15 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता...2

गत अंक से आगे...भ्रष्टाचार की लीला भी अजीब है. यह कभी मेज के नीचे आता है तो कभी मेज के उपरकभी पंच सितारा होटल में किसी उच्च स्तरीय बैठक में पहुँच जाता है तोकभी देश की संसद में प्रश्न पूछने के बहाने पहुँच जाता हैकभी यह नेता के पास जाता है तोकभी बड़े-बड़े प्रशासनिक  अधिकारियों के पासकभी यह चारा खाता है तोकभी तीसरी पीढ़ी के टेलीफ़ोन पर ढेर  सारी बातें करता हैकभी खेल के नाम पर अंधाधुंध धन बहाता है. इसकी खूबियों की क्या चर्चा करूँ और इसकी व्यापकता का अहसास करने के लिए मुझे भी साधना करनी पड़ेगीऔर इसको धारण करने के लिए किसी बड़े भ्रष्टाचारी गुरु के जीवन को जानना होगा. वर्ना इसकी लीला को समझना मेरे वश की बात नहींहाँ यह जरुर है कि यदा-कदा इसके दर्शन मुझे भी होते रहे हैंऔर यह जरुर है कि इसने अपनी लीला का आभास करवाया है.
लेकिन मैंने काफी हद तक उस लीला को नजरअंदाज भी किया है. यह भी एक विडंबना देखिये पिछले 10-15 सालों से में देख रहा हूँ कि हमारे देश या राज्यों की राजनितिक पार्टियाँ अपने चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात करती रहीं हैलेकिन जैसे ही उन्हें सत्ता मिलती हैकानून व्यवस्था जैसे ही उनके हाथ में आती है वैसे ही भ्रष्टाचार के रंग में वह रंगना शुरू हो जाते हैंऔर फिर ऐसे लगता है कि यह भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि उसे सरंक्षण देने के लिए सत्ता में आये होंसरंक्षण ही नहीं उसे बढाने के लिए भीमैंने देखा है कि जब कोई व्यक्ति राजनीति में आता है तो वह 5 वर्षों के शासन में एक अच्छा सा घरगाड़ी और भी बहुत सी सुविधाओं  का मालिक बन जाता हैजनता की सेवा तो कहाँजनता को खुद की सेवक समझता है. उसकी नियत बदल जाती है और अब नियत बदली है तो कर्म का बदलना स्वाभाविक हैऔर ऐसा कोई एक रात में नहीं हुआ इस पम्परा को स्थापित करने में भी बहुत से लोगों ने मेहनत की इस उक्ति को चरितार्थ किया बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा  उन्होंने सोचा काम चाहे हम जैसा भी करें लेकिन नाम होना चाहिए. फिर चाहे कुछ भी हो जाए देश के किसी भी व्यक्ति का हित दाव पर लग जाए कोई फर्क नहीं पड़ताबस यह सिलसिला चल पड़ा और आज यह अपनी चरम सीमा को लाँघ रहा है. जहाँ अमीर ओर अमीर  होता जा रहा है ओर गरीब ओर गरीब होता जा रहा है. एक व्यक्ति दो वक़्त की रोटी के लिए दिन रात मेहनत कर रहा है  फिर भी उसका पेट नहीं भरता है. ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जिनके बारे में सोचकर दिल दहल जाता हैदिमाग चकरा जाता है. लेकिन सबका आलम एक सा ही बना रहता है.
भ्रष्टाचार एक विषाणु की तरह है. दूसरे शब्दों में इसे एड्स कहना चाहिए. प्रारम्भ में व्यक्ति को इसका पता नहीं चल पाता लेकिन जब वह रोगी हो जाता है तो फिर इसका कोई इलाज नहींहमारे देश में  बड़े-बड़े रोगी पाए जाते हैं भ्रष्टाचार के ओर हमारे यहाँ कोई कानून व्यवस्था  ऐसी नहीं कि हम उसे नियन्त्रित कर सकें अगर होती तो फिर यह रोगी आवारा घूम नहीं रहे होते. हाँ अगर इन्हें कहीं किसी तरीके से जेल जाना पड़ता है तो भी अपने साथ उस आदत को ले जाते हैं जहाँ पर जेल के नियमों को ताक पर रख दिया जाता है ओर फिर कुछ दिन बाद यह बाहर. कईयों को तो वह भी नसीब नहीं होता व तो अपना काम इस तरीके से करते हैं कि रोग भी उन्हें होता है ओर उनके इलाज का कोई बंदोबस्त भी नहीं. खैर यह सब होता रहा है इस देश में ओर इसके समाप्त होने की सम्भावना अभी नजर नहीं आती?
लेकिन फिर भी इनसान को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए और ऐसे प्रयास हर स्तर पर होते रहे हैं कि इन भ्रष्टाचारियों को समाप्त किया जाएएक प्रश्न सबसे पहले उभर कर आता है कि क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक ही तरफ से हो रहा है. हम ज्यादातर अपनी राजनितिक व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं नेताओं को दोषी मानते हैं. यह हो सकता है कि उनका दोष ज्यादा है वह अपना उतरदायित्व पूरी कर्तव्यनिष्ठा से नहीं निभा पाए. लेकिन किसी एक को तो दोषी नहीं माना जा सकता न. अगर हम किसी एक को ही दोषी मान रहे हैं तो हम सही विश्लेषण की अवस्था में नहीं पहुँच पाए हैं. हमें स्थितियों का पूर्वाग्रह रहित होकर विश्लेषण करना होगा और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है. किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और उसे क्रियान्वित करने से पहले हमें वास्तविक स्थिति के सभी पहलुओं को जांचना और परखना होगा फिर कोई कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से सफलता हमारे हाथ में होती है. अगले अंक में भी जारी...!!!

45 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

केवल राम जी
वर्त्तमान सन्दर्भों में बहुत सी बातों रेखांकित करता हुआ अच्छा आलेख
राजनितिक पार्टियाँ तो हमेशा ही ऐसी बातें करते आये है
उनका तो काम ही यही है जनता की भावनाओं पर अपनी रोटिया सेकना
और सत्ता में आते ही अपनी जेबे भरना और जनता की सेवा गई पानी में
तभी गरीब गरीब ही रह जाते है और अमीर और अमीर होते जाते है
भ्रष्टाचार तो शुरू से ही जन्म ले लेता है पहले नोट लुटाते है फिर नाते कमाते है

संजय भास्कर ने कहा…

भ्रष्टाचार के विषाणु आज समाज में पूरी तरह से अपनी जगह बना चुके है
और मुझे नहीं लगता इन्हें इतनी आसानी से दूर किया जा सकता है

रविकर ने कहा…

देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
भूल गया मैं कविताबाजी |

चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
और जिता दे हारी बाजी |

लेखक-कवि पाठक आलोचक
आ जाओ अब राजी-राजी |

क्षमा करें टिपियायें आकर
छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सही विश्लेषण ... आज जिन नेताओं की करोड़ों की संपत्ति है उनके शुरू से बही खाते देखे जाएँ तो समझ आएगा की कैसे इतनी संपत्ति बनी है ..

anshumala ने कहा…

स्थिति कितनी भी ख़राब क्यों ना हो उससे हार मान कर बैठ जाने से अच्छी है की कुछ ना कुछ प्रयास करते रहना चाहिए भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए, कुछ नहीं से कुछ करना तो बेहतर ही होता है |

shikha varshney ने कहा…

स्थिति वाकई भयावह है परन्तु हार मानकर भी तो कुछ नहीं होगा.अपने अपने स्तर पर प्रयास जरुरी है.
सार्थक आलेख..

संध्या शर्मा ने कहा…

किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और उसे क्रियान्वित करने से पहले हमें वास्तविक स्थिति के सभी पहलुओं को जांचना और परखना होगा फिर कोई कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से सफलता हमारे हाथ में होती है ."
बहुत अच्छे विचार एक सकारात्मक सोच के साथ... प्रयास करना आवश्यक है. परिश्रम से सफलता की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.... शुभकामनायें

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

आज जब विद्वत्ता की नहीं धन की पूजा होती है तो सभी धनवान बनना चाहते हैं गुणवान नहीं और यही वह घुंडी है जो भ्रष्टाचार को हवा देती है॥

Patali-The-Village ने कहा…

भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए हमें खुद पहल करनी होगी| सार्थक आलेख|

Saru Singhal ने कहा…

Very well written, our society is crippled with this problem.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जो है नाम वाला वही तो बदनाम है।

Maheshwari kaneri ने कहा…

भ्रष्टाचार पर सही विश्लेषण किया है केवल राम जी.. सुन्दर ,सार्थक लेख..

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

अलख जलाते रखना होगा, एक रोज मंजिल अवश्य मिलेगी. शुभकामनाएं.

रामराम

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा आपका विश्लेषण!

***Punam*** ने कहा…

वर्तमान राजनैतिक,सामाजिक और कहीं-कहीं पारिवारिक भी परिस्थितियां ऐसी ही हैं..
बस भ्रष्टाचार का रूप बदला होता है हर जगह...
सुन्दर विश्लेषण...!

आशा ने कहा…

बहुत सार्थक और सटीक लेख |
बधाई
आशा

सतीश सक्सेना ने कहा…

आशा करते हैं ...बदलाव की !
शुभकामनायें !

सतीश सक्सेना ने कहा…

आशा करते हैं ...बदलाव की !
शुभकामनायें !

रविकर ने कहा…

जीवन में जो कुछ घटा, उचित अवधि के बाद,
गलत-सही का आकलन, कर पाए उस्ताद |

कर पाए उस्ताद, बाप गलती पर डांटे,
तीस वर्ष का कर्म, आज खुद खाय गुलाटे |

मारा नाथू-राम, नहीं तो करते अनशन ,
बना दिया ना-पाक, कोसते अपना जीवन ||

chirag ने कहा…

itna aasan nhi hain brashtachar ko rokna
aur sahi mayne mein har kisi ko
jaldi kaam karvane ki iccha rahti h aur fir isi iccha se janm leta hain brashtachar

रविकर ने कहा…

शुक्रवार
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mahendra srivastava ने कहा…

गंभीर हालात हैं केवल जी, इन हालातों से लोगों को बाहर आना ही होगा।

Amrita Tanmay ने कहा…

सटीक छिद्रान्वेषण किया है . मनन करने योग्य.

Minakshi Pant ने कहा…

भ्रष्टाचार के बारे जितना भी कहा जाये उतना कम है मुझे तो लगता है इसमें सिर्फ बहस हो सकती है इसका कोई समाधान नहीं है क्युकी इसकी जड़ें इतनी अंदर तक जा चुकी है की इसको खत्म करने में बरसों लग जायेंगे और इसमें तब तक सुधार नहीं हो सकता जबतक की हर नागरिक इसमें अपना पूरा योगदान न दे |
अच्छे विषय पर चर्चा |

Ojaswi Kaushal ने कहा…

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विरेन्द्र ने कहा…

आप का कहना सही है! सभी के सुधरने से भ्रष्टाचार का दानव अपने आप मर जाएगा! एक दूसरे पर दोष मढने भर से कुछ नहीं होने वाला! सार्थक लेख !

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

bhrshtachar ko mitane ke liye jagrukata bahut jaruri hai..

badhiya charcha ki hai aapne..ek sarthak post hai kewal ji..dhanywaad

Gopal Mishra ने कहा…

really situation is not good.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया .... सकारात्मक सोच को सुझाता उम्दा चिंतन ......

अवनीश सिंह ने कहा…

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देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अगले अंक की प्रतीक्षा।

Suresh kumar ने कहा…

केवल जी आपका लिखा हुआ एक-एक शब्द कुछ न कुछ सन्देश जरुर देता है | इसके लिए आपको बहुत -बहुत बधाई |
कभी -कभी चलते -चलते हमारे यहाँ भी पधारें |

POOJA... ने कहा…

वाह जी वाह... बहुत बढ़िया...
भ्रष्टाचार न तो एक दिन में पनपा था, और न ही एक ही दिन में ख़तम हो जायेगा...
और एक तरह से देखें तो हर कोई इसमें लिप्त है... चाहे directly या indirectly ...
इसीलिए शुरुआत करने के लिए पूरा का पूरा सिस्टम फ़िर से तैयार करना पड़ेगा...
और नेता तो सभी एक ही थाली के चाटते-बट्टे हैं... कोई बड़ा और समाचार में है और कोई छुपा हुआ, कोई सत्ता में है तो कोई सत्ता में आने के लिए लड़ाई कर रहा है... सब हैं वही सिर्फ नाम अलग अलग हैं...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

अभी पिछले दिनों एक वाद-विवाद में विषय मिला क्या लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा.. मैंने कहा कम या ज़्यादा होने पर बहस करवाना हो तो करवा लीजिए, खतम होने की तो बात ही हास्यास्पद है!!
अच्छा लगा आपका यह विश्लेषण भी!!

केवल राम : ने कहा…

@सम्वेदना के स्वर
आपकी बात से मैं भी सहमत हूँ ...आगे आपको आपकी बात का उत्तर मिल जाएगा ऐसा मुझे आभास होता है ......आपका आभार

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

सार्थक चिंतन,
मार कर मेरे पत्थर छुपा कौन है.
बोलता भी नहीं वो मुआ कौन है. :)

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा है।
केवल राम भाई आभार!बहुत ही अच्छा लिखा है।
केवल राम भाई आभार!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

ऐसा लगता है कि हमारी और राजनीतिज्ञों की भ्रष्टाचार की परिभाषाओं में ही अंतर है। परिभाषित करना भी ज़रूरी है और लोगों के जीवन को सामान्य स्तर तक लाना भी ज़रूरी है.

Vivek Jain ने कहा…

अच्छा आलेख है केवल राम जी
बधाई,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

shashi purwar ने कहा…

aapka lekh bahut accha kaga .....bhrastachar aaj ki sabse badi samasya hai aur ise failane wale bhi hamare desh ke neta hai ..........unhe to apni jebo ke alawa kuch nahi dikhai deta ......!

Santosh Kumar ने कहा…

हम भी आपके साथ है, ओए बदलाव लाना ही होगा. लोगों की मानसिकता बदलनी होगी..
आइए.. साथ खड़े हों अन्ना के लड़ने का ये तरीका भी तो अच्छा है. आपने भी आवाज़ उठाई.
हम सब लोगों की सामाजिक ज़िम्मेवारी बनती है. धन्यवाद.

amrendra "amar" ने कहा…

parivertan prakarti ka niyam hai .......aur aaj nahi to nischay kal hai ........sarthak lekh ke liye aabhar

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका आलेख बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद । समय मिले तो मेरा भी मनोबल बढाएं ।

Rakesh Kumar ने कहा…

केवल भाई जैसे पानी का बहाव ऊपर से नीचे की तरफ होता है,तैसे ही सदाचार से भ्रष्टाचार कब होने लगता है पता ही नहीं चलता.

वास्तव में उर्ध्व गति के लिए साधना की आवश्यकता होती है,जिसका नितांत अभाव होता जा रहा है आजकल.

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ.

Chanderbhan ने कहा…

उत्कृष्ट लेखन और गहन चिंतन, आज के इस राजनीती परिपेक्ष को आइना दिखती आपकी पोस्ट विचारणीय है