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16 अगस्त 2012

अधूरी क्रान्ति....पूरा स्वप्न...2

2 टिप्‍पणियां:
भ्रष्टाचार को मिटाने की आस लिए जनता की आँखों की चमक बढ़ रही है ...अब तो सब सही होकर ही रहेगा ....इतने में फिर दृश्य बदल जाता है ....! गतांक से आगे  
एक तरफ भ्रष्टाचार पर बात हो रही थी और लोग हैं कि फिर इसी का सहारा ले रहे हैं. भीड़ बढ़ रही है लेकिन वहां जो भी व्यक्ति हैं सबके सब अपने स्वार्थों से जुड़े हुए हैं. किसी को देश कि चिन्ता नहीं है. सबका अपना-अपना नज़रिया है इस क्रान्ति के पीछेकोई व्यक्तिगत प्रभाव से आया है तो किसी को घूमने की फुर्सत मिल गयी हो जैसेकोई इस आन्दोलन में शामिल होकर अपना रुतवा कायम करना चाहता हो जैसे. यहाँ जितने लोग हैं बेशक उनका मंच एक है लेकिन मंतव्य सबके अलग-अलग हैं. मैंने बड़ी गहराई से देखा कि जो लोग मंच पर आसीन हैं जो भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अनशन पर बैठे हैं वह भी कहीं न कहीं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं. कहीं न कहीं पर उनके जहन में भी देशभक्त होने का भाव है . गौरव से उनकी गाथा लिखी जाए यह सोच भी वह रखते हैं . इतिहास को बदलने की मादा रखते हैं और जब वह मुंह खोलते हैं तो ऐसा लगता है कि सकारात्मक बातें इन्हें करनी ही नहीं आती और लोग हैं कि इनकी बातों पर ताली पीटते हैं और इनका उत्साह बढाते हैं. बस यही संतोष इनके मन मैं है और 121 करोड़ की आबादी वाले इस देश के दस-पंद्रह हजार व्यक्ति इनके साथ हो लिए तो उसे यह बड़ी सफलता मान रहे हैं और उस भीड़ को देखा तो वहां कोई भी सच्चा देशभक्त नजर नहीं आया. मैं बड़ा असमंजस की स्थिति में हूँमंच जैसे रंगमंच हो गया हो. जहाँ एक ही पात्र आता है लेकिन हर बार उसकी भाषा बदल जाती है और और उसका अभिनय भी......मैंने देखा कुछ लोग मेरी चुप्पी को भांप जाते हैं और उनकी नजरें मुझ पर टिक जाती हैं. मैं थोडा सा खुद सँभालने की कोशिश करता हूँ.  लेकिन उन्हें लगता है कि मैं कोई जासूस हूँ. एक पूर्ण भारतीय को वह शक की नजर से देखते हैं. हा..हा..हा..!
इतने में एक नया नजारा मेरी आँखों के सामने आता है. सामने से भीड़ आ रही है और सारा पंडाल नारों से गूंज रहा है. भारत माता की जय...वन्दे मातरम्एक संत देश बचाने निकला है...ऐसे नारे लग ही रहे थे कि...एकव्यक्ति आता है वह कहता है ...एक संत देश चबाने निकला है ....बस फिर क्या थाभ्रष्टाचार पर भाषण देनेवालों को किसी को गाली देना भ्रष्टाचार नहीं लगता. वह देश को गाली देते हैंदेश की जनता के प्रतिनिधियों को गाली देते हैंदेश के लोगों की खिल्ली उड़ाते हैं. उन्हें उनका चुनाव गलत लगता है. जो व्यवस्था आज है वह किसी भी तरीके से सही नहीं हैपता नहीं कौन सी व्यवस्था लाना चाहते हैं. बातें बड़ी-बड़ी करते हैं और संभवतः बात करना मूर्खों के लिए आसान होता हैऔर जिम्मेवार बात करने से पहले सोचता है और जब वह कोई निर्णयलेता है तो उसे निभाने की पूरी क्षमता रखता है. लेकिन मैं इस व्यक्ति को देखकर हैरान हूँ. मैदान छोड़कर भागना कोई इनसे सीखे....आज तो भगवे वस्त्र धारण किये हैं लेकिन वेश बदलना इन्हें अच्छे से आता है. आखिर संत जो ठहरे यहाँ संतों की शक्ति में बड़ा विश्वास किया है. सच को सच साबित करने के लिए हमारे देश के संतों ने जलते हुए तवे पर भी परीक्षा दीदीवारों में भी चिनवा दिया तो कोई परवाह नहीं की लेकिन अपने लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटे.
लेकिन यह संत ऐसे हैं कि समय आने पर इन्हें तलवार उठानी चाहिए थीक्योँकि गुरु गोबिंद सिंह जी ने यही किया था, इन्होंने एक नया सिद्धान्त प्रतिपादित किया....जब सांस खतरे में हो तो तलवार नहीं-सलवार उठा लोऔर फिर भाग जाओ मैदान छोड़ करलक्ष्य गया भाड़ में बस खुद का बचाव कर लो और फिर कह दो कि हमें मारने की साजिश रची गयी थी और हम हैं कि बच निकले...जो लोग देशभक्तों की बातें करते नहीं थकते उनके आदर्शों की चर्चा करते नहीं थकते वह आज इस तरह से भाग निकले ....समझ नहीं आया ..जिन्होंने देश से सच्चा प्रेम किया उन्होंने अपने कर्मों द्वारा ऐसे सिद्धान्त प्रतिपादित किये कि आज हम उनका अनुसरण करते हैंउन्होंने सिद्धान्तों की चर्चा नहीं की लेकिन जीवन ऐसा जिया कि हर कर्म सिद्धान्त बन गया. मैं ऐसा विश्लेषण कर ही रहा हूँ और आगे बढ़ रहा हूँ.....! मैं कभी वर्तमान को देख रहा हूँ तो कभी भूत को याद कर रहा हूँ ...ऐसे लग रहा है कि मैं दो नावों में सवार हो गया हूँ और भूतकाल की नाव मुझे ज्यादा गौरवान्वित कर रही है और इतने में मैं उस भीड़ से उठ खड़ा होता हूँ. सब मेरी तरफ देखते हैं. मैं मंच पर जाने की कोशिश करता हूँ लेकिन मुझे रोक दिया जाता है. मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीँ छिन जाती हैजिस मंच से हर प्रकार की स्वतंत्रता की बात की जा रही है.
इतने में फिर दृश्य बदल जाता है..........एक सूनापन....मेरे सामने है. मैं सोच रहा हूँ अब क्या किया जाए....मैं खुद असमंजस की स्थिति में हूँ...सारे देश की जनता गुमराह है. बुद्धिजीवी अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैंनेताओं का अपना नज़रिया है. प्रशासनिक अधिकारी अपना दिमाग लगा रहे हैं उन्हें अभी भी अपनी लाभ हानि नजर आ रही है. पत्रकार असमंजस में हैकिसे खबर बनाएं. क्या कहेंक्या लिखें...इधर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपनी टीआरपी की भी चिन्ता है. सब अपना-अपना लाभ सोच रहे हैंसब अपना एक सुरक्षित किनारा तलाश रहे हैं जहां यह चैन से भी रह सकें और तमाशा भी कर सकेंयह बात मेरी समझ से बाहर है. मेरी बुद्धि मुझे झिनझोड़ती है और फिर मुझसे सवाल करती है??? कब तक तुम इस तरह तमाशा देखते रहोगेआखिर जब तुम सब सच-सच जानते हो तो क्योँ झिझक रहे होसच को जनता के सामने ला दो. मैं अपने अंतर्मन की आवाज को सुनता हूँ और जहां मैं खड़ा हूँ वहीँ से सामने वाली जनता को पुकारता हूँ.....भारत माता की जय.....सब मेरे जय घोष में शामिल होते हैं.....मैं मंच पर बैठे लोगों से आहवान करता हूँ कि मुझे थोडा सा वक़्त दिया जाये एक आम नागरिक होने के नाते ताकि मैं अपनी भावनाएं जो विशुद्ध रूप से देश प्रेम के कारण मेरे जहन में उठ रहीं हैं उन्हें आप सबके साथ सांझा कर सकूँ.....फिर मैं जनता को संबोधित करता हूँ.....! लेकिन मेरा संबोधन अलगे अंक में ...!

07 अगस्त 2012

अधूरी क्रान्ति....पूरा स्वप्न...1

32 टिप्‍पणियां:
रात को अपने सब काम निपटाने के बाद मन किया थोडा सा नेट पर देखा जाये क्या चल रहा है, इसलिए जीमेल खोल दिया, यहाँ कोई नहीं दिखाई दिया, ठीक है फेसबुक की तरफ बढ़ते हैं. यहाँ कुछ अपडेट्स हैं चलो पढ़ते हैं, लाइक करते हैं, टिप्पणी करने से मुझे गुरेज है. फिर चलो नींद आ रही है सो जाता हूँ. सोने से पहले मुझे आदत है कुछ पढने की, किताब पढ़ लेता हूँ और खासकर कोई अध्यात्म की किताब, आज ना जाने मन क्योँ कह रहा है जल्दी सोया जाए. ठीक है सो लेते हैं. लाईट बंद करके हम सो गए. अब असली माजरा शुरू होता है. मैं अब होश में नहीं हूँ नींद ने पूरी तरह से मुझे जकड लिया है शांत चित होकर सोया हूँ नींद भी अच्छी आ रही है. रात के 11 बजकर 45 मिनट पर सोया हूँ, इसलिए अगला दिन शुरू होने में 15 मिनट हैं ठीक है सो लेता हूँ. यूं मुझे सपने देखने की आदत नहीं है, और जब भी सपने देखता हूँ बंद आँखों से नहीं बल्कि खुली आँखों से….आज ना तो मेरी आँखें पूरी तरह से बंद हैं ना ही खुली.......मेरी आँखों में एक प्रश्नचिन्ह है??? लेकिन फिर भी खुद को संभाले हुए हूँ और पूरी तत्परता से सोने की तैयारी कर रहा हूँ....हा..हा..हा..सोने के लिए भी किसी को क्या तैयारी करनी पड़ती है? मैं भी क्या कमाल हूँ......!
अब धीरे-धीरे स्वप्न आगे बढ़ता है. मैं तैयार होकर घर से निकला हूँ. आज ऑफिस में कार्यक्रम है जल्दी जाना है, जरा अच्छे बनके जाना है. ब्रांडेड कपडे और जूते पहने हैं, घडी भी विदेशी कम्पनी की है एकदम मस्त लग रहा हूँ. अचानक दृश्य बदलता है. अपनी गाड़ी में हूँ कहीं से आवाज आ रही है देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है...मैं मन ही मन सोचता हूँ यह कौन सी नयी बात है यह तो आजकल हर कोई कहता है. हम गाड़ी की रेस बढाते हैं आगे बढ़ते हैं. फिर थोड़ी दूर जाकर जाम लगा है लोग उस रैली के लिए आ रहे हैं और बड़ा उत्साह है. हर किसी के मन में जज्बा है...हर कोई कह रहा है अब तो मरकर ही दम लेंगे मैं फिर हँसता हूँ, ‘अरे मर कर कौन है जो दम लेता है, और जो दम लेता है उसे मरा हुआ नहीं कहते’....मुझे हंसी आती है लोगों की बातों पर कितने भोले हैं बेचारे बात करने से पहले सोचते तक नहीं. चलो क्या कहा जाए...मैं मशगूल हूँ उनकी बातों पर चिंतन में और मुझे ऑफिस की याद आती है. हाय!!!!!!! हाय!!!!!!!!!!!!!!! अब क्या होगा? फिर उधेड़बुन है....!
इतने में फिर दृश्य बदलता है कहीं से आवाज आती है आज पूरे शहर के लोग यहाँ हैं और आप में से हर कोई जानता है कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ रह है...सब तालियाँ बजाते हैं, अपने घर और शहर की बेइज्जती  करते हुए उनके चेहरे पर जो ख़ुशी छलक रही थी उसका कोई अनुमान नहीं.... मैं आगे बढ़ता हूँ. मंच की तरफ देखता हूँ तो एक सुन्दर सा मंच सजा है 10-12 लोग बैठे हैं सबकी निगाहें मंच की और हैं इतने में एक व्यक्ति खड़ा होता है और मंच से लोगों को संबोधित करना शुरू करता है. ‘आप सभी आज यहाँ आये हैं देश की समस्याओं पर चिंतन करने के लिए...आपको पता है देश में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है, सब तालियाँ बजाते हैं. भाषणकर्ता के चेहरे पर ख़ुशी छा जाती है, वह और जोश से बोलना शुरू करता है. इस देश की संसद में बैठे लोग भ्रष्ट हैं, सब के सब चोर हैं इन लोगों ने देश को बेचने की योजना बना रखी है और आये दिन यह इस देश को बेच रहे हैं विदेशियों के हाथों और खुद भी इस देश को लूटने के लिए तैयार बैठे हैं. वह सीधे  संवाद की मुद्रा में लोगों से प्रश्न करता है......क्या आपको पता है अगर हमारा यह कानून पास हो जाए तो देश के आधे से ज्यादा मंत्री जेल में होंगे, फिर तालियाँ....फिर वह नाम गिनना शुरू करता है...10-15 नाम जब तक नहीं लिए जाते सांस ही नहीं लेता है....वाह क्या बात है....इधर भाषणकर्ता भाषण देने में मशगूल है ...अचानक वह अपने सामने  देखता है और उसका जोश कम हो जाता है??? सबके चेहरे पर मायूसी छा गयी...अरे क्या हुआ किसी की समझ में नहीं आ रहा था ‘उसने भाषण देना इसलिए बंद कर दिया क्योँकि ना तो वहां पर्याप्त भीड़ थी और न ही कोई कैमरा उसकी इन बातों को रिकॉर्ड कर रहा था, वहां न कोई माइक था और न ही कैमरे की फ्लैश बार बार चमक रही थी....चलो ठीक है. बोलने वाला अपना भाषण संक्षिप्त कर देता है. फिर एक मंत्रणा होती है. देश से भ्रष्टाचार मिटाना है, इसलिए अब हम सामूहिक अनशन करेंगे, और यह दूसरी अगस्त क्रांति होगी....लोग भीड़ में कह रहे हैं...जी नहीं यह तीसरी अगस्त क्रांति होगी...क्योँकि आपकी इस बेलगाम टीम के वरिष्ठ सदस्य ने  पिछले वर्ष 2 बार अनशन किया था आप उनके योगदान को क्योँ भूल रहे हैं...जी नहीं मेरा मतलब यह नहीं था....फिर सन्नाटा...अब अनशन शुरू होता है...अच्छा खासा मंच सजता है..नारे लगते हैं...और लोग आगे बढ़ते हैं...!!!!!!
इतने में एक आदमी आता है और वह पूछता है अरे भाई ‘अगर आपका यह कानून पास हो गया तो में भी जेल में हूँगा’ अच्छा कोई बात नहीं हम उस मांग को हटा देते हैं और मुझे हंसी आती है. हमारा मकसद तो देश की एक विशेष पार्टी का विरोध करना है. इसलिए हम कानून का मुखौटा पहनकर, अनशन को हथियार बनाकर लोगों की भीड़ जुटाकर अपना मतलब सिद्ध कर रहे हैं. कल हमें भी वहीँ जाने की इच्छा है जहाँ यह सब चोर बैठे हैं. सामने से वह व्यक्ति प्रश्न करता है. आप भी वहां पहुँच कर ऐसे ही हो जाओगे....नेता कहता है..तब का तब देखा जाएगा...आम आदमी का ध्यान उधर नहीं है...पर्दे के पीछे एक नया खेल खेला जा रहा है.....भ्रष्टाचार को मिटाने की आस लिए जनता की आँखों की चमक बढ़ रही है...अब तो सब सही होकर ही रहेगा ....इतने में फिर दृश्य बदल जाता है ....! बाकी दृश्य अगले अंकमें..!!! 

15 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता...2

45 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे...भ्रष्टाचार की लीला भी अजीब है. यह कभी मेज के नीचे आता है तो कभी मेज के उपरकभी पंच सितारा होटल में किसी उच्च स्तरीय बैठक में पहुँच जाता है तोकभी देश की संसद में प्रश्न पूछने के बहाने पहुँच जाता हैकभी यह नेता के पास जाता है तोकभी बड़े-बड़े प्रशासनिक  अधिकारियों के पासकभी यह चारा खाता है तोकभी तीसरी पीढ़ी के टेलीफ़ोन पर ढेर  सारी बातें करता हैकभी खेल के नाम पर अंधाधुंध धन बहाता है. इसकी खूबियों की क्या चर्चा करूँ और इसकी व्यापकता का अहसास करने के लिए मुझे भी साधना करनी पड़ेगीऔर इसको धारण करने के लिए किसी बड़े भ्रष्टाचारी गुरु के जीवन को जानना होगा. वर्ना इसकी लीला को समझना मेरे वश की बात नहींहाँ यह जरुर है कि यदा-कदा इसके दर्शन मुझे भी होते रहे हैंऔर यह जरुर है कि इसने अपनी लीला का आभास करवाया है.
लेकिन मैंने काफी हद तक उस लीला को नजरअंदाज भी किया है. यह भी एक विडंबना देखिये पिछले 10-15 सालों से में देख रहा हूँ कि हमारे देश या राज्यों की राजनितिक पार्टियाँ अपने चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात करती रहीं हैलेकिन जैसे ही उन्हें सत्ता मिलती हैकानून व्यवस्था जैसे ही उनके हाथ में आती है वैसे ही भ्रष्टाचार के रंग में वह रंगना शुरू हो जाते हैंऔर फिर ऐसे लगता है कि यह भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि उसे सरंक्षण देने के लिए सत्ता में आये होंसरंक्षण ही नहीं उसे बढाने के लिए भीमैंने देखा है कि जब कोई व्यक्ति राजनीति में आता है तो वह 5 वर्षों के शासन में एक अच्छा सा घरगाड़ी और भी बहुत सी सुविधाओं  का मालिक बन जाता हैजनता की सेवा तो कहाँजनता को खुद की सेवक समझता है. उसकी नियत बदल जाती है और अब नियत बदली है तो कर्म का बदलना स्वाभाविक हैऔर ऐसा कोई एक रात में नहीं हुआ इस पम्परा को स्थापित करने में भी बहुत से लोगों ने मेहनत की इस उक्ति को चरितार्थ किया बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा  उन्होंने सोचा काम चाहे हम जैसा भी करें लेकिन नाम होना चाहिए. फिर चाहे कुछ भी हो जाए देश के किसी भी व्यक्ति का हित दाव पर लग जाए कोई फर्क नहीं पड़ताबस यह सिलसिला चल पड़ा और आज यह अपनी चरम सीमा को लाँघ रहा है. जहाँ अमीर ओर अमीर  होता जा रहा है ओर गरीब ओर गरीब होता जा रहा है. एक व्यक्ति दो वक़्त की रोटी के लिए दिन रात मेहनत कर रहा है  फिर भी उसका पेट नहीं भरता है. ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जिनके बारे में सोचकर दिल दहल जाता हैदिमाग चकरा जाता है. लेकिन सबका आलम एक सा ही बना रहता है.
भ्रष्टाचार एक विषाणु की तरह है. दूसरे शब्दों में इसे एड्स कहना चाहिए. प्रारम्भ में व्यक्ति को इसका पता नहीं चल पाता लेकिन जब वह रोगी हो जाता है तो फिर इसका कोई इलाज नहींहमारे देश में  बड़े-बड़े रोगी पाए जाते हैं भ्रष्टाचार के ओर हमारे यहाँ कोई कानून व्यवस्था  ऐसी नहीं कि हम उसे नियन्त्रित कर सकें अगर होती तो फिर यह रोगी आवारा घूम नहीं रहे होते. हाँ अगर इन्हें कहीं किसी तरीके से जेल जाना पड़ता है तो भी अपने साथ उस आदत को ले जाते हैं जहाँ पर जेल के नियमों को ताक पर रख दिया जाता है ओर फिर कुछ दिन बाद यह बाहर. कईयों को तो वह भी नसीब नहीं होता व तो अपना काम इस तरीके से करते हैं कि रोग भी उन्हें होता है ओर उनके इलाज का कोई बंदोबस्त भी नहीं. खैर यह सब होता रहा है इस देश में ओर इसके समाप्त होने की सम्भावना अभी नजर नहीं आती?
लेकिन फिर भी इनसान को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए और ऐसे प्रयास हर स्तर पर होते रहे हैं कि इन भ्रष्टाचारियों को समाप्त किया जाएएक प्रश्न सबसे पहले उभर कर आता है कि क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक ही तरफ से हो रहा है. हम ज्यादातर अपनी राजनितिक व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं नेताओं को दोषी मानते हैं. यह हो सकता है कि उनका दोष ज्यादा है वह अपना उतरदायित्व पूरी कर्तव्यनिष्ठा से नहीं निभा पाए. लेकिन किसी एक को तो दोषी नहीं माना जा सकता न. अगर हम किसी एक को ही दोषी मान रहे हैं तो हम सही विश्लेषण की अवस्था में नहीं पहुँच पाए हैं. हमें स्थितियों का पूर्वाग्रह रहित होकर विश्लेषण करना होगा और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है. किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और उसे क्रियान्वित करने से पहले हमें वास्तविक स्थिति के सभी पहलुओं को जांचना और परखना होगा फिर कोई कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से सफलता हमारे हाथ में होती है. अगले अंक में भी जारी...!!!

13 अक्टूबर 2010

रावण को क्योँ जलाते हैं, जब हम राम नहीं हो पाते हैं ..!

9 टिप्‍पणियां:
राम और रावण इतिहास के दो प्रसिद्ध व्यक्तित्व हुए हैं। दोनों की प्रसिद्धि  एक दूसरे के समकक्ष है।
एक दृष्टि से देखा जाये तो दोनों का व्यक्तित्व विराट है। पर दोनों की प्रसिधी के क्षेत्र अलग-अलग है। एक को मर्यादा पुरशोतम कहा जाता है तो,दूसरे को मर्यादा तोड़ने के कारण याद किया जाता है। रावण कभी राम की बात नहीं मानता, पर राम फिर भी उससे आग्रह करते हैं। राम की सीता का हरण करने के पश्चात भी राम उसे समझाते हैं, परन्तु वह अपने हठ पर अड़ा रहता है अन्ततः उसका क्या हश्र होता है इस बात को आप भली भांति जानते हैं. राम और रावण को हम किस रूप में लेते हैं यह सब हमारी सोच पर निर्भर करता है। पर इतना जरुर है राम और रावण दोनों हमें जिन्दगी के वास्तविक सत्यों के काफी करीब ले जाते हैं और दोनों हमें आत्मविश्लेषण का मौका देते हैं ,अनुसरण का मौका देते हैं। हम किसका अनुसरण करते हैं यह हम पर निर्भर करता है। मैं जहाँ तक सोचता हूँ, एक समय में व्यक्ति एक का ही अनुसरण कर सकता है। दो का नहीं, व्यक्ति का आदर्श एक होता है दो नहीं। हमारे आदर्श कौन हैं ? यह हमें पता होगा ! एक पल के लिए हम रावण के व्यक्तित्व का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि, रावण लंका का राजा था। वह वेदों का प्रकांड विद्वान था। रावण भक्त भी था, और बहुत पराक्रमी योद्धा भी आखिर इतनी विशेषताएं होने के बाबजूद भी रावण को समाज में नफरत कि दृष्टि से क्योँ देखा जाता है? कोई न कोई कारण तो जरुर होगा। अपने एक निबंध मैं कुबेरनाथ राय ने रावण को अधर्म का नहीं बल्कि प्रति धर्म का प्रतीक कहा है । 

रावणअपने आप में एक प्रतीक है। जो हमें समझाता है कि ज्ञान, विद्या, पराक्रम, भक्ति आदि चाहे व्यक्ति के पास किसी भी हद तक क्योँ न हो अगर अहंकार हम में विद्यमान है तो हम शिखर पर होते हुए भी नीची सोच के कारण ऊंचाई को नहीं छु पाते, और हम इतने गिर जाते हैं कि हमारा नाम ही किसी को कष्ट देने का कारण बन जाता है। अहंकार के कारण व्यक्ति कि सकारात्मक सोच पर पर्दा गिर जाता है। और मद के नशे में चूर व्यक्ति फिर जो भी कर्म करता है उससे उसका कल्याण तो होना तो दूर , वह कर्म दूसरों के लिए भी सही नहीं होता। और फिर उसे रावण कि तरह हर साल जलना पड़ता है। जब हमारे मन में अहंकार आता है तो फिर हम भाषा के आधार पर, जाति के आधार पर, मजहब के नाम पर, उंच नीच के आधार पर, सरहदों के आधार पर, न जाने कितने भ्रम हमें अँधा कर देते हैं और हम मानवता के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं।
वर्तमान संदर्भों को अगर हम देखें तो स्तिथि और भी भयानक प्रतीत होती है। आज हर मोड़ पर रावण के दर्शन हो जाते हैं, किसी शायर ने क्या खूब लिखा है :-
राम वालों को इस्लाम से बू आती है ,
अहले इस्लाम को राम से बू आती है ।
क्या कहें दुनियां के हालात हैं इस कदर ,
यहाँ इंसान को इंसान से बू आती है ।
आज के परिप्रेक्ष्य में में देखा जाये तो हम बहार से राम बनने कि कोशिश करते हैं लेकिन हमारे भीतर रावण हमेशा विद्यमान रहता है। और वह इतना हाबी हो जाता है कि हम कोई भी कर्म करें, उसमें उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। ऐसी हालात हम कहाँ सही निर्णय ले पाएंगे, और जब सही निर्णय नहीं होंगे तो वर्तमान समाज कि तस्वीर कैसे बदलेगी।

आज एक और बात भी देखी जाती है कि इन्सान का मानसिक स्तर काफी गिर चुका है। नैतिकता  तो उसके लिए कल्पना करने के सामान है । भ्रष्टाचार तो उसकी जिन्दगी का लक्ष्य बन चुका है । आये दिन चोरी, डकैती, बलात्कार, लूटपाट आदि यह सब क्या रावणत्व के कारण नहीं है । तो फिर हम किस रावण को जलाते हैं, और फिर किस राम कि हम पूजा करते हैं । किस लिए हम दशहरा मानते हैं, और क्यों हमारे घरों में दिवाली होती है, कभी इस बात पर विचार किया? नहीं आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई । अगर ख्याल आया भी तो हमने गौर नहीं किया .... और जीते रहे जिन्दगी, बस यूँ ही खत्म हो गया सांसों का सिलसिला .... ! राम हमारे आदर्श कभी नहीं बन सके इस बात का अफ़सोस जताते हुए हम संसार से विदा हो गए ।