राम और रावण इतिहास के दो प्रसिद्ध व्यक्तित्व हुए हैं। दोनों की प्रसिद्धि एक दूसरे के समकक्ष है।
एक दृष्टि से देखा जाये तो दोनों का व्यक्तित्व विराट है। पर दोनों की प्रसिधी के क्षेत्र अलग-अलग है। एक को मर्यादा पुरशोतम कहा जाता है तो,दूसरे को मर्यादा तोड़ने के कारण याद किया जाता है। रावण कभी राम की बात नहीं मानता, पर राम फिर भी उससे आग्रह करते हैं। राम की सीता का हरण करने के पश्चात भी राम उसे समझाते हैं, परन्तु वह अपने हठ पर अड़ा रहता है अन्ततः उसका क्या हश्र होता है इस बात को आप भली भांति जानते हैं. राम और रावण को हम किस रूप में लेते हैं यह सब हमारी सोच पर निर्भर करता है। पर इतना जरुर है राम और रावण दोनों हमें जिन्दगी के वास्तविक सत्यों के काफी करीब ले जाते हैं और दोनों हमें आत्मविश्लेषण का मौका देते हैं ,अनुसरण का मौका देते हैं। हम किसका अनुसरण करते हैं यह हम पर निर्भर करता है। मैं जहाँ तक सोचता हूँ, एक समय में व्यक्ति एक का ही अनुसरण कर सकता है। दो का नहीं, व्यक्ति का आदर्श एक होता है दो नहीं। हमारे आदर्श कौन हैं ? यह हमें पता होगा ! एक पल के लिए हम रावण के व्यक्तित्व का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि, रावण लंका का राजा था। वह वेदों का प्रकांड विद्वान था। रावण भक्त भी था, और बहुत पराक्रमी योद्धा भी आखिर इतनी विशेषताएं होने के बाबजूद भी रावण को समाज में नफरत कि दृष्टि से क्योँ देखा जाता है? कोई न कोई कारण तो जरुर होगा। अपने एक निबंध मैं कुबेरनाथ राय ने रावण को अधर्म का नहीं बल्कि प्रति धर्म का प्रतीक कहा है ।
रावणअपने आप में एक प्रतीक है। जो हमें समझाता है कि ज्ञान, विद्या, पराक्रम, भक्ति आदि चाहे व्यक्ति के पास किसी भी हद तक क्योँ न हो अगर अहंकार हम में विद्यमान है तो हम शिखर पर होते हुए भी नीची सोच के कारण ऊंचाई को नहीं छु पाते, और हम इतने गिर जाते हैं कि हमारा नाम ही किसी को कष्ट देने का कारण बन जाता है। अहंकार के कारण व्यक्ति कि सकारात्मक सोच पर पर्दा गिर जाता है। और मद के नशे में चूर व्यक्ति फिर जो भी कर्म करता है उससे उसका कल्याण तो होना तो दूर , वह कर्म दूसरों के लिए भी सही नहीं होता। और फिर उसे रावण कि तरह हर साल जलना पड़ता है। जब हमारे मन में अहंकार आता है तो फिर हम भाषा के आधार पर, जाति के आधार पर, मजहब के नाम पर, उंच नीच के आधार पर, सरहदों के आधार पर, न जाने कितने भ्रम हमें अँधा कर देते हैं और हम मानवता के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं।
वर्तमान संदर्भों को अगर हम देखें तो स्तिथि और भी भयानक प्रतीत होती है। आज हर मोड़ पर रावण के दर्शन हो जाते हैं, किसी शायर ने क्या खूब लिखा है :-
राम वालों को इस्लाम से बू आती है ,
अहले इस्लाम को राम से बू आती है ।
क्या कहें दुनियां के हालात हैं इस कदर ,
यहाँ इंसान को इंसान से बू आती है ।
अहले इस्लाम को राम से बू आती है ।
क्या कहें दुनियां के हालात हैं इस कदर ,
यहाँ इंसान को इंसान से बू आती है ।
आज के परिप्रेक्ष्य में में देखा जाये तो हम बहार से राम बनने कि कोशिश करते हैं लेकिन हमारे भीतर रावण हमेशा विद्यमान रहता है। और वह इतना हाबी हो जाता है कि हम कोई भी कर्म करें, उसमें उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। ऐसी हालात हम कहाँ सही निर्णय ले पाएंगे, और जब सही निर्णय नहीं होंगे तो वर्तमान समाज कि तस्वीर कैसे बदलेगी।
आज एक और बात भी देखी जाती है कि इन्सान का मानसिक स्तर काफी गिर चुका है। नैतिकता तो उसके लिए कल्पना करने के सामान है । भ्रष्टाचार तो उसकी जिन्दगी का लक्ष्य बन चुका है । आये दिन चोरी, डकैती, बलात्कार, लूटपाट आदि यह सब क्या रावणत्व के कारण नहीं है । तो फिर हम किस रावण को जलाते हैं, और फिर किस राम कि हम पूजा करते हैं । किस लिए हम दशहरा मानते हैं, और क्यों हमारे घरों में दिवाली होती है, कभी इस बात पर विचार किया? नहीं आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई । अगर ख्याल आया भी तो हमने गौर नहीं किया .... और जीते रहे जिन्दगी, बस यूँ ही खत्म हो गया सांसों का सिलसिला .... ! राम हमारे आदर्श कभी नहीं बन सके इस बात का अफ़सोस जताते हुए हम संसार से विदा हो गए ।





