19 अक्टूबर 2010

वो लहर

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सागर के तट पर जाते ही
देखा
पानी की एक लहर
हो रही है, अलग प्रतीत


देखते ही नयनों का निशाना लग गया
मानो मैं उस लहर में खो गया
तलाश मोतियों की थी
पर कला अधूरी थी......।

सीखना चाहा उस लहर से
जो सागर से मोती उभार रही थी
नजर -नजर में, मैं निहार रहा था
अंग -अंग फड़क रहा था

चूम लूँ , छू लूँ , बना लूँ इसे अपना

ताकि सिखा दे मुझे
इस तरह लहरना
लहर कर फिर ठहरना
मोती उभारना
हंस को आकर्षित करना
पर कला अधूरी थी......।
पहुंचा वहां
जहाँ वो लहर थी बड़ी करीब
उसे पाने की सोच रहा था तरकीब
मन में लेकर विश्वास
उसे पाने का किया प्रयास
बढ़ाते ही कदम



उसमें उठने लगा अहम
लगी वो सागर से और उठने
तोड़ देना चाहती थी, सीमा.......।

हटना पड़ा पीछे
इसलिए
कहीं बहा न दे बहाब में
या मैं घिर न जाऊं ,उसके शबाब में
देखता रहा ,रहा सोचता
उसांस भरकर , किनारे पर लोटता
लेटकर घास नोचता
मानो.......
भाव की चढ़ रही हो बलि
कैसे बनाऊ उसे अलि।

13 अक्टूबर 2010

रावण को क्योँ जलाते हैं, जब हम राम नहीं हो पाते हैं ..!

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राम और रावण इतिहास के दो प्रसिद्ध व्यक्तित्व हुए हैं। दोनों की प्रसिद्धि  एक दूसरे के समकक्ष है।
एक दृष्टि से देखा जाये तो दोनों का व्यक्तित्व विराट है। पर दोनों की प्रसिधी के क्षेत्र अलग-अलग है। एक को मर्यादा पुरशोतम कहा जाता है तो,दूसरे को मर्यादा तोड़ने के कारण याद किया जाता है। रावण कभी राम की बात नहीं मानता, पर राम फिर भी उससे आग्रह करते हैं। राम की सीता का हरण करने के पश्चात भी राम उसे समझाते हैं, परन्तु वह अपने हठ पर अड़ा रहता है अन्ततः उसका क्या हश्र होता है इस बात को आप भली भांति जानते हैं. राम और रावण को हम किस रूप में लेते हैं यह सब हमारी सोच पर निर्भर करता है। पर इतना जरुर है राम और रावण दोनों हमें जिन्दगी के वास्तविक सत्यों के काफी करीब ले जाते हैं और दोनों हमें आत्मविश्लेषण का मौका देते हैं ,अनुसरण का मौका देते हैं। हम किसका अनुसरण करते हैं यह हम पर निर्भर करता है। मैं जहाँ तक सोचता हूँ, एक समय में व्यक्ति एक का ही अनुसरण कर सकता है। दो का नहीं, व्यक्ति का आदर्श एक होता है दो नहीं। हमारे आदर्श कौन हैं ? यह हमें पता होगा ! एक पल के लिए हम रावण के व्यक्तित्व का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि, रावण लंका का राजा था। वह वेदों का प्रकांड विद्वान था। रावण भक्त भी था, और बहुत पराक्रमी योद्धा भी आखिर इतनी विशेषताएं होने के बाबजूद भी रावण को समाज में नफरत कि दृष्टि से क्योँ देखा जाता है? कोई न कोई कारण तो जरुर होगा। अपने एक निबंध मैं कुबेरनाथ राय ने रावण को अधर्म का नहीं बल्कि प्रति धर्म का प्रतीक कहा है । 

रावणअपने आप में एक प्रतीक है। जो हमें समझाता है कि ज्ञान, विद्या, पराक्रम, भक्ति आदि चाहे व्यक्ति के पास किसी भी हद तक क्योँ न हो अगर अहंकार हम में विद्यमान है तो हम शिखर पर होते हुए भी नीची सोच के कारण ऊंचाई को नहीं छु पाते, और हम इतने गिर जाते हैं कि हमारा नाम ही किसी को कष्ट देने का कारण बन जाता है। अहंकार के कारण व्यक्ति कि सकारात्मक सोच पर पर्दा गिर जाता है। और मद के नशे में चूर व्यक्ति फिर जो भी कर्म करता है उससे उसका कल्याण तो होना तो दूर , वह कर्म दूसरों के लिए भी सही नहीं होता। और फिर उसे रावण कि तरह हर साल जलना पड़ता है। जब हमारे मन में अहंकार आता है तो फिर हम भाषा के आधार पर, जाति के आधार पर, मजहब के नाम पर, उंच नीच के आधार पर, सरहदों के आधार पर, न जाने कितने भ्रम हमें अँधा कर देते हैं और हम मानवता के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं।
वर्तमान संदर्भों को अगर हम देखें तो स्तिथि और भी भयानक प्रतीत होती है। आज हर मोड़ पर रावण के दर्शन हो जाते हैं, किसी शायर ने क्या खूब लिखा है :-
राम वालों को इस्लाम से बू आती है ,
अहले इस्लाम को राम से बू आती है ।
क्या कहें दुनियां के हालात हैं इस कदर ,
यहाँ इंसान को इंसान से बू आती है ।
आज के परिप्रेक्ष्य में में देखा जाये तो हम बहार से राम बनने कि कोशिश करते हैं लेकिन हमारे भीतर रावण हमेशा विद्यमान रहता है। और वह इतना हाबी हो जाता है कि हम कोई भी कर्म करें, उसमें उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। ऐसी हालात हम कहाँ सही निर्णय ले पाएंगे, और जब सही निर्णय नहीं होंगे तो वर्तमान समाज कि तस्वीर कैसे बदलेगी।

आज एक और बात भी देखी जाती है कि इन्सान का मानसिक स्तर काफी गिर चुका है। नैतिकता  तो उसके लिए कल्पना करने के सामान है । भ्रष्टाचार तो उसकी जिन्दगी का लक्ष्य बन चुका है । आये दिन चोरी, डकैती, बलात्कार, लूटपाट आदि यह सब क्या रावणत्व के कारण नहीं है । तो फिर हम किस रावण को जलाते हैं, और फिर किस राम कि हम पूजा करते हैं । किस लिए हम दशहरा मानते हैं, और क्यों हमारे घरों में दिवाली होती है, कभी इस बात पर विचार किया? नहीं आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई । अगर ख्याल आया भी तो हमने गौर नहीं किया .... और जीते रहे जिन्दगी, बस यूँ ही खत्म हो गया सांसों का सिलसिला .... ! राम हमारे आदर्श कभी नहीं बन सके इस बात का अफ़सोस जताते हुए हम संसार से विदा हो गए ।

12 अक्टूबर 2010

मेरा जन्मदिन...मेरे विचार

7 टिप्‍पणियां:

आज सुबह जब मैं जागा तो मेरे फोन पर लगभग दस सन्देश थे जिनमें मेरे जन्मदिन पर मुझे शुभकामनायें संप्रेषित की गयी थी । मैं बड़ा खुश था ,मुझे लगा मुझे चाहने वाले कितने अछे हैं हर सन्देश को पढने के बाद मेरा मन काफी प्रफुलित हुआ तथा मैंने मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया । कुछ पल सोचता रहा कि ईश्वर ने कितने सुंदर ढंग से इस सृष्टि का निर्माण किया है और हमें यह मानव तन मिला है । बस ऐसे ही विचारों का सिलसिला आगे बढ़ता गया और मैंने आत्मविश्लेषण करना शुरू कर दिया ।

मेरे सामने काफी प्रश्न उपस्थित हुए मैने अपने आप को एक असमंजस कि स्तिथि में पाया , इधर मेरे फोन कि घंटी बार बार बज रही थी और उधर मेरा मन मुझसे बार बार प्रश्न कर रहा था । खेर यह सिलसिला काफी देर चलता रहा , मैं ऐसी स्थिति में भी सबकी शुभकामनाओं को सहर्ष स्वीकार करता रहा ।

थोड़ी देर के बाद शुभकामनाओं का सिलसिला ख़त्म हुआ , और अगले कार्य की योजना बनने लगी । बस फिर क्या था । एक के बाद एक प्रश्न ?........? कुल मिलाकर मुझे अपनी जिन्दगी का हर लम्हा याद आया और फिर मैंने खुद से पूछा..आखिर इस जिन्दगी का मकसद क्या है ? क्या तुम जो कुछ कर रहे हो यह इस जिन्दगी का मकसद है ? फिर कहीं याद आया " मानुष जन्म दुर्लभ है होत न बारम्बार " जो दुर्लभ है जो बड़ी से मुश्किल से मिला है आखिर उसका लक्ष्य क्या हो सकता है । एक बार अपने वर्तमान परिदृश्य की तरफ झाँका , महसूस किया ,क्या आज जो कुछ संसार में हो रहा है में भी उसका हिस्सा तो नहीं हूँ ? आज के समय के सन्दर्भ में मुझे किसी शायर की पंक्तियाँ याद आ गयी :

आदमी की शक्ल से डर रहा है आदमी
अपनों को लुट कर ,घर भर रहा है आदमी ।
मर रहा है आदमी ,और मार रहा है आदमी
समझ में नहीं आता , क्या कर रहा है आदमी ।

ऐसी हालत में मुझे कुछ नहीं सुझा , बस एक प्रार्थना के सिवा " ईश्वर मेरे सरे गुनाहों को माफ़ कर दे " ।

इंसान धरती पर आकर क्या किसी को दे जाता है ,और क्या ले जाता है ? हम अपनी जिन्दगी का अधिकांश समय बेकार की बातों में गुजार देते है । कितनी बड़ी है दुनियां हम इसका कभी एहसास ही नहीं कर पाते । जब तक हमें महसूस होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । इसलिए यह निर्णय लिया की जितना हो सके हम मानवीय भावनाएं अपने हृदय में बसाकर मानवता कर कल्याण के लिए कार्य कर पायें । जितना हो सके हम इस धरती पर शांति का वातावरण कायम करने में सहायक बन पायें । अपने पराये का भेद समाप्त कर पूरी मानव जाति में इस ईश्वर के दर्शन कर सकें । तभी इस मानव जीवन की सार्थकता होगी ।