिन यहाँ लोगों के एक दूसरे के प्रति अथाह प्रेम, सहयोग और विश्वास किसी भी प्रकार के कठिन समय को काट देते. लोगों का एक दूसरे से मिलजुल कर रहना एक अलग ही अहसास देता. पूरा गाँव एक दूसरे के सुख-दुःख का बराबर सांझीदार होता. ख़ुशी में सब खुश होते, और गम में सब दुखी. ऐसे ही कटता गाँव के जीवन का सफर.
गर्मियों के मौसम में लोग जहाँ मिलजुल कर कृषि सम्बन्धी कार्य करते. इस दौरान प्रकृति जिस रूप में अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से सबके मन को मोह लेती वह एक अलग ही आकर्षण होता. लेकिन सर्दी का मौसम भी कम रोमांचक नहीं होता. गर्मी के मौसम में जहाँ प्रकृति अपने सौन्दर्य से सबको अपनी और आकर्षित करती, वहीँ सर्दियों के मौसम में यहाँ के स्थानीय त्यौहार एक खुशनुमा माहौल बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते. कुल मिलाकर घाटी में पूरे वर्ष कुछ न कुछ सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती रहती, जो लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखती. एक तरफ जहाँ गर्मी के मौसम में प्रकृति के रंगों के साथ-साथ त्यौहार आयोजित किये जाते तो सर्दी के मौसम में भी वही क्रम चलता रहता. इन सब कार्यक्रमों में लोगों का उत्साह, सहयोग और प्रेम देखते ही बनता था.
गाँव के लोग जहाँ गर्मी के दौरान अपना अधिक समय जंगलों और खेतों में व्यतीत करते. वहीँ सर्दी के मौसम में गाँव में ही पूरा समय व्यतीत होता. इस दौरान गाँव के लोग घर के अन्दर रहकर ही अपने कार्यों को निपटाते. कुल मिलकर व्यवस्था ऐसी होती कि सर्दियों में अलग काम किये जाते और गर्मियों में अलग काम. गर्मियों के मौसम में कृषि से सम्बन्धित कार्य अधिक किये जाते और सर्दियों के मौसम में घर के अन्दर रहकर किये जाने वाले कार्य किये जाते. जैसे ऊन कातने से लेकर हथकरघे पर कपड़ा बनाना. इस कार्य को स्त्री को पुरुष दोनों मिलकर करते. महिलायें भी ऐसे कामों में दक्ष होती. वह अधिकतर गेहूं की पुआल से कई तरह की चीजें बनाती, जैसे पाँव में डालने के लिए जूता (जिसे स्थानीय बोली में ‘पूले’ कहा जाता). उसमें भी ऐसे डिजाईन बनाये जाते कि उन्हें देखकर ही मन इस कला पर मुग्ध हो जाता. गेहूं के पुआल से ही चटाई आदि भी बनाई जाती. ऐसे अनेक काम होते जिन्हें लोग अकसर सर्दियों के मौसम में ही करते. सबसे बड़ी बात यह कि यह सब काम समूह में मिलकर सहयोग से किये जाते.
गाँव में वैसे तो हर वक़्त कुछ न कुछ चला रहता. सर्दियों के शुरू होते ही लोग अखरोट की गिरी निकालने का काम करते. हमारे क्षेत्र में अखरोट बहुत मात्रा में पैदा होता है. इसलिए उसकी गिरी से लेकर तेल निकालने तक का कार्य घर में ही किया जाता. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इस काम में काफी सहयोग और रोमांच से भाग लेते. इसके अलावा और भी छोटे-छोटे और रोचक काम गाँव का हर व्यक्ति अपने हिसाब से करता रहता. कोई जुराब बना रहा है तो कोई स्वेटर बुन रहा है. कोई ऊन कात रहा है तो कोई कपड़ा बन रहा है. कुल मिलाकर गाँव के लोग कभी भी बेकार बैठकर अपना समय कभी भी बर्बाद नहीं करते. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई अपने-अपने हिसाब से व्यस्त रहने की कोशिश करता.
मेरे गाँव में एक और विशेष बात होती, वह यह कि वहां एक बड़े बुद्धिजीवी व्यक्ति थे और लोग सर्दियों में उन्हें अपने घर कथा कहने के लिए बुलाते, इस कथा को बड़े ध्यान से सुना जाता. बच्चे जवान बुजुर्ग सब शामिल होते. कई बार तो ऐसा माहौल बनता कि पूरा गाँव ही किसी एक के घर में इकठ्ठा हो जाता और बड़ी तन्मयता से उन कहानियों को सुनता. उन कहानियों को सुनने और सुनाने की एक विशेष व्यवस्था होती, सबसे बड़ी बात तो यह होती कि बच्चे इन सब गतिविधियों में बड़े उत्साह से भाग लेते और कई बार उनके मासूम सवाल लोगों को अचरज में डाल देते. इन कहानियों में साहस, प्रेम, दया, करुणा और बलिदान के अनेक किस्से होते जो सबके मन पर प्रभाव डालते, और जीवन में वैसा कुछ करने के लिए प्रेरित करते. कई बार कुछ कहानियाँ कई दिनों तक चलती दो या तीन दिन तक लेकिन लोग नए अंक को सुनने के लिए बड़ी तन्मयता से पहुँच जाते. एक अलग सा ही अहसास होता है अब मुझे उस दौर के बारे में सोचकर. इन कहानियों में जीवन का हर पहलू बड़ी बारीकी से अभिव्यक्त किया जाता. कहानी सुनाने वाले के साथ एक और व्यक्ति रोचकता बनाये रखने के लिए उससे बीच-बीच में “जी भाई जी” जैसे शब्द कहते हुए कहानी को आगे बढाने में सहायक होता.
गाँव का जीवन कई मायनों में बड़ा परम्परा से बंधा हुआ माना जाता है, मैंने अपने गाँव में परम्पराएँ तो देखी, लेकिन परम्पराओं को निभाने के प्रति कोई कट्टरपन कभी नहीं देखा. अनुशासन की जहाँ तक बात है तो वह हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत मायने रखता है और गाँव के लोग इस विषय में काफी ध्यान देते. इस अनुशासन का पालन व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक किया जाता. दैनिक गतिविधियों में भी अनुशासन का कड़ाई से पालन करने की बात की जाती, सुबह जागने से लेकर रात्रि सोने तक. खान-पान से लेकर आचार व्यवहार तक. शेष अगले अंक में...!!!