16 मार्च 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...4

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4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुसार उसका धर्म भी निर्धारित कर दिया जाता है. हालाँकि इसका एक पहलू यह भी है कि जो जिस देश में पैदा होता है, उसके द्वारा उसी देश में प्रचलित धर्म का पालन करना पहली प्राथमिकता होता है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. क्योँकि हमारी मान्यता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि धर्म के पालन के बिना जीवन का कोई मकसद पूरा नहीं हो सकता. इसलिए धर्म को जीवन का आधार सा मान लिया गया है. लेकिन धर्म की अनुपालना के विषय में ज्यादातर अनुभव यही बताते हैं कि इसने किसी एक समाज और धर्म के लोगों को जोड़ने का काम बेशक किया है, लेकिन किसी दूसरे को अपने से अलग मानने का भाव भी अधिकतर धर्म के कारण ही पैदा हुआ है. मेरा धर्म श्रेष्ठ है, और किसी दूसरे का नहीं. इस भाव ने दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा की हैं. हमारी किसी दूसरे व्यक्ति से नफरत के कारणों पर विचार करें तो उसमें धर्म और जाति की भूमिका सबसे बड़ी है. हालाँकि देशों की सीमाओं के आधार पर भी व्यक्ति से व्यक्ति का भेद पैदा हुआ है, लेकीन यह भेद उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धर्म और जाति का भेद खतरनाक है. देशों का भेद किसी दूसरे देश के लोगों से हो सकता है. लेकिन जाति और धर्म का भेद किसी एक देश में बसने वाले लोगों में भी द्वंद्व का कारण बन सकता है, और इतिहास गवाह है कि इसी भेद के कारण दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा हुई हैं.
हालाँकि देखने में यह आया है कि जाति की सीमा किसी हद तक सीमित है, लेकिन धर्म की सीमा व्यापक है. एक ही समाज-क्षेत्र और देश में कई जातियां हो सकती हैं, लेकिन उसी समाज और क्षेत्र में उन सभी जातियों का एक ही धर्म हो सकता है. इससे यह सिद्ध होता है कि जाति और धर्म का गहरा सम्बन्ध है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जाति धर्म की रक्षा करती है तो, धर्म जाति को संरक्षण प्रदान करता है. अगर हम भारत के विषय में ही बात करें तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ चार मुख्य धर्म प्रचलन में हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और सिक्ख. लेकिन मुझे लगता है कि सिक्ख धर्म को धर्म कहने के बजाय अध्यात्म के प्रचार की संस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. हालाँकि सिक्खों की भी अपनी एक जीवन पद्धति है. लेकिन सामाजिक समरसता के जो तत्व सिक्खों में देखने को मिलते हैं वह बाकी के तीन धर्मों में कम ही देखने को मिलते हैं. फिर भी अगर कोई सिक्ख धर्म मानता है तो वह उसकी अपनी सोच है. मैं धर्म के विषय पर दूसरे तरीके से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ.
हमारे देश में वैसे तो बौद्ध और जैन विचारधाराओं को भी धर्म की श्रेणी में रखा जाता है. लेकिन इनमें धर्म के तत्व मौजूद होते हुए भी इन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता. फिर भी बात जो भी हो इन्हें विचारधारा कह लीजिये यह धर्म, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें समझना यह है कि एक ही धर्म को मामने वाले अगर समान हैं तो फिर जाति का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए था, लेकिन यहाँ होता यह है कि एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में भी कई जातियां विद्यमान रहती है. इससे यह जाहिर होता है कि इनसान किसी एक स्तर पर बंटा हुआ नहीं है, बल्कि कुछ धर्मभीरु लोगों ने उसे अनेक स्तरों पर बांटने की कोशिश की है. इसलिए हम किसी भी धर्म को मानें, पहले तो हमें उसकी खूबियों और खामियों के विषय में अवगत होना चाहिए और दूसरी बात यह है कि हम धर्म और जाति के आधार पर इनसान को न बाँटें तो बेहतर होगा. किसी की आस्था, मान्यता से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे नफरत का अधिकार हमें किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं है. बदलते दौर में युवाओं की यह जिम्मेवारी है कि वह धर्म और जाति के बन्धन से ऊपर उठकर इनसान को इनसान के नजरिये से देखने का प्रयास करे, ऐसा करने से उन्हें खुद भी एक बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा और वह दूसरों के लिए भी एक बेहतर मिसाल के रूप में दुनिया के सामने होंगे. उन्हें धर्मों के इस अस्तित्व को सकारात्मक रूप में लेने की आवश्यकता है.
5. परम्पराओं और संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को समझें: परम्पराएँ और संस्कृति किसी भी देश-समाज और व्यक्ति की पहचान है. परम्पराएँ और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं. हम देखते हैं कि हमारे समाज में अनेक परम्पराएं मौजूद हैं, जो समाज के स्वरुप को निर्धारित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं. एक तरह से अनेक परम्पराएं मिलकर के संस्कृति का निर्माण करती हैं. संस्कृति किसी भी देश की पहचान को निर्धारित करती है, इसलिए अक्सर यह कहा जाता है कि इस देश की संस्कृति ऐसी है, उस देश की संस्कृति ऐसी है. संस्कृति के आधार पर ही हम किसी देश के जन-जीवन और मानवीय मूल्यों के विषय में जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. इसलिए हमारे लिए यह जरुरी है कि हम अपने देश और समाज की परम्पराओं और संस्कृति के विषय में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें. परम्पराओं के पीछे जो मान्यताएं प्रचलन में हैं उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें. इससे एक तो हमारी जानकारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ हमें जो सही लगेगा हम उसे बड़े उत्साह से अपनाएंगे और जो कुछ सही नहीं है उसमें सुधार करने का प्रयास करेंगे.
यह सब युवाओं पर निर्भर करता है कि वह अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह से समझते हैं और किस तरह से उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं. आजकल जो दौर चल रहा है इसमें परम्पराओं और संस्कृति की बात करना बेमानी सा हो गया है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इसका खामियाजा हमें भुगतना भी पड़ रहा है. जो परम्पराएं और संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़कर रखती थी, उनके न मानने से समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई हैं, मनुष्य-मनुष्य का वैरी हो गया है, समाज में व्यक्ति केन्द्रित जीवन को तरजीह दी जाने लगी है. जिससे हम एकाकी जीवन की और बढ़ रहे हैं. एकाकी जीवन में अवसाद और घुटन के कारण आत्महत्या और किसी की जान लेने की प्रवृतियां बढ़ रही हैं. इससे हर जगह भय का माहौल बना हुआ है. युवाओं के लिए यह जरुरी है कि वह अपने आसपास के समाज में सक्रिय रूप से भागीदार बने. लोगों के दुःख-दर्द में काम आने का साधन बने, एक सहयोग और प्रेम वाली संस्कृति को जन्म देने की कोशिश करें. इसे एक परम्परा के रूप में ही विकसित करें, ताकि समाज एक सुंदर रूप ले सके और सभी का जीवन खुशहाली से बीत सके. शेष अगले अंक में...!!!  

18 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...3

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गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए हैं उनका स्तर उपदेशात्मक ही रहा है. वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए हैं. हालाँकि इस धरती पर बहुत से महापुरुष-गुरु-पीर-पैगम्बर और समाज सुधारक पैदा हुए हैं, जिन्होंने मानव को मानवीय पहलूओं के विषय में बताने की कोशिश की है. साथ ही यह भी प्रयास किया है कि हर कोई अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर अपने जीवन को दूसरों के भले के लिए अर्पित कर दे. लेकिन ऐसा हो कहाँ पा रहा है, आज के भौतिकवादी दौर में अधिकतर लोग भौतिक सुखों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने पूरे समाज के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है. ऐसे में युवाओं को अतीत से अनुभव लेकर, वर्तमान में अपने विचारों और कर्म में परिवर्तन करते हुए भविष्य के लिए एक सुन्दर से संसार की नींव रखनी चाहिए. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि इनसान चाहे जिनती भी भौतिक उन्नति कर ले, अन्ततः उसे मनुष्य के साथ की जरुरत ही पड़ती है. मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव ही ऐसा भाव है जो इस भौतिक उन्नति की प्रासंगिकता को और बढ़ा सकता है. जब तक मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव नहीं होगा तब तक हम इस भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति से कोई ख़ास लाभ नहीं ले सकते. ऐसे में युवाओं को थोडा चिन्तन-मनन कर आगे बढ़ने की जरुरत है. उसके लिए सबसे पहले उन्हें समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझना होगा और देश और दुनिया के परिदृश्य को बदलने के लिए गम्भीर और जिम्मेवार प्रयास की तरफ कदम बढ़ाना होगा. कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिन पर अगर हम थोडा चिन्तन मनन करें तो दुनिया को बदलने में युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है.
     1.   अपने अस्तित्व के विषय में विचार करें: हम दुनिया में तमाम तरह की उपलब्धियां अर्जित करने का प्रयास करते हैं. बचपन से लेकर मृत्यु तक हम कुछ न कुछ ऐसा अर्जित करने के विषय में सोचते रहते हैं जिससे हमारे यश-मान-सम्मान में वृद्धि होती रहे. दुनिया के बीच में नाम होता रहेहम जहाँ भी जाएँ लोग हमें एकदम पहचान लेंऔर ऐसा भी प्रयास मनुष्य का रहा है कि मृत्यु के उपरान्त भी लोग उसे याद करते रहें. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मनुष्य शरीर और शरीर के बाद भी अमर होने के लिए प्रयत्नशील रहा है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है कि मनुष्य को भाग्य के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना चाहिए और अपने जीवन काल में जितना वह कर्म कर सकता है करना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का नुकसान हो. हमारे आगे बढ़ने की दौड़ में कई बार हम अपने साथियों का ही अहित कर देते हैं तो फिर वैसी उपलब्धि का क्या लाभजिसे दूसरों के हक़ मार कर हासिल किया गया हो. यही वह प्रश्न है जो हमें अपने अस्तित्व के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है. अपने कॉलेज के दिनों में मैं एक वाक्य अपनी हर नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा करता था. After all what we are, what is our entity, when we see the universe, where we stand. यह वाक्य मुझे हमेशा आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता रहता. हम क्या हैंयह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर मनुष्य सोचना शुरू करे तो उसके जीवन की कई उलझने तो स्वतः ही समाप्त हो जाएँलेकिन मनुष्य है कि कभी वह इस प्रश्न पर विचार ही नहीं करता. इसलिए युवाओं को कुछ भी करने से पहलेसंसार की तमाम उपलब्धियों की तरफ बढ़ने से पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका अस्तित्व क्या है इस संसार मेंमैं इस प्रश्न का जबाब नहीं दूंगा आप स्वयं सोच लेनाक्योँकि मैं आपको किसी दायरे में नहीं बांधना चाहता कि आप यह हैंआप वो हैंजो कि अब तक होता आया है. लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आप दुनिया में आगे जरुर बढ़ेंजो अरमान आपके हैंउनको पूरा करने के लिए बिलकुल प्रयास करेंलेकिन इतना जरुर सोचें कि आखिर यह सब किया किस लिए जा रहा है और आपको वास्तविक रूप में इससे क्या लाभ होने वाला है.
 2.   जाति के प्रश्न पर तर्क के साथ सोचें: आज दुनिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि हमें जाति जैसे प्रश्न पर विचार करने की जरुरत है. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है जो हमें दिखाई दे रही है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य से मनुष्य के बीच में शरीर की खाई बेशक न होलेकिन मन के स्तर पर मनुष्य से मनुष्य के बीच में गहरी खाई व्याप्त हैऔर यह खाई ऐसी है जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह कितनी गहरी है और कितनी दर्दनाक है. जाति का प्रश्न ऐसा प्रश्न है जो मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाता है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि ताउम्र मनुष्य इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. हालाँकि ऐसा नहीं है कि जाति के प्रश्न पर आज तक विचार नहीं किया गयाइस प्रश्न विचार किया गया हैकई सामाजिक आन्दोलन हुए हैंबहुत कुछ लिखा गया हैलेकिन फिर भी जाति का जिन्न ऐसा है कि यह अन्दर ही अन्दर अपना विकास करता रहता है और समय आने पर अपना रूप दिखा देता है. मुझे लगता है कि मनुष्य से मनुष्य को दूर करने का सबसे बड़ा उपकरण जाति व्यवस्था के रूप में समाज में ऐसा पल्लवित-पुष्पित किया गया है कि इससे बाहर कोई आना ही नहीं चाहता. लेकिन जाति का बजूद क्या हैइस पर कोई तार्किक उत्तर भी नहीं मिल पाता. भारत के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि यहाँ कि सबसे छोटी समझे जाने वाली जाति भी अपने से छोटी जाति ढूंढ लेती है. ऐसी स्थिति में समाज में विघटन की स्थिति पैदा होती रही है. जाति की यह व्यवस्था किसी एक देश में ही व्याप्त नहीं हैकमोवेश इसकी उपस्थिति दुनिया के हिस्से में है. लेकिन हमारे देश में तो यह इतनी विकराल रूप से व्याप्त है कि हम जितनी जल्दी इस जाति से छुटकारा पा लेंउतना ही हमारे लिए अच्छा है. क्योँकि आज जितनी भी विसंगतियां हमारे समाज में मौजूद हैंउनके मूल में जाति एक बड़ा आधार है. जब हम इस प्रश्न पर तर्क के साथ सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि जाति का अस्तित्व सिर्फ मानसिक हैइसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है. हमें जितनी जल्दी या बात समझ आएगी उतना ही हमारे लिए भी यह अच्छा होगा. यूवाओं से यह अपेक्षा है कि वह इस रूढ़ि को समाज से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास करे. शेष अगले अंक में..!!! 

08 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...2

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गत अंक से आगे...हम अपने आसपास की चीजों को जब समझने की कोशिश करते हैं तो हमें समझ आता है कि इस समाज में कितना कुछ है जिसका हमारी जिन्दगी से कोई सीधा सरोकार नहीं है, और कितना कुछ ऐसा है जिसे हमें अपनाने की जरुरत है. अमूमन तो ऐसा होता है कि हम अपने सामाजिक परिवेश में जो कुछ घटित हो रहा होता है उससे खुद को अलग ही रखते हैं और अगर कहीं ध्यान भी जाता है तो हम उसे बदलने का प्रयास भी नहीं करते. ऐसे माहौल में कई पीढियां जीवन जी लेती हैं, लेकिन समाज वहीँ का वहीँ खड़ा रहता है. अगर कोई समाज की गैर जरुरी मान्यताओं पर प्रश्न करता है तो उसे वह समाज ही बहिष्कृत कर देता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि समाज में कोई बुराई व्याप्त नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि उस बुराई को हटाने के लिए किसी ने प्रयास नहीं किये हैं. समाज में बुराइयों को जन्म देने वाले लोग भी रहे हैं और उन बुराइयों को मिटाने वाले भी पैदा होते रहे हैं. लेकिन बुराइयां पैदा करने वाले और उन्हें मानने वाले लोगों की संख्या हमेशा अधिक रही है और उन्हें मिटाने वाले और उनका अनुसरण करने वालों की संख्या बहुत कम रही है. इसलिए दुनिया में जितने भी महामानव पैदा हुए हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में जिन बुराईयों को मिटाने का प्रयास किया, उनके जाने के बाद लोग फिर उन्हीं बुराईयों की तरफ प्रवृत होने लगे. इसलिए दुनिया में सामाजिक स्तर पर बहुत कम परिवर्तन देखने को मिलते हैं.
हम अगर दुनिया का पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखें तो हमें समझ आता है कि इस काल का इतिहास मानव जीवन में सबसे ज्यादा उथल-पुथल का इतिहास रहा है. इन हजार वर्षों में मानव ने एक और जहाँ भौतिक-तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से काफी उन्नति की, वहीँ दूसरी और कुछ ऐसी परम्पराओं को भी उखाड़ फैंका जो मनुष्य को मनुष्य से दूर करने का कारण बनी हुई थी. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हजार वर्षों में जो कुछ भी हुआ वह सकारात्मक ही हुआ, इस कालखंड में बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ और उसने ऐसा वातावरण मनुष्य के सामने पेश किया कि मानवता की पैरवी करने वाले दांतों तले ऊँगली दबाते ही रह गए. लेकिन यह हुआ किस कारण, उसका एक सटीक सा जबाब है, मनुष्य की नासमझी के कारण. कुछ सत्ता लोलप और अपने अहम् में डूबे लोगों के कारण. जिन्होंने पूरी मानवता को ही विनाश के कगार पर ला खडा कर दिया. अगर हम भारत के ही इतिहास को देखें तो कौन भूला है मुगल आक्रमणकारियों की लूट-पाट को, कौन भूला है सत्ती प्रथा के दर्दनाक मंजर को, कौन भूला है सिक्ख गुरुओं के साथ हुए सलूक को, और कौन भूला है आजादी के दौर में शहीद हुए उन लाखों नौजवान वीर और वीरांगनाओं को. विश्व के इतिहास में भी ऐसे दर्दनाक पहलू भरे पड़े हैं. कुछ हादसे रुढियों के नाम पर हुए हैं, तो कुछ प्रगतिशीलता के नाम पर. लेकिन इन सबके बीच जो चीज सबसे महत्वपूर्ण रही है, वह है मनुष्य की स्वार्थ की प्रवृति और इसी प्रवृति के कारण कुछ लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं, जिनके कारण पूरी मानवता और मानवीय चेतना पर संकट पैदा हुए हैं. ऐसा नहीं है कि आज यह संकट नहीं है, आज भी ऐसे संकटों का माहौल बदस्तूर जारी है और उसके परिणाम बीती सदी में हुई घटनाओं से कहीं ज्यादा गंभीर हैं. लेकिन आज हमारा ध्यान उस तरफ जा कहाँ रहा है? हम एक तरह से गुमराह दौर में जी रहे हैं और अपनी सुविधाओं और स्वार्थों की पूर्ति से आगे हमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है. आज फिर वही दौर और वही घटनाएँ नए अंदाज में घट रही हैं, जो पूर्व काल में घट चुकी हैं. लेकिन किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं है. जो थोड़े बहुत प्रयास ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हुए भी हैं, वह भी आज के दौर में नाकाफी हैं.    
ऐसे में युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. क्योँकि आज तक जिनती भी क्रांतियाँ इस धरा पर हुई हैं उनमें युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. युवा किसी भी देश की अमूल्य धरोहर होते हैं, अगर वह अपने समाज और परिवेश के प्रति सजग रहते हैं तो फिर विश्व की ऐसी कोई ताकत नहीं जो युवाओं को उनके मंतव्यों से पीछे हटा दें. इतिहास में हुई अनेक सफल क्रांतियों का नेतृत्व युवाओं ने किया है. इसलिए आज वैश्विक स्तर पर यह जरुरत महसूस की जा रही है कि युवा अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति सचेत रहें और जो कुछ समाज में विघटन का कारण बन रहा है उसे हटा देने के लिए प्रयास करें. आज जहाँ दुनिया अनेक खेमों-विचारधाराओं में बंट चुकी है, उसके कारण कई तरफ के नकारात्मक भाव मानव के जहन में भरे जा रहे हैं तो ऐसे में हमें दुनिया को वास्तविक रूप से समझने के लिए पुनः प्रयास करने की जरुरत है. हालाँकि आज हम यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं, लेकिन ऐसे दौर में भी ऐसी अनेक बंदिशें मनुष्य से मनुष्य के बीच में पैदा की गयी हैं कि आये दिन विश्व में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहता है जो मानवीय भावों के विपरीत होता है. दुनिया एक और बारूद के ढेर में तब्दील होती जा रही है, और दूसरी ओर हर कोई अपने आप को समृद्ध और शक्तिशाली घोषित करने की फिराक में है. वह विकास की बात कह कर दुनिया को विनाश के रास्ते पर धकेल रहा है. यह कुछ ऐसे पहलू हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं. हमें देश और दुनिया में जो समस्याएं पैदा हुई हैं उनके सतही और कानूनी हल खोजने की बजाय वास्तविक हल खोजने की जरुरत है और उसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हम अपने आप से शुरुआत करें, अपने परिवेश और समाज से शुरुआत करें. जब हम और हमारा समाज बदल जाएगा तो फिर दुनिया अपने आप ही बदल जायेगी. शेष अगले अंक में...!!! 

04 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...1

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‘आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है’. सन 1977 में आई फिल्म ‘अपनापन’ का यह गीत काफी लोकप्रिय गीत रहा है और मनुष्य जीवन के सन्दर्भ में काफी प्रासंगिक है. इस गीत का मुखड़ा मनुष्य जीवन के सफ़र के साथ भी जोड़ा जा सकता है. आदमी इस दुनिया में एक मुसाफिर की तरह जीवन जीता है, जो चंद साल इस धरती पर मनुष्य के रूप में रहता है और फिर इस धरती से रुखसत हो जाता है. वह जाता कहाँ हैं? इस विषय में दुनिया में तमाम तरह के विचार प्रचलित हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि मनुष्य का शरीर यहीं रहता है, लेकिन उस शरीर को चलायमान रखने वाली चेतना उससे कहीं अलग हो जाती है. जैसे ही वह चेतना शरीर से अलग होती है, शरीर निढाल हो जाता है, वह सभी तरह की गतिविधियाँ करना बंद कर देता है. दूसरे शब्दों में हम उसे मृत्यु कहते हैं.
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह शारीरिक रूप से अक्षम होता है और धीरे-धीरे वह धरा पर अपने परिवेश के अनुसार उपलब्ध वस्तुओं का उपभोग करते हुए अपने शरीर की यात्रा को तय करता है. उसके शरीर की यात्रा कितनी है इस विषय में उसे कभी कोई जानकारी नहीं रहती. फिर हम अनुमान लगाते हैं कि एक स्वस्थ मनुष्य औसतन 60 से लेकर 80-90 वर्ष तक जीवन जी लेता है. मनुष्य का यह सफ़र इस धरा पर रोचक सफ़र होता है. वह तरह-तरह की गतिविधियाँ करता है और उनके माध्यम से वह ऐसा प्रयास करता है कि अपने समाज और देश की परम्पराओं-विश्वासों और मान्यताओं का पालन करते हुए अपने जीवन के सफ़र को तय कर सके. हमारा समाज भी ऐसी ही अपेक्षा एक व्यक्ति से करता है कि जो कुछ भी उसने तय किया है, अगर व्यक्ति उसके अनुसार जीवन जीता है तो उस जीवन को सफल और सम्मानजनक माना जाता है, और अगर कोई व्यक्ति समाज के बने-बनाये नियमों को तोड़ने की कोशिश करता है तो समाज उसे हिकारत की नजर से देखता है.
कई बार लगता है कि समाज और मनुष्य को एक सही दिशा देने के लिए यह नियम आवश्यक हैं और ऐसा भी महसूस किया जाता है कि इन नियमों के बिना समाज आगे बढ़ ही नहीं सकता. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. लेकिन यह भी एक प्रश्न है कि दुनिया में मनुष्य किस तरह से जीवन जिए? क्योँकि पूरी दुनिया में हम देखते हैं तो हमें पता चलता है कि दुनिया के हर हिस्से में जीवन को जीने के नियम अलग हैं. हर हिस्से में अपनी मान्यताएं हैं, अपनी परम्पराएं हैं, भाषा है, पहरावा है, खान-पान है, रहन-सहन है, ऐसी तमाम चीजें हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदल जाती हैं. फिर हम इस उलझन में उलझते हैं कि यह श्रेष्ठ है और यह बेकार है. हालाँकि अगर हम गहराई से सोचें तो हमें समझ आएगा कि दुनिया में जो कुछ भी परम्पराओं-रुढियों और विश्वासों के नाम पर प्रचलित है वह सिर्फ उस विशेष समुदाय-जाति-वर्ग या उस स्थान पर रहने वाले लोगों की मान्यता है. अगर कोई उसे नहीं भी मानता है तो उससे कोई ख़ास नुकसान किसी को होने वाला नहीं है. लेकिन हम जिस परिवेश में रहते हैं, उस परिवेश को बेहतर बनाने के प्रयास किये जा सकते हैं. ताकि हर मनुष्य इस धरा पर शान से जीवन को जी सके. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम दुनिया के किसी भी हिस्से पर नजर दौड़ाकर देखें असमानता-शोषण-भेदभाव आदि कुरीतियों के चिन्ह हमें व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं.
अब अगर हम विचार करें कि ऐसा क्योँ है तो हमें इसका कोई सटीक जबाब नहीं मिल पायेगा. दुनिया में इतने धर्म, इतनी जातियां, इतनी भाषाएँ, इतनी परम्पराएँ, इतनी मान्यताएं आखिर क्योँ अस्तित्व में है? इसका कोई जबाब नहीं है. हालाँकि इन सबका होना कोई बुरी बात नहीं है. आज जितना कुछ है इससे अधिक भी अगर इस धरा पर होता तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी, लेकिन थोडा रुककर सोचें तो समझ आता है कि इन सबने मनुष्य को मनुष्य से अलग करने का काम किया है. जब एक प्रांत का मनुष्य दूसरे प्रांत के मनुष्य से घृणा करता है, जब एक भाषा को बोलने वाला दूसरे की भाषा को कमतर आंकता है, जब एक मनुष्य की परम्पराएँ दूसरे के लिए सरदर्द बन जाती हैं, जब एक मनुष्य का पहरावा दूसरे मनुष्य के लिए नफरत का कारण बन जाता है तो हमें फिर इस विविधता पर गम्भीरता से विचार करने की जरुरत है. आखिर क्योँ ऐसा हो रहा है? हमें किसी से नफरत करने का अधिकार किसने दिया है? कौन हमें किसी भाषा और रंग से नफरत करने की सलाह दे रहा है? हमें किसने कह दिया कि मनुष्य जन्म से छोटा और बड़ा है, स्वर्ण और शुद्र है? यह तमाम प्रश्न हैं जो आज के दौर में ही नहीं, बल्कि हजार वर्षों से हमारे बीच में उठ रहे हैं और हम इन प्रश्नों का हल खोजने के लिए किसी हजार वर्ष पुराने सन्दर्भ का सहारा लेकर खुद को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हमें हासिल क्या हो रहा है, इस पहलू पर कोई विचार नहीं कर रहा है.
परम्पराएं और मान्यताएं किसी समाज की पहचान हैं और यह होना भी चाहिए, लेकिन वहीँ तक जहाँ तक कि यह किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान न पहुंचाएं. अगर कोई ऐसी मान्यता या परम्परा किसी दूसरे मनुष्य को नुकसान पहुंचा रही है तो हमें उसे तुरन्त बदल देने की जरुरत है. क्योँकि आखिर हम सब पञ्च भौतिक शरीर में रहकर ही जीवन के सफ़र को तय कर रहे हैं. तो ऐसी अवस्था में कौन छोटा, और कौन बड़ा, कौन गोरा, और कौन काला, कौन ऊँचा और कौन नीचा? जब हम इस तरह से सोचना शुरू करते हैं तो दुनिया में जो भी उलझन भरी हुई है, वह धीरे-धीरे सुलझती हुई नजर आती है. कुछ एक ऐसे पहलू हैं जो हमारे समाज को निरन्तर विकृत किये जा रहे हैं. लकिन हम हैं कि उनके विषय में सोचते ही नहीं हैं. कहीं न कहीं पर हम भी ऐसे पहलूओं को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभा रहे होते हैं. अब जब दुनिया बदल रही है तो क्योँ न हम नए सिरे से सोचें इस दुनिया के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी सभ्यता के बारे में. अगर हम गहराई से सोचेंगे तो हमें बहुत से ऐसे पहलू मिलेंगे जो हमारे लिए सार्थक हैं, और कुछ ऐसे भी मिलेंगे जो हमारे लिए निरर्थक हैं, हमें उनकी पहचान करनी है और उन्हें बदलने का प्रयास करना है. शेष अगले अंक में...!!!              

31 जनवरी 2017

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...4

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गत अंक से आगे....कम्प्यूटर-स्मार्टफोन-इन्टरनेट और विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने आज के दौर में पूरे विश्व के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जहाँ तक सवाल है तो इन साइट्स ने पूरी दुनिया के लोगों को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान किया है. यह मंच किसी व्यक्ति की निजी अभिव्यक्ति से लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए स्थान उपलब्ध करवाते हैं, जिसकी पहुँच पूरे विश्व में है. इस मंच की उपयोगिता इस बात से भी सिद्ध होती है कि इसका प्रयोग व्यक्ति विश्व के किसी भी कोने में बैठकर कर सकते हैं. स्मार्टफोन और इन्टरनेट के संगम ने तो सूचना-तकनीक की पूरी दुनिया को व्यक्ति की मुट्ठी तक सीमित कर दिया है. ऐसे दौर में जब हम अपना हर पल सूचनाओं के बीच में बिताते हैं तो वहां पर हम हमेशा ही सूचनाओं के प्रवाह में अपना विवेक भी खो सकते हैं और किसी अफवाह का शिकार भी हो सकते हैं.
सोशल नेटवर्किंग के जितने भी ठिकाने अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं, उन ठिकानों के माध्यम से सब कुछ संचालित किया जा रहा है. भौतिक दुनिया का कोई भी पहलू ऐसा नहीं है जिसकी अभिव्यक्ति इस आभासी कही जाने वाली दुनिया में न होती हो. यहाँ राजनीति भी है, प्रेम भी है, जाति भी है, धर्म भी है, एक तरह से यहाँ वह सब कुछ है, जिससे हमारा वास्ता है. आज के दौर में तो व्यक्ति की दिनचर्या से लेकर विश्व की हर समस्या और सुविधा का हर पहलू इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति के सामने सूचनाओं और विषयों का अम्बार लगा हुआ है. उसका प्रत्येक क्लिक उसे एक नयी सूचना से अवगत करवा रहा है और व्यक्ति उस सूचना को पाकर खुद के प्रगतिशील होने का भ्रम पाल रहा है. कभी वह उस सूचना पर टिप्पणी कर रहा है तो कभी वह उस सूचना को पसन्द करके आगे बढ़ रहा है. कई बार वह ऐसी सूचनाओं में उलझ भी रहा है, जैसे कोई दुर्घटना आदि और कई बार वह इन सूचनाओं के स्रोत खोजने में अपना वक़्त जाया कर है. सूचनाओं का यह प्रवाह व्यक्ति को एक ऐसी दुनिया में ले जा रहा है, जहाँ से वह चाह कर भी नहीं निकल सकता. उसे इन सबका नशा सा हो गया है. वह अपने आसपास के वातावरण से बेखबर है, लेकिन उसके पास दुनिया भर की जानकारी है. यह भी एक अजीब विरोधाभास है. जिस स्थान पर व्यक्ति रह रहा है वहां शायद वह किसी से बात करने के लिए उत्सक हो लेकिन इस आभासी दुनिया में वह हर किसी से ‘रिश्ता’ कायम करने के विषय में सोचता है.
सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जाल में उलझा व्यक्ति निरन्तर भटक रहा है, उसके पास ठहराव नहीं है. वह अपना बहुमूल्य समय इन साइट्स पर बिताता है और उसे कहीं यह भ्रम भी है कि यही सब कुछ उसकी प्रगतिशील सोच के परिचायक हैं. आजकल तो ऐसा भी देखने को मिल रहा है कि किसी जनूनी का अकाउंट अगर किसी बजह से नहीं चल पाता है तो उसे यह आभास होता है कि उसका सब कुछ लुट गया. सोशल मीडिया ने व्यक्ति को कितना सामाजिक और संवेदनशील बनाया है, यह विषय अलग से अध्ययन की मांग करता है. लेकिन अधिकतर यह ही देखने सुनने को मिलता है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति विश्वास कम किया है. हम किसी साईट पर बने मित्र से बेशक बात करते हैं, लेकिन उससे उतना ही दूर रहने का भी प्रयास करते हैं. हालाँकि कुछ अच्छे रिश्ते भी सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आये हैं, यह माध्यम पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है. हाँ यह बात अलग है कि प्रयोग करने वाला किस मंशा से इसका प्रयोग कर रहा है. सोशल मीडिया में व्यक्ति की उपस्थिति और उसके व्यक्तित्व का प्रभाव प्रयोगकर्त्ता की सोच और समझ पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर इस माध्यम का प्रयोग तलवार की धार पर चलने के समान है. जो सही और सजगता से प्रयोग करता है वह दुनिया में काफी नाम कमाता है, अच्छी पहचान बनाता है, लोग उसकी बातों पर यकीं करते हैं, उसके विचार का समर्थन करते हैं. लेकिन जब कोई इसका प्रयोग मानवीय स्वाभाव के अनुरूप नहीं करता है तो वह यहाँ पर ज्यादा देर टिक नहीं सकता है.
सोशल मीडिया 21वीं शताब्दी की महत्वपूर्ण घटना है. अभिव्यक्ति की आजादी के क्षेत्र में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. हालाँकि इसका कोई आचारशास्त्र नहीं है. जिसके मन में जो आये वह उसे अभिव्यक्त कर सकता है. लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस माध्यम की पहुँच बहुत विस्तृत दायरे में फैली हुई है, हमारी कही हुई बात को कौन सा पाठक किस सन्दर्भ में समझ रहा है इसके विषय में हम अवगत नहीं है. इसलिए इस माध्यम पर हम जो कुछ भी कहें उसे साफ़ और स्पष्ट रूप से कहें, ताकि पाठक के मन में किसी तरह का कोई भ्रम पैदा न हो. आपके द्वारा कही गयी बात उसके लिए सार्थक सिद्ध हो. हम समर्थन और विरोध करते समय भी विवेक का सहारा लें. किसी जानकारी को पढ़ते समय और उसे आगे बढ़ाते समय तथ्य-तर्क और सन्दर्भ को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरुर कोशिश करें. अगर हम ऐसा कर पाने में सफल हो जाते हैं तो यक़ीनन सोशल मीडिया हमारे लिए बेहतर माध्यम है. अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो फिर हमें थोडा सा रूककर विचार करने की जरुरत है.
हमें सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय में जितना कुछ कहने के लिए सतर्क रहने की जरुरत है, उतना ही हमें इस पर प्रकाशित होने वाली सूचनाओं को ग्रहण करने के सन्दर्भ में सजग रहने की आवश्यकता है. सोशल मीडिया एक एक तरफ तो उपयोगकर्त्ता की जानकारियों की वृद्धि में सहायक सिद्ध हो सकता है, वहीँ दूसरी और कोई ऐसी जानकारी भी उसे पढ़ने को मिल सकती है, जिसका कोई बजूद ही न हो. लेकिन ऐसी जानकारी किसी न किसी को प्रभावित कर रही है. इसलिए सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय विवेक से काम लेने की जरुरत है. विवेक की यह जरुरत दोनों स्थितियों में है, जब हम कुछ अभिव्यक्त कर रहे हैं, तब भी और जब हम कुछ पढ़ रहे हैं तब भी. क्योँकि दोनों स्थितियों में जानकारी का प्रभाव किसी न किसी पर पड़ रहा है. इसलिए सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय हमें बहुत सतर्क रहने की जरुरत है. तभी हम अभिव्यक्ति के इस माध्यम का सही मायने में लाभ उठा पायेंगे. 

28 जनवरी 2017

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...3

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गत अंक से आगे....w.w.w. के विकास के साथ ही विभिन्न प्रकार के जाल स्थल भी अस्तित्व में आने लगे. एक तरफ जहाँ विभिन्न देशों की सरकारें और संगठन अपनी गतिविधियों को विभिन्न जाल स्थलों के माध्यम से आम जन तक पहुँचाने का प्रयास करने लगे, वहीँ दूसरी और कुछ ऐसे जाल स्थल भी अस्तित्व में भी आये, जिनके माध्यम से आम व्यक्ति भी अपनी भावनाओं को एक दूसरे के साथ सांझा करने लगे. जिस समय w.w.w. अस्तित्व में आया था उस समय किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि आने वाले वर्षों में किस तरह से यह माध्यम पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लेगा. 20वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में विभिन्न व्यक्तिगत और सामूहिक जाल स्थल अस्तित्व  में आये और इनके माध्यम से पूरी दुनिया के लोग सूचना-क्रान्ति का हिस्सा हो गए. 21वीं सदी का पहला दशक जहाँ अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों की के अस्तित्व और प्रचलन में आने का दशक है, वहीँ इन माध्यमों ने 21वीं सदी के दूसरे दशक में वैकल्पिक मीडिया का रूप धारण कर लिया है.
आज जिन माध्यमों को हम सोशल मीडिया के रूप में अभिहित करते हैं, वह अभी चंद वर्ष पहले ही अस्तित्व में आये हैं. यहाँ हम सोशल मीडिया के सिर्फ चुनिन्दा और प्रचलित जाल स्थलों के विषय में ही बात करेंगे, जिनमें ब्लॉग, फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर प्रमुख हैं. इन्टरनेट पर किसी विषय को लेकर लिखने की शुरुआत 1994 में ऑनलाइन डायरी के रूप में हुई, इसके बाद ब्लॉग अस्तित्व में आया. ब्लॉग के अस्तित्व में आने के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी को एक नया आयाम मिला. अब तक जिस अभिव्यक्ति को हम प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रचारित कर रहे थे, उसे अंतर्जाल पर एक व्यवस्थित स्थान ब्लॉग के रूप में मिला. ब्लॉग के अस्तित्व में आने के साथ ही पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक नयी बहस छिड़ गयी. दुनिया के अनेक पत्रकार, शिक्षक, चिन्तक, बुद्धिजीवी और यहाँ तक कि सामान्य नागरिक भी ब्लॉग के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने लगे. देखते ही देखते अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर छिड़ी इस बहस में दुनिया के तमाम देशों की सरकारों ने भी ध्यान देना शुरू कर दिया. ब्लॉग को अनेक तरह से नियंत्रित करने के प्रयास किये जाने लगे. ब्लॉग की विषय-वस्तु पर निगरानी के लिए कुछ विशेष प्रयास करने की तरफ भी ध्यान दिया जाने लगा. लेकिन जो ऐसा प्रयास कर रहे थे उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हो सकी. ब्लॉग निरंतर विकास करता गया और अभिव्यक्ति की आजादी के क्षेत्र में अपनी एक विशेष पहचान बनाने में कामयाब रहा.
ब्लॉग लिखने के लिए आज भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो मुफ्त में अपनी सेवायें प्रयोक्ताओं को उपलब्ध करवाते हैं. जिनमें ब्लॉगर, वर्डप्रेस, लाइवजर्नल, टम्बलर आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. इन जाल स्थानों पर पर कोई भी व्यक्ति अपना खाता बनाकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकता है. इतना ही नहीं इन माध्यमों पर लिखी गयी बात का दायरा वैश्विक है, इसलिए कोई भी स्थानीय घटना अपनी प्रासंगिकता के हिसाब से वैश्विक रूप ले लेती है. इसे एक तरह से हम सूचनाओं का लोकतंत्रीकरण और घटना का वैश्वीकरण कह सकते हैं. ब्लॉग और वेबसाइट ने अभिव्यक्ति और सूचना के प्रस्तुतीकरण को एक नया रूप प्रदान किया, जिससे पाठक के मन में उसे जानने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहने लगी और इससे कई ऐसे ब्लॉग और ब्लॉगर अस्तित्व में आये जो आज किसी एक स्थानीय सूचना या घटना को सुदूर किसी गाँव से किसी उन्नत शहर में चर्चा का विषय बनाते थे. इसके साथ ही ब्लॉग ने सामयिक घटनाओं के विश्लेषण को भी कई अर्थों में नए आयाम दिए. किसी एक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मसले पर राय के लिए जब हम सिर्फ अखबार और पत्र-पत्रिकाओं पर निर्भर रहते थे, अब ब्लॉग के आने से उन मसलों के वह पहलू भी सामने आने लगे जो आज तक पाठक की नजर में नहीं आ पाते थे. इसलिए ब्लॉग को सही मायने में अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति के नाम से अभिहित किया जा सकता है.
ब्लॉग के साथ ही फेसबुक-यूट्यूब और ट्विटर ने भी अभिव्यक्ति के स्वरुप को बदलने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. आज विश्व में फेसबुक एक तरह से लोगों के जीवन का अहम् हिस्सा बन चुका है. 30 जून 2016 तक विश्व की कुल आबादी में से 22.8% फेसबुक का प्रयोग करते थे. यह संख्या निरन्तर बढ़ रही है. भारत जैसे देश में फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है. भारत में लगभग (195.16 लाख) दो करोड़ लोग फेसबुक पर प्रयोग करते हैं, और अमरीका में फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या (191.03 लाख) है. इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह से दुनिया की अधिकतर जनसंख्या फेसबुक का प्रयोग करने की तरफ बढ़ रही है. हालाँकि यह तथ्य भी गौर करने योग्य है कि अधिकतर युवा लोग ही इन माध्यमों पर सक्रिय हैं और वह भी इन माध्यमों का प्रयोग किसी गम्भीर बहस और विमर्श के बजाय अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए करते हैं. लेकिन फिर भी वह देश और दुनिया की हलचलों से वाकिफ रहते हैं और समय-समय पर अपनी राय जाहिर भी करते रहते हैं. यह भी एक पहलू है कि दुनिया की राजनीति को अब सोशल मीडिया के माध्यम से धार दी जाने लगी है. व्यापार और कारोबार की अधिकतर सफल कहानियों में सोशल मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. हालाँकि इस दिशा में यह माध्यम अभी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है, लेकिन निकट भविष्य में ऐसी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि पूरे विश्ब में विज्ञापन की दुनिया का अधिकतर हिस्सा सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएगा.
फेसबुक और अलावा जिन दो माध्यमों ने लोगों के ध्यान को अपनी और आकर्षित किया है उनमें यूट्यूब और ट्विटर का नाम लिया जा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में यूट्यूब ने वीडियो की दुनिया में अपना एक नया मुकाम पेश किया है. जो लोग आवाज के धनी है और थोड़ी सी तकनीकी जानकारी रखते हैं वह अपनी भावनाओं को वीडियो के माध्यम से लोगों तक बहुत सुगमता से पहुंचा सकते हैं. आज ऐसे कई यूट्यूब चैनल इस माध्यम पर उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से लोगों को अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी के बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाती है. यूट्यूब ने अपने आप को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समानांतर खुद को पेश करने की कोशिश की है, कुछ स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति इस माध्यम से भी अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं और लोग उनके इन प्रयासों को सराह भी रहे हैं. ऐसे में हम यह समझ सकते हैं कि इन्टरनेट के आने से अभिव्यक्ति के क्षेत्र में तमाम बदलाब हुए हैं और हम उन बदलावों के साथ चलते हुए दुनिया को एक नयी राह दिखा रहे हैं. शेष अगले अंक में...!!! 

15 जनवरी 2017

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...2

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गत अंक से आगे...स्मार्टफोन और इन्टरनेट के संगम ने सूचना को विस्तार देने, उसे त्वरित गति से लोगों तक पहुँचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. आंकड़ों के हिसाब से अगर हम पूरी दुनिया में स्मार्टफोन का प्रयोग करने वालों की संख्या पर नजर दौडाएं तो हमें यह बात आसानी से समझ आती है कि पूरी दुनिया में स्मार्टफोन का प्रयोग करने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है. सन 2014 में पूरे विश्व में 21.6 प्रतिशत लोग स्मार्टफोन का प्रयोग करते थे. 2015 में 25.3 प्रतिशत और 2016 में 28.3 प्रतिशत लोग पूरे विश्व में स्मार्टफोन का प्रयोग कर रहे हैं. पूरे विश्व में स्मार्टफोन का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या में प्रतिवर्ष 3 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है. विश्लेषकों का अनुमान है कि सन 2020 तक पूरे विश्व में स्मार्टफोन का प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग 37 प्रतिशत तक पहुँच जायेगी. एक और जहाँ सन 2017 तक विश्व की 4.77 अरब जनसंख्या के पास मोबाइल फ़ोन पहुँचाने की आशाएं लगायी जा रहीं हैं, वहीं यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल विश्व की कुल कुल आबादी में 2.32 अरब आबादी के पास स्मार्टफोन उपलब्ध होगा. सन 2020 तक पूरे विश्व में स्मार्टफोन का प्रयोग करने वालों की संख्या 2.87 अरब होने का अनुमान है. एक और जहाँ मोबाइल और स्मार्टफोन का प्रयोग करने वालों की संख्या में वृद्धि होने का अनुमान है, वहीं दूसरी और पूरी दुनिया की 54.6 प्रतिशत आबादी तक इन्टरनेट भी पहुँच जाएगा.
इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया किस तरह से सूचना-तकनीक के साधनों के साथ जुड़ रही है, और पूरे विश्व में किस तरह से सूचनाओं का प्रसार करने वाले साधनों का बाजार बढ़ रहा है. साथ ही यह पहलू भी ध्यान देने योग्य है कि सूचना-तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने इसे और सस्ता-सरल और उपयोगी बनाने की दिशा में काफी बेहतर काम किया है. पिछली सदी के अन्तिम दशक और इस सदी के लगभग 1.5 दशक ने सूचना-तकनीक के साधनों ने जिस तरह से विकास किया है वह अपने आप में उल्लेखनीय है. इतना ही नहीं इन साधनों ने आम व्यक्ति के बीच में एपीआई एक पैठ कायम की है. व्यक्ति को इन साधनों के बगैर जीवन नीरस सा लगने लगा है. इन्टरनेट और मोबाइल फ़ोन की जुगलबंदी ने सूचना क्रान्ति के पूरे परिदृश्य को बदल कर रख दिया है. इन्टरनेट के आने से मोबाइल फ़ोन की उपयोगिता में कई गुना वृद्धि हुई है, लेकिन यह सिर्फ फ़ोन के हार्डवेयर के कारण ही सम्भव नहीं हुआ है, बल्कि यह सब सम्भव हुआ है स्मार्टफोन में प्रयोग होने वाले विभिन्न एप्लीकेशन्स के कारण. आगे बढ़ने से पहले हम इनकी भी हलकी सी चर्चा कर लेते हैं.           
हम इस बात पर चर्चा कर चुके हैं कि इन्टरनेट ने स्मार्टफोन की उपयोगिता को कई गुना बढ़ा दिया है. अब वह सिर्फ सम्पर्क का ही साधन नहीं है, बल्कि अब वह हर उस पहलू में हमारी मदद करता है जिसकी हमें तत्काल आवश्यकता होती है. हमें इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि स्मार्टफोन के आने से मोबाइल एप्लीकेशन ने किस तरह से सूचनाओं के प्रस्तुतीकरण को बदल दिया है. स्मार्टफोन के आने से मोबाइल एप्लीकेशन्स में भी बेहताशा वृद्धि हुई है. अब हर एक विषय को लेकर मोबाइल एप्प बन रहे हैं. दुनिया में होने वाला कोई भी कार्य ऐसा ऐसा नहीं जिसे मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से न किया जा रहा हो. चाहे आपको हवाई जहाज की टिकट लेनी हो या फिर आपको अपने घर का कोई सामान मंगवाना हो यह सब कुछ आपको अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ही मिलो जाएगा वह भी अनेक विकल्पों के साथ, यहाँ न तो आपको घर से बाहर निकलने की जरुरत है और न ही कोई मोल भाव बस आपको अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव करना है, इसलिए आये दिन मोबाइल एप्लीकेशन को बेहतर बनाने की दिशा में कई सारे काम किये जा रहे हैं. वर्तमान में गूगल प्ले स्टोर पर लगभग 22 लाख मोबाइल एप्लीकेशन मौजूद हैं. इसी तरह एप्पल एप्प स्टोर पर भी लगभग 20 लाख मोबाइल एप्प मौजूद हैं. इस तरह अगर हम अभी तक प्रयोग हो रहे मोबाइल एप्लीकेशन का आंकड़ा निकालने की कोशिश करें तो यह बात सामने आती है कि इस समय विभिन्न प्लेटफोर्मों पर लगभग 57 लाख मोबाइल एप्लीकेशन मौजूद हैं और इनकी संख्या में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है. कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि स्मार्टफोन-इन्टरनेट और मोबाइल एप्लीकेशन के संगम ने सूचना और अभिव्यक्ति की दुनिया को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है.
इस लेख के शीर्षक और अभी तक जो कुछ कहा गया उसमें आपको शायद कोई तारतम्य नजर नहीं आ रहा हो, लेकिन मेरा प्रयास सिर्फ इस पहलू को समझाने का रहा है कि सिर्फ सोशल मीडिया का प्रयोग करने वालों की ही संख्या में दिन प्रतिदिन की वृद्धि नहीं हो रही है, बल्कि सोशल मीडिया से जुड़े महत्वपूर्ण उपकरणों के विकास की गति भी बड़ी तेज से वृद्धि हो रही है. हमें इस पहलू को कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि यह सब कुछ जो भी हो रहा है इसका अपना एक अर्थशास्त्र भी है, लेकिन उस पहलू पर किसी और तरह से विचार किया जा सकता है, यहाँ सिर्फ इन्टरनेट और उससे जुड़े कुछ खास पहलूओं पर ध्यान देने का प्रयास किया जा रहा है. इस लेख के माध्यम से मेरी कोशिश इस पहलू पर प्रकाश डालने की है कि किस तरह से सूचना तकनीक के विकास ने व्यक्ति और उसकी अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है. वर्तमान दौर में पूरे विश्व में सोशल मीडिया के जिन प्लेटफोर्मों ने अभिव्यक्ति की आजादी को ने दिशा देने का प्रयास किया है उनमें वेबसाइट-ब्लॉग-फेसबुक-ट्विटर जैसे माध्यमों का नाम बड़ी शान से लिया जाता है. दूसरे शब्दों में इन्हीं माध्यमों के माध्यम से जो कुछ भी अभिव्यक्त किया जा रहा है उसे हम ‘अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति’ के नाम से अभिहित कर रहे हैं. अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस तरह से इन्टरनेट-स्मार्टफोन और विभिन्न जाल स्थल किस तरह से व्यक्ति की अभिव्यक्ति को बदल रहे हैं और वह समाज को किस तरह की दिशा दे रहे हैं. शेष अगले अंक में....!!!

01 जनवरी 2017

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...1

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पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल हमारी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गया है. अंतर्जाल पर उपलब्ध कुछ माध्यम हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल हो गए हैं. मेलब्लॉगफेसबुकट्विटरव्हाट्स एप्पइन्स्टाग्राम जैसे ठिकानों ने हमारी दैनिक जीवन की गतिविधियों और क्रियाकलापों को काफी हद तक प्रभावित किया है. इनके अलावा अनेक ऐसी वेबसाइट्स और मोबाइल एप्लीकेशन्स हैं जिनका प्रयोग हम अपनी जरूरतों के अनुसार करते हैं. भारत में जब से इन्टरनेट की शुरुआत (15 अगस्त 1995) हुई हैतब से लेकर आज तक भारत में इन्टरनेट का निरन्तर विस्तार होता चला गया है. सन 1992 में जब वर्ल्ड वाइड वेव (www) अस्तित्व में आया तब भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या शून्य  थी. 1995 में जब भारत में इन्टरनेट की शुरुआत हुई उस समय भारत प्रति सौ व्यक्तियों में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या 0.026 थी,सन 2000 में यह संख्या 0.528 हो गयी. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि सन 2000 में भारत की कुल आबादी का मात्र 0.5% प्रतिशत आबादी ही इन्टरनेट के सम्पर्क में आई थी. सन 2005 में भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल जनसंख्या का 2.4% थी. 2010 में भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों का प्रतिशत 7.5 था और 2015 में यह 27% प्रतिशत तक पहुँच गया. भारत में 2016 की स्थिति देखें तो कुल जनसंख्या का 34.8% इन्टरनेट का प्रयोग करता है. इन आंकड़ों पर अगर हम गौर करें तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारत में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या में सन 2010 के बाद एकदम से उछाल आ गया है. इसके कई सारे कारणों में से मोबाइल पर इन्टरनेट की उपलब्धता को सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है. आज भारत में प्रति 100 व्यक्तियों में से 26 व्यक्ति इन्टरनेट का प्रयोग कर रहे हैं.
आम जनता का इन्टरनेट से जुड़ना सूचना-तकनीक की क्रान्ति की सार्थकता का सूचक है. सूचना क्रान्ति के इस दौर में पूरे विश्व का भूगोल बदल सा गया है. सूचना और सूचना की तकनीक ने वैश्विक रूप ले लिया है. इस कारण आम व्यक्ति का झुकाव भी इस माध्यम की तरफ सबसे ज्यादा है. सन 1995 में जहाँ पूरे विश्व की 1% आबादी इन्टरनेट के साथ जुडी थी,वहीँ सन 2016 के आते-आते पूरे विश्व की लगभग 40% आबादी इन्टरनेट से जुड़ चुकी है. देशों के हिसाब से अगर पूरे विश्व में इन्टरनेट प्रयोगकर्ताओं का आकलन करें तो हमें यह आंकड़े मिलते हैं कि Iceland की 100% आबादी इन्टरनेट का प्रयोग करती है. विश्व के छोटे-छोटे देश जिनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल बहुत कम है वह इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों में सबसे आगे हैं. सबसे अधिक आबादी वाले देशों के हिसाब से अगर देखा जाए तो चीन की आबादी विश्व में सबसे ज्यादा है और वहां की 52.2% जनसंख्या इन्टरनेट का प्रयोग करती है. आबादी के हिसाब से भारत विश्व में दूसरे स्थान पर आता है और यहाँ की कुल आबादी में से 34.8% जनता इन्टरनेट का प्रयोग करती है. सबसे आधुनिक और तकनीक के मामले में श्रेष्ठ माने जाने वाले देश अमरीका की 88.5% आबादी इन्टरनेट का प्रयोग करती है. इसके साथ ही यू. के. में इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या 92.6% है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इन्टरनेट पूरे विश्व में प्रचलन में है और इसने पूरी दुनिया के भूगोल को बदल कर रख दिया है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है इसका तकनीकी रूप से विकास हो रहा हैतथा यह आम जनता की पहुँच में आसानी से पहुँच रहा है. इन्टरनेट के माध्यम से ही हमें अनेक ऐसे तमाम साधन (जैसे वेबसाइटपोर्टलसोशल नेटवर्किंग साइट्समोबाइल एप्लीकेशन्स) उपलब्ध हुए हैंजिन्होंने पूरे विश्व को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया है.
इन्टरनेट की बढ़ती उपयोगिता और सोशल सोशल नेटवर्किंग के इस दौर में व्यक्ति जी जिन्दगी में कई तरह के परिवर्तन आये हैं. आज एक सामान्य से इनसान के हाथ में भी स्मार्टफोन है और वह उसी के माध्यम से पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है. अब तो स्थिति यह है कि संवाद-विवाद-समर्थन-विरोध जैसे कम भी वह इन्टरनेट के माध्यम से करने लगा है. आम इनसान के हाथ में स्मार्टफोन का होनासिर्फ सम्पर्क स्थापित करने के साधन तक ही सीमित नहीं हैबल्कि स्मार्टफोन के रूप में उपलब्ध यह छोटी सी डिवाइस उसके सम्पूर्ण क्रियाकलापों का एक जीवन्त दस्तावेज है. इसके माध्यम से वह अपने जीवन के अनेक महत्वपूर्ण कार्यों को अन्जाम देता है. स्मार्टफोन में इन्टरनेट की उपलब्धता उसकी कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा देती है. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि इन्टरनेट स्मार्टफोन में आत्मा की तरह कार्य करता है. स्मार्टफोन अगर इन्टरनेट के साथ जुड़ा हुआ है तो वह एक तरह से व्यक्ति का जीवन्त साथी हो जाता है और इसके माध्यम से व्यक्ति उस हर कार्य को अन्जाम दे सकता है जो उसकी तात्कालिक जरुरत हो. इस तरह से हम यह समझ सकते हैं कि वर्तमान दौर में इन्टरनेट और इससे जुड़े हुए अनेक साधन व्यक्ति के जीवन का अहम् हिस्सा हैं और व्यक्ति जितना इन साधनों के साथ जुड़ता चला जाता है उतना ही उसका जीवन सुगम होता चला जाता है. शेष अगले अंक में...!!!