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26 जून 2014

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

7 टिप्‍पणियां:
जीवन का क्रम है ही कुछ ऐसा कि आपको कहीं भी किसी भी परिस्थिति का सामना कर पड़ सकता है. लेकिन अगर आप अपने दृढ निश्चय के साथ आगे बढ़ रहे हैं तो फिर आपके लिए हर परिस्थिति एक नया जोश, एक नयी ऊर्जा पैदा करती है. हालाँकि जीवन का यह क्रम भी है कि गिरते वही हैं जो चढ़ने की कोशिश करते हैं, और जब आप गिर रहे हों तो जिसने आपको उठाया है वह आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. जब आप चढ़ने का प्रयास कर रहे हैं तब भी अगर कोई आपको आपके लक्ष्य तक पहुंचाने का सहभागी बनता है तो वह भी आपके लिए किसी ईश्वर से कम नहीं होता.

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यही इसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. यह अपनी बुद्धि के बल पर पूरी सृष्टि के रहस्यों को समझने की चेष्टा करता है और ऐसा प्रयास उसने आज तक किया भी है. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी रुचियाँ और जीवन की प्राथमिकतायें बदलती रही हैं. फिर भी उसके जीवन का आधार नहीं बदला है और न ही वह बदल सकता है. क्योँकि जीवन तो प्रकृति का हिस्सा है और जब तक जीवन है तब तक हमें प्रकृति से जुड़े रहना होगा. हमारे जीवन का निर्माण ही प्रकृति के अनुकूल हुआ है तो फिर हम किस तरह से प्रकृति से अलग रह सकते हैं. लेकिन आज का मनुष्य इस बात को समझने की चेष्टा नहीं कर रहा है. उपभोगतावादी संस्कृति ने उसे बहुत संकुचित बना दिया है. अब वह समाज के लिए नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ अपने लिए कार्य करने में विश्वास करता है. मनुष्य की इस संकुचित सोच ने कई बार इस सृष्टि में भयंकर तहस-नहस मचाई है और अनेक निर्दोष लोगों का ही नहीं बल्कि प्रकृति के अनेक जीवों के जीवन के लिए भी संकट पैदा किया है.

व्यावहारिक स्तर पर हम सोचें तो यह बात हमें समझ आ जाएगी कि जीवन की वास्तविकता क्या है? मैं
इस प्रश्न का उत्तर वर्षों से खोज रहा हूँ और अब तक के अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जीवन एक क्षण है. हम जीवन को बेशक दिन, सप्ताह, महीने और साल के आधार पर गिनते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि जीवन एक क्षण है. हमारे एक क्षण में लिए गए निर्णय कई बार सिर्फ हमें प्रभावित करते हैं, लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि वह निर्णय हम पर प्रभाव कम डालते हैं और किसी दूसरे को अधिक प्रभावित करते हैं. उसके पीछे एक स्पष्ट सिद्धांत है कि व्यक्ति समाज की एक इकाई होता है, और उसका प्रत्यक्ष और परोक्ष सम्बन्ध समाज के प्रत्येक प्राणी से होता है. इसी कारण एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने हर निर्णय को सोच समझ कर लेता है. ताकि समाज में उसके किसी निर्णय का कोई विपरीत असर न पड़े. जहाँ तक मुझे लगता है व्यक्ति को इसी तरह का जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि समाज का एक सुन्दर और स्वस्थ रूप सामने आ सके.

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि हम कितने वर्ष जीवन जीते हैं, बल्कि इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम जीवन को किस तरह से जीते हैं. हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व में अनेक ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिनकी जीवन यात्रा बहुत थोड़ी सी है लेकिन कर्म इतना ऊँचा कर गए हैं कि कोई सौ वर्षों तक भी जी ले उनके स्तर तक नहीं पहुँच सकता. इसलिए मुझे लगता है जीवन वर्षों से नहीं बल्कि कर्मों से समझा जाता है. एक बात और जिसे में कुछ वर्षों से गहरे से अनुभव करता हूँ कि बुद्धिमता का उम्र से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि हमारे देश में ऐसी परम्परा है कि हमें अपने से बड़ों का आदर सम्मान करना चाहिए, लेकिन इसका कोई ठोस आधार नहीं है कि किस आधार पर करना चाहिए. उम्र के किसी भी पढाव तक जरुरी नहीं है कि व्यक्ति बुद्धिमान हो, बुद्धिमता का गुण किसी बालक में भी हो सकता है और किसी बुजुर्ग में उसी बुद्धिमता का अभाव देखा जा सकता है. शायद बुद्धिमता और श्रेष्ठ कर्म का उम्र से कोई लेना देना नहीं होता. इसलिए हमें जीवन में बहुत सोच समझ कर कदम उठाने की आवश्यकता होती है. आदर्श जीवन लम्बे समय जीने का मोहताज नहीं होता, वह श्रेष्ठ कर्म का मोहताज होता है. हम जीवन में जितना अपने लिए सोचते और करते हैं उसका एक हिस्सा भी दूसरों के लिए सोचें और करें तो हमारे जीवन और समाज की स्थिति ही बदल जायेगी, और यही मनुष्यता की सबसे बड़ी पहचान है.

जीवन में एक और सिद्धांत बहुत मायने रखता है वह है दूसरों को आगे बढ़ाना. अगर हम दूसरों को आगे बढ़ा रहे होते हैं तो हम खुद भी आगे बढ़ रहे होते हैं. इसके पीछे एक स्पष्ट मान्यता है कि मनुष्य की सामाजिकता और उसकी बुद्धिमता उसे यह सब करने के लिए प्रेरित करती है. जब मनुष्य खुद पीछे रहकर किसी दूसरे को आगे बढ़ाने का कार्य करता है तो वह खुद भी आगे बढ़ रहा होता है. लेकिन ऐसी स्थिति में मनुष्य के स्वार्थ का क्या होगा? यह एक यक्ष प्रश्न है. लेकिन उसके लिए कोई प्रश्न नहीं है जिसे यह पता है कि जीवन एक क्षण है, जब हम जीवन की क्षण भंगुरता को समझ जायेंगे तो अपने आप इन भौतिक स्वार्थों से से ऊपर उठ जायेंगे और जीवन के हर पल को किसी दूसरे की भलाई के लिए लगाने का प्रयास करेंगे. लेकिन ऐसा होता बहुत कम है और आज तक का इतिहास ऐसा ही कहता है. एक मछली कई बार पूरे तालाब को गंदा कर देती है, लेकिन फिर भी हमें व्यक्तिगत स्तर पर एक सुन्दर और स्वस्थ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए. हमारा पुरुषार्थ तो यही है कि हम एक बार जो भी निर्णय लें उसे किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलें, और जो बार-बार अपने निर्णयों को बदलते हैं उनकी बुद्धिमता पर हमें भी चिन्तन करना चाहिए.  

मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपनी असीम लालसाओं के लिए दिन रात प्रयास करता है, लेकिन अंत में उसे क्या हासिल होता है यह सबके सामने है. कल मोनिका शर्मा जी ने अपनी फेसबुक वाल पर एक चिंतन करने योग्य बात लिखी थी “कभी कभी इस विषय में सोचकर डर लगता है कि हमारा कमाया पैसा, धन दौलत, प्रोपर्टीज इस दुनिया से जाते समय भी हम अपने साथ ले जा सकते तो क्या होता ...? जानते समझते हैं कि सब कुछ यहीं छूट जाना है तो ये हाल है ... कमाए गए धन को जन्मजन्मांतर तक साथ रख सकते तो ...? तो शायद इंसानियत कहीं ढूंढें ना मिलतीहमें भी इस प्रश्न पर गहरे से विचार करना चाहिए और जीवन को सकारात्मक दिशा में जीने का स्वस्थ और सुन्दर प्रयास करना चाहिए.  

23 मई 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...2

20 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.......! नुष्य ने सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक कर्म और भाग्य के द्वंद्व को समझने की कोशिश की है और इस दिशा में उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है. कठोपनिषद में कर्म की अनित्यता पर विचार किया गया है "जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं, न ह्यध्रुवै: प्राप्यते हि ध्रुवं तत्”. (10/217) अर्थात मैं यह जानता हूँ कि कर्मफल निधि अनित्य है, क्योँकि अनित्य साधनों द्वारा वह नित्य (परमात्मा) को प्राप्त नहीं कर सकता. अगर इस बात पर गहनता से विचार करें तो हम पाएंगे कि मनुष्य कर्मफल के मोह से बच नहीं सकता, और इसलिए जब वह कर्म करता है तो हर प्रकार के कर्म में उस कर्म की सफलता के लिए प्रार्थना को महत्व देता है. यह अनुभव रहा है कि जीवन में जब भी कर्म को सिर्फ कर्म के दृष्टिकोण से किया जाता है तो सफलता की सम्भावना ज्यादा बलवती हो जाती है, और अगर कर्म सिर्फ और सिर्फ प्राणी मात्र की भलाई के लिए किया जा रहा है तो वह सफलता के साथ-साथ आनंद देने वाला भी होता है. अगर यह भाव जीवन में बन जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति कर्म और भाग्य के द्वंद्व से मुक्त होकर सिर्फ और सिर्फ कर्म को ही महता देगा, और ऐसी स्थिति में वह बहुत सी भ्रांतियों का शिकार होने से बचा रहेगा, जिसे वह भाग्य मानकर अपने को कोसता रहता है उसके लिए उसके मन में कर्म का भाव पैदा होगा और इस कर्म के भाव का पैदा होना उसके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा. गीता में श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस भाव को यूं समझाते हैं :-काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः / क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा. (4/12 /158) कि इस संसार में मनुष्य सकाम कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, फलस्वरूप वह देवताओं की पूजा करते हैं. निसंदेह इस संसार में मनुष्यों को सकाम कर्म का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है. लेकिन दूसरी तरफ इस बात पर भी बल देते हैं कि "कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः / अकर्मणश्च बोद्धव्यं  गहना कर्मणो गतिः”. (4 /27/163). कर्म की बारीकियों को समझना अत्यंत कठिन है. अतः मनुष्य को चाहिए की वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है? विकर्म क्या है और अकर्म क्या है? अगर मनुष्य यह निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है कि किया जाने वाला कर्म जीवन में क्या भूमिका निभाएगा, उसका फल क्या होगा और उस कर्म की चरम परिणति क्या होगी यह सब जानना आवश्यक है. अगर इस चिंतन से कोई भी कर्म किया जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति ब्रह्म भाव में खुद को स्थापित कर लेगा और उसकी एक-एक दुआ उसके जीवन को बदलने वाली होगी, और निश्चित रूप से वह महसूस करेगा कि किस तरह से दुआ का एक लफ्ज जीवन की दिशा को परिवर्तित करता है. 

स सृष्टि में मानव जीवन की उत्पति और इसके जीवन रहस्यों को समझने की जब हम चेष्टा करते हैं तो पाते
हैं कि इस जीवन की कुछ पहेलियाँ ऐसी हैं जिहें समझना कठिन है, और प्रार्थना और दुआ के सन्दर्भ में तो और भी रोचक और असमंजस की स्थिति है . मनुष्य कहीं ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकारता है तो उसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों की आवश्यकता नहीं पड़ती जहाँ कहीं उसके मन का भाव प्रार्थना के जाग्रत हुआ उसके हाथ उठ गए वह झुक गया उसने ईश्वर को याद कर लिया उसके सामने अपनी फरियाद रख दी अपनी मांग रख दी, जो कुछ उसे चाहिए वह इस निराकार और सर्वव्यापी सत्ता से कह दिया और खुद चिंता मुक्त हो गया. लेकिन कहीं पर ऐसा भी भाव है जहाँ वह इबादत के लिए, प्रार्थना के लिए मीलों की दूरी तय करता है, दिनों का समय लगाता है और फिर किसी विशेष स्थान पर पहुँच कर वह प्रार्थना करता है, लेकिन फिर भी प्रार्थना पूरी नहीं होती उसका वहां से विश्वास उठ जाता है. वह दूसरी तरफ चल पड़ता है और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है. लेकिन मनुष्य है कि वह कर्म तो कर रहा है लेकिन उसकी दिशा सही नहीं है. अगर जब दिशा ही सही नहीं है तो फिर दशा कैसे बदलेगी. अपनी दशा को बदलने के लिए उसे अपनी दिशा में परिवर्तन करना होगा और वह परिवर्तन बड़ी आसानी से हो सकता है. सबसे पहले उसे ईश्वर के साकार और निराकार स्वरूप को समझना होगा और इस बात को गहनता से मन में बिठाना होगा कि साकार सत्ता की एक सीमा है उसका हर स्तर पर एक दायरा है, लेकिन निराकार-सर्वव्यापक सत्ता सीमा से परे है, वह हमारी कल्पना का हिस्सा नहीं है, इसलिए साकार और निराकार-सर्वव्यापक दोनों सत्ताओं के सामने की गयी प्रार्थना का अपना महत्व है . 

गर हम इस सृष्टि का गहनता से विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इस दृश्यमान जगत में जितनी भी योनियाँ हैं वह सब भोग योनियाँ है, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे कर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है. इस आधार पर देखें तो भोग योनियाँ और कर्म योनी और इन सबकी (अंडज, पिंडज, उतभुज, सेतज) रचना में ईश्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है. इस आधार पर देखें तो मनुष्य ही ईश्वर की एक ऐसी कृति है जिसे उसने चेतना का चरम सोपान प्रदान किया है, और हमारे ऋषि मुनि हमेशा इस बात पर चिंतन करते रहे कि आखिर इस चेतना का क्या औचित्य है ? क्योँकि उन्हें लगता है कि "भोजन भोग निद्रा भय, यह सब पशु पुरख सामान " अगर यह चारों लक्षण इंसान और पशुओं में एक जैसे हैं तो फिर इंसान कि क्या महता है ? क्योँ उसे यह जीवन प्रदान किया गया है ? हालाँकि हम संसार में विचरते हैं लेकिन शायद इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, कि हमारे इस जीवन की क्या महता है ? हम तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं की अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. कुछ बिंदु अगले अंक में..! 

28 जनवरी 2011

जिन्दगी है एक दिन

81 टिप्‍पणियां:

{ बहुत दिन तक ब्लॉग से दूरी बनी रही ....लेकिन जिन्दगी के बारे में सोचना जारी रहा ....फिर जो ख्याल बना उसे शब्दों में बांध दिया इस तरह ......!


क्योँ तमन्ना करते हो
किसी का हक़ दबाने की

क्योँ दुखी होते हो
किसी की तरक्की देखकर
क्या ख्याल पाल रखा है तुमने
जिसे तुम जाहिर करने से कतराते हो
तुम्हारा क्या है ?
जिस पर तुम इतना इतराते हो ।

सोच लो एक दिन किसी वीरानी सी
जगह पर...जाकर
जहाँ तुम्हारे साथ सिर्फ तुम होंगे
और
तुम फिर खुद से पूछना अपने बारे में
एक सवाल...!
शायद वही सवाल
तुम्हारी जिन्दगी का
पहला और आखिरी सवाल होगा ।
तुम्हारे पास उत्तर तो बहुत होंगे
शायद सवाल नहीं ???


तब तुम सोचना
जिन्दगी क्या है, जानने के लिए

मौत से पहले
और जन्म के बाद
हम जो भी करते हैं
बस अपने लिए करते हैं ,
अपनी इच्छाओं से ।

कभी यह नहीं सोचते
मेरे किसी कर्म का क्या प्रभाव
पड़ेगा सामने वाले की जिन्दगी पर
बस यही भूल
हम हर पल करते हैं
पर सच यह है कि.....!

सामने वाला भी हमारा है
हम उसके हैं
उसका हित , हमारा हित
उसकी ख़ुशी , हमारी ख़ुशी


उसका गम, हमारा गम

सिर्फ इसलिए .....!!

क्योंकि यह सच है..कि
जिन्दगी है
एक दिन हमसे भी रूठ जाएगी