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01 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...3

21 टिप्‍पणियां:
म तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं कि अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. गतांक से आगे...! जीव जैसे ही इस दृश्यमान जगत में विचरता है तो यह दृश्यमान जगत उसे अपनी और आकर्षित करता है, क्योँकि सृष्टा ने इसे बनाया ही आकर्षक है, और इस दृश्यमान जगत की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक और नैसर्गिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लाख कोशिश करने के बाद भी जीव का कोई वश नहीं चलता कि वह इस जगत से मुंह मोड़ ले, वह चाह कर भी इस मायावी जगत से अपना नाता नहीं तोड़ सकता. इस दृश्यमान जगत की प्रत्येक वस्तु (जड़-चेतन) उसे बेहद आकृष्ट करती है. इसीलिए वह इस मायावी संसार रमना चाहता है, सब कुछ भूलकर. वह इस भौतिक जगत का आनंद लेना चाहता है. तभी तो इरविन एडमिन ने लिखा है "जब तक मनुष्य साँस लेता रहेगा और उसकी आँखों में देखने की शक्ति रहेगी, तब तक जीवन के ऐसे अंतिम प्रतिमानों की खोज होती रहेगी और जिनको हृदय और मस्तिष्क दोनों की स्वीकृति प्राप्त होती रहेगी ". निश्चित रूप से मनुष्य की जिजीविषा और जिज्ञासा उसे हमेशा प्रयत्नशील बनाये रखते हैं और जब तक उसका मन और मस्तिष्क किसी अंतिम निर्णय को स्वीकार नहीं करता तब तक मनुष्य प्रयास करता रहता है. इस दृश्यमान जगत की उत्पति से लेकर निर्वाण तक का विचार मनुष्य ने किया है. जब हम गहराई से विचार करते हैं तो इस सृष्टि की तीन स्थितियों से अवगत होते हैं 1. सृष्टि की उत्पति 2. स्थिति 3. और प्रलय. हमारे धर्म ग्रंथों में इन सब स्थितियों के विषय में बहुत कुछ जानने को मिलता है और यह स्वीकार किया जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति से लेकर विनाश तक के क्रम को ईश्वर द्वारा नियोजित किया जाता है, और यह बात सर्वमान्य है. यह भी माना जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति ईश्वर ने की है, इसके पालन का आधार भी ईश्वर ही है और अंततः यह सृष्टि इस ईश्वर में ही समा जाएगी. गीता में भगवान् श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस विषय में समझाते हुए कहते हैं कि:- अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते/ इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसविन्ताः (10 /08 /338.) "अर्थात मैं सब आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझसे ही उद्भूत है. जो बुद्धिमान यह भली भांति जानते हैं, वह मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में अपना सर्वस्व अर्पित करते हैंअब जब यह निष्कर्ष मनुष्य के सामने आता है तो वह किसी हद तक इसे स्वीकार करने से कतराता है. लेकिन जैसे ही उसकी बुद्धि और शक्ति उसे जबाब दे जाती है तो वह इस अदृश्य सत्ता के प्रति स्वतः ही नतमस्तक होता है", और फिर क्रम शुरू होता है इबादत का.
 
नुष्य अक्सर जब जिन्दगी की जंग हारने के कगार पर होता है तो वह दुआ और इबादत का सहारा लेता है.
हालाँकि हम दुआ और इबादत में अंतर करने में सक्षम नहीं होते, लेकिन इन दोनों शब्दों पर गहराई से विचार करते हैं तो दोनों शब्दों में स्वाभाविक अंतर जाना पड़ता है. "कहीं पर दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है, तो कहीं पर वर्षों की इबादत हार जाती है". निश्चित रूप से ऐसा होता भी है. मनुष्य पहले व्यक्तिगत स्तर पर इबादत करता है. जिसमें उसका अपना कोई न कोई मंतव्य छुपा होता है. लेकिन दुआ वह है जिसे किसी दुसरे के लिए कोई और करे, और इबादत वह है जिसे व्यक्ति खुद के लिए करे. इसलिए दुआ का एक लफ्ज असर कर जाता है और उस असर के पीछे दुआ करने वाले की भावना बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हमारे यहाँ तो यह बातें प्रचलन में है ही कि "दुआ भी तक़दीर बदल सकती है " या फिर "जो काम दुआ कर सकती है, वह दवा नहीं" इसलिए दुआ की महता है. दुआ में भाव आ गया किसी की भलाई का, किसी की ख़ुशी का, किसी के सपने साकार करने का अब जब दुआ की जा रही है तो दुआ करने वाले ने खुद को मिटा दिया, वह खुद से उपर उठ गया, उसने अपने स्वार्थ को त्याग दिया, उसके लिए परिचित-अपरिचित, अपना-पराया, उंचा-नीचा कुछ भी मायने नहीं रखता उसके लिए तो मानवीय भाव बहुत महत्वपूर्ण है. सामने वाले की ख़ुशी महत्वपूर्ण है. लेकिन इसके साथ ही एक और बात भी महत्वपूर्ण है, क्या सच में जिसके लिए दुआ की जा रही है और जिस आवश्यकता के लिए की जा रही है उसमें उसका और मानवता का कितना भला होता है, यह बात महत्वपूर्ण है. क्योँकि ईश्वर से तो कुछ भी छुपा नहीं है, वह दुआ को तभी कबूल करेगा जब सामने वाले के हृदय में मानवीय हित का भाव प्रबल हो, और ऐसे भाव को लेकर की गयी दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है.

हालाँकि यह बात भी सही है कि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की गयी दुआ भी असरकारक नहीं होती, कोई विशेष ही इस दिशा में महारत रखता है. इसलिए तो हम बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, उनके सामने अपने मन के भाव रखते हैं और मनोकामना करते हैं कि उनका कहा हुआ वचन सच निकले, इसी क्रम में गुरुओं-पीरों-पैगम्बरों आदि की महता बहुत बढ़ जाती है, हमारा विश्वास जितना दृढ होगा उतना ही हमें किसी की दुआ का लाभ मिलेगा. लेकिन इसका लाभ तभी लिया जा सकता है जब हम मानव और सृष्टि के अस्तित्व को समझते हैं और फिर इस बात को भली भांति समझते हैं कि इन सबमें ईश्वर या अदृश्य सत्ता की भूमिका क्या है? हम यह तो स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की व्यापकता में परमात्मा की बहुत बड़ी भूमिका है, यह इसका ही प्रतिबिम्ब है और इस व्यापकता को अनेक प्रकार से अभिव्यक्त किया गया है. 
जिस प्रकार ईश्वर के अस्तित्व को समझने के लिए हमें मशक्कत करनी पड़ती है उसी प्रकार मानव के अस्तित्व को भी समझा जाना चाहिए. जिस तरह सृष्टि के तीन रूप हैं उसी प्रकार मानव अस्तित्व को भी तीन रूपों में समझा जा सकता है. 1. आधि भौतिक  2. आधि दैविक  3. आध्यात्मिक. इसे यूं भी समझा जा सकता है. रक्त, मांस, मज्जा से बना यह शरीर मनुष्य का अधिभौतिक रूप है, जिसे हम दुसरे शब्दों में स्थूल काया भी कहते हैं. यह स्थूल काया अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों का माध्यम है. आम व्यक्ति इसे ही सब कुछ समझ लेता है और जितने भी भ्रम आज हमारे सामने हैं वह इस आधिभौतिक रूप से जुड़े हैं. इसी के कारण एक से पंचभौतिक तत्वों से बना शरीर हिन्दू हो गया, मुसलमान हो गया, सिक्ख हो गया, ईसाई हो गया. आधार तो समझ का था लेकिन सब कुछ बदल गया, कहीं पर जाति हावी हो गयी, तो कहीं पर भाषा, कहीं पर धर्म तो कहीं पर क्षेत्र हावी हो गया. यह सब भिन्नताएं इस आधिभौतिक शरीर को सब कुछ मान लेने के कारण हैं. मनुष्य के आधिदैविक स्वरूप पर अगर विचार करें तो यह जीवात्मा की सत्ता से सम्बंधित है, और यह जीवात्मा भौतिक चेतना की नियामक और संचालक है. मनुष्य के इसी आधिदैविक रूप के कारण ही उसे सुख-दुःख, शुभ-अशुभ, बुरा-भला आदि कर्मों की प्रतीति होती है. भोग और अनुभूति से सम्बंधित जितने भी अनुभव हैं वह मनुष्य को उसके आधिदैविक रूप के कारण अनुभूत होते हैं. मानव जीवन की चरम उपलब्धि अगर ईश्वर से साक्षात्कार है तो इस शरीर में समाहित आत्मा की चरम परिणति परमात्मा में स्थापित हो जाने में है. आध्यात्मिक बोध का अनुभव आत्मा की व्यापकता में है और यह व्यापकता तब बढती है जब मनुष्य खुद को अपने पहले दो रूपों से उपर उठा कर आत्मिक स्वरूप में स्थापित करता है. अब इस स्तर पर कोई भेद नहीं, कोई भ्रम नहीं, कोई बंधन नहीं अगर कुछ है तो वह है सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का बोध और आत्मिक स्तर का जीवन. हालाँकि इस स्तर को हासिल करना कठिन लगता है लेकिन यह नामुमकिन नहीं...जिन ढूंढा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ जिसने पा लिया उसने समझ लिया, जान लिया, अपना लिया. उसका प्रत्येक कर्म दुआ बन गया, इबादत हो गया...! कुछ बिन्दु अगले अंक में....!

23 मई 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...2

20 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.......! नुष्य ने सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक कर्म और भाग्य के द्वंद्व को समझने की कोशिश की है और इस दिशा में उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है. कठोपनिषद में कर्म की अनित्यता पर विचार किया गया है "जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं, न ह्यध्रुवै: प्राप्यते हि ध्रुवं तत्”. (10/217) अर्थात मैं यह जानता हूँ कि कर्मफल निधि अनित्य है, क्योँकि अनित्य साधनों द्वारा वह नित्य (परमात्मा) को प्राप्त नहीं कर सकता. अगर इस बात पर गहनता से विचार करें तो हम पाएंगे कि मनुष्य कर्मफल के मोह से बच नहीं सकता, और इसलिए जब वह कर्म करता है तो हर प्रकार के कर्म में उस कर्म की सफलता के लिए प्रार्थना को महत्व देता है. यह अनुभव रहा है कि जीवन में जब भी कर्म को सिर्फ कर्म के दृष्टिकोण से किया जाता है तो सफलता की सम्भावना ज्यादा बलवती हो जाती है, और अगर कर्म सिर्फ और सिर्फ प्राणी मात्र की भलाई के लिए किया जा रहा है तो वह सफलता के साथ-साथ आनंद देने वाला भी होता है. अगर यह भाव जीवन में बन जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति कर्म और भाग्य के द्वंद्व से मुक्त होकर सिर्फ और सिर्फ कर्म को ही महता देगा, और ऐसी स्थिति में वह बहुत सी भ्रांतियों का शिकार होने से बचा रहेगा, जिसे वह भाग्य मानकर अपने को कोसता रहता है उसके लिए उसके मन में कर्म का भाव पैदा होगा और इस कर्म के भाव का पैदा होना उसके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा. गीता में श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस भाव को यूं समझाते हैं :-काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः / क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा. (4/12 /158) कि इस संसार में मनुष्य सकाम कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, फलस्वरूप वह देवताओं की पूजा करते हैं. निसंदेह इस संसार में मनुष्यों को सकाम कर्म का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है. लेकिन दूसरी तरफ इस बात पर भी बल देते हैं कि "कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः / अकर्मणश्च बोद्धव्यं  गहना कर्मणो गतिः”. (4 /27/163). कर्म की बारीकियों को समझना अत्यंत कठिन है. अतः मनुष्य को चाहिए की वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है? विकर्म क्या है और अकर्म क्या है? अगर मनुष्य यह निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है कि किया जाने वाला कर्म जीवन में क्या भूमिका निभाएगा, उसका फल क्या होगा और उस कर्म की चरम परिणति क्या होगी यह सब जानना आवश्यक है. अगर इस चिंतन से कोई भी कर्म किया जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति ब्रह्म भाव में खुद को स्थापित कर लेगा और उसकी एक-एक दुआ उसके जीवन को बदलने वाली होगी, और निश्चित रूप से वह महसूस करेगा कि किस तरह से दुआ का एक लफ्ज जीवन की दिशा को परिवर्तित करता है. 

स सृष्टि में मानव जीवन की उत्पति और इसके जीवन रहस्यों को समझने की जब हम चेष्टा करते हैं तो पाते
हैं कि इस जीवन की कुछ पहेलियाँ ऐसी हैं जिहें समझना कठिन है, और प्रार्थना और दुआ के सन्दर्भ में तो और भी रोचक और असमंजस की स्थिति है . मनुष्य कहीं ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकारता है तो उसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों की आवश्यकता नहीं पड़ती जहाँ कहीं उसके मन का भाव प्रार्थना के जाग्रत हुआ उसके हाथ उठ गए वह झुक गया उसने ईश्वर को याद कर लिया उसके सामने अपनी फरियाद रख दी अपनी मांग रख दी, जो कुछ उसे चाहिए वह इस निराकार और सर्वव्यापी सत्ता से कह दिया और खुद चिंता मुक्त हो गया. लेकिन कहीं पर ऐसा भी भाव है जहाँ वह इबादत के लिए, प्रार्थना के लिए मीलों की दूरी तय करता है, दिनों का समय लगाता है और फिर किसी विशेष स्थान पर पहुँच कर वह प्रार्थना करता है, लेकिन फिर भी प्रार्थना पूरी नहीं होती उसका वहां से विश्वास उठ जाता है. वह दूसरी तरफ चल पड़ता है और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है. लेकिन मनुष्य है कि वह कर्म तो कर रहा है लेकिन उसकी दिशा सही नहीं है. अगर जब दिशा ही सही नहीं है तो फिर दशा कैसे बदलेगी. अपनी दशा को बदलने के लिए उसे अपनी दिशा में परिवर्तन करना होगा और वह परिवर्तन बड़ी आसानी से हो सकता है. सबसे पहले उसे ईश्वर के साकार और निराकार स्वरूप को समझना होगा और इस बात को गहनता से मन में बिठाना होगा कि साकार सत्ता की एक सीमा है उसका हर स्तर पर एक दायरा है, लेकिन निराकार-सर्वव्यापक सत्ता सीमा से परे है, वह हमारी कल्पना का हिस्सा नहीं है, इसलिए साकार और निराकार-सर्वव्यापक दोनों सत्ताओं के सामने की गयी प्रार्थना का अपना महत्व है . 

गर हम इस सृष्टि का गहनता से विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इस दृश्यमान जगत में जितनी भी योनियाँ हैं वह सब भोग योनियाँ है, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे कर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है. इस आधार पर देखें तो भोग योनियाँ और कर्म योनी और इन सबकी (अंडज, पिंडज, उतभुज, सेतज) रचना में ईश्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है. इस आधार पर देखें तो मनुष्य ही ईश्वर की एक ऐसी कृति है जिसे उसने चेतना का चरम सोपान प्रदान किया है, और हमारे ऋषि मुनि हमेशा इस बात पर चिंतन करते रहे कि आखिर इस चेतना का क्या औचित्य है ? क्योँकि उन्हें लगता है कि "भोजन भोग निद्रा भय, यह सब पशु पुरख सामान " अगर यह चारों लक्षण इंसान और पशुओं में एक जैसे हैं तो फिर इंसान कि क्या महता है ? क्योँ उसे यह जीवन प्रदान किया गया है ? हालाँकि हम संसार में विचरते हैं लेकिन शायद इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, कि हमारे इस जीवन की क्या महता है ? हम तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं की अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. कुछ बिंदु अगले अंक में..! 

14 मई 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...1

16 टिप्‍पणियां:
स ब्रह्माण्ड को जब भी हम देखते हैं, महसूस करते हैं, इसके रहस्यों को जानने की जब कोशिश करते हैं तो कहीं पर हम सीमित हो जाते हैं. हमारी सोच का दायरा, कल्पना की उड़ान, समझ की सीमा सब छोटा पड़ जाता है. जब भी इस विश्व को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आखिर यह सब कुछ व्यवस्थित कैसे है? जितनी भी कायनात है उसके जर्रे-जर्रे में एक अदृश्य सत्ता का आभास हमें होता है और जब भी हम इसे और गहराई से महसूस करते हैं तो भी हम इसका अंदाजा नहीं लगा सकते. दुसरे शब्दों में हम इसे  नेति-नेति कहते हैं अर्थात “न इति" जिसका कोई आदि -मध्य और अंत नहीं. जो जन्म और मृत्यु से मुक्त है जिसे हम खुदा, ईश्वर, सृष्टा, भगवान, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड आदि नामों से पुकारते हैं. अवतारी पुरुषों के रूप में हम इस सत्ता को राम- कृष्ण, गुरु नानक, हजरत मुहम्मद, ईसा मसीह आदि कई नामों से अभिहित करते हैं, और समग्र रूप से हम इस अदृश्य सत्ता को सर्वव्यापी, सर्व समरथ, सर्वगुणसंपन्न, कालातीत आदि कई विश्लेषणों से अभिव्यक्त करते हैं.  इसकी सर्वव्यापकता को सिद्ध करने के लिए हम इसे अखंड भी कहते हैं

वेद में इसे "अखंड मंडलाकार व्यापतेन चराचरम" (अर्थात जो खंडित नहीं हो सकता और जो इस सृष्टि के
कण-कण में व्याप्त है) कहा गया है. निर्गुण रूप में जो ब्रह्म वाणी और शब्दों द्वारा वर्णन की सीमा में न बंध सकने से साधारण मनुष्यों की पहुँच (उपासना) से परे होता है, उसका रूप चाहे साकार हो या निराकार लेकिन मनुष्य के लिए उसकी थाह लेना मुश्किल होता है."निर्गुणमपि सत ब्रह्म नामरूपगतैर्गुनै सगुणं-उपस्नार्थमुपदिश्यते " फिर भी यह दयालु ईश्वर इस धरती के जीवों पर अपनी कृपाएं करता रहता है और उन्हें सुख के साधन प्रदान करता रहता है. यह इस सृष्टि में समस्त कर्मों को करता हुआ भी कर्म बंधन में नहीं फंसता, जबकि इंसान है कि इन कर्म बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता:- न मां कर्माणि लिम्पन्ति न कर्मफले स्प्रहा. / इति मां योऽभिजानाति  कर्मभिर्न स बध्यते. कर्मों में लिप्त न होने के कारण इस इस ईश्वर में सुख-दुःख मोहादि गुण भी व्याप्त नहीं होते हैं. वह सदा आनंदयुक्त है. ईश्वर स्वयं आनंद युक्त है और मनुष्य उससे प्रार्थना करके इस आनंद को पाने की चेष्टा करता है. लेकिन फिर भी उसका आकर्षण भौतिक जगत में बना रहता है. इसलिए उसकी पहली प्रार्थना इन भौतिक साधनों को पाने की ही होती है. वह सदा प्रत्यनशील रहता है अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु.

ब प्रश्न यह उठता है कि क्या मनुष्य ही प्रार्थना करता है, या धरती के और जीव भी इस ईश्वर से प्रार्थना करते हैं. यह गहन शोध का विषय हो सकता है. इस विषय पर अभी कोई ऐसी बात सामने नहीं आई कि मनुष्यों के अलावा भी धरती पर रहने वाले जीव ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, और अगर करते हैं तो उनकी प्रार्थना में क्या शामिल रहता है? किस तरह के सुख की मांग वह ईश्वर से करते हैं. यह बड़ा रोचक और शोधपूर्ण विषय हो सकता है. अगर हम इस दिशा में कदम बढाते हैं तो ....! जहाँ तक मनुष्य की बात है वह इस दिशा में एकदम भिन्न किस्म की मानसिकता रखता है, और कभी-कभी तो ऐसा आभास होता है कि इस विविधता के पीछे भी कोई ईश्वरीय विधान छुपा है. लेकिन जहाँ तक प्रार्थना की बात है वह किसी तर्क और तथ्य से परे होती है. उसमें व्यक्ति का कर्म और उसके मन की पवित्रता भी मायने रखती है. कई बार देखा गया है कि कोई मनुष्य प्रार्थना करता है तो वह पूरी नहीं होती, और कई बार उसे उसकी प्रार्थना के बदले में उसकी सोच से भी बढ़कर मिलता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति हमेशा असमंजस की स्थिति में रहता है और जीवन के अंतिम पड़ाव तक वह यह तय नहीं कर पाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? उसे प्रार्थना के बल पर सब कुछ मिल जायेगा या उसे कर्म करना चाहिए. दुआ और कर्म इन दोनों के बीच वह हमेशा पिसता रहा है. धर्म गुरु कहते हैं कि तेरे कर्मों से कुछ भी नहीं होने वाला है, जो कुछ भी होगा ईश्वर की कृपा से ही होगा और दूसरी बात वह यह भी कहते हैं कि "भगवान हमेशा भक्त के वश में रहता है. "दोनों बातों पर अगर विचार करते हैं तो विरोधाभास स्वतः ही पैदा हो जाता है. अब मनुष्य क्या करे भाग्य को देखे या कर्म के फल को? यह ऐसी बातें हैं जिन पर हम सोच विचार तो कर सकते हैं लेकिन किसी अंतिम निर्णय तक पहुंचना टेढ़ी खीर के समान है. शेष अगले अंकों में...!!!!! 

21 दिसंबर 2010

अनुभूति और सत्य

55 टिप्‍पणियां:
कदमों के निशां .
जन्म के बाद की
आनिश्चितताएँ
और
जीवन के अंतिम पड़ाव से पहले
सांसों के इस सफ़र में
मेरी जिन्दगी
जिन राहों से गुजरेगी
मुझे तय करना है ....
कि.....
उन राहों पर
मेरे कदमों के निशां
रहेंगे या नहीं ।
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx




इबादत
वो क्या खाक इबादत
खुदा की करेंगे
जो .....
इंसानों से नफरत
करते हैं .....
और पत्थरों को
खुदा समझ बेठें हैं ।
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अंतिम सत्य
जीवन की क्षणभंगुरता

और मृगतृष्णाओं के द्वंद्व के बीच
मेरी 'रूह' हमेशा कहती है
जीवन का अंतिम सत्य
प्रकाश को पाना है ...
बंधन मुक्त हो जाना है .
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06 अक्टूबर 2010

आखिरी है ...!

1 टिप्पणी:

वो दिन पहला था ,यह दिन आखिरी है
तुमसे हो रहा जो आज , यह मिलन आखिरी है ।

जाने किस मंजिल और किस राह के हम राही
दिल में है जो कशिश , उसकी चुभन आखिरी है ।

वयां करना कैसे छोड़ें हम इश्क -ए - जज्बात
तुम्हें अपना बनाने का, यह जतन आखिरी है

तुम ख्वाबों में रहोगे, या दिल में तस्वीर बनकर
परवाने का शम्मा पर , यह जलन आखिरी है ।

बनते थे तुम्हीं से ,यह गीत और ग़ज़ल मेरे
बजा रहा हूँ जिसे आज वो धुन आखिरी है

लाख इबादत की हमने आपकी मोहब्बत में
केवल जोड़ रहा हूँ , जो हाथ वो नमन आखिरी है