30 अक्टूबर 2016

कभी न बुझने वाला दीप जलाना

7 टिप्‍पणियां:
दीप
खुद को जलाता
किसी दूसरे को प्रकाश से
सरावोर करने के लिए
रिश्ता दीप का उससे कोई नहीं
न ही कोई चाह है उससे
न कोई बदले का भाव
फिर भी
दीप
उसे प्रकाश दे रहा है
सिर्फ अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिए.

दीप
शिक्षा है संसार के लिए
जो खुद को जलाकर
मार्ग बना रहा है दूसरों के लिए
अँधेरा चाहे कितना भी घना हो
दीप की एक लौ काफी है
हजारों वर्ष का अँधेरा मिटाने के लिए
दीप
अर्थ कई हैं इसके, कई हैं मायने   
जिन्दगी जियें हम दीप की भान्ति
समग्र संसार के लिए.

दीप
साथी है जीवन का
हर कर्म इसके बिना है अधूरा
दीप का होना है जीवन का होना
इसके बिना सब और है अँधेरा
दीप
भेद है जड़ और चेतना का
दीप प्रतीक है करुणा और संवेदना का  
दीप बिना है जीवन सूना  
और मृत्यु भी अधूरी
दीप के बिना.

दीप
प्रतीक अंतर्मन के प्रकाश का
सोये हुए जग के उजास का
भटके हुए राही की
मंजिल का यह आधार
दीप से ही मंजिल पाता
यह संसार
दीप
न बुझने वाला अंतर्मन में जलाना
दीप की इस रौशनी में
प्रेम के बीज बोना
करुणा की फुहार से उसे सींचना
इस संसार में चंद दिनों का सफर
दीप की भान्ति तय करते जाना
दिवाली की इस शुभ बेला पर
कभी न बुझने वाला दीप जलाना. 

28 अक्टूबर 2016

पहाड़ पर कविता

10 टिप्‍पणियां:
वर्षों पहले पहाड़
दुर्गम था,
दूर होना कोई प्रश्न नहीं था?
था तो पहाड़ का दुर्गम होना.
सोचता था.....
कभी पहाड़ की चोटी तक पहुंचा तो
छू लूँगा आसमान
हालाँकि यह भी भान था कि
पहाड़ होता है वीरान.
फिर भी पहाड़ मुझे
खींचता था अपनी ओर
या कभी ऐसा भी हुआ
मैं खुद ही खिंच गया
पहाड़ की और.......
मेरे और पहाड़ के बीच का फासला
सिर्फ भौतिक ही नहीं था
कई बजहें थी उस फासले की
फिर भी..!!
मैं पहाड़ की चोटी तक पहुंचना चाहता था
आसमान छूना चाहता था
चाँद-तारों का संग पाना चाहता था.
मैं प्राणी तो धरती का हूँ
लेकिन मेरे लक्ष्य में हमेशा
यात्रा आसमान की रही है
धरती की भीड़ से कहीं दूर
एक तलाश कहीं वीरान की रही है
मेरे सामने पहाड़ था
मैंने उसका चुनाव किया
लेकिन पहाड़ की चोटी तक पहुंचना
बहुत दुर्गम था
मैं पहाड़ को देखता 
तो सकूं महसूस करता
धरती की बंदिशें और दीवारें
मेरी राह में रोड़ा थी
बाहर जितनी दीवारें थीं
उससे कहीं अधिक
मनुष्य मन में लिए फिरता
वह हर पल एक नयी दीवार
अपनी हिफाजत के लिए
 करता है तैयार
सोचता था, पहाड़ पर नहीं होगी कोई दीवार
वहां से करूँगा मैं इस धरा का दीदार
लेकिन...पहाड़ पर पहुंचना मुश्किल था
एक दिन मैं बढ़ चला अपनी मंजिल की तरफ
सोच लिया मैंने
क्या है पहाड़ के उस तरफ?
जो मुझे खींच रहा है
अपने विचारों, प्रेरणाओं से सींच रहा है
मैं देख रहा था धरती के हालात
यहाँ सभ्य कहलाने वाला ही कर रहा था
सबसे ज्यादा खुरापात
उसके मंसूबे हैं बड़े डरावने
वह मिटा देना चाहता है
अस्तित्व ही धरा के मनुष्य का
सिर्फ अपने अहम् की तुष्टि के लिए
मेरे कदम अब रुके नहीं रुक रहे थे
मैं पहाड़ की ऊंचाई को छूना चाहता था
पहुँच गया मैं
एक दिन पहाड़ की ऊंचाई पर
देख ली मैंने दुनिया
जैसी मैं देखना चाहता था
दुनिया वही थी, लोग वही थे
लेकिन मेरी नजर बदल गयी
मैं दुनिया को पहाड़ से देख रहा था अब
कभी में दुनिया से पहाड़ देखा करता था
लेकिन दुनिया अब भी मुझे वैसी ही लग रही थी
बहुत गहरे में जाकर सोचा
दुनिया बदल सकती है
लेकिन उसके लिए स्थान बदलने से जरुरी है
खुद के विचार को बदलना
खुद को खुदगर्जियों से दूर रखना
पहाड़ पर पहुँच कर
मैंने कविता की भाषा में
खुद से संवाद किया
वीराने में भी व्यक्ति अशांत हो सकता है
और भीड़ में भी ‘शान्ति’ से रहा जा सकता है
पूरी दुनिया विचार से चलती है
और विचार भीतर की उपज है
पहाड़ की चोटी पर जाकर देखा
आसमान है ही नहीं
मैंने खुद को समझाया
जीवन यथार्थ है,
विचार को बदलोगे तो
दुनिया में श्रेष्ठ बन जाओगे
सब देखेंगे तुम्हारी तरफ
देखते हैं जैसे
अँधेरे में जलते दीये की तरफ.

25 अक्टूबर 2016

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा...3

2 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे... मन वचन और कर्म के पहलुओं को समझाने की कोशिश कई तरीकों से की जाती. गाँव के बुजुर्ग गाँव के हर बच्चे के साथ अपने बच्चे जैसा व्यवहार करते, इसलिए बच्चों के पास कोई अवकाश नहीं होता था कि वह किसी के साथ उदंडता से पेश आये. अगर कभी ऐसी भूल हो भी जाती थी तो वहीं बच्चे को उसकी भूल का अहसास करवा दिया जाता. अगर कहीं बात गलती से घर तक पहुँच जाती थी तो और भी डांट पड़ती. इसलिए गाँव में बुजुर्गों के प्रति सबके मन में सम्मान का भाव बना रहता और बुजुर्ग भी सबको हमेशा मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देते, सबका सम्मान और सहयोग करने की तरफ प्रेरित करते. हर घर में ऐसा माहौल होता कि वहां किसी भी तरह का कोई अनुशासन भंग नहीं होता. घर के सञ्चालन का मुख्य जिम्मा स्त्रियों के हाथ होता, उसमें सबसे बड़ी भूमिका घर में सबसे वरिष्ठ स्त्री की होती, कोई भी निर्णय मिल बैठकर सबकी सहमति से लिया जाता. उसके पीछे एक और भी कारण था कि गाँव में सभी लोग एक दूसरे के सम्मान के साथ-साथ अपने घर का सम्मान भी बनाये रखना बखूबी जानते थे. घर में कोई आपसी मन मुटाव हो तो उसे घर पर ही सुलझाने की कोशिश की जाती, अगर फिर भी कोई मामला नहीं सुलझता है तो गाँव के किसी वरिष्ठ और सम्मानीय व्यक्ति को बुलाकर सुलझाने की कोशिश की जाती और अधिकतर मामले वही शांत हो जाते. मन मुटाव वहीं समाप्त हो जाते और सभी एक ही छत के नीचे प्रेम और सहयोग से रहने की कोशिश करते. गाँव का माहौल मुझे इसलिए भी अच्छा लगता क्योंकि वहां व्यक्ति किसी के प्रति मन में इर्ष्या, द्वेष का भाव नहीं रखता, घर-परिवार से लेकर समाज तक सब एक दूसरे की इज्जत करते और सहयोग करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते.
कुल मिलाकर गाँव में जो वातावरण आज से 10-15 साल पहले तक था वह ऐसा ही था और इससे पहले और भी बेहतर, जैसा कि मुझे मेरे दादा जी बताया करते थे. वह अपने जीवन काल में भी गाँव के बदलते माहौल के लिए चिन्तित दिखाई देते थे. उनकी मृत्यु आज से 10 साल पहले हुई, उनके जाने के बाद मेरे जीवन में न भरा जाने वाला खालीपन आ गया. मेरे सबसे अच्छे दोस्त की तरह थे वह. मेरे जीवन को संवारने में उनकी भूमिका सबसे ज्यादा है. फिर धीरे-धीरे गाँव बदलने लगा. गाँव क्या बदला लोग बदलना शुरू हुए. हालाँकि इस बदलाव के बीज एकदम नहीं उगे थे, यह धीरे-धीरे हो रहा था. जैसे-जैसे भौतिक संसाधन लोगों के पास आना शुरू हुए, लोगों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव जाता रहा. पहले जहाँ सिर्फ जमीन-जायदाद और घर आदि को लेकर भाइयों में कहा सुनी होती थी अब उसके बीच में पैसा भी आ गया. लेकिन पुश्तैनी जायदाद के लिए पहले से नियम बना था तो वह ज्यादा परेशानी का कारण नहीं था किसी के लिए. जब भी किसी को अपने परिवार से अलग होना हो तो वह उन नियमों का पालन करते हुए अपनी नयी दुनिया बसा सकता था, लेकिन वहां पर गाँव की जो समीति होती, जिसे हम ‘प्रजा’ कहते हैं. उसमें वह घर के बड़े सदस्य या पिता की सहमति के बाद ही शामिल हो पाता. क्योंकि बहुत से ऐसे अधिकार जो व्यक्ति के लिए गाँव में जीवनयापन करने के लिए जरुरी होते हैं, वह प्रजा के पास सुरक्षित रहते. इसलिए परिवार से अलग होने का साहस वही करता, जिसे अपने परिवार से कोई ज्यादा परेशानी हो, वर्ना संयुक्त परिवार में आनन्द लेते हुए ही जीवन कट जाता. लेकिन आज गाँव में संयुक्त परिवार इक्का-दुक्का ही देखने को मिलते हैं. वर्ना माहौल ऐसा होता कि बच्चों को परदादा तक के दर्शन अपने जीवन काल में हो जाते, लेकिन आज बदलते दौर में परदादा के तो कहाँ माता-पिता के पास भी बच्चों के लिए समय नहीं है.
आज गाँव में बदलाब की बयार हर स्तर पर देखी जा रही है. उपरी स्तर पर देखने से लगता है कि गाँव की हालत सुधर रही है, विकास हो रहा है. हर गाँव तक सड़क पहुँच गयी है, आने जाने के साधन हैं. लोगों के घरों के बाहर गाड़ियां देखने को मिल जाती हैं. हर घर के हर कमरे में टीवी लगा हुआ है. 15 से ऊपर के हर व्यक्ति के पास मोबाइल फ़ोन हैं. इन्टरनेट की सुविधा भी धीरे-धीरे बेहतर होती जा रही है. लोग टीवी बहसों के आधार पर देश की दशा और दिशा पर चर्चा करने लगे हैं. राजनितिक पार्टी के समर्थन और विरोध के आधार पर दोस्त और दुश्मन बन रहे हैं, रिश्तों में बनावटीपन आता जा रहा है. महिलाओं का परिधान बदल गया है. पुरुष भी भौतिक चकाचौंध से दूर नहीं हैं, उन्होंने भी खुद को बदलते परिवेश के अनुरूप खुद को ढाल लिया है. गाँव में विद्यालय जरुर खुल गए हैं, लेकिन शिक्षा के नाम पर वहां लीपापोती के अलावा कुछ नहीं होता. गाँव का बचपन भी अब अठखेलियाँ नहीं करता, वह किसी बुजुर्ग का सम्मान नहीं करता. वह अब किसी के सामने श्रद्धा से नहीं झुकता. अब गाँव का बच्चा भी अपने पराये का भेद करने लगा है. गाँव का व्यक्ति अब टोली बनाकर घर से बार नहीं निकलता. वह पैसे के दम पर सब कुछ हासिल करने की कोशिश करता है. उसे भी लग रहा है कि भौतिक उन्नति ही जीवन का मूल लक्ष्य है और इसके लिए वह अपने सम्बन्धों को भी दरकिनार कर रहा है. अब उसके पास पडोसी से बात करने का समय नहीं वह अपनी ही धुन पर अपनी डपली बजा रहा है, चाहे किसी कोई परेशानी ही क्यों न हो.
आज गाँव और शहर में कोई अन्तर नहीं रहा गया है, बस एक ही अन्तर है भौगोलिक. इसी आधार पर अब गाँव और शहर में अन्तर किया जाता है. बाकी सब चीजें और व्यक्ति की फितरत वही है जो आज का इनसान कर रहा है और ऐसी फितरतों के आधार पर वह खुद को शिक्षित और बुद्धिमानी साबित करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन भीतर से देखें तो आज का इनसान बाहर से चमकीला जरुर है, लेकिन भीतर से वह खोखला है. गाँव का परिवेश भी इससे अछूता नहीं रहा. अब मेरा गाँव गाँव नहीं रहा, मिटटी वही है, लेकिन उस मिटटी से बने लोग बदल गए हैं और बदलने का यह क्रम हमें संवेदना विहीन कर रहा है. विकास का खोखला नारा हमें अपने बजूद से दूर कर रहा है. मनुष्य तू समझ क्योँ नहीं रहा है. अपने बजूद को बचाए रखने के लिए हमें मानवीय भावों को अपनाना होगा, वर्ना हमारे पास भौतिक साधन तो जरुर होंगे, लेकिन एक अदद इनसान की कमी जीवन में खलती रहेगी. हम गाँव को जरुर बदलें जो हमारे लिए सुविधाजनक हो, सुखद हो, लेकिन मानवीय भावों और संवेदनाओं को हमें जिन्दा रखना होगा, प्रेम और सहयोग को बढ़ाना होगा, सचमुच का इनसान बनना होगा.