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16 फ़रवरी 2014

सृजन की प्राथमिकता, ब्लॉगिंग और हम...1

5 टिप्‍पणियां:
चिन्तन मनुष्य की सहज प्रवृति है. यह गुण उसे प्रकृति द्वारा प्रदत्त है. चिन्तन के इसी गुण के बल पर उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने की भरपूर कोशिश की है, और आज तक वह इस दिशा में अनवरत क्रियाशील है. उसके चिन्तन के अनेक आयाम हैं और हर एक आयाम का अपना एक महत्व है. दुनिया के इतिहास पर हम नजर डालते हैं तो हम यह सहज रूप से ही समझ जाते हैं कि मनुष्य ने आज तक जो भी चिन्तन किया है उसके केंद्र में वह स्वयं ही रहा है. अपने चिन्तन के केंद्र में खुद को रखने से उसने यह महसूस किया कि वह भी प्रकृति का ही एक अभिन्न अंग है. जिन तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ है उन्हीं तत्वों से उसका भी निर्माण हुआ है. इसलिए प्रारम्भ में उसके चिन्तन का केन्द्र प्रकृति और इसके रहस्य रहे हैं. चिन्तन का जहाँ से प्रारम्भ हुआ है या जो दस्तावेज आज हमें उपलब्ध हैं या जिन विषयों के विषय में आज हमें जानकारी उपलब्ध है वह हमें स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि प्रारम्भ में मनुष्य ने अपनी चेतना को समझने के प्रयास किये हैं. उसने यह भी समझने की चेष्टा की है कि आखिर इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? इस धरा पर ही नहीं बल्कि इस ब्रहमांड में जो कुछ भी है, उसका निर्माण कैसे हुआ? इस सबके पीछे किसका हाथ है? यह जो कुछ भी निर्मित हुआ है, इसका उद्देश्य क्या है? इस ब्रहमांड को सुनियोजित तरीके से चलाने में किसकी भूमिका है और क्योँ? ऐसे अनेक सवाल हैं जो सृष्टि के प्रारम्भ से मनुष्य के चिन्तन का हिस्सा रहे हैं और समय-समय पर मनुष्य ने उसके विषय में अपने निष्कर्षों से आने वाली पीढ़ियों को अवगत करवाने के लिए अनेक माध्यमों का भी विकास किया है.
मनुष्य ने आज तक जितना भी चिन्तन किया है और जहाँ भी किया है, जिस भी भाषा और जिस भी पद्धति के माध्यम से किया है उन सबके निष्कर्ष में उसने एक बात तो स्वीकार की है कि इस सृष्टि का सृजन कर्ता परमात्मा है, और इसे वह कई नामों से अभिहित करता है. इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उसके जहन में यह प्रश्न पैदा होने शुरू हुए कि आखिर यह ब्रह्म क्या है? इस दुनिया की विभिन्न सत्ताओं में उसकी भूमिका क्या है? श्वेताश्वतरोपनिषद् के प्रथम अध्याय में इस प्रश्न पर कुछ इस तरह से चिन्तन किया गया है किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता, जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सूखेतरेषु, वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्”।। (1/1/1133) अर्थात जगत का कारणभूत ब्रह्म कैसा है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? किसके द्वारा जीवित रहते हैं? कहाँ स्थित हैं? और हे ब्रह्मविद्गण! हम किसके द्वारा सुख-दुःख में प्रेरित होकर व्यवस्था (संसार यात्रा) का अनुवर्तन करते हैं. यक़ीनन यह सबसे गम्भीर प्रश्न है. क्योँकि जिस सृष्टि में हम रहते हैं और जिस तरह से यह क्रियान्वित होती है, उससे तो यह बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि इस सृष्टि की रचना के पीछे कोई न कोई उद्देश्य तो जरुर होगा.
इन सब बातों पर विस्तार से चिन्तन करने की जरुरत है, और सबसे बड़ी महता इस बात की है कि हम दुनिया भर में उपलब्ध आज तक के चिन्तन और अनुभव के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालें. क्योँकि आज तक इन विषयों पर जितना भी चिन्तन किया गया है वह एक सत्ता को तो मानता है लेकिन उसकी उत्पति, क्रिया और कारणों पर अलग-अलग राय रखता है. इसलिए जब वह चिन्तन व्यवहार के धरातल पर उतरता है तो हमें लगता है कि जो बात कोई दूसरे विचार को मानने वाला कह रहा है, मेरी बात उससे कहीं श्रेष्ठ है, मेरा मत किसी और निष्कर्ष का समर्थन करता है, इसलिए आज हम देखते हैं कि पूर्ववर्ती काल में सृष्टि के रहस्यों और दुनिया को सुन्दर स्वरूप प्रदान करने के लिए जो मार्ग खोजे गए, कालान्तर में उन मार्गों पर कुछ तथाकथित लोगों का अधिकार हो गया. उन्होंने अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए कई तरह के भ्रम और भ्रांतियां पैदा की और आज जितने भी पहलू इन विषयों पर उपलब्ध हैं, वह सुलझने की बजाय उलझते हुए ज्यादा नजर आ रहे हैं और यह सब कुछ मनुष्य जाति के लिए और उसके चिन्तन के लिए सही नहीं है.
प्रारम्भ में मनुष्य ने जब सृजन की दुनिया में कदम रखा तो उसके उद्देश्य बहुत बृहत् थे, वह सम्पूर्ण कायनात को अपने चिन्तन का हिस्सा बनाना चाहता था और इसी कोशिश में उसने वनस्पति, जल, वायु, सूर्य, चन्द्र, तारे, नक्षत्र आदि के साथ-साथ इन सबको क्रिया रूप प्रदान करने वाली शक्ति को समझने की कोशिश भी की. अपनी शक्ति और साधना के बल पर उसने जो कुछ भी पाया उसके आधार पर उसने इन रहस्यों के निष्कर्षों को क्रियान्वित करने की कोशिश की, और जो कुछ उसे हासिल नहीं हुआ या जो कुछ उसे समझ नहीं आया उसके प्रति उसने सकारात्मक भाव रखा और उसे भी अपने जीवन का आधार मानते हुए उसके प्रति आस्था और सम्मान का भाव रखते हुए उस रहस्य को समझने की कोशसिह की. वैदिक साहित्य में हमें इस बात के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं, और जो कुछ भी उसने उस प्रकृति के माध्यम से सीखने की कोशिश की या उसने जो अपने भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिश की उसे उसने दैवीय प्रेरणा कहा. हमारे देश भारत में तो कोई भी प्राचीन ग्रन्थ ऐसा नहीं मिलता जिसमें इस बात को पुष्ट न किया गया हो कि सृजन का विषय चाहे जो भी रहा हो, लेकिन उसमें मानवीय पहलूओं को प्रमुखता से उजागर किया गया है और इस धारणा को भी पुष्ट किया गया है कि जो भी सृजन हुआ है वह सब दैवीय प्रेरणा का परिणाम है.
कालान्तर में बेशक सृजन की यह धारणा बदली हो और यह किसी हद तक स्वाभाविक भी है. क्योँकि सृजन समाज का हिस्सा होता है, जिस तरह के परिवर्तन समाज में आते हैं वह सब कुछ सृजन के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं. तभी तो कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है. कभी साहित्य समाज को प्रभावित करता है तो कभी समाज साहित्य को प्रभावित करता है. लेकिन साहित्य के सृजन की प्राथमिकता तो मनुष्य है और वह आज तक इस दिशा में अग्रसर रहा है. लेकिन बदलते दौर में दुःख इस बात है कि सृजन की प्राथमिकताएं भी बदली और आज हम ऐसे बिन्दु पर खड़े है जहाँ से हम अतीत को देखकर समझकर गौरवान्वित होते हैं, लेकिन भविष्य पर गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हैं. विषय चाहे कोई भी हो, दिशा चाहे कोई भी हो अब वह गंभीरता कहाँ रही और वह ललक कहाँ. हालाँकि हम ऐसा नहीं कह सकते कि अब सृजन नहीं हो रहा है, हो रहा है, पूर्ववर्ती काल से कहीं ज्यादा हो रहा है. लेकिन कहीं कोई गंभीरता नहीं, कहीं कोई मौलिकता नहीं, बस एक सरपट दौड़ है दूसरे से आगे निकलने की, सब कुछ कम संघर्ष में हासिल करने की और उसके लिए हम किसी मानक को मानने के लिए तैयार नहीं. बस हम दौड़ना चाहते हैं, भले ही उसकी सार्थकता हो या नहीं, उसके परिणाम क्या होंगे, इस बात की कोई चिंता नहीं. बस एक ही चिंता है किस तरह से किसी से आगे निकला जाए, कैसे किसी को नीचा दिखाया जाये. यह एक ऐसा उपक्रम है जिसमें आज हमारे समय के बहुत से तथाकाथित सृजनकर्मी प्रवृत हैं. हम इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि हमारे सामने चिन्तन और सृजन के जो मानक हैं, क्या हम उन मानकों पर कितना खरे उतर पाए हैं, और हम उससे आगे बढ़ने के लिए और क्या कर सकते हैं? हमारे चिन्तन का हिस्सा क्या होना चाहिए? किस दिशा में हमें और काम करने की जरुरत है?  यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर आज हमें बहुत गंभीरता से विचार करने की जरुरत है और आज जो माध्यम हमारे सामने हैं उन माध्यमों का लाभ उठाते हुए हम इस दुनिया के स्वरूप को सुन्दर बनाने में कितना सहयोग कर पाते हैं, इस बात पर सोचने की आवश्यता है.  शेष अगले अंकों में.....!!!

23 मई 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...2

20 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.......! नुष्य ने सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक कर्म और भाग्य के द्वंद्व को समझने की कोशिश की है और इस दिशा में उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है. कठोपनिषद में कर्म की अनित्यता पर विचार किया गया है "जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं, न ह्यध्रुवै: प्राप्यते हि ध्रुवं तत्”. (10/217) अर्थात मैं यह जानता हूँ कि कर्मफल निधि अनित्य है, क्योँकि अनित्य साधनों द्वारा वह नित्य (परमात्मा) को प्राप्त नहीं कर सकता. अगर इस बात पर गहनता से विचार करें तो हम पाएंगे कि मनुष्य कर्मफल के मोह से बच नहीं सकता, और इसलिए जब वह कर्म करता है तो हर प्रकार के कर्म में उस कर्म की सफलता के लिए प्रार्थना को महत्व देता है. यह अनुभव रहा है कि जीवन में जब भी कर्म को सिर्फ कर्म के दृष्टिकोण से किया जाता है तो सफलता की सम्भावना ज्यादा बलवती हो जाती है, और अगर कर्म सिर्फ और सिर्फ प्राणी मात्र की भलाई के लिए किया जा रहा है तो वह सफलता के साथ-साथ आनंद देने वाला भी होता है. अगर यह भाव जीवन में बन जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति कर्म और भाग्य के द्वंद्व से मुक्त होकर सिर्फ और सिर्फ कर्म को ही महता देगा, और ऐसी स्थिति में वह बहुत सी भ्रांतियों का शिकार होने से बचा रहेगा, जिसे वह भाग्य मानकर अपने को कोसता रहता है उसके लिए उसके मन में कर्म का भाव पैदा होगा और इस कर्म के भाव का पैदा होना उसके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा. गीता में श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस भाव को यूं समझाते हैं :-काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः / क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा. (4/12 /158) कि इस संसार में मनुष्य सकाम कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, फलस्वरूप वह देवताओं की पूजा करते हैं. निसंदेह इस संसार में मनुष्यों को सकाम कर्म का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है. लेकिन दूसरी तरफ इस बात पर भी बल देते हैं कि "कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः / अकर्मणश्च बोद्धव्यं  गहना कर्मणो गतिः”. (4 /27/163). कर्म की बारीकियों को समझना अत्यंत कठिन है. अतः मनुष्य को चाहिए की वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है? विकर्म क्या है और अकर्म क्या है? अगर मनुष्य यह निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है कि किया जाने वाला कर्म जीवन में क्या भूमिका निभाएगा, उसका फल क्या होगा और उस कर्म की चरम परिणति क्या होगी यह सब जानना आवश्यक है. अगर इस चिंतन से कोई भी कर्म किया जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति ब्रह्म भाव में खुद को स्थापित कर लेगा और उसकी एक-एक दुआ उसके जीवन को बदलने वाली होगी, और निश्चित रूप से वह महसूस करेगा कि किस तरह से दुआ का एक लफ्ज जीवन की दिशा को परिवर्तित करता है. 

स सृष्टि में मानव जीवन की उत्पति और इसके जीवन रहस्यों को समझने की जब हम चेष्टा करते हैं तो पाते
हैं कि इस जीवन की कुछ पहेलियाँ ऐसी हैं जिहें समझना कठिन है, और प्रार्थना और दुआ के सन्दर्भ में तो और भी रोचक और असमंजस की स्थिति है . मनुष्य कहीं ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकारता है तो उसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों की आवश्यकता नहीं पड़ती जहाँ कहीं उसके मन का भाव प्रार्थना के जाग्रत हुआ उसके हाथ उठ गए वह झुक गया उसने ईश्वर को याद कर लिया उसके सामने अपनी फरियाद रख दी अपनी मांग रख दी, जो कुछ उसे चाहिए वह इस निराकार और सर्वव्यापी सत्ता से कह दिया और खुद चिंता मुक्त हो गया. लेकिन कहीं पर ऐसा भी भाव है जहाँ वह इबादत के लिए, प्रार्थना के लिए मीलों की दूरी तय करता है, दिनों का समय लगाता है और फिर किसी विशेष स्थान पर पहुँच कर वह प्रार्थना करता है, लेकिन फिर भी प्रार्थना पूरी नहीं होती उसका वहां से विश्वास उठ जाता है. वह दूसरी तरफ चल पड़ता है और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है. लेकिन मनुष्य है कि वह कर्म तो कर रहा है लेकिन उसकी दिशा सही नहीं है. अगर जब दिशा ही सही नहीं है तो फिर दशा कैसे बदलेगी. अपनी दशा को बदलने के लिए उसे अपनी दिशा में परिवर्तन करना होगा और वह परिवर्तन बड़ी आसानी से हो सकता है. सबसे पहले उसे ईश्वर के साकार और निराकार स्वरूप को समझना होगा और इस बात को गहनता से मन में बिठाना होगा कि साकार सत्ता की एक सीमा है उसका हर स्तर पर एक दायरा है, लेकिन निराकार-सर्वव्यापक सत्ता सीमा से परे है, वह हमारी कल्पना का हिस्सा नहीं है, इसलिए साकार और निराकार-सर्वव्यापक दोनों सत्ताओं के सामने की गयी प्रार्थना का अपना महत्व है . 

गर हम इस सृष्टि का गहनता से विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इस दृश्यमान जगत में जितनी भी योनियाँ हैं वह सब भोग योनियाँ है, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे कर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है. इस आधार पर देखें तो भोग योनियाँ और कर्म योनी और इन सबकी (अंडज, पिंडज, उतभुज, सेतज) रचना में ईश्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है. इस आधार पर देखें तो मनुष्य ही ईश्वर की एक ऐसी कृति है जिसे उसने चेतना का चरम सोपान प्रदान किया है, और हमारे ऋषि मुनि हमेशा इस बात पर चिंतन करते रहे कि आखिर इस चेतना का क्या औचित्य है ? क्योँकि उन्हें लगता है कि "भोजन भोग निद्रा भय, यह सब पशु पुरख सामान " अगर यह चारों लक्षण इंसान और पशुओं में एक जैसे हैं तो फिर इंसान कि क्या महता है ? क्योँ उसे यह जीवन प्रदान किया गया है ? हालाँकि हम संसार में विचरते हैं लेकिन शायद इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, कि हमारे इस जीवन की क्या महता है ? हम तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं की अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. कुछ बिंदु अगले अंक में..!