07 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता ..1 ..


भारत माता की जय !! वन्दे मातरम !!! ज़िंदाबाद - मुर्दाबाद !!! आदि नारे किसी भी जुलूस या प्रदर्शन का हिस्सा  होते हैं . आजकल देखता हूँ कि यह नारे आम हो गए हैं . हर गली मोहल्ले में इनकी गूंज सुनाई  देती है . जब हम कोई विरोध या प्रदर्शन करते हैं तो, हम अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए इन नारों का प्रयोग करते हैं . इनका प्रयोग करना भी चाहिए, आखिर हम स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं . एक ऐसे  देश के नागरिक जहाँ का एक- एक वीर जवान विश्व को जीतने की क्षमता रखता है . मानवीय मूल्यों की रक्षा करना उसके जीवन का परम लक्ष्य है . उसने अपने जीवन का लक्ष्य यूँ निर्धारित किया है " अपने लिए जिया तो क्या जिया , है जिन्दगी का मकसद औरों के काम आना " और यही भावना उसे अपने प्राणों तक की आहुति तक देने के लिए प्रेरित करती है . इसी विशेषता के कारण भारत माँ को अपने हर सपूत पर गर्व  है और उसी सपूत ने उसे पूरी दुनिया में अलग पहचान दी है. भारत माता गौरवान्वित हुई है . उसके क़दमों में सारा जहाँ अपना मस्तक झुकाता  है और हर भारतीय अपनी जन्म भूमि का सम्मान  होते देख गर्व से फुले नहीं समाता  .

हमारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले ज्यादातर व्यक्ति (आज के परिप्रेक्ष्य को छोड़ कर ) अहिंसावादी रहे हैं .उनके लिए मानव जीवन के मायने दूसरों की ख़ुशी के लिए जीना है . सबके हितों के लिए लड़ना है . अपना हित न चाहते हुए , दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना है . महर्षि  दधीचि को तो सभी जानते हैं . देवताओं की रक्षा के लिए अपने शरीर  की हडियाँ तक दान कर दीं, ऐसे और भी व्यक्ति  हैं जिन्होंने  मानव के अधिकारों के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा दी , और हमारा समाज भी उन सबको  आज तक भुला नहीं पाया है जिन्होंने मानवता के लिए अपने आपको समर्पित किया है . हमारे देश के  ही नहीं बल्कि  विश्व के हर एक प्राणी को एक पथ प्रदर्शक की आवश्यकता होती है . जिस देश और समाज में पथ प्रदर्शक सही और उद्दात व्यक्तित्व का मालिक होता है उस देश में किसी तरह का कोई विरोध उत्पन्न नहीं होता . वहां का जन जीवन सुख और खुशहाली  से भरपूर होता है .
 
भारत को तो विश्व गुरु होने का गौरव प्राप्त है . यहाँ की माटी के हर कण में नैसर्गिक जीवन जीने की प्रेरणा भरी पड़ी है . लेकिन अफ़सोस इतना कुछ होने के बाबजूद भी आज हमारे देश में हाहाकार मचा है . चारों तरफ कुछ बातें नजर आती है जिनके बारे में सोचकर मन दुखी हो जाता है  और वह यह कि व्यवस्था पर अव्यवस्था हावी , सत्य पर झूठ हावी , ईमानदारी  पर बेईमानी हावी , सही पर गलत हावी , धर्म पर अधर्म हावी, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के जितने भी पहलु हैं हर जगह मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है और मानव पतन की तरफ तेजी से अग्रसर है . भौतिक चकाचौंध में वह इतना रम गया है कि उसे अपने मानव होने का अहसास भी नहीं रहा है , जीवन का कोई अंत भी है यह बात भी वह भूल चूका है . उसके जहन में बस एक ही बात है और वह है कि ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधनों  का एकत्रण और उन भौतिक साधनों के एकत्रण में वह जीवन का सुख ढूंढ़ रहा है , उसे  आवश्यकता और इच्छा में अंतर नजर नहीं आ रहा है , आवश्यकता की पूर्ति करना सही प्रतीत होता है और हमारी आवश्यकता जब पूरी हो जाती है तब हम संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन इच्छा के साथ ऐसा नहीं है . एक इच्छा पूरी हो जाती है तो दूसरी पनप पड़ती है , जब दूसरी पूरी हो जाती है तो फिर कई  इच्छाएं हमारे जहन में उभर कर आती है , फिर हम पूरा जीवन उन इच्छाओं की पूर्ति  के लिए लगाते हैं . आज का मानव यही कुछ कर रहा है . हमारे देश में ही नहीं बल्कि यह हर देश में हो रहा है . सूचना तकनीक के इस दौर में आज इंसान की भागदौड किसी एक दायरे में न बंधकर पूरी दुनिया में फैली है .  वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हर तरह के साधन अपना रहा है . जिनमें व्यवस्था  का हनन भी एक साधन है . वह अपनी व्यवस्था को दरकिनार कर अपना हित साधने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार  है . दुसरे शब्दों में हम उसे भ्रष्टाचार कहते हैं .
"भ्रष्टाचार"   शब्द को जब गहराई सोचता हूँ तो पाता हूँ कि यह शब्द अपने क्षेत्र में बहुत व्यापक अर्थ लिए है , और इसका दायरा भी बहुत बड़ा है . जैसे "सदाचार"   शब्द किसी व्यक्ति के पूरे जीवन और नैतिकता को अभिव्यक्त करने के लिए काफी है वैसे ही भ्रष्टाचार शब्द किसी व्यक्ति के अनैतिक होने परिचय देने के  लिए काफी है . एक ही शब्द से व्यक्ति का पूरा जीवन अभिव्यक्त होता है यह तो मानना ही पड़ेगा कि शब्द अपने अर्थ को पूरी तरह से प्रमाणित भी करता है . आज हर तरफ देखता हूँ कि सभी लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे हैं . कोई भाषण बाजी कर रहा है , तो कोई मीडिया को अपना वयान दे रहा है . कहीं पर जुलुस निकला जा रहा है तो कहीं पर प्रदर्शन किया जा रहा है . कोई जेल जाने की तैयारी में है तो किसी की भड़ास कम्प्यूटर के कीबोर्ड से आग  उगल रही है , और किसी ने तो निर्वस्त्र होने तक का आह्वान कर दिया .......! फिर पाया वाह भ्रष्टाचार तेरी लीला भी है अपरम्पार .....!
शेष अगले अंक में .......!

53 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर और सार्थक चिंतन ....जीवन के दर्शन को प्रासंगिक परिस्थितियों से जोड़कर बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त किया है आपने ...

amrendra "amar" ने कहा…

sama samayik aur gahan vicharsheel pratstuti ke liye aapko hardik badhai ......

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

आज के समय का आलेख... बहुत सुन्दर...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक चिंतन ... आज के समय में विचारणीय ..

संजय भास्कर ने कहा…

हकीकत बयान करती यह पोस्ट अच्छी लगी...शुभकामनायें !!
केवल जी......हैट्स ऑफ इस पोस्ट के लिए

रविकर ने कहा…

"भ्रष्टाचार" शब्द को जब गहराई सोचता हूँ तो पाता हूँ कि यह शब्द अपने क्षेत्र में बहुत व्यापक अर्थ लिए है , और इसका दायरा भी बहुत बड़ा है . जैसे "सदाचार" शब्द किसी व्यक्ति के पूरे जीवन और नैतिकता को अभिव्यक्त करने के लिए काफी है वैसे ही भ्रष्टाचार शब्द किसी व्यक्ति के अनैतिक होने परिचय देने के लिए काफी है . एक ही शब्द से व्यक्ति का पूरा जीवन अभिव्यक्त होता है यह तो मानना ही पड़ेगा कि शब्द अपने अर्थ को पूरी तरह से प्रमाणित भी करता है .

शुभकामनायें ||

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

भौतिक साधनों का एकत्रण और उन भौतिक साधनों के एकत्रण में वह जीवन का सुख ढूंढ़ रहा है , उसे आवश्यकता और इच्छा में अंतर नजर नहीं आ रहा है , आवश्यकता की पूर्ति करना सही प्रतीत होता है और हमारी आवश्यकता जब पूरी हो जाती है तब हम संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन इच्छा के साथ ऐसा नहीं है . एक इच्छा पूरी हो जाती है तो दूसरी पनप पड़ती है , जब दूसरी पूरी हो जाती है तो फिर कई इच्छाएं हमारे जहन में उभर कर आती है , फिर हम पूरा जीवन उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए लगाते हैं . आज का मानव यही कुछ कर रहा है . हमारे देश में ही नहीं बल्कि यह हर देश में हो रहा है . सूचना तकनीक के इस दौर में आज इंसान की भागदौड किसी एक दायरे में न बंधकर पूरी दुनिया में फैली है . वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हर तरह के साधन अपना रहा है . जिनमें व्यवस्था का हनन भी एक साधन है . वह अपनी व्यवस्था को दरकिनार कर अपना हित साधने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार है . दुसरे शब्दों में हम उसे भ्रष्टाचार कहते हैं .

wahhhhhhhh!!!!!! Ramji! bahut hi sreshth , samayik aur naitik moolyon ko darshata, humsabko santulit, sanyamit jeevan jeene,desh,aur manav kalayan ke lie
kuch kar gujarne ki prerana deta ,
josh aur isfoorti bharta hua lekh likhane ke lie aapka bahut2 abhar......tum jiyo hazaro saal.aapke vichar hum sabke lie preranasrot hain.

एस.एम.मासूम ने कहा…

एक बेहतरीन लेख़ . भ्रष्टाचार तेरी लीला भी है अपरम्पार सत्य है लेकिन इसको मिटाने कौनसा देवदूत आने वाला है? कम भ्रष्टाचारी से काम चला लेना चाहिए.
हम को अपने जीवन से कथनी और करनी का फर्क मिटाना होगा.

सदा ने कहा…

सार्थक व सटीक लेखन ..आभार ।

राजन ने कहा…

आज आम आदमी यदि खुद भ्रष्टाचार करता है तो भी वह व्यवस्था से परेशान है और नहीं करता है तो भी.

राजन ने कहा…

अगले अंक का इंतजार रहेगा

Suresh kumar ने कहा…

केवल जी आपने बहुत ही सुन्दर लिखा है
........धन्यवाद् .....

shikha varshney ने कहा…

हमारे लोकतंत्र में सबकी ही लीला अपरम्पार है.सुन्दर सार्थक चिंतन के साथ उत्तम लेख.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

एक विलक्षण विश्लेषण किया है आपने.. बहुत ही बेहतर!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चिन्तन को प्रेरित करता यह आलेख।

ZEAL ने कहा…

भ्रष्टाचार का सार्थक विश्लेषण। पहचान है ये शब्द बहुत से मुखौटेधारियों का।

smshindi By Sonu ने कहा…

बहुत ही बढ़िया लेख

Rajiv ने कहा…

"चारों तरफ कुछ बातें नजर आती है जिनके बारे में सोचकर मन दुखी हो जाता है और वह यह कि व्यवस्था पर अव्यवस्था हावी , सत्य पर झूठ हावी , ईमानदारी पर बेईमानी हावी , सही पर गलत हावी , धर्म पर अधर्म हावी, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के जितने भी पहलु हैं हर जगह मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है और मानव पतन की तरफ तेजी से अग्रसर है"-विकास के चरम पर पहुँचने के बादइसमें ह्रास की स्थिति तो आती ही है.जब संस्कार के विकास पर बहुत जोर दिया गया तो उसका काफी विकास हुआ.जब लोग भौतिक विकास की ओर बढे तो उसका विकास हुआ.यह तो प्राथमिकताओं की बात है.हर स्थिति का दोनों पक्ष है-सकारात्मक और नकारात्मक .
""जैसे "सदाचार" शब्द किसी व्यक्ति के पूरे जीवन और नैतिकता को अभिव्यक्त करने के लिए काफी है वैसे ही भ्रष्टाचार शब्द किसी व्यक्ति के अनैतिक होने परिचय देने के लिए काफी है ""--आप रूपए को ही लें,मूल्य ह्रास तो उसका भी हुआ है,लेकिन मूल्य है,वैसे ही"सदाचार" और भ्रष्टाचार" में आचार निहित है. जरूरत उस कारण को ढूंढ़ने और उसके निवारण के उपायों को दृढ़तापूर्वक लागू करने की.
मैक्सवेल परेरा(दिल्ली के पूर्व संयुक्त पुलिस आयुक्त) ने एकबार अपने साक्षात्कार में कहा था कि "व्यावहारिक शिक्षा में कमी से अपराधों कि संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है "

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

अहिंसावादी.... जो बेचते थे दवाए-दर्देदिल, वो दुकान अपनी उठाकर चले गए :(

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही लाजवाब और सटीक विश्लेषण, आभार.

रामराम

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुन्दर आलेख ।
विचारणीय पोस्ट ।

सुबीर रावत ने कहा…

भ्रष्टाचार शब्द व्यापक अर्थ लिए हुए हैं. अभी अन्ना जी के आन्दोलन में जिस तरह से लोगों का हुजूम उमड़ा उससे ऐसा लगा मानो सारा देश भ्रष्टाचार मुक्त हो गया हो और सभी देशवासियों का ह्रदय परिवर्तन हो गया हो. रुपये पैसे की लेन देन करने वाला ही भ्रष्ट है क्या? समझना होगा कि जो मुलाजिम अपनी डयूटी छोड़कर, जो वकील कोर्ट छोड़कर, रामलीला मैदान पहुंचा होगा क्या वह भ्रष्ट की श्रेणी में नहीं आता?
इसे परिभाषित करना होगा...
सार्थक लेख के लिए आभार!!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

वाह! भ्रष्टाचार तेरी लीला अपरम्पार .....!

Atul Shrivastava ने कहा…

बढिया आलेख।

व्‍यापक चिंतन योग्‍य विषय।
आभार आपका

संध्या शर्मा ने कहा…

फिर पाया वाह भ्रष्टाचार तेरी लीला भी है अपरम्पार .....!
जी हाँ अंत में यही होता है, इसलिए शुरुआत हमें स्वयं से ही करनी होगी और यही भावना हर एक भारतीय नागरिक में होगी तभी हो सकेगा एक भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र का निर्माण... वर्ना हालत हो जाती है की पानी में रहकर मगरमच्छ से दुश्मनी मोल लेने जैसी...
सुंदर और सार्थक चिंतन ...

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और विश्लेषणात्मक पोस्ट बधाई भाई केवल जी

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और विश्लेषणात्मक पोस्ट बधाई भाई केवल जी

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही लाजवाब और सटीक विश्लेषण| धन्यवाद्|

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शोचनीय तो यह है कि जो भी चिंतन-मन वे लोग कर रहे हैं जिनका सीधा कोई दख़ल नहीं है.फिर भी,कभी तो वो सुबह आएगी...!

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

गहन चिन्तनयुक्त प्रासंगिक लेख....

मनोज कुमार ने कहा…

आप समस्या को एक अलग नज़रिए से देखते हैं जो कि बहुत अच्छा लगता है।

mahendra srivastava ने कहा…

सार्थक सोच।

POOJA... ने कहा…

बहुत सी बातों को समाहित किया है इस पोस्ट में आपने...
वाकई बहुत गहन सोच और चिंतन नतीजा है ये... जितनी तन्मयता से इस पोस्ट को लिखा गया है, इसे पढने के लिए भी उतने ही concentration कि जरूरत है...
बहुत-बहुत आभार... आज की हालत और हालातों को शब्द प्रदान करने के लिए...

Dr Varsha Singh ने कहा…

अच्छा विश्लेण किया है आपने... हार्दिक बधाई।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बढ़िया लग रहा है..अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना!
आपने अच्छा आलेख लिखा है!

Amrita Tanmay ने कहा…

केवल राम जी , जहाँ तक मानसिकता की बात है तो नियम दूसरों के लिए होता है ,जब अपनी बारी आती है तो सभी नियम को ताक पर रख देते हैं . संभवतः इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है.जब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा है तो सब सस्वर गान में शामिल हो लिए हैं.सराहनीय पोस्ट है आपका .

Ankit pandey ने कहा…

bahut sundar aur satik rachna. Padh kar achha laga.

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

विचारों के आसमान पर एक एक सार्थक हलचल पैदा करती पोस्‍ट।

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क्‍यों डराती है पुलिस ?
घर जाने को सूर्पनखा जी, माँग रहा हूँ भिक्षा।

आशा ने कहा…

बहुत सार्थक लेख |
आशा

shilpa mehta ने कहा…

एक अलग नजरिया | बहुत अच्छा लेख है केवलराम जी - हमेशा की ही तरह |

@ सुबीर रावत जी - बेशक - यदि वह ड्यूटी में हाजिरी लगा कर अपने निजी कार्य को आया है - तो भ्रष्ट हुआ | कई लोग छुट्टी ले कर भी आये होंगे, कई लोग जेल जाने की मानसिक तयारी से भी आये होंगे | गीता कहती है कि कर्म की परिभाषा इस पर है कि उसके पीछे उद्देश्य - निज फल प्राप्ति है, या कर्त्तव्य परायणता | यदि व्यक्ति ड्यूटी से अपने निजी कार्य को जा रहा है , तो भ्रष्ट कहलायेगा, किन्तु यदि देश धर्म को जा रहा है - तो नहीं |

और एक बात - एक समय ऐसा होता है - जब बड़े कर्त्तव्य और छोटे कर्त्तव्य में चुनाव करना पड़ता है - तब व्यक्ति के ऊपर है कि वह अपने निजी कर्त्तव्य (ड्यूटी) को अधिक अहमियत देता है, या कि देश के प्रति अपने कर्त्तव्य को अधिक अहमियत देता है | यूँ तो श्री गौतम बुद्ध को भी आप "भ्रष्ट" कहेंगे ?? क्योंकि वे भी अपनी पत्नी और पुत्र की ओर अपनी निजी ड्यूटी छोड़ कर ही सन्यास को गए थे |

NEELKAMAL VAISHNAW ने कहा…

आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए..
MADHUR VAANI कृपया यहाँ चटका लगाये
BINDAAS_BAATEN कृपया यहाँ चटका लगाये
MITRA-MADHUR कृपया यहाँ चटका लगाये

Rakesh Kumar ने कहा…

सुन्दर सार्थक चिंतन बहुत अच्छे विश्लेशण के साथ
पढकर प्रसन्न हो गया है मन.

आचार से सदाचार या भ्रष्टाचार.
भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा उसे ही दुःख देता है
जो भ्रष्टाचार अपनाता है,भले ही वह दुःख
दिखलाई न पड़ता हो.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,केवल राम जी.

Roshi ने कहा…

adhunik jeevan ko darshti rachma...........

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

वर्त्तमान सन्दर्भों को रेखांकित करता हुआ एक गहन तथा सार्थक चिंतन.

Maheshwari kaneri ने कहा…

केवल जी ! बहुत ही सटीक सुन्दर और विश्लेषणात्मक पोस्टके लिए बहुत-बहुत बधाई .....

रचना दीक्षित ने कहा…

सटीक और सार्थक लेख.

JHAROKHA ने कहा…

kewal ram ji
bahut hi behatreen tareeke se aapne apni bhavnao ko shbd diye hain.
waqai bahut hi gahrai me jakar aapne aaj ke saty ko ujagar kiya hai hi bahut hi gahan chintan ka bodh karati aapki yah prastuti .ach me aapki soch
ko naman karti hun.
aabhar-------poonam

अभिषेक मिश्र ने कहा…

सार्थक चिंतन.

बेनामी ने कहा…

चिंतन का उत्कृष्ट नमूना है आपका यह आलेख . अनशन को नए सन्दर्भ में देखने का आपका यह प्रयास सराहनीय है .

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगता है।
मेर पोस्ट कर आपका स्वागत है ।

Swarajya karun ने कहा…

विचारणीय आलेख.

Swarajya karun ने कहा…

विचारणीय आलेख.