30 जून 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 2 ..

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हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम देशों में कमोबेश ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहीं हैं . लेकिन ऐसी स्थितियों के लिए प्रकृति कम और मनुष्य ज्यादा जिम्मेवार है .
गत अंक से आगे……!
मनुष्य के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने उसके ही सामने कई विकट स्थितियां पैदा की हैं , ओजोन परत का क्षीण हो जाना और सूर्य की पराबैंगनी किरणों का उस तक पहुंचना और फिर इन किरणों के कारण उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर होना यह सब स्थितियां एक दूसरे से गहरा ताल्लुख रखती हैं . इधर कई वर्षों से यह कहा जा रहा है कि धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब धरती पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है . जल, जंगल और जमीन के अत्याधिक दोहन के कारण प्रकृति का सारा संतुलन बिगड़ गया है और हम हैं कि सिर्फ आंकड़े एकत्र करने में लगे हैं . कहीं पर ग्रीनहॉउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है तो कहीं पर अन्य कारणों पर चर्चा की जा रही है . लेकिन अगर परिणाम देखते हैं तो सब कुछ होने के बाबजूद भी परिणाम शून्य नजर आ रहे हैं .

अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने तो कार्बनडाईऑक्साइड को कम करने के लिए कृत्रिम पेड लगाने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा है . लेकिन यह ज्यादा समझदारी होगी कि जितना श्रम और धन उन कृत्रिम पेड़ों को लगाने में लगेगा उसका आधा भी अगर हम प्राकृतकि पेड़ों को लगाने में खर्च करें तो वर्षों तक स्थितियां बेहतर बनायीं जा सकती हैं और दूसरी तरफ जितना श्रम और धन उन पेड़ों के रख रखाब पर खर्च होगा उतना ही ध्यान अगर अपनी मौजूदा प्राकृतिक सम्पदाओं पर देने की कोशिश करेंगे तो आने वाले समय में बेहतर प्रबंधन के साथ और आगे बढ़ते हुए काफी क्रांतिकारी परिवर्तन हासिल किये जा सकते हैं . क्योँकि प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करते वक़्त हमें बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हम अकेले ही नहीं हैं इस धरा पर, हमारे साथ - साथ इस धरती के प्रत्येक जीव को प्राकृतिक साधनों और सम्पदाओं की उतनी ही जरुरत है जितनी कि हमें है . वन्य प्राणियों का जीवन पेड पौधों पर आश्रित है , पेड पोधों का जीवन जल और वायु पर , इसी तरह से यह क्रम है और इस प्रकृति की प्रत्येक सता एक दूसरे से जुडी हुई है और सभी एक दूसरे पर आश्रित भी है . अगर कहीं पर कोई भी रिक्त स्थान आ जायेगा तो वह श्रृंखला टूट जायेगी और हम सदा - सदा के लिए के दूसरे से बिछुड़ जायेंगे , यानि मिट जायेंगे इसलिए समय रहते इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है . 

अब इस दिशा में कदम कौन उठाएगा यह विचारणीय है ? लेकिन मेरा मानना है कि इस दिशा में तो हमें सरकारों से किसी तरह की अपेक्षा करने की बजाए स्वयं कदम उठाने होंगे और इसके लिए अगर हम अपने गाँव या शहर या आसपास के लोगों को छोटे -छोटे समूहों में संगठित कर कार्य करेंगे तो शीघ्र ही उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और अगर हर जगह ऐसा करने में हम सफल हो जाएँ तो वह दिन दूर नहीं जब हम फिर इस धरती के वातावरण को जीने लायक बना सकते हैं . 

यह तो एक पहलू है प्रदूषण का मैंने जब प्राकृतिक प्रदूषण के पर विभिन्न पहलुओं पर विचार किया तो मेरे सामने बहुत विकट स्थितियां पैदा हुईं . हालाँकि जब भी मुझे इस विषय पर चर्चा करने का मौका मिलता है तो मैं बहत बैचैन होता हूँ . क्योँकि मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं इस प्राकृतिक प्रदूषण की जड़ यह भी है और वह है मानसिक प्रदूषण और यह इतना खतरनाक और प्रभावी है कि इससे बचना अब बहुत मुश्किल हो गया है . हमारे मनों में इतनी दीवारें हैं कि हम एक दूसरे के विषय में सकारात्मक सोच ही नहीं पाते . जाति , भाषा , मजहब , धर्म , क्षेत्र ना जाने कितने वर्ग हैं जिनके आधार पर एक छोटे से क्षेत्र के लोग बंटे होते हैं , हालाँकि उन सबका जीवन एक जैसा होता है एक जैसे साधनों का उपयोग वह करते हैं फिर भी एक दुसरे से इतनी नफरत कि जैसे सामने वाला इनसान इस धरती का है ही नहीं और इस मानसिक प्रदूषण के परिणाम प्राकृतिक प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं .

इस मानसिक प्रदूषण ने ऐसा वातावरण तैयार किया कि हम खुलकर बात करने की स्थिति में नहीं हैं . आये दिन ना जाने क्या - क्या घटित हो जाता है हमारे सामने और हम मूकदर्शक की भूमिका निभाते हुए आगे बढ़ रेहे हैं और अपना संवेदनाहीन जीवन जी रहे हैं . कुछ भौतिक साधनों का एकत्रण हमनें कर लिया है और उसे हम अपने जीवन की सफलता मानकर फूले नहीं समा रहे हैं . लेकिन वास्तविकता से कटकर जीना भी कोई जीना है ? कम से कम मेरी समझ में नहीं आता ! मानसिक प्रदूषण का प्रभाव हम पर इतना हावी है कि हम वास्तविकता को जाने बगैर आगे बढ़ रहे हैं . जो बातें किसी तरह का अस्तित्व नहीं रखती उन्हें मानकर उनका अनुसरण कर रहे हैं , जबकि प्रायः यह देखा जाता है कि ऐसी बातों का वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं होता , और जो लोग ऐसी बातें करते या उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं उनसे ही अगर पूछ लिया जाये तो वह भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते . तो फिर यही आभास होता है कि यह एक तरह का मानसिक प्रदूषण है जिसे हम अपना रहे हैं . हमनें कभी विविधता को स्वीकार नहीं किया और एकांगी और मानसिक रूप से प्रदूषित जीवन को हम जीते रहे और जीवन की इतिश्री इसी रूप में हो गयी और आने वाली पीढ़ी को भी वही प्रदूषित सोच हमनें सौंप दी . काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
अगले अंक में भी जारी.....! 

17 जून 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 1 ..

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आजकल देश के हर भाग में भीषण गर्मी पड़ रही है . मौसम विज्ञान विभाग हर दिन तापमान बढ़ने  के आंकड़े जारी करता है , और साथ में यह भी चेतावनी देता है कि आने वाले दो दिनों में पारा उंचाई की तरफ जाने वाला है तो इंसान त्राहि - त्राहि करने लगता है . इंसान ही क्योँ धरती का हर जीव इस भीषण गर्मी की चपेट में खुद को असहज महसूस करता है . एक तरफ इंसान ने विकास के नाम पर जल , जंगल, जमीन और प्राकृतिक संपदाओं का अंधाधुंध दोहन किया और दूसरी तरफ उसे बचाने और संवारने के कोई प्रयास नहीं किये . विकास की इस अंधी दौड़, भौतिक साधनों और सुखों के मोह ने उसे इतना पंगू बना दिया कि अपनी चिर सहचरी प्रकृति के विषय में सोच ही नहीं पाया, उसने उसका दोहन तो आवशयकता से कई गुणा ज्यादा किया, लेकिन जब सरंक्षण और उसे सहेजने की बारी आई तो वह सिर्फ बातें ही करता रहा , योजनायें ही बनाता रहा, नियमों में ही उलझता रहा . आज जो हालात हमारे सामने हैं वह बहुत भयावाह दृश्य हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं और यह चेतावनी भी देते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी भी प्रकार से सुरक्षित नहीं है यह धरती ? एक तरफ तो प्रदूषण बढ़ रहा है और दूसरी तरफ इनसान - इनसान से इतना त्रस्त है कि उसने उसके अस्तित्व को मिटाने की ठान ली और सुरक्षा के नाम पर इतने हथियारों का आविष्कार किया कि आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी दिखाई देती है . इतना सब कुछ कैसे हुआ ? आखिर जिस दिशा की तरफ हम बढे क्या उसकी जरुरत और महता है ? क्या जो दिशा हमने तय की है हमें अब भी इस तरफ बढ़ना चाहिए या फिर पुनः प्रकृति के करीब रहकर प्राकृतिक जीवन जीना शुरू करना चाहिए ? ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है , और वैसे तो अब समय निकल गया है लेकिन फिर भी अगर मिलजुल कर प्रयास किये जाते हैं तो देर से ही सही हम इस वातावरण में कुछ तो तबदीली लाने में सफल हो सकते हैं . लेकिन यह किसी एक हाथ से होने वाला नहीं है इसके लिए तो बिना कोई देर किये हर एक इनसान को जुट जाने की आवश्यकता है . हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज जिन प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हम कर रहे हैं वह हमें हमारे पूर्वजों की देन है , अब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम भी आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक संपदा को सहेज कर रखें और जितना भी संभव हो सकता है इसे और बढाने का प्रयास करें . 

आज धरती के वातावरण को जब हम देखते हैं तो एक अजीब सा अहसास होता है . ऐसे लगता है कि हम प्रकृति से कोसों दूर चले गए हैं, हमारे जहन में प्रकृति के लिए कोई प्रेम नहीं रहा, अब हम भौतिक साधनों के इतने गुलाम बन गए हैं कि प्रकृति के करीब रहकर जीवन जीने की कल्पना ही नहीं कर सकते . बस यहीं से घुटन और टूटन शुरू होती है और आज जिस कगार पर हम खड़े हैं वह आने वाले समय में निश्चित रूप से मानवीय अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है . हमारे पूर्वजों ने जीवन जीने की जो पद्धति हमें सिखाई थी हम उसे तो भूल ही गए , अब हम वातानुकूलित वातावरण को तरजीह दे रहे हैं और यह भूल गए हैं कि इस वातानुकूलित वातावरण के लिए भी तो प्रकृति का साथ चाहिए , वर्ना हमारे सारे प्रयास निष्फल सिद्ध होंगे और हो भी रहे हैं . हमनें प्रकृति को भूलकर जब जीवन जीने की सोची तो इसने भी हमें भुलाना शुरू कर दिया और आये दिन प्रकृति के कोपों का भाजन हमें करना पड़ता है . कहीं पर भीषण गर्मी पड़ रही है तो , कहीं पर बाढ़ और तूफ़ान आ रहे हैं , कहीं पर लोग वर्षा के लिए तरस रहे हैं तो कहीं उसके रोकने के प्रयास किये जा रहे हैं . सब कुछ एकदम सोच, समझ और जरुरत के उलट घट रहा है . यह प्रकृति की चेतावनियाँ हमारे लिए हैं लेकिन हम हैं कि सब कुछ नजरअंदाज कर बस आगे बढ़ने की होड़ में लगे हैं और इसी होड़ के परिणाम आज धीरे - धीरे हमारे सामने आ रहे हैं . आने वाला कल कैसे होगा यह सोच जा सकता है , और अगर उस कल को बेहतर बनाना है तो आज से बिना देर किये ही गंभीर और लक्ष्य तक पहुंचाने वाले प्रयास किये जाने आवश्यक हैं . 

यहाँ जब हम इनसान की जीवन शैली को देखते हैं तो और भी कई बातें उभर कर सामने आती हैं जिन पर उसे पुनर्विचार करने की आवश्यकता है . अगर हम पर्यावरणीय प्रदूषण को ही विश्लेषित करने का प्रयास करें तो हमारे सामने कई चौकांने वाले तथ्य उभर कर सामने आते हैं . ऐसा नहीं है कि पर्यावरण पर कोई बहस नहीं होती , उसे बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किये जाते , इस दिशा में कोई बात नहीं करता या फिर किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता . जहां तक मैंने अध्ययन किया है तो ऐसा सब कुछ तो वर्षों से किया जाता रहा है . विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून हर वर्ष) भी मनाया जाता है , और धरती दिवस (22 अप्रैल हर वर्ष) भी . लेकिन फिर भी इन दोनों को सहेजने की कबायद कितनी आगे बढ़ पाई है यह सबके सामने है . क्योटो प्रोटोकोल और कानकुन एग्रीमेंट जैसे प्रयास भी सामने आये लेकिन कोई परिवर्तन होने की बजाए स्थितियां निरंतर बिगडती रहीं . करीब 20 साल पहले 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज बना था . तभी से ही जलवायु परिवर्तन के उपायों पर चर्चा होनी शुरू हुई थी . अगर हम गंभीरता से विचार करें तो यह तथ्य सामने आता है कि इन 20 सालों में जो कुछ हमें हासिल करना चाहिए था वह नहीं कर पाए . क्योँकि इस दिशा में जो भी कार्य हुआ वह सिर्फ नीतिगत स्तर पर ही हुआ जमीनी धरातल पर उसका क्रियान्वयन किया जाना बाकी है . इन सब घटनाओं और प्रयासों पर अगर विचार करें तो यहाँ भी एक तरह का प्रदूषण ही फैलाया जा रहा है . क्लाइमेट चेंज के नाम पर राजनीति हो रही है . जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी वैश्विक बैठकें बेमानी साबित होती जा रहीं हैं , क्योँकि इन बैठकों में जो चर्चा होती है वह समस्या पर नहीं बल्कि आमिर देशों के हितों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित होती है . कभी - कभी तो ऐसा महसूस होता है कि यह वैश्विक फोरम गरीब बनाम अमीर देशों की लड़ाई का मोर्चा बनता जा रहा है . लेकिन इस लड़ाई का नुक्सान तो दोनों तरह के देशों को भुगतना पड़ेगा और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम देशों में कमोबेश ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहीं हैं . लेकिन ऐसी स्थितियों के लिए प्रकृति कम और मनुष्य ज्यादा जिम्मेवार है .
कुछ बिंदु अगले अंक में ....!

08 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...4

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गतांक से आगे...!!! मनुष्य जब भौतिक चीजों से उपर उठकर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाने के लिए प्रार्थना करता है तो उसकी प्रार्थना उसे आनंद देने वाली होती है, और वास्तविक मायनों में यह ही सच्ची प्रार्थना है. क्योँकि इस प्रार्थना का फल हमेशा उसे आनंद देता है. जिसने इबादत में खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. क्योँकि सांसारिक चीजों की प्राप्ति थोड़ी देर के लिए आनंददायक हो सकती है और फिर दुसरे ही क्षण हमारे सामने हमारी कोई और इच्छा जाग्रत हो जाती है. ऐसी हालत में हम सदा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही प्रार्थना करते हैं और करते रहेंगे. लेकिन जिसने इबादत में खुदा से खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं, वह हर परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त है, वह खुद को इस ईश्वर में स्थापित कर लेता है. क्योँकि उसे इस बात का अहसास है कि:- राम नाम निज औषधि, काटे कोटि विकार. / विषम व्याधि ये उबरै, काया कंचन सार. (दादू)

राम नाम रूपी यह औषधि एक निजी औषधि है, और यह करोड़ों विकारों का शमन करने वाली है. जैसे ही
हमारे जीवन में ईश्वर का रंग चढ़ने लगता है तो हमारी विषमता
, असंतुलन कम होने लगता है, समता की अवस्था की और जीवन के भाव अग्रसर होते हैं, ईश्वर और जगत के बीच संतुलन कायम हो जाता है.
जितनी भी विषम परिस्थितियाँ इस जगत में उभरती हैं वह सब चित से हट जाती हैं, और हम इस स्वर्ण देह को देखते हुए इस नश्वर शरीर में ही अनश्वर शरीर को देख पाते हैं. ऐसी स्थिति में जीवन के प्रति मोह भंग तो नहीं होता, लेकिन जीवन की वास्तविकता समझ आती है कि इस नश्वर देह के साथ अनश्वर ईश्वर का गहरा सम्बन्ध है और फिर जीवन का हर क्षण दूसरों की भलाई के लिए, कल्याण के लिए प्रयुक्त होता है, यही से इबादत-दुआ बन जाती है. जब हम आत्मिक और भावनात्मक स्तर पर  बिना किसी लाभ हानि के हमेशा दूसरों का हित सोचते हैं तो हमारे आनंद की सीमा कई गुणा बढ़ जाती है फिर हम संसार की प्रत्येक परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त रहते हैं और समय आने पर किसी के कल्याण के लिए , दुःख का शमन करने के लिए ईश्वर से दुआ करते हैं :-जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि./छोड़ सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि”. (आदि ग्रन्थ : 519) 

अर्थात ऐसे गुरसिख की अरदास कभी खाली नहीं जाती जो पूरे समर्पण भाव से गुरु से प्रार्थना करता है, जो अपनी अक्ल और तन-मन को गुरु को समर्पित कर देता है. दुआ की पहुँच बहुत गहरी होती है, अगर सच्चे मन से हम कोई भी भाव इस ईश्वर के सामने रखते हैं तो वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है.  इस भाव में किसी देश की, भाषा की, जाति की सीमा आड़े नहीं आती हम किसी के दुःख को देखकर दुआ करते हैं उसे तुरंत सुख महसूस होता है. कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि सामने वाले मनुष्य के लिए प्रार्थना करते ही उसके जीवन कि दशा बदलने लगती है और की बार तो प्रार्थना के बल पर ही आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त होते हैं. यह बात ध्यान देने वाली है कि प्रार्थना अंधविश्वास नहीं है, यह एक पक्का विश्वास है और यह विश्वास ईश्वर की पूर्णता और उसके साथ आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लेने के बाद ही प्राप्त होता है. ज्यादातर हमारी दुआ और इबादत अंधविश्वास पर आधारित होती है और ऐसी हालत में सामने वाला हमारा लाभ उठाता है. हमारी मजबूरी का लाभ उठाकर वह अपना स्वार्थ सिद्ध करता है. कई बार तो यह भी देखा जाता है ऐसे स्वार्थी व्यक्ति दुआ के नाम पर व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक शोषण भी करते हैं, यह एक नकारात्मक पहलू हैं. जिससे हमें बचना होगा. हम खुद के लिए जब प्रार्थना करते हैं तो उसमें हमारी इबादत और आस्था बहुत मायने रखती है, लेकिन जब कोई किसी के लिए दुआ करता है तो उसमें हमारा विश्वास काम करता है और यही हमारी इबादत और दुआ का आधार है.

01 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...3

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म तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं कि अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. गतांक से आगे...! जीव जैसे ही इस दृश्यमान जगत में विचरता है तो यह दृश्यमान जगत उसे अपनी और आकर्षित करता है, क्योँकि सृष्टा ने इसे बनाया ही आकर्षक है, और इस दृश्यमान जगत की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक और नैसर्गिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लाख कोशिश करने के बाद भी जीव का कोई वश नहीं चलता कि वह इस जगत से मुंह मोड़ ले, वह चाह कर भी इस मायावी जगत से अपना नाता नहीं तोड़ सकता. इस दृश्यमान जगत की प्रत्येक वस्तु (जड़-चेतन) उसे बेहद आकृष्ट करती है. इसीलिए वह इस मायावी संसार रमना चाहता है, सब कुछ भूलकर. वह इस भौतिक जगत का आनंद लेना चाहता है. तभी तो इरविन एडमिन ने लिखा है "जब तक मनुष्य साँस लेता रहेगा और उसकी आँखों में देखने की शक्ति रहेगी, तब तक जीवन के ऐसे अंतिम प्रतिमानों की खोज होती रहेगी और जिनको हृदय और मस्तिष्क दोनों की स्वीकृति प्राप्त होती रहेगी ". निश्चित रूप से मनुष्य की जिजीविषा और जिज्ञासा उसे हमेशा प्रयत्नशील बनाये रखते हैं और जब तक उसका मन और मस्तिष्क किसी अंतिम निर्णय को स्वीकार नहीं करता तब तक मनुष्य प्रयास करता रहता है. इस दृश्यमान जगत की उत्पति से लेकर निर्वाण तक का विचार मनुष्य ने किया है. जब हम गहराई से विचार करते हैं तो इस सृष्टि की तीन स्थितियों से अवगत होते हैं 1. सृष्टि की उत्पति 2. स्थिति 3. और प्रलय. हमारे धर्म ग्रंथों में इन सब स्थितियों के विषय में बहुत कुछ जानने को मिलता है और यह स्वीकार किया जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति से लेकर विनाश तक के क्रम को ईश्वर द्वारा नियोजित किया जाता है, और यह बात सर्वमान्य है. यह भी माना जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति ईश्वर ने की है, इसके पालन का आधार भी ईश्वर ही है और अंततः यह सृष्टि इस ईश्वर में ही समा जाएगी. गीता में भगवान् श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस विषय में समझाते हुए कहते हैं कि:- अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते/ इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसविन्ताः (10 /08 /338.) "अर्थात मैं सब आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझसे ही उद्भूत है. जो बुद्धिमान यह भली भांति जानते हैं, वह मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में अपना सर्वस्व अर्पित करते हैंअब जब यह निष्कर्ष मनुष्य के सामने आता है तो वह किसी हद तक इसे स्वीकार करने से कतराता है. लेकिन जैसे ही उसकी बुद्धि और शक्ति उसे जबाब दे जाती है तो वह इस अदृश्य सत्ता के प्रति स्वतः ही नतमस्तक होता है", और फिर क्रम शुरू होता है इबादत का.
 
नुष्य अक्सर जब जिन्दगी की जंग हारने के कगार पर होता है तो वह दुआ और इबादत का सहारा लेता है.
हालाँकि हम दुआ और इबादत में अंतर करने में सक्षम नहीं होते, लेकिन इन दोनों शब्दों पर गहराई से विचार करते हैं तो दोनों शब्दों में स्वाभाविक अंतर जाना पड़ता है. "कहीं पर दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है, तो कहीं पर वर्षों की इबादत हार जाती है". निश्चित रूप से ऐसा होता भी है. मनुष्य पहले व्यक्तिगत स्तर पर इबादत करता है. जिसमें उसका अपना कोई न कोई मंतव्य छुपा होता है. लेकिन दुआ वह है जिसे किसी दुसरे के लिए कोई और करे, और इबादत वह है जिसे व्यक्ति खुद के लिए करे. इसलिए दुआ का एक लफ्ज असर कर जाता है और उस असर के पीछे दुआ करने वाले की भावना बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हमारे यहाँ तो यह बातें प्रचलन में है ही कि "दुआ भी तक़दीर बदल सकती है " या फिर "जो काम दुआ कर सकती है, वह दवा नहीं" इसलिए दुआ की महता है. दुआ में भाव आ गया किसी की भलाई का, किसी की ख़ुशी का, किसी के सपने साकार करने का अब जब दुआ की जा रही है तो दुआ करने वाले ने खुद को मिटा दिया, वह खुद से उपर उठ गया, उसने अपने स्वार्थ को त्याग दिया, उसके लिए परिचित-अपरिचित, अपना-पराया, उंचा-नीचा कुछ भी मायने नहीं रखता उसके लिए तो मानवीय भाव बहुत महत्वपूर्ण है. सामने वाले की ख़ुशी महत्वपूर्ण है. लेकिन इसके साथ ही एक और बात भी महत्वपूर्ण है, क्या सच में जिसके लिए दुआ की जा रही है और जिस आवश्यकता के लिए की जा रही है उसमें उसका और मानवता का कितना भला होता है, यह बात महत्वपूर्ण है. क्योँकि ईश्वर से तो कुछ भी छुपा नहीं है, वह दुआ को तभी कबूल करेगा जब सामने वाले के हृदय में मानवीय हित का भाव प्रबल हो, और ऐसे भाव को लेकर की गयी दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है.

हालाँकि यह बात भी सही है कि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की गयी दुआ भी असरकारक नहीं होती, कोई विशेष ही इस दिशा में महारत रखता है. इसलिए तो हम बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, उनके सामने अपने मन के भाव रखते हैं और मनोकामना करते हैं कि उनका कहा हुआ वचन सच निकले, इसी क्रम में गुरुओं-पीरों-पैगम्बरों आदि की महता बहुत बढ़ जाती है, हमारा विश्वास जितना दृढ होगा उतना ही हमें किसी की दुआ का लाभ मिलेगा. लेकिन इसका लाभ तभी लिया जा सकता है जब हम मानव और सृष्टि के अस्तित्व को समझते हैं और फिर इस बात को भली भांति समझते हैं कि इन सबमें ईश्वर या अदृश्य सत्ता की भूमिका क्या है? हम यह तो स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की व्यापकता में परमात्मा की बहुत बड़ी भूमिका है, यह इसका ही प्रतिबिम्ब है और इस व्यापकता को अनेक प्रकार से अभिव्यक्त किया गया है. 
जिस प्रकार ईश्वर के अस्तित्व को समझने के लिए हमें मशक्कत करनी पड़ती है उसी प्रकार मानव के अस्तित्व को भी समझा जाना चाहिए. जिस तरह सृष्टि के तीन रूप हैं उसी प्रकार मानव अस्तित्व को भी तीन रूपों में समझा जा सकता है. 1. आधि भौतिक  2. आधि दैविक  3. आध्यात्मिक. इसे यूं भी समझा जा सकता है. रक्त, मांस, मज्जा से बना यह शरीर मनुष्य का अधिभौतिक रूप है, जिसे हम दुसरे शब्दों में स्थूल काया भी कहते हैं. यह स्थूल काया अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों का माध्यम है. आम व्यक्ति इसे ही सब कुछ समझ लेता है और जितने भी भ्रम आज हमारे सामने हैं वह इस आधिभौतिक रूप से जुड़े हैं. इसी के कारण एक से पंचभौतिक तत्वों से बना शरीर हिन्दू हो गया, मुसलमान हो गया, सिक्ख हो गया, ईसाई हो गया. आधार तो समझ का था लेकिन सब कुछ बदल गया, कहीं पर जाति हावी हो गयी, तो कहीं पर भाषा, कहीं पर धर्म तो कहीं पर क्षेत्र हावी हो गया. यह सब भिन्नताएं इस आधिभौतिक शरीर को सब कुछ मान लेने के कारण हैं. मनुष्य के आधिदैविक स्वरूप पर अगर विचार करें तो यह जीवात्मा की सत्ता से सम्बंधित है, और यह जीवात्मा भौतिक चेतना की नियामक और संचालक है. मनुष्य के इसी आधिदैविक रूप के कारण ही उसे सुख-दुःख, शुभ-अशुभ, बुरा-भला आदि कर्मों की प्रतीति होती है. भोग और अनुभूति से सम्बंधित जितने भी अनुभव हैं वह मनुष्य को उसके आधिदैविक रूप के कारण अनुभूत होते हैं. मानव जीवन की चरम उपलब्धि अगर ईश्वर से साक्षात्कार है तो इस शरीर में समाहित आत्मा की चरम परिणति परमात्मा में स्थापित हो जाने में है. आध्यात्मिक बोध का अनुभव आत्मा की व्यापकता में है और यह व्यापकता तब बढती है जब मनुष्य खुद को अपने पहले दो रूपों से उपर उठा कर आत्मिक स्वरूप में स्थापित करता है. अब इस स्तर पर कोई भेद नहीं, कोई भ्रम नहीं, कोई बंधन नहीं अगर कुछ है तो वह है सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का बोध और आत्मिक स्तर का जीवन. हालाँकि इस स्तर को हासिल करना कठिन लगता है लेकिन यह नामुमकिन नहीं...जिन ढूंढा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ जिसने पा लिया उसने समझ लिया, जान लिया, अपना लिया. उसका प्रत्येक कर्म दुआ बन गया, इबादत हो गया...! कुछ बिन्दु अगले अंक में....!