16 फ़रवरी 2014

सृजन की प्राथमिकता, ब्लॉगिंग और हम...1

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चिन्तन मनुष्य की सहज प्रवृति है. यह गुण उसे प्रकृति द्वारा प्रदत्त है. चिन्तन के इसी गुण के बल पर उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने की भरपूर कोशिश की है, और आज तक वह इस दिशा में अनवरत क्रियाशील है. उसके चिन्तन के अनेक आयाम हैं और हर एक आयाम का अपना एक महत्व है. दुनिया के इतिहास पर हम नजर डालते हैं तो हम यह सहज रूप से ही समझ जाते हैं कि मनुष्य ने आज तक जो भी चिन्तन किया है उसके केंद्र में वह स्वयं ही रहा है. अपने चिन्तन के केंद्र में खुद को रखने से उसने यह महसूस किया कि वह भी प्रकृति का ही एक अभिन्न अंग है. जिन तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ है उन्हीं तत्वों से उसका भी निर्माण हुआ है. इसलिए प्रारम्भ में उसके चिन्तन का केन्द्र प्रकृति और इसके रहस्य रहे हैं. चिन्तन का जहाँ से प्रारम्भ हुआ है या जो दस्तावेज आज हमें उपलब्ध हैं या जिन विषयों के विषय में आज हमें जानकारी उपलब्ध है वह हमें स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि प्रारम्भ में मनुष्य ने अपनी चेतना को समझने के प्रयास किये हैं. उसने यह भी समझने की चेष्टा की है कि आखिर इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? इस धरा पर ही नहीं बल्कि इस ब्रहमांड में जो कुछ भी है, उसका निर्माण कैसे हुआ? इस सबके पीछे किसका हाथ है? यह जो कुछ भी निर्मित हुआ है, इसका उद्देश्य क्या है? इस ब्रहमांड को सुनियोजित तरीके से चलाने में किसकी भूमिका है और क्योँ? ऐसे अनेक सवाल हैं जो सृष्टि के प्रारम्भ से मनुष्य के चिन्तन का हिस्सा रहे हैं और समय-समय पर मनुष्य ने उसके विषय में अपने निष्कर्षों से आने वाली पीढ़ियों को अवगत करवाने के लिए अनेक माध्यमों का भी विकास किया है.
मनुष्य ने आज तक जितना भी चिन्तन किया है और जहाँ भी किया है, जिस भी भाषा और जिस भी पद्धति के माध्यम से किया है उन सबके निष्कर्ष में उसने एक बात तो स्वीकार की है कि इस सृष्टि का सृजन कर्ता परमात्मा है, और इसे वह कई नामों से अभिहित करता है. इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उसके जहन में यह प्रश्न पैदा होने शुरू हुए कि आखिर यह ब्रह्म क्या है? इस दुनिया की विभिन्न सत्ताओं में उसकी भूमिका क्या है? श्वेताश्वतरोपनिषद् के प्रथम अध्याय में इस प्रश्न पर कुछ इस तरह से चिन्तन किया गया है “किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता, जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सूखेतरेषु, वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्”।। (1/1/1133) अर्थात जगत का कारणभूत ब्रह्म कैसा है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? किसके द्वारा जीवित रहते हैं? कहाँ स्थित हैं? और हे ब्रह्मविद्गण! हम किसके द्वारा सुख-दुःख में प्रेरित होकर व्यवस्था (संसार यात्रा) का अनुवर्तन करते हैं. यक़ीनन यह सबसे गम्भीर प्रश्न है. क्योँकि जिस सृष्टि में हम रहते हैं और जिस तरह से यह क्रियान्वित होती है, उससे तो यह बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि इस सृष्टि की रचना के पीछे कोई न कोई उद्देश्य तो जरुर होगा.
इन सब बातों पर विस्तार से चिन्तन करने की जरुरत है, और सबसे बड़ी महता इस बात की है कि हम दुनिया भर में उपलब्ध आज तक के चिन्तन और अनुभव के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालें. क्योँकि आज तक इन विषयों पर जितना भी चिन्तन किया गया है वह एक सत्ता को तो मानता है लेकिन उसकी उत्पति, क्रिया और कारणों पर अलग-अलग राय रखता है. इसलिए जब वह चिन्तन व्यवहार के धरातल पर उतरता है तो हमें लगता है कि जो बात कोई दूसरे विचार को मानने वाला कह रहा है, मेरी बात उससे कहीं श्रेष्ठ है, मेरा मत किसी और निष्कर्ष का समर्थन करता है, इसलिए आज हम देखते हैं कि पूर्ववर्ती काल में सृष्टि के रहस्यों और दुनिया को सुन्दर स्वरूप प्रदान करने के लिए जो मार्ग खोजे गए, कालान्तर में उन मार्गों पर कुछ तथाकथित लोगों का अधिकार हो गया. उन्होंने अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए कई तरह के भ्रम और भ्रांतियां पैदा की और आज जितने भी पहलू इन विषयों पर उपलब्ध हैं, वह सुलझने की बजाय उलझते हुए ज्यादा नजर आ रहे हैं और यह सब कुछ मनुष्य जाति के लिए और उसके चिन्तन के लिए सही नहीं है.
प्रारम्भ में मनुष्य ने जब सृजन की दुनिया में कदम रखा तो उसके उद्देश्य बहुत बृहत् थे, वह सम्पूर्ण कायनात को अपने चिन्तन का हिस्सा बनाना चाहता था और इसी कोशिश में उसने वनस्पति, जल, वायु, सूर्य, चन्द्र, तारे, नक्षत्र आदि के साथ-साथ इन सबको क्रिया रूप प्रदान करने वाली शक्ति को समझने की कोशिश भी की. अपनी शक्ति और साधना के बल पर उसने जो कुछ भी पाया उसके आधार पर उसने इन रहस्यों के निष्कर्षों को क्रियान्वित करने की कोशिश की, और जो कुछ उसे हासिल नहीं हुआ या जो कुछ उसे समझ नहीं आया उसके प्रति उसने सकारात्मक भाव रखा और उसे भी अपने जीवन का आधार मानते हुए उसके प्रति आस्था और सम्मान का भाव रखते हुए उस रहस्य को समझने की कोशसिह की. वैदिक साहित्य में हमें इस बात के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं, और जो कुछ भी उसने उस प्रकृति के माध्यम से सीखने की कोशिश की या उसने जो अपने भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिश की उसे उसने दैवीय प्रेरणा कहा. हमारे देश भारत में तो कोई भी प्राचीन ग्रन्थ ऐसा नहीं मिलता जिसमें इस बात को पुष्ट न किया गया हो कि सृजन का विषय चाहे जो भी रहा हो, लेकिन उसमें मानवीय पहलूओं को प्रमुखता से उजागर किया गया है और इस धारणा को भी पुष्ट किया गया है कि जो भी सृजन हुआ है वह सब दैवीय प्रेरणा का परिणाम है.
कालान्तर में बेशक सृजन की यह धारणा बदली हो और यह किसी हद तक स्वाभाविक भी है. क्योँकि सृजन समाज का हिस्सा होता है, जिस तरह के परिवर्तन समाज में आते हैं वह सब कुछ सृजन के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं. तभी तो कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है. कभी साहित्य समाज को प्रभावित करता है तो कभी समाज साहित्य को प्रभावित करता है. लेकिन साहित्य के सृजन की प्राथमिकता तो मनुष्य है और वह आज तक इस दिशा में अग्रसर रहा है. लेकिन बदलते दौर में दुःख इस बात है कि सृजन की प्राथमिकताएं भी बदली और आज हम ऐसे बिन्दु पर खड़े है जहाँ से हम अतीत को देखकर समझकर गौरवान्वित होते हैं, लेकिन भविष्य पर गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हैं. विषय चाहे कोई भी हो, दिशा चाहे कोई भी हो अब वह गंभीरता कहाँ रही और वह ललक कहाँ. हालाँकि हम ऐसा नहीं कह सकते कि अब सृजन नहीं हो रहा है, हो रहा है, पूर्ववर्ती काल से कहीं ज्यादा हो रहा है. लेकिन कहीं कोई गंभीरता नहीं, कहीं कोई मौलिकता नहीं, बस एक सरपट दौड़ है दूसरे से आगे निकलने की, सब कुछ कम संघर्ष में हासिल करने की और उसके लिए हम किसी मानक को मानने के लिए तैयार नहीं. बस हम दौड़ना चाहते हैं, भले ही उसकी सार्थकता हो या नहीं, उसके परिणाम क्या होंगे, इस बात की कोई चिंता नहीं. बस एक ही चिंता है किस तरह से किसी से आगे निकला जाए, कैसे किसी को नीचा दिखाया जाये. यह एक ऐसा उपक्रम है जिसमें आज हमारे समय के बहुत से तथाकाथित सृजनकर्मी प्रवृत हैं. हम इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि हमारे सामने चिन्तन और सृजन के जो मानक हैं, क्या हम उन मानकों पर कितना खरे उतर पाए हैं, और हम उससे आगे बढ़ने के लिए और क्या कर सकते हैं? हमारे चिन्तन का हिस्सा क्या होना चाहिए? किस दिशा में हमें और काम करने की जरुरत है?  यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर आज हमें बहुत गंभीरता से विचार करने की जरुरत है और आज जो माध्यम हमारे सामने हैं उन माध्यमों का लाभ उठाते हुए हम इस दुनिया के स्वरूप को सुन्दर बनाने में कितना सहयोग कर पाते हैं, इस बात पर सोचने की आवश्यता है.  शेष अगले अंकों में.....!!!

13 फ़रवरी 2014

प्रेम का बाजार भाव...2

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जहाँ हम अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करके प्रेम करने की कोशिश करते हैं वहां हम सामने वाले को तो धोखा दे सकते हैं, लेकिन प्रेम का जो वास्तविक आनंद है उसे प्राप्त नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में हमें अपने मन को एक बार नहीं हजार बार टटोलने की आवश्यकता होती है. लेकिन जो सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वह विरले ही होते हैं. गतांक से आगे

यहाँ प्रेम के सन्दर्भ में हमें एक बात सहजता से स्वीकारनी होगी कि वास्तविक प्रेम-प्रेम जैसा कुछ करने से नहीं होता, वह अपने आप हो जाता है. व्यक्ति चाह कर भी अपने भावों को किसी एक दिशा में बढ़ने से नहीं रोक पाता. प्रेम का भाव अक्सर होने का भाव है, करने का नहीं. जहाँ प्रेम हो गया-बस हो गया. यहाँ व्यक्ति का कोई वश नहीं. यहाँ अनुरक्ति का भाव पैदा हो गया किसी अनजाने के प्रति, किसी अजनबी के प्रति, कोई दूर रहकर भी पास होने लगा, कोई ऐसा जिसके बिना जीवन लगता ही कुछ नहीं. ऐसी अवस्था में फिर सोच लिया उसकी हर खूबी को और एक समय ऐसा आया जब उसके बिना जीवन नीरस और बेकार लगने लगा. चाहे लौकिक प्रेम हो या अलौकिक दोनों में एक स्तर पर स्थिति एक सी हो जाती है. इन दोनों दिशाओं में चलते हुए अगर कोई प्रेम होने की स्थिति में आगे बढ़ रहा है तो फिर उसे कोई परवाह नहीं. जिससे उसने प्रेम किया है वह चाहे जैसा भी हो, जो भी हो, दुनिया की नजर उसे चाहे किसी भी निगाह से देखती हो लेकिन जिसे प्रेम हो गया है उसे हो गया है. उसे कोई परवाह नहीं दुनिया की, बस उसे एक ही परवाह है अपने भावों को और चरम सीमा तक ले जाने की. ऐसी अवस्था में प्रेम परमात्मा हो जाता है और परमात्मा प्रेम हो जाता है. प्रेम और प्रेमी दोनों एक हो जाते हैं, दोनों में कोई भेद नहीं रहता. दो जान एक दिल बस सब कुछ समा जाता है, पूरी कायनात प्रेममय लगती है और ऐसी स्थिति में व्यक्ति को लगता है कि प्रेम ही जीवन है और जीवन ही प्रेम, प्रेम के बिना जीवन कुछ लगता ही नहीं. 

प्रेम के अनेक आयाम है और इसकी अनेक दिशाएँ भी हैं. जरुरी नहीं हमें प्रेम सिर्फ किसी खुबसूरत चेहरे से ही हो, हमें प्रेम प्रकृति से हो सकता है, देश से हो सकता है, किसी ऐसी कला से हो सकता है जिसके बिना हम अधूरे से लगते हैं. दुनिया में जितनी भी दृश्य और अदृश्य चीजें हैं हमें किसी से भी प्रेम हो सकता है. लेकिन ज्यादातर प्रेम दृश्य चीजों से ही होता है. क्योँकि प्रेम की प्रारंभिक अवस्था स्थूल से ही प्रारंभ होती है. जैसे वह ग़ज़ल है न “जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था, लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है”. स्थूल से प्रारंभ हुआ यह सफ़र धीरे-धीरे व्यक्ति के मानसपटल में उतरता जाता है और एक अवस्था ऐसी आती है जब वह खुद की अपेक्षा प्रेम को ही तरजीह देता है और फिर उसे लगता है कि एक उम्र कम है मोहब्बत के लिए. हमारे सामने लौकिक और अलौकिक प्रेम के अनेक उदाहरण हैं. हर व्यक्तित्व में एक अद्भुत आकर्षण है, हालाँकि हम उनके बाह्य व्यक्तित्व को ही जानते हैं, लेकिन प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने जो कुछ भी अभिव्यक्त किया उसे समझने की जरुरत है. एक तरफ कबीर, नानक, मीरा जैसे व्यक्तित्व है तो दूसरी तरफ लैला-मजनूं, हीर-रांझा जैसे व्यक्तित्व भी हैं. इसके साथ-साथ देश और राष्ट्र से प्रेम करने वालों की भी एक लम्बी सूची है. हम कैसे भूल सकते हैं भगत सिंह, चन्द्र शेखर और सुभाष चन्द्र बोस जैसे राष्ट्र प्रेमियों को. जिन्होंने मातृ भूमि से प्रेम किया और अपने प्राणों का उत्सर्ग तक कर दिया इसकी आन-वान और शान के लिए. यक़ीनन जब वह फांसी के फंदे पर हँसते-हँसते झूलने जाते हैं तो फिर खुद को धन्य महसूस करते हैं. अपनी दीवानगी पर कुर्बान होना उन्हें सौभाग्य लगता है और सही मायने में यही प्रेम की चरम सीमा है. इन सब जनुनियों को देखने की निगाह दुनिया चाहे कुछ भी हो लेकिन प्रेम इनमें भरपूर था अपने देश के मिटटी के लिए. हम जिस भी दिशा के प्रेम करने वालों के जीवन को कर्म पर निगाह डालें हमें अद्भुत अनुभव होंगे, बेशर्त हैं हम उन्हें पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर न देखें. 

लेकिन बदलते दौर में सब कुछ बदल रहा है. अब किसी भी दिशा में ऐसे दीवाने नहीं दिखाई देते जो अपने
प्राणों का उत्सर्ग करने के लिए तैयार रहते हों, हालाँकि यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि रोज ही कोई न कोई नयी खबर आती रहती हैं कि प्रेम के लिए किसी ने फंदा लगा लिया और किसी ने जहर खा लिया, या ऐसा भी सुनने में आता है कि दो प्रेमियों ने ही अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर दी तो इसे क्या कहेंगे? यहाँ एक बात यह समझनी होगी कि प्रेम किसी भी स्थिति में ऐसा करने की अनुमति नहीं देता, वह तो आपको सकारात्मक दिशा की तरफ ले जाता है, वह आपको जीवन जीने के मायने सिखाता है. प्रेम किसी भी स्थिति में व्यक्ति को जीवन से विमुख होने के लिए प्रेरित नहीं करता. यह जो सब कुछ हो रहा है सिर्फ स्वार्थवश हो रहा है. हाँ कोई विरला ऐसा मिल सकता है, जिसने लाख कोशिश की हो अपने प्रेम को पाने की, वह हार गया हो और उस हार से वह जीवन से विमुख हो गया, उसने जीवन को समाप्त करने की ही सोची. ऐसे विषय अपवाद स्वरूप ही हो सकते हैं. लेकिन आज प्रेम एक फैशन बन चुका है और फैशन कभी भी स्थाई नहीं होता. 

बदलते दौर में मानव मूल्य बदल रहे हैं. सबको अपनी-अपनी पडी है. आज अगर कहीं कोई प्रेम कर भी रहा है तो उसमें कहीं न कहीं उसका स्वार्थ छिपा हुआ है. आज अगर कोई किसी से सम्बन्ध भी स्थापित कर भी रहा है तो उसमें भी स्वार्थ की बू आने लगी हैं. सब सामाजिक हैसियत और अपना लाभ देखकर ही किसी से प्रेम करने का नाटक करते हैं और यह तो आपको पता ही है कि नाटक का कोई भी पात्र वास्तविक नहीं होता. हालाँकि यह सब कुछ किसी बड़े पैमाने पर भले ही न हो रहा हो लेकिन तस्वीर बदल रही है, व्यक्ति का नैतिक स्तर गिर रहा है और आये दिन मानव पाशविकता के उदाहरण पेश कर ही रहा है. जहाँ जिसको जो अवसर मिल रहा है वह व्यक्ति का शोषण कर ही रहा है. लेकिन जरुरी नहीं कि जो शोषण कर रहा है वह ही इसके लिए जिम्मेवार हो, प्रारंभिक अवस्था में शोषण करवाने वाला भी जिम्मेवार है, लेकिन जब उसकी कोई इच्छा पूरी नहीं होती तो वह दूसरे पर आरोप थोप देता है. आये दिन हमें प्रेम के ऐसे किस्से और कहानियाँ हमने सुनने को मिलती रहती हैं. ऐसी स्थिति में प्रेम-प्रेम नहीं लगता बस स्वार्थ सिद्धि का एक जरिया लगता है. इसलिए तो हमने अब प्रेम के लिए दिन, महीने और सप्ताह निश्चित कर लिए. जहाँ प्रेम करने के बाद जीवन एक उत्सव बन जाता है, वहीँ हमने इसके विपरीत प्रेम को ही उत्सव (आज के अश्लीलता के सन्दर्भ में) बना लिया. अब हम प्रेम के नाम पर चोकलेट डे, प्रोमिस डे, और किस डे आदि मनाने लगे. अब प्रेम बाजार पर निर्भर हो गया. ऐसे प्रायोजित प्रेम पर आलेख लिखे जाने लगे. इसके पुरातात्विक महत्व (हम तो तेरे आशिक है सदियों पुराने) पर चर्चाएँ की जाने लगी हैं. बाजार सज रहे हैं और लोग प्रेम के नाम पर बिक रहे हैं. प्रेम-प्रेम नहीं हो गया बाजार हो गया, इसलिए उसमें संसेक्स की तरह उतर चढ़ाव लगातार जारी हैं.

10 फ़रवरी 2014

प्रेम का बाजार भाव...1

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प्रेम एक ऐसा शब्द जो हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है, एक ऐसा भाव जिसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, और एक ऐसा जूनून जो हमें जीवन के मायने सिखाता है. प्रेम मनुष्य ही नहीं बल्कि हर प्राणी के जीवन का आधार है. दुनिया में जो कुछ भी हमारी समझ में आज तक आया है, वहां प्रेम की अभिव्यक्ति अवश्य होती है. मनुष्य ही नहीं बल्कि जितने भी जीव हैं वह प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं, और उसके माध्यम से वह अपने जीवन को दिशा देते हैं. इसलिए इस धरा पर समाज और व्यक्ति को जोड़ने की जो कड़ी है वह प्रेम ही है. प्रेम व्यक्ति को सामाजिक बनाता है, दूसरों के हितों के प्रति सोचने के लिए प्रेरित करता है और जहाँ पर हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई कार्य करते हैं तो वहां हम दुनिया से अलग हो जाते हैं, हमारा नजरिया बदल जाता है. प्रेम की शक्ति अद्भुत है और इसी कारण इसका वर्णन कई तरह से किया गया है और इसकी महता भी कई तरह से बताई गयी है. हर व्यक्ति के लिए प्रेम के मायने अलग हैं, लेकिन वास्तविक प्रेम तो वही है जहाँ हम अपने आप को मिटाकर सिर्फ और सिर्फ दूसरों के हित का चिन्तन करते हैं और बदले में किसी प्रकार की कोई आशा नहीं करते हैं. इसे सच्चे प्रेम की निशानी तो नहीं बल्कि प्रेम की चरम सीमा कह सकते हैं, प्रेम का शुद्धतम और उच्च स्वरूप कह सकते हैं. क्योँकि जहाँ प्रेम है वहां सच और झूठ जैसे शब्द नहीं होते. जिसने प्रेम किया बस किया, वहां सच-झूठ का कोई प्रश्न नहीं. प्रेम है तो बस प्रेम और नहीं है तो सिर्फ औपचारिक्ताएं.

एक दृष्टि से अगर देखा जाए तो इस दुनिया में प्रेम के बिना कुछ भी नहीं है. सब कुछ होते हुए भी अगर प्रेम रूपी भाव जीवन में नहीं है तो वहां जीवन का आनंद नहीं है, भौतिक सुख सुविधाएं हमारे जीवन संघर्ष को कम अवश्य कर सकती हैं, लेकिन वह हमें प्रेम जैसा भाव नहीं दे सकती. हम जितनी भी भौतिक उन्नति कर लें और बेशक हम अपनी उन उपलब्धियों पर गर्वित हों, लेकिन जीवन की उन सफलताओं में भी प्रेम की महता बहुत महत्वपूर्ण है. उसके बिना जीवन का हर पक्ष अधूरा है, और जिस व्यक्ति के जीवन में प्रेम नहीं है, जो निकृष्ट है वह किसी भी स्थिति में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है. क्योँकि उसमें जीवन का वह आधार भाव ही नहीं है जो उसे पूरी सृष्टि के प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाता है, और जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता नहीं वह जी कर भी क्या करेगा? जीवन के अगर वास्तविक मायने हैं तो वह प्रेम के कारण ही हैं, संवेदनशीलता के कारण ही हैं. क्योँकि संवेदनशीलता जब तक व्यक्ति के जहाँ में तब तक वह दूसरों के हित को सर्वोपरि रखते हुए अपने जीवन की दिशा का निर्धारण करता है और अंततः अपने जीवन के साथ-साथ दूसरे प्राणियों को जीवन जीने में सहायता करता है.

प्रेम के अनेक पक्ष हैं, एक बालक जब धरा पर जन्म लेता है तो उसके जीवन की शुरुआत प्रेम से ही होती है.
सबसे पहले उसे उसके माता-पिता का प्रेम मिलता है और वहीँ से उसके जीवन का सफ़र शुरू होता है. जीवन की जितनी भी स्थितियां और पड़ाव आते हैं वहां उसे प्रेम की आवशयकता पड़ती रहती है. कहीं पर भाई-बहनों का प्यार, कहीं दोस्तों का प्यार, कहीं समाज के लोगों का प्यार उसे जीवन के हर मोड़ पर प्रेरित करता है और एक व्यक्ति जीवन सफ़र को तय करते हुए आगे बढ़ता जाता है, उपलब्धियां अर्जित करता जाता है और अंततः उसे यह आभास होता है कि प्रेम ही सब कुछ है और प्रेम के बिना जीवन के कोई मायने नहीं. क्योँकि समाज में ऐसी भी स्थिति देखी गयी है कि व्यक्ति के पास भौतिक सुख सुविधायें होते हुए भी प्रेम के आभाव में उसे जीवन की सार्थकता कहीं नजर नहीं आती, इसलिए कई बार व्यक्ति अवसाद ग्रस्त हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाने से भी नहीं हिचकता. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि प्रेम जीवन का आधार है उसके बिना जीवन की कल्पना करना बेमानी सा लगता है. जितनी भी संस्कृतियों ने आज तक जन्म लिया है उनके मूल में भी प्रेम की भावना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिन्हें हम दुनिया की उच्च संस्कृतियाँ कहते हैं उन्होंने भी मनुष्यता के प्रति प्रेम के बीज बोने का काम किया है, इसलिए उनकी महता भी किसी से कम नहीं है. मनुष्य किसी भी समाज का हिस्सा हो लेकिन प्रेम की आवश्यकता उसे हर मोड़ पर पड़ती है. इसलिए प्रेम को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया है.

प्रेम के विषय में जितना भी वर्णन किया जाय कम है, क्योँकि यह अनुभूति का विषय है. हम इसे किसी भी तर्क से सिद्ध करने की कोशिश भी करें तो इसकी थाह लेना आसान नहीं. हम ऐसा कभी भी सिद्ध नहीं कर सकते कि कोई किसी से कितना प्रेम करता है, करता भी है या नहीं. अगर वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम में करने जैसा कुछ भी नहीं है, यहाँ सब कुछ होने जैसा है, व्यक्ति के वश में कुछ नहीं है. सब कुछ अपने आप होने वाला है, बस व्यक्ति को खुद को समर्पित रखना होता है और अपने भावों को सही दिशा देने का प्रयास करना होता है. अगर व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तो उसे इस तरफ जोर लगाने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. प्रेम में तो सब कुछ सहज में घटित होता है. क्योँकि यह विशुद्ध रूप से अनुभूति का विषय है. हर किसी व्यक्ति के जीवन में प्रेम का अपना अनुभव होता है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. लेकिन जो प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर प्रेम करते हैं, प्रेम का वास्तविक आनंद तो वही ले पाते हैं. क्योँकि जहाँ हम अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करके प्रेम करने की कोशिश करते हैं वहां हम सामने वाले को तो धोखा दे सकते हैं, लेकिन प्रेम का जो वास्तविक आनंद है उसे प्राप्त नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में हमें अपने मन को एक बार नहीं हजार बार टटोलने की आवश्यकता होती है. लेकिन जो सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वह विरले ही होते हैं.   शेष अले अंक में......!!!