गुल-ए-गुलजार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गुल-ए-गुलजार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

29 अक्टूबर 2010

संसार पाया होता

11 टिप्‍पणियां:
तमन्ना ही रही कि उनका पार पाया होता
जो था पलकों के करीब, उसका सार पाया होता ।

सागर है तो शांत है, ना कोई किनारा होगा
बनकर हंस मोती चुनने का किरदार निभाया होता ।

आज चेहरों पर चेहरे लगाये फिरते हैं लोग
जिस्म का नहीं, आत्मा का श्रंगार पाया होता । 


जो भी मिला सबसे है गम देने का गिला
अपना उसे बनाकर, एक मददगार पाया होता । 

जामा इंसानी मिला, पर गुण कितने हैं इसमें
देखकर ज्ञान का आईना, कुछ पारावार पाया होता ।

मिटाने पर तो मिट जाते हैं, निशां - ए - खूं
उसे समर्पित होकर एक नया संसार पाया होता ।

केवल जीने का नाम नहीं है जिन्दगी
मिटाकर हस्ती को गुल-ए-गुलजार पाया होता ।