10 फ़रवरी 2014

प्रेम का बाजार भाव...1

प्रेम एक ऐसा शब्द जो हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है, एक ऐसा भाव जिसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, और एक ऐसा जूनून जो हमें जीवन के मायने सिखाता है. प्रेम मनुष्य ही नहीं बल्कि हर प्राणी के जीवन का आधार है. दुनिया में जो कुछ भी हमारी समझ में आज तक आया है, वहां प्रेम की अभिव्यक्ति अवश्य होती है. मनुष्य ही नहीं बल्कि जितने भी जीव हैं वह प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं, और उसके माध्यम से वह अपने जीवन को दिशा देते हैं. इसलिए इस धरा पर समाज और व्यक्ति को जोड़ने की जो कड़ी है वह प्रेम ही है. प्रेम व्यक्ति को सामाजिक बनाता है, दूसरों के हितों के प्रति सोचने के लिए प्रेरित करता है और जहाँ पर हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई कार्य करते हैं तो वहां हम दुनिया से अलग हो जाते हैं, हमारा नजरिया बदल जाता है. प्रेम की शक्ति अद्भुत है और इसी कारण इसका वर्णन कई तरह से किया गया है और इसकी महता भी कई तरह से बताई गयी है. हर व्यक्ति के लिए प्रेम के मायने अलग हैं, लेकिन वास्तविक प्रेम तो वही है जहाँ हम अपने आप को मिटाकर सिर्फ और सिर्फ दूसरों के हित का चिन्तन करते हैं और बदले में किसी प्रकार की कोई आशा नहीं करते हैं. इसे सच्चे प्रेम की निशानी तो नहीं बल्कि प्रेम की चरम सीमा कह सकते हैं, प्रेम का शुद्धतम और उच्च स्वरूप कह सकते हैं. क्योँकि जहाँ प्रेम है वहां सच और झूठ जैसे शब्द नहीं होते. जिसने प्रेम किया बस किया, वहां सच-झूठ का कोई प्रश्न नहीं. प्रेम है तो बस प्रेम और नहीं है तो सिर्फ औपचारिक्ताएं.

एक दृष्टि से अगर देखा जाए तो इस दुनिया में प्रेम के बिना कुछ भी नहीं है. सब कुछ होते हुए भी अगर प्रेम रूपी भाव जीवन में नहीं है तो वहां जीवन का आनंद नहीं है, भौतिक सुख सुविधाएं हमारे जीवन संघर्ष को कम अवश्य कर सकती हैं, लेकिन वह हमें प्रेम जैसा भाव नहीं दे सकती. हम जितनी भी भौतिक उन्नति कर लें और बेशक हम अपनी उन उपलब्धियों पर गर्वित हों, लेकिन जीवन की उन सफलताओं में भी प्रेम की महता बहुत महत्वपूर्ण है. उसके बिना जीवन का हर पक्ष अधूरा है, और जिस व्यक्ति के जीवन में प्रेम नहीं है, जो निकृष्ट है वह किसी भी स्थिति में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है. क्योँकि उसमें जीवन का वह आधार भाव ही नहीं है जो उसे पूरी सृष्टि के प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाता है, और जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता नहीं वह जी कर भी क्या करेगा? जीवन के अगर वास्तविक मायने हैं तो वह प्रेम के कारण ही हैं, संवेदनशीलता के कारण ही हैं. क्योँकि संवेदनशीलता जब तक व्यक्ति के जहाँ में तब तक वह दूसरों के हित को सर्वोपरि रखते हुए अपने जीवन की दिशा का निर्धारण करता है और अंततः अपने जीवन के साथ-साथ दूसरे प्राणियों को जीवन जीने में सहायता करता है.

प्रेम के अनेक पक्ष हैं, एक बालक जब धरा पर जन्म लेता है तो उसके जीवन की शुरुआत प्रेम से ही होती है.
सबसे पहले उसे उसके माता-पिता का प्रेम मिलता है और वहीँ से उसके जीवन का सफ़र शुरू होता है. जीवन की जितनी भी स्थितियां और पड़ाव आते हैं वहां उसे प्रेम की आवशयकता पड़ती रहती है. कहीं पर भाई-बहनों का प्यार, कहीं दोस्तों का प्यार, कहीं समाज के लोगों का प्यार उसे जीवन के हर मोड़ पर प्रेरित करता है और एक व्यक्ति जीवन सफ़र को तय करते हुए आगे बढ़ता जाता है, उपलब्धियां अर्जित करता जाता है और अंततः उसे यह आभास होता है कि प्रेम ही सब कुछ है और प्रेम के बिना जीवन के कोई मायने नहीं. क्योँकि समाज में ऐसी भी स्थिति देखी गयी है कि व्यक्ति के पास भौतिक सुख सुविधायें होते हुए भी प्रेम के आभाव में उसे जीवन की सार्थकता कहीं नजर नहीं आती, इसलिए कई बार व्यक्ति अवसाद ग्रस्त हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाने से भी नहीं हिचकता. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि प्रेम जीवन का आधार है उसके बिना जीवन की कल्पना करना बेमानी सा लगता है. जितनी भी संस्कृतियों ने आज तक जन्म लिया है उनके मूल में भी प्रेम की भावना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिन्हें हम दुनिया की उच्च संस्कृतियाँ कहते हैं उन्होंने भी मनुष्यता के प्रति प्रेम के बीज बोने का काम किया है, इसलिए उनकी महता भी किसी से कम नहीं है. मनुष्य किसी भी समाज का हिस्सा हो लेकिन प्रेम की आवश्यकता उसे हर मोड़ पर पड़ती है. इसलिए प्रेम को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया है.

प्रेम के विषय में जितना भी वर्णन किया जाय कम है, क्योँकि यह अनुभूति का विषय है. हम इसे किसी भी तर्क से सिद्ध करने की कोशिश भी करें तो इसकी थाह लेना आसान नहीं. हम ऐसा कभी भी सिद्ध नहीं कर सकते कि कोई किसी से कितना प्रेम करता है, करता भी है या नहीं. अगर वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम में करने जैसा कुछ भी नहीं है, यहाँ सब कुछ होने जैसा है, व्यक्ति के वश में कुछ नहीं है. सब कुछ अपने आप होने वाला है, बस व्यक्ति को खुद को समर्पित रखना होता है और अपने भावों को सही दिशा देने का प्रयास करना होता है. अगर व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तो उसे इस तरफ जोर लगाने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. प्रेम में तो सब कुछ सहज में घटित होता है. क्योँकि यह विशुद्ध रूप से अनुभूति का विषय है. हर किसी व्यक्ति के जीवन में प्रेम का अपना अनुभव होता है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. लेकिन जो प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर प्रेम करते हैं, प्रेम का वास्तविक आनंद तो वही ले पाते हैं. क्योँकि जहाँ हम अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करके प्रेम करने की कोशिश करते हैं वहां हम सामने वाले को तो धोखा दे सकते हैं, लेकिन प्रेम का जो वास्तविक आनंद है उसे प्राप्त नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में हमें अपने मन को एक बार नहीं हजार बार टटोलने की आवश्यकता होती है. लेकिन जो सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वह विरले ही होते हैं.   शेष अले अंक में......!!!               

6 टिप्‍पणियां:

  1. भावनातमक लगाव कहीं खो गया है ...प्रेम के अर्थ भी समय के साथ बदले रहे हैं ....

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  2. अनुभूति का विषय है प्रेम और हम उसे सदा नापने में लगे रहते हैं।

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  3. प्रेम बस एक अनुभूति है जो दिल से दिल तक जाती है ... अच्छा आलेख ..

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  4. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  5. कल 14/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर

    [प्यार का गुल खिलाने खतो के सिलसिले चलने लगे..हलचल का Valentine विशेषांक ]

    धन्यवाद !

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जब भी आप आओ , मुझे सुझाब जरुर दो.
कुछ कह कर बात ऐसी,मुझे ख्वाब जरुर दो.
ताकि मैं आगे बढ सकूँ........केवल राम.