सागर के तट पर जाते हीदेखा
पानी की एक लहर
हो रही है, अलग प्रतीत
देखते ही नयनों का निशाना लग गयामानो मैं उस लहर में खो गया
तलाश मोतियों की थी
पर कला अधूरी थी......।
सीखना चाहा उस लहर से
जो सागर से मोती उभार रही थी
नजर -नजर में, मैं निहार रहा था
अंग -अंग फड़क रहा था
चूम लूँ , छू लूँ , बना लूँ इसे अपना

ताकि सिखा दे मुझे
इस तरह लहरना
लहर कर फिर ठहरना
मोती उभारना
हंस को आकर्षित करना
पर कला अधूरी थी......।
पहुंचा वहांजहाँ वो लहर थी बड़ी करीब
उसे पाने की सोच रहा था तरकीब
मन में लेकर विश्वास
उसे पाने का किया प्रयास
बढ़ाते ही कदम
लगी वो सागर से और उठने
तोड़ देना चाहती थी, सीमा.......।
हटना पड़ा पीछे
इसलिए
कहीं बहा न दे बहाब में
या मैं घिर न जाऊं ,उसके शबाब में
देखता रहा ,रहा सोचता

उसांस भरकर , किनारे पर लोटता
लेटकर घास नोचता
मानो.......
भाव की चढ़ रही हो बलि
कैसे बनाऊ उसे अलि।