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11 फ़रवरी 2016

प्रेम का गणित 1+1=1...1

6 टिप्‍पणियां:
एक दिन मैं अपने मित्र से बात कर रहा था. बातों-बातों में बात प्रेम के विषय तक आ पहुंची. बात-बात में मैंने महसूस किया कि वह अपने प्रेम को लेकर संशय की स्थिति में है. वह अपने प्रेम के अनुभवों और भविष्य की स्थितियों को लेकर बहुत असमंजस में था. उसे लग रहा था कि कहीं वह उसे खो न देजिसे उसने बड़ी शिद्दत से पाया है. उसके मन में कई तरह के प्रश्न थे. मैंने उसे सलाह दी कि प्रेम के गणित में 1 और 1 का जबाब 1 ही होता है. मेरी बात सुनकर वह हंसा और मेरा मजाक बनाते हुए वहां से चल दिया. उसे लगा शायद मैं उसकी इस हरकत पर बुरा मान जाऊंगा या फिर अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करूँगा. उसके हाव-भाव से यह भी लग रहा था कि मैं किसी दिन अपने इस तर्क से पीछे हट जाऊंगा और उसे यह कह दूंगा कि मैं तो मजाक कर रहा था.
गणित के नियम के अनुसार जब हम 1+1 करते हैं तो स्वाभाविक सी बात है कि उसका उत्तर 2 होता है. यह बात तो एक सामान्य सी बुद्धि का व्यक्ति भी समझ सकता है. लेकिन जब भी वह मुझसे प्रेम के विषय में पूछता तो मैं अन्त में उसे यह जरुर कहता कि जीवन में स्थिति चाहे जैसी भी होलोग चाहे जैसे भी होंवह कुछ भी कर लेंलेकिन उन्हें प्रेम की कमी महसूस होती ही है. जीवन में प्रेम का कोई विकल्प नहीं है. ‘प्रेम’ जीवन का वह अहसास है जिसका होना ही जीवन के मायने बदल देता है. मेरी इस बात पर उसकी प्रतिक्रिया उसके मन की स्थिति  के हिसाब से होतीजब वह खुश होता तो वह वाह-वाह करतालेकिन अगर थोड़ी सी भी कहीं कोई किन्तु-परन्तु हो तो वह सिरे से नकार देता कि जीवन में प्यार-व्यार कुछ नहीं होता. सब अपने मतलब से किसी से जुड़ते हैंउनका अपना कोई ख़ास मकसद होता है. जब उनका मकसद पूरा हो जाता है तो वह किसी को किनारे करके किसी और मंजिल का रुख कर लेते हैंऐसे में एक संवेदनशील व्यक्ति अपने जीवन और मौत के बीच जूझता रहता है. ऐसी कई बातें थी जो वह मुझसे किया करता था. लेकिन उसे ख़ास दिलचस्पी इसी बात को समझने में थी कि 1+1=1 कैसे हो सकता है.
मैं उसे कई दिन टालता रहालेकिन उसे यही समझना था कि प्रेम का गणित कैसेसामान्य गणित से अलग हो सकता है. जहाँ प्रेम है वहां गणित का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है. वहां तो भाव हैंअनुभूति हैचाहत हैएक दूसरे के लिए मर मिटने के अरमान हैं. ऐसी कई बातें हैं जिन्हें हम सिर्फ महसूस कर सकते हैंउन्हें कहना मुश्किल लगता है. उसकी बातों और व्यवहार का यह अन्तर उसके प्रेम पर और भी सन्देह पैदा करता था. प्रेम में आदर्श स्थिति किसी हद तक सही हो सकती हैकल्पना की ऊँची उड़ान भी वहां हैसाथ जीने और साथ चलने के वादे भी हैंलेकिन यह प्रेम के प्रारम्भिक चिन्ह हैंयह प्रेम के अंकुरण के संकेत हैं. बीज के प्रस्फुटित होने की निशानियाँ हैं. हो सकता है कि आगे चलकर यह अंकुर फल तक पहुंचे ही नतो ऐसी स्थिति में क्या होगामैं जब भी उससे यह प्रश्न करता तो उसके लिए प्रेम किसी अबूझ पहेलो जैसा हो जाता. इस बात पर तो उसे और भी चिढ़ आतीजब मैं यह कहता कि प्रेम करने का नाम नहींप्रेम होने का नाम है. प्रेम में संसार (जाति-धर्म-वर्ण-आश्रम-अमीरी-गरीबी-रंग-रूप आदि) कहीं नहीं हैप्रेम में सिर्फ प्रेम ही है, ‘सिर्फ और सिर्फ प्रेम’. प्रेम जीवन में एक क्रान्ति हैजो होती तो कहीं भीतर घटित हैलेकिन उसका प्रभाव व्यक्ति के पूरे जीवन में देखा जा सकता है. प्रेम रूपी क्रान्ति सभी सीमाओं को तोड़ने की क्षमता रखती है. प्रेम को परिभाषित करना और उसे शब्दों में बांधना बहुत कठिन है.
प्रेम के विषय में यह सब बातें सुनकर वह अपने को टटोलने की कोशिश करता कि क्या सच में प्रेम एक ‘क्रान्ति’ का नाम हैजो ‘भीतर’ ही ‘भीतर’ घटित होती है. जो आखों से उतर कर रूह के धरातल पर अवस्थित होती है. जो जिस्म के बन्धन की अपेक्षा हृदय के स्तर पर बंधी होती है. जो तर्क की अपेक्षा सहजता को स्वीकार करती है. वह मेरी बातों में उलझता जा रहा था. पहले प्रेम का गणित और अब प्रेम एक ‘क्रान्ति’, आँखें और रूहआखिर यह माजरा क्या हैवह तो अभी तक यही सोच रहा था कि प्रेम की यात्रा तो आखों से होते हुए शरीर के एक ख़ास हिस्से पर पहुँच कर ख़त्म हो जाती है और उसके बाद प्रेम ठहर जाता है. वह एक सामान्य जीवन की और अग्रसर होता हैवह सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाता हैऔर फिर एक सीमा पर आकर प्रेम रूपी यह अहसास समाप्त भी हो जाता है. प्रेम का मतलब उसके लिए सिर्फ इतना ही है कि किसी ख़ास इनसान को अपने करीब लाओउसे अपना बनाओ और फिर उसके साथ जीवन गुजारने के बारे में सोचो. घर-गृहस्थी बसाओ और मौज उड़ाओइससे ज्यादा और क्या चाहिए होता है जिन्दगी में. लेकिन मेरी बातें सुनकर वह परेशान हो जाता. उसे अपनी योजनायें बेकार लगने लगतीजो कुछ उसने अभी तक सोचा हैमेरे सामने वह सब निरर्थक हो जाता. बचता तो सिर्फ एक आधा-अधूरा शब्द ‘प्रेम’ जिसका वह मतलब भी सही तरीके से नहीं समझ पाया थाऔर उसने कभी उसे समझने की कोशिश ही नहीं की. उसके लिए प्रेम सिर्फ दो लोगों का मिलन हैबस इसके सिवा और कुछ नहीं.
लेकिन दो से एक होने के मायने और एक और एक होने के मायने बहुत अलग हैं. मैं उसे यही बात समझाने की कोशिश करतालेकिन उसे लगता कि प्रेम में सिद्धान्त का क्या कामवहां तो मौज मस्ती हैघूमना फिरना हैगप्पें मारना हैमिलना जुलना है और फिर एक उम्र के बाद शादी के बन्धन में बंधकर आगे का नीरस जीवन जीना है. जहाँ खुद को जिम्मेवारियों के हवाले करना है और परिवार और समाज को संभालना है. ....शेष अगले अंक में..!!

10 फ़रवरी 2014

प्रेम का बाजार भाव...1

5 टिप्‍पणियां:
प्रेम एक ऐसा शब्द जो हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है, एक ऐसा भाव जिसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, और एक ऐसा जूनून जो हमें जीवन के मायने सिखाता है. प्रेम मनुष्य ही नहीं बल्कि हर प्राणी के जीवन का आधार है. दुनिया में जो कुछ भी हमारी समझ में आज तक आया है, वहां प्रेम की अभिव्यक्ति अवश्य होती है. मनुष्य ही नहीं बल्कि जितने भी जीव हैं वह प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं, और उसके माध्यम से वह अपने जीवन को दिशा देते हैं. इसलिए इस धरा पर समाज और व्यक्ति को जोड़ने की जो कड़ी है वह प्रेम ही है. प्रेम व्यक्ति को सामाजिक बनाता है, दूसरों के हितों के प्रति सोचने के लिए प्रेरित करता है और जहाँ पर हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई कार्य करते हैं तो वहां हम दुनिया से अलग हो जाते हैं, हमारा नजरिया बदल जाता है. प्रेम की शक्ति अद्भुत है और इसी कारण इसका वर्णन कई तरह से किया गया है और इसकी महता भी कई तरह से बताई गयी है. हर व्यक्ति के लिए प्रेम के मायने अलग हैं, लेकिन वास्तविक प्रेम तो वही है जहाँ हम अपने आप को मिटाकर सिर्फ और सिर्फ दूसरों के हित का चिन्तन करते हैं और बदले में किसी प्रकार की कोई आशा नहीं करते हैं. इसे सच्चे प्रेम की निशानी तो नहीं बल्कि प्रेम की चरम सीमा कह सकते हैं, प्रेम का शुद्धतम और उच्च स्वरूप कह सकते हैं. क्योँकि जहाँ प्रेम है वहां सच और झूठ जैसे शब्द नहीं होते. जिसने प्रेम किया बस किया, वहां सच-झूठ का कोई प्रश्न नहीं. प्रेम है तो बस प्रेम और नहीं है तो सिर्फ औपचारिक्ताएं.

एक दृष्टि से अगर देखा जाए तो इस दुनिया में प्रेम के बिना कुछ भी नहीं है. सब कुछ होते हुए भी अगर प्रेम रूपी भाव जीवन में नहीं है तो वहां जीवन का आनंद नहीं है, भौतिक सुख सुविधाएं हमारे जीवन संघर्ष को कम अवश्य कर सकती हैं, लेकिन वह हमें प्रेम जैसा भाव नहीं दे सकती. हम जितनी भी भौतिक उन्नति कर लें और बेशक हम अपनी उन उपलब्धियों पर गर्वित हों, लेकिन जीवन की उन सफलताओं में भी प्रेम की महता बहुत महत्वपूर्ण है. उसके बिना जीवन का हर पक्ष अधूरा है, और जिस व्यक्ति के जीवन में प्रेम नहीं है, जो निकृष्ट है वह किसी भी स्थिति में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है. क्योँकि उसमें जीवन का वह आधार भाव ही नहीं है जो उसे पूरी सृष्टि के प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाता है, और जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता नहीं वह जी कर भी क्या करेगा? जीवन के अगर वास्तविक मायने हैं तो वह प्रेम के कारण ही हैं, संवेदनशीलता के कारण ही हैं. क्योँकि संवेदनशीलता जब तक व्यक्ति के जहाँ में तब तक वह दूसरों के हित को सर्वोपरि रखते हुए अपने जीवन की दिशा का निर्धारण करता है और अंततः अपने जीवन के साथ-साथ दूसरे प्राणियों को जीवन जीने में सहायता करता है.

प्रेम के अनेक पक्ष हैं, एक बालक जब धरा पर जन्म लेता है तो उसके जीवन की शुरुआत प्रेम से ही होती है.
सबसे पहले उसे उसके माता-पिता का प्रेम मिलता है और वहीँ से उसके जीवन का सफ़र शुरू होता है. जीवन की जितनी भी स्थितियां और पड़ाव आते हैं वहां उसे प्रेम की आवशयकता पड़ती रहती है. कहीं पर भाई-बहनों का प्यार, कहीं दोस्तों का प्यार, कहीं समाज के लोगों का प्यार उसे जीवन के हर मोड़ पर प्रेरित करता है और एक व्यक्ति जीवन सफ़र को तय करते हुए आगे बढ़ता जाता है, उपलब्धियां अर्जित करता जाता है और अंततः उसे यह आभास होता है कि प्रेम ही सब कुछ है और प्रेम के बिना जीवन के कोई मायने नहीं. क्योँकि समाज में ऐसी भी स्थिति देखी गयी है कि व्यक्ति के पास भौतिक सुख सुविधायें होते हुए भी प्रेम के आभाव में उसे जीवन की सार्थकता कहीं नजर नहीं आती, इसलिए कई बार व्यक्ति अवसाद ग्रस्त हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाने से भी नहीं हिचकता. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि प्रेम जीवन का आधार है उसके बिना जीवन की कल्पना करना बेमानी सा लगता है. जितनी भी संस्कृतियों ने आज तक जन्म लिया है उनके मूल में भी प्रेम की भावना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिन्हें हम दुनिया की उच्च संस्कृतियाँ कहते हैं उन्होंने भी मनुष्यता के प्रति प्रेम के बीज बोने का काम किया है, इसलिए उनकी महता भी किसी से कम नहीं है. मनुष्य किसी भी समाज का हिस्सा हो लेकिन प्रेम की आवश्यकता उसे हर मोड़ पर पड़ती है. इसलिए प्रेम को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया है.

प्रेम के विषय में जितना भी वर्णन किया जाय कम है, क्योँकि यह अनुभूति का विषय है. हम इसे किसी भी तर्क से सिद्ध करने की कोशिश भी करें तो इसकी थाह लेना आसान नहीं. हम ऐसा कभी भी सिद्ध नहीं कर सकते कि कोई किसी से कितना प्रेम करता है, करता भी है या नहीं. अगर वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम में करने जैसा कुछ भी नहीं है, यहाँ सब कुछ होने जैसा है, व्यक्ति के वश में कुछ नहीं है. सब कुछ अपने आप होने वाला है, बस व्यक्ति को खुद को समर्पित रखना होता है और अपने भावों को सही दिशा देने का प्रयास करना होता है. अगर व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तो उसे इस तरफ जोर लगाने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. प्रेम में तो सब कुछ सहज में घटित होता है. क्योँकि यह विशुद्ध रूप से अनुभूति का विषय है. हर किसी व्यक्ति के जीवन में प्रेम का अपना अनुभव होता है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. लेकिन जो प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर प्रेम करते हैं, प्रेम का वास्तविक आनंद तो वही ले पाते हैं. क्योँकि जहाँ हम अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करके प्रेम करने की कोशिश करते हैं वहां हम सामने वाले को तो धोखा दे सकते हैं, लेकिन प्रेम का जो वास्तविक आनंद है उसे प्राप्त नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में हमें अपने मन को एक बार नहीं हजार बार टटोलने की आवश्यकता होती है. लेकिन जो सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वह विरले ही होते हैं.   शेष अले अंक में......!!!               

18 फ़रवरी 2011

एक उम्र कम है

102 टिप्‍पणियां:
इधर 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे (प्यार का दिनमनाया गयाऔर मैं बेखबर होकर सोचता रहा अपनी मस्ती में इन पंक्तियों को:-
एक उम्र भी कम है मोहब्बत के लिए
लोग कहाँ से वक़्त निकालते हैं, नफरत के लिए।
काश उस शायर ने यह लिखा होताएक दिन कम है मोहब्बत के लिएतो हमारे किसी आशिक का वश चलता तो इसे दो दिन या फिर जयादा मेहरवान होकर सात दिन और अगर और सफलता मिलती तो वेलेंटाइन डे की जगह वेलेंटाइन पखवाड़ा मनाया जाता। पर खैर एक दिन भी काफी है...प्यार करने के लिए तो एक क्षण भी बहुत है, और यहाँ तो पूरा एक दिन है, और इससे पहले भी कोई रोज डेचोकलेट डे और भी बहुत से दिन मनाये जाते हैं। कुल मिलाकार सिलसिला चल पड़ता है 7 या 8 फरवरी से और इसका चरम रूप हमें 14 फरवरी को देखने को मिलता है।
पर यह आश्चर्यजनक है कि उसके बाद न तो इस प्यार की बात होती है और ना कोई प्यार जताने वाला मिलता है। फिर इन्तजार होता है अगली 14 फरवरी का और इसी तरह यह क्रम चल रहा है। मैंने सोचा क्या सच में प्यार को जाहिर किया जा सकता है। जिस संत ‘वेलेंटाइन’ के नाम से यह दिन मनाया जाता है उसका मंतव्य तो कुछ और था और हम क्या उस मंतव्य को पूरा कर रहे हैंहमें ज्यादा दूर जाने कि आवश्यकता नहीं है। हमारे देश में भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैंजिन्होंने अपने जीवन को प्यार (लौकिकके लिए समर्पित कर दिया जैसे, हीर-राँझा, लैलामजनू, सोहनी-महिवाल, कुंजू-चंचलो, सुन्नी-भुन्कू, रान्झूफुल्मु, लिल्लोचमन आदि -आदि। परजो समाज आज प्रेम दिवस मना रहा है उस समाज ने इन प्यार करने वालों की कितनी कदर की, यह सब आप जानते हैं। आज जो कुछ भी हमारे सामने घटित हो रहा हैक्या सच में प्यार करने वाले ऐसा कर सकते हैं। मेरी समझ में नहीं...अगर जिन्दगी में हम किसी एक इनसान से भी निस्वार्थ प्रेम कर पाए तो हमारी जिन्दगी की सफलता निश्चित हो जाती है...और यहाँ तो लोग प्रेम करने का दावा करते हैं। यह बात भी सच है कि लौकिक प्रेम से ही आलौकिक प्रेम का मार्ग प्रशस्त होता हैऔर हमें यह भी बताया जाता है कि इनसान से प्रेम करना ही भगवान से प्रेम करना है। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है...नहीं। अगर ऐसा होता तो आज दुनिया का यह स्वरूप यह नहीं होता।
आज जिस दिशा की तरफ हम बढ़ रहे हैं...क्या प्यार के कारण ऐसा हो सकता है...नहींदुनिया में सभी तरह की अधिकता तबाही मचा सकती है लेकिन प्यार की अधिकता तो सकूँ और चैन लाती है। पर यहाँ पर तो सब चीजें अस्त-व्यस्त हैं। सबको अपनी-अपनी पड़ी है। जो हमारी संकीर्णता की परिचायक है। जरा गहराई से सोचें क्या प्रेम करने के लिए एक दिन काफी है और बाकी के दिन सिर्फ नफरत के लिए तो जिन्दगी का मंतव्य क्या रह जायेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से वेलेंटाइन डे का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन जिस तरह से और जिन मंतव्यों के लिए इस दिन को मनाया जाता है उस प्रक्रिया पर मुझे अफ़सोस जरुर होता है:-
दिल है कि धडकने का सबब भूल गया है
जीने का सलीका और अदब भूल गया है।
आज हम अपने चारों और के वातावरण को देखें। हमें क्या नजर आता है। आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है और हम निरंतर आविष्कार कर रहे है घातक हथियारों कापर किसके लिए सिर्फ इनसान के लिए...आज इनसान को इनसान से ज्यादा डर है और उसका मंतव्य है किसी के हक को छीनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना। जब ऐसे हालत हमारे सामने हैं तो हम किस दिशा की तरफ जा रहे हैं, यह हमें सोचना होगा। कम से कम प्यार की यह दिशा तो नहीं हैऔर यह भी सच है कि:-
इस दुनिया में ऐ जहाँ वालोबहुत मुश्किल है इन्साफ करना
बहुत आसां है सजाएं देनाबहुत मुश्किल है माफ़ करना।
हम माफ़ करने के बारे में कम सोचते हैं और सजाएँ देने के बारे में जयादा तो फिर हम क्या प्यार करते हैं और किस से। कम से कम मेरी समझ में तो नहीं आता।
आज वेलेंटाइन डे को मात्र मनाने की जरुरत नहीं बल्कि इस दिन के मूल मंतव्य को समझने की आवश्यकता है, और अगर हम समझ जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारे लिए हर एक दिन वेलेंटाइन डे होता है। एक छोटी सी जिन्दगी में हम जितना इस खुदा की बनाई सृष्टि से प्यार कर पाते हैं उतना ही हम जिन्दगी के मकसद के करीब पहुँच पाते हैं। और जिन्दगी का मकसद है LIVE AND LET LIVE। हम जब भी इन बातों के बारे में सोचेंगे इनकी महता खुद ब खुद हमारे सामने आ जाएगीहम प्रेम के मूल मंतव्य को समझ जायेंगे और तब हमें सृष्टि प्रेममयी नजर आएगीजिन्दगी जीने का आनंद आ जायेगा। फिर हम सब रोज वेलेंटाइन डे मनाया करेंगे उसके लिए हमें किसी खास दिन का इन्तजार नहीं करना पड़ेगा। काश!! हम केवल इतना कर पाते कि अपने दिल और दिमाग को हर तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त रखकर इस दुनिया में आनंद लेते हुए इस जीवन के सफ़र को तय कर पातेऔर फिर हर दिन वेलेंटाइन डे मानते।
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