10 फ़रवरी 2014

प्रेम का बाजार भाव...1

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प्रेम एक ऐसा शब्द जो हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है, एक ऐसा भाव जिसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, और एक ऐसा जूनून जो हमें जीवन के मायने सिखाता है. प्रेम मनुष्य ही नहीं बल्कि हर प्राणी के जीवन का आधार है. दुनिया में जो कुछ भी हमारी समझ में आज तक आया है, वहां प्रेम की अभिव्यक्ति अवश्य होती है. मनुष्य ही नहीं बल्कि जितने भी जीव हैं वह प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं, और उसके माध्यम से वह अपने जीवन को दिशा देते हैं. इसलिए इस धरा पर समाज और व्यक्ति को जोड़ने की जो कड़ी है वह प्रेम ही है. प्रेम व्यक्ति को सामाजिक बनाता है, दूसरों के हितों के प्रति सोचने के लिए प्रेरित करता है और जहाँ पर हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई कार्य करते हैं तो वहां हम दुनिया से अलग हो जाते हैं, हमारा नजरिया बदल जाता है. प्रेम की शक्ति अद्भुत है और इसी कारण इसका वर्णन कई तरह से किया गया है और इसकी महता भी कई तरह से बताई गयी है. हर व्यक्ति के लिए प्रेम के मायने अलग हैं, लेकिन वास्तविक प्रेम तो वही है जहाँ हम अपने आप को मिटाकर सिर्फ और सिर्फ दूसरों के हित का चिन्तन करते हैं और बदले में किसी प्रकार की कोई आशा नहीं करते हैं. इसे सच्चे प्रेम की निशानी तो नहीं बल्कि प्रेम की चरम सीमा कह सकते हैं, प्रेम का शुद्धतम और उच्च स्वरूप कह सकते हैं. क्योँकि जहाँ प्रेम है वहां सच और झूठ जैसे शब्द नहीं होते. जिसने प्रेम किया बस किया, वहां सच-झूठ का कोई प्रश्न नहीं. प्रेम है तो बस प्रेम और नहीं है तो सिर्फ औपचारिक्ताएं.

एक दृष्टि से अगर देखा जाए तो इस दुनिया में प्रेम के बिना कुछ भी नहीं है. सब कुछ होते हुए भी अगर प्रेम रूपी भाव जीवन में नहीं है तो वहां जीवन का आनंद नहीं है, भौतिक सुख सुविधाएं हमारे जीवन संघर्ष को कम अवश्य कर सकती हैं, लेकिन वह हमें प्रेम जैसा भाव नहीं दे सकती. हम जितनी भी भौतिक उन्नति कर लें और बेशक हम अपनी उन उपलब्धियों पर गर्वित हों, लेकिन जीवन की उन सफलताओं में भी प्रेम की महता बहुत महत्वपूर्ण है. उसके बिना जीवन का हर पक्ष अधूरा है, और जिस व्यक्ति के जीवन में प्रेम नहीं है, जो निकृष्ट है वह किसी भी स्थिति में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है. क्योँकि उसमें जीवन का वह आधार भाव ही नहीं है जो उसे पूरी सृष्टि के प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाता है, और जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता नहीं वह जी कर भी क्या करेगा? जीवन के अगर वास्तविक मायने हैं तो वह प्रेम के कारण ही हैं, संवेदनशीलता के कारण ही हैं. क्योँकि संवेदनशीलता जब तक व्यक्ति के जहाँ में तब तक वह दूसरों के हित को सर्वोपरि रखते हुए अपने जीवन की दिशा का निर्धारण करता है और अंततः अपने जीवन के साथ-साथ दूसरे प्राणियों को जीवन जीने में सहायता करता है.

प्रेम के अनेक पक्ष हैं, एक बालक जब धरा पर जन्म लेता है तो उसके जीवन की शुरुआत प्रेम से ही होती है.
सबसे पहले उसे उसके माता-पिता का प्रेम मिलता है और वहीँ से उसके जीवन का सफ़र शुरू होता है. जीवन की जितनी भी स्थितियां और पड़ाव आते हैं वहां उसे प्रेम की आवशयकता पड़ती रहती है. कहीं पर भाई-बहनों का प्यार, कहीं दोस्तों का प्यार, कहीं समाज के लोगों का प्यार उसे जीवन के हर मोड़ पर प्रेरित करता है और एक व्यक्ति जीवन सफ़र को तय करते हुए आगे बढ़ता जाता है, उपलब्धियां अर्जित करता जाता है और अंततः उसे यह आभास होता है कि प्रेम ही सब कुछ है और प्रेम के बिना जीवन के कोई मायने नहीं. क्योँकि समाज में ऐसी भी स्थिति देखी गयी है कि व्यक्ति के पास भौतिक सुख सुविधायें होते हुए भी प्रेम के आभाव में उसे जीवन की सार्थकता कहीं नजर नहीं आती, इसलिए कई बार व्यक्ति अवसाद ग्रस्त हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाने से भी नहीं हिचकता. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि प्रेम जीवन का आधार है उसके बिना जीवन की कल्पना करना बेमानी सा लगता है. जितनी भी संस्कृतियों ने आज तक जन्म लिया है उनके मूल में भी प्रेम की भावना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिन्हें हम दुनिया की उच्च संस्कृतियाँ कहते हैं उन्होंने भी मनुष्यता के प्रति प्रेम के बीज बोने का काम किया है, इसलिए उनकी महता भी किसी से कम नहीं है. मनुष्य किसी भी समाज का हिस्सा हो लेकिन प्रेम की आवश्यकता उसे हर मोड़ पर पड़ती है. इसलिए प्रेम को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया है.

प्रेम के विषय में जितना भी वर्णन किया जाय कम है, क्योँकि यह अनुभूति का विषय है. हम इसे किसी भी तर्क से सिद्ध करने की कोशिश भी करें तो इसकी थाह लेना आसान नहीं. हम ऐसा कभी भी सिद्ध नहीं कर सकते कि कोई किसी से कितना प्रेम करता है, करता भी है या नहीं. अगर वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम में करने जैसा कुछ भी नहीं है, यहाँ सब कुछ होने जैसा है, व्यक्ति के वश में कुछ नहीं है. सब कुछ अपने आप होने वाला है, बस व्यक्ति को खुद को समर्पित रखना होता है और अपने भावों को सही दिशा देने का प्रयास करना होता है. अगर व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तो उसे इस तरफ जोर लगाने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. प्रेम में तो सब कुछ सहज में घटित होता है. क्योँकि यह विशुद्ध रूप से अनुभूति का विषय है. हर किसी व्यक्ति के जीवन में प्रेम का अपना अनुभव होता है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. लेकिन जो प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर प्रेम करते हैं, प्रेम का वास्तविक आनंद तो वही ले पाते हैं. क्योँकि जहाँ हम अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करके प्रेम करने की कोशिश करते हैं वहां हम सामने वाले को तो धोखा दे सकते हैं, लेकिन प्रेम का जो वास्तविक आनंद है उसे प्राप्त नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में हमें अपने मन को एक बार नहीं हजार बार टटोलने की आवश्यकता होती है. लेकिन जो सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वह विरले ही होते हैं.   शेष अले अंक में......!!!               

07 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...2

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यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है वह तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है, चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. गतांक से आगे....!!!!  

भाषा सीखना और उसे प्रयोग करना यह दोनों अलग-अलग बातें हैं. जरुरी नहीं कि हम कोई भाषा सीखें और उसका प्रयोग करें, क्योँकि संवाद का सीधा सा नियम है कि जब हम किसी से किसी भी भाषा में बात करें तो सामने वाले को भी वह भाव समझ आना चाहिए, भाव को समझने के लिए भाषा की जानकारी जरुरी है, और भाषा की जानकारी के लिए शब्दों की समझ होनी जरुरी है, शब्द को समझने के लिए उसके अर्थ के विषय में जानकरी होनी चाहिए. यह नियम वाचक और श्रोता दोनों के लिए लागू होता है. तब कहीं हम कह सकते हैं कि एक सार्थक संवाद हुआ, वर्ना अगर हम समझ में न आने वाली भाषा में अपनी भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्त करते रहें तो वैसी भाषा की कोई सार्थकता नहीं है. भाषा तो वही सार्थक है जो आम जन की समझ में आ जाये और इसके साथ-साथ विचार भी वही सार्थक है जो अपने हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्त किया गया हो, या ऐसा भी कह सकते हैं जिसमें व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि का भाव निहीत हो. वर्ना भाषा का एक पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि हम आम जन की समझ में आने वाली भाषा में बहुत निकृष्ट और दोयम दर्जे के विचार अभिव्यक्त करें तो भी भाषा की कोई सार्थकता नहीं होगी. 

एक दृष्टि से अगर हम देखें तो ऐसा भी कह सकते हैं कि व्यक्ति का व्यवहार भाषा का आधार है, और इसी बात का
दूसरा पक्ष ऐसा भी हो सकता है कि भाषा व्यक्ति के व्यवहार की परिचायक है. मैं दूसरे पक्ष से ज्यादा इतेफाक रखता हूँ. क्योँकि भाषा पर व्यक्ति के व्यवहार का किसी हद तक कोई फर्क नहीं पड़ता, हां एक स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भाषा को प्रभावित कर सकता है, जहाँ पर सामूहिक रूप से शब्दों का प्रयोग उनके वास्तविक सन्दर्भों की अपेक्षा किन्हीं अन्य सन्दर्भों के लिए किया जाय. लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों में घटित होती है और निश्चित रूप से इसका प्रभाव भाषा पर पड़ता है. एक दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि जब कोई सामाजिक रूप से प्रसिद्ध व्यक्ति किसी विशेष ‘शब्द’ का प्रयोग उसके विशेष अर्थ के सन्दर्भ में न करके किसी और सन्दर्भ में करता है तो भी व्यक्ति का उस शब्द के प्रति किये गए व्यव्हार का प्रभाव भाषा पर पड़ता है. लेकिन यह सब कुछ छुट-पुट रूप से घटित होता है, और ऐसी स्थिति भी वर्षों में एक-आध बार आती है और किसी विशेष शब्द आदि के लिए. वर्ना भाषा के विषय में तो कहा जाता है कि यह बहता नीर है इसलिए इसे हम किसी ख़ास सांचे में बाँध कर नहीं रख सकते, और यह भाषा के विकास की दृष्टि से संभव भी नहीं है. जो भाषा जितनी समृद्ध होती है उसमें अनेक भाषाओँ के शब्दों को समेटने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है. इसी तरह जो व्यक्ति भाषा के व्यवहार के प्रति सजग होता है वह भी अपने प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा के लिए उतना ही लचीला रवैया अपनाता है और भाषा को अपने व्यवहार और व्यक्तित्व का अंग मानते हुए उसके विकास में सहायक बनता है.  

अगर हम यह मानकर चलते हैं कि किसी भाषा के प्रयोग करने वालों के कारण उस भाषा का स्वरूप निर्धारित होता है तो हमें इस बात की भी समझ होनी चाहिए कि उन्हीं प्रयोग करने वालों पर ही भाषा का सारा कार्य-व्यापार निर्भर करता है.  ऐसी स्थिति में हम यह भी कह सकते हैं भाषा ही व्यक्तित्व है और व्यक्तित्व ही भाषा. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भाषा और लिपि कोई एक हो सकती है, लेकिन जब हम उसके प्रयोक्ता पर ध्यान देते हैं तो हमें भाषा के अलग–अलग रुप नजर आते हैं. जब हम किसी अध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं और उससे संवाद करते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, किसी राजनितिक व्यक्ति से मुलाकात में हमारी शब्द और हाव-भाव अलग होते हैं. किसी सामाजिक समारोह में जब हम मिलते हैं तो हमारे शब्द अलग होते हैं, इसी तरह से हम किसी अपराधी के लिए अलग शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, संत के अलग, साहित्य से जुड़े व्यक्ति के लिए, समाज सेवक के लिए अलग. इस तरह से जितने प्रकार के व्यक्तित्व हमारे सामने से गुजरते हैं उनके लिए हम वैसे ही शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि भाषा का व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है. जब हम व्यक्तित्व के अनुकूल शब्दों का प्रयोग करते हैं तो भाषा की खूबसूरती और भी बढ़ जाती हैं, शब्द भाषा को एक नया आयाम देते हैं और जो व्यक्ति-व्यक्तित्व के अनुकूल भाषा का प्रयोग करने में सक्षम होता है, वह सबसे ज्यादा प्रिय भी होता है और दूसरी तरफ अपने व्यक्तित्व के अनुसार शब्दों का प्रयोग जो भी व्यक्ति करता है वह उसके व्यक्तित्व को और अधिक प्रिय बनाता है. शब्दों के प्रयोग के प्रति अगर हम सजग हैं तो हमारे सामाजिक सम्बन्ध कभी भी नहीं बिगड़ सकते, सामाजिक ही नहीं किसी भी प्रकार के सम्बन्धों को बनाये रखने का मुख्य आधार शब्द ही हैं. हमारा व्यक्तित्व, हमरा व्यवहार सब कुछ शब्दों के माध्यम से निर्धारित होता है और यह जीवन की एक महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि आधारभूत कड़ी है. 

आज की परिस्थितियों पर अगर हम दृष्टिपात करते हैं तो यह बात हम समझ सकते हैं कि आज शब्दों के प्रति हम लापरवाह हो गए हैं. हालाँकि सूचना तकनीक के आने से व्यक्ति के संवाद की संभावनाओं में अकल्पनीय उन्नति हुई है. लेकिन जितनी यह उन्नति हुई है उतना ही हमारा शब्दों के प्रति नजरिया बदला है. आज का दौर सोशल नेटवर्किंग का दौर है. ऐसी स्थिति में हमें अपनी भाषा और शब्दों के प्रति सजगता को अपनाने की ज्यादा आवश्यकता है. लेकिन कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि उन्हें कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं इसलिए वह किसी भी प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं, लेकिन अगर वह दूसरे दृष्टिकोण से देखते तो यह भी सोच सकते थे कि इन शब्दों के माध्यम से ही उनके व्यक्तित्व का परिक्षण होगा तो निश्चित रूप से वह कभी भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते, कम से कम गाली जैसे शब्दों का तो नहीं. किसी भी विषय के लिए हमें अपने विरोध और असहमति को प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन उस असहमति को हम अगर भद्दे शब्दों के माध्यम से जताएंगे तो संभवतः कोई लाभ होने वाला नहीं है और दूसरी तरफ हमारा व्यक्तित्व भी धूमिल हो रहा है. यह वही शब्द हैं जिनके माध्यम से हम प्रभावशाली और प्रभावहीन दोनों बन सकते हैं.    

04 फ़रवरी 2014

भाषा और व्यक्तित्व...1

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अपने आस-पास ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में नजर दौड़ाकर देखता हूँ तो सम्पूर्ण क्रियाएं मुझे शब्दों की ही अभिव्यक्ति लगती हैं. लेकिन इससे और आगे बढ़ते हुए देखता हूँ तो सब कुछ मुझे ‘शब्द’ ही नजर आता है. कहीं गहरे में उतरकर देखता हूँ तो मुझे वह अवधारणा साकार होती हुई नजर आती है कि ‘शब्द ही ब्रह्म है’. जिस तरह से ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह प्रकृति के विभिन्न रूपों के माध्यम से अपने बजूद का अहसास करवाता है, उसी प्रकार शब्द भी सम्पूर्ण सृष्टि में समाया हुआ है और वह भी विभिन्न क्रियाओं के घटित होने पर अपने बजूद का अहसास करवाता है. इससे यह बात जाहिर होती है कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति भी शब्द के माध्यम से होती है. शब्द बेशक अक्षरों से बने होते हैं, अक्षर के मूल में ध्वनि निहीत रहती है. किसी हद तक भाषा, ध्वनि, अक्षर और उसके स्वरूप के विषय में विचार करना व्याकरणिक और भाषा वैज्ञानिक चिन्तन का हिस्सा है. लेकिन यह पक्ष किसी हद तक भाषा के बाह्य स्वरूप से सम्बन्ध रखते हैं. भाषा का मुख्य कार्य तो भावनाओं की अभिव्यक्ति करना है, विचारों को किसी दूसरे तक संप्रेषित करना है और यह भाषा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है. इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि भाषा का जन्म ही इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है. जहाँ तक व्याकरण और भाषा विज्ञान का सम्बन्ध है, यह भाषा को व्यवस्थित करने और उसके प्रयोग के कुछ नियमों का पालन करना हमें सिखाते हैं, और जहाँ तक साहित्य का सम्बन्ध है, यह भाषा को स्थाई और मानक रूप देने के साथ-साथ भाषा की समृद्धि, उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि के साथ-साथ आम जन में उसके प्रयोग के लिए सहायक होता है. साहित्य भाषा के विकास के विभिन्न पड़ावों की जानकारी के साथ-साथ किसी विशेष काल में चिन्तन और मनन के विषयों की जानकारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में भी सहायक है. 

भाषा का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ साहित्य की रचना में ही योगदान देना नहीं है, या साहित्य का मुख्य उद्देश्य भी भाषा को सुरक्षित करना नहीं है. साहित्य और भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ समाज और संस्कृति से भी गहरे से जुडा हुआ है. हालाँकि जब हम भाषा और साहित्य के सम्बन्धों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि इन दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. लेकिन किसी और दृष्टि से विचार करें तो ऐसा लगता है कि यह दोनों अपना अलग-अलग मकसद और अलग बजूद भी रखते हैं और इन दोनों की पूर्ति अनेक माध्यमों से होती भी रहती है. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, वह सब चीजों का मूल आधार है. भाषा के बिना हम किसी भी चीज की कल्पना नहीं कर सकते. मनुष्य के आज तक के सब प्रकार के विकास में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, और मनुष्य के आज तक के अविष्कारों में भाषा सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार है. अगर भाषा नहीं होती तो दुनिया का स्वरूप कैसा होता? मनुष्य ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगत का स्वरूप और हाल कैसा होता? यह सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. हमारे लिए भाषा कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा हम कभी नहीं लगा सकते. लेकिन जब हम कहीं किसी विकट स्थिति का सामना करते हैं और वहां पर हम सब कुछ होते हुए भी भाषा हीन हो जाते हैं तो तब हमें पता चलता है कि जीवन में भाषा के मायने क्या हैं? भाषा हमारे जीवन के विकास और उसके विभिन्न आयामों का एक अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हम कभी भी भाषा की अनदेखी नहीं कर सकते, और हम हमेशा उसे अपनाए हुए अपने विकास क्रम को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं. 

मानव सदियों से अपने भावों, विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा का सहारा लेता आया है और आज तक वह उसी डगर पर चलते हुए अपने जीवन को चला रहा है. भाषा की महता सम्पूर्ण जगत के लिए आज से पहले, आज और आज के बाद भी बनी रहेगी. इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि जब तक इस जगत में जीव के जीवन और क्रिया के चिन्ह रहेंगे तब तक वह अपने आप को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश करता रहेगा और यह उसके लिए जरुरी भी है. क्योँकि अभिव्यक्ति के बिना उसकी कोई क्रिया संपन्न नहीं होती, और बिना क्रिया के उसका जीवन नहीं चलता. उसके जीवन को चलाने में जितनी महता क्रिया की है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भाषा है. आज जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं यह हमारे विकास के विभिन्न पडावों से अर्जित अनुभव और उपलब्धियों की व्यवस्था है. निश्चित रूप से इसमें भाषा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. भाषा के बिना हम अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि आज इस धरा पर मनुष्य के अनुभव कैसे रहे हैं और उन अनुभवों का क्या कुछ अभी तक निष्कर्ष निकल पाया है. मनुष्य और भाषा के सन्दर्भ में अगर विचार करें तो हम पाते हैं कि बिना भाषा के मनुष्य की कोई महता नहीं और उसके बजूद का कोई अता-पता नहीं. इसलिए जब भी हम इतिहास को देखने, समझने की कोशिश करते हैं तो यह सब क्रियाएं सिर्फ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती हैं. 

भाषा के अध्ययन और उसकी उपयोगिता के अनेक पक्ष हो सकते हैं. लेकिन भाषा का मुख्य कार्य व्यापार विचारों और भावनाओं का सम्प्रेष्ण है. इसका सीधा सा सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार से है. व्यक्ति अपने आप अभिव्यक्त नहीं होता, बल्कि वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है. उसकी भावनाएं, उसके विचार, उसकी सोच सब कुछ इन शब्दों के माध्यम से अभियक्ति पाता है. इसलिए कोई नवजात जब इस धरा पर जन्म लेता है तो सबसे पहले वह अभिव्यक्ति करना ही सीखता है. अपने भावों और अपनी जरूरतों को वह भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है. यह भी कितना अद्भुत है कि जिस माहौल और जिस भाषा के लोगों के बीच कोई नवजात जन्म लेता है तो वह वही भाषा बोलता है, और उसी के अनुरूप अपनी अभिव्यक्ति करता है. उस भाषा को हम उसकी मातृ भाषा कहते हैं और यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहता है चाहे वह किसी भी भाषा का प्रयोग करे. शेष अगले अंकों में ....!!!!