08 फ़रवरी 2013

पुस्तकें और पाठक .. 1


संवाद स्थापित करना प्राणी की अनिवार्य और महत्वपूर्ण आवश्यकता है. अगर हम यह कल्पना करें कि जब संवाद स्थापित करने के साधन नहीं थे तो जीवन कैसा रहा होगा ? संवाद करना सिर्फ मनुष्य की ही नहीं, प्राणी मात्र की आवश्यकता है. हर एक प्राणी अपने भाव को प्रकट करता है और उसे प्रकट करने के लिए वह किसी ख़ास शैली का प्रयोग करता है. संवाद प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से स्थापित किया जा सकता है. संवाद स्थापित करने के लिए लिखित, मौखिक और सांकेतिक विधियां मुख्य रूप से प्रयोग में लायी जाती रही हैं. हालाँकि इनकी कोई सीमा नहीं निर्धारित की जा सकती, लेकिन यह तीन विधियां प्रारंभ से प्रचलन में रही हैं और जीवन रहते तक इनकी महता बनी रहेगी. जहाँ पर हम प्रत्यक्ष संवाद करते हैं वहां हमारे सामने मौखिक विकल्प ज्यादा रहता है या फिर लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से हम संवाद स्थापित कर सकते हैं. लेकिन जहाँ हम लोगों के सामने जाकर अपनी बात नहीं रख पाते तो वहां हम लिखकर या संकेत रूप में अपने भावों को प्रकट करते हैं, और आधुनिक युग में तो हम संवाद स्थापित करने के लिए सुचना तकनीक के अनेक साधनों का प्रयोग करते हैं.
गर हम यह कहें कि जो कुछ भी हम देख रहे हैं उसमें संवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. मानव जीवन के इतिहास का एक नहीं बल्कि अनेक पहलू संवाद के बिना अधूरे हैं, इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि संवाद के बिना उनकी कल्पना करना बेमानी जैसा होगा. संवाद करने की इस उत्कट इच्छा ने मानव को भाषा दी, लिपि दी और फिर आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह एक तरह से संवाद स्थापित करने का ही हिस्सा है. सूचना तकनीक के साधनों का विकास भी एक पड़ाव है संवाद स्थापित करने के और इसने सब कुछ बदल दिया है. मनुष्य ने जब लिखित रूप से संवाद करने की कोशिश की तो फिर अनेक साधनों का विकास किया. एक तरफ उसने लिपि का अविष्कार अपनी भाषा को सुरक्षित करने के लिए किया तो दूसरी तरफ कागज़, कलम और स्याही का आविष्कार उसे सुरक्षित रूप प्रदान किया. अपने विचारों को सहेजने के लिए उसने फिर की शैलियों का प्रयोग किया और उन विचारों को जिस माध्यम से दुनिया तक पहुंचाया उसे हमने पुस्तक की संज्ञा से अभिहित किया. आज हम देखते हैं कि एक रचनाकार अपने भावों को, विचारों को पुस्तकों के माध्यम से दुनिया के कोने - कोने तक सहजता से पहुंचा सकता है, यही नहीं हम हजारों वर्षों पुराने दस्तावेजों के माध्यम से अपने अतीत को जान सकते हैं और यह भी बड़ा रोचक है कि भविष्य की योजनायें बनाने में भी कहीं न कहीं पुस्तकों की भूमिका महत्वपूर्ण है. यह आज भी है, कल भी थी और भविष्य में भी बनी रहेगी.
क पुस्तक जो हमारी नजरों के सामने से गुजरती है, आज जिस रूप में वह हमारे सामने है उसके विकास की कहानी बड़ी रोचक है और ना जाने उसके कितने पड़ाव हैं. यह भी हो सकता है कि उसके विकास के कुछ पडावों को हम विस्मृत कर गए हों. लेकिन एक पुस्तक विकास का सिर्फ एक आयाम लेकर ही हमारे सामने नहीं आती बल्कि अनेक आयामों का प्रकटीकरण वह अपने माध्यम से करती है. संवाद स्थापित करने के लिए भाषा, भाषा को सहेजने के लिए लिपि, लिपि को मानक रूप देने के लिए ध्वनि चिन्ह और उसे व्यवस्थित करने के लिए व्याकरण इसी प्रकार यह शृंखला आगे बढती जाती है. एक तरफ तो यह अगर दूसरी तरफ देखें तो भाषा को जिन  माध्यमों से सहेजा गया उनमें कहीं पर पत्थरों/ शिलाओं का योगदान रहा तो कहीं बांस का, फिर हमने भोजपत्रों, धातुपत्रों  पर लिखना शुरू किया आगे चलकर कागज़ का अविष्कार हुआ, हाथ से लिखने से लेकर बड़ी- बड़ी मशीनों माध्यम से यह काम होना आदि बहुत से आयाम हैं जो इस पुस्तक के इतिहास से जुड़े हैं. इस दिशा में हम निरंतर विकास कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. इन सब पर लिखने के लिए स्याही के रूप में अनेक द्रव्यों का प्रयोग आदि काल से होता रहा है . हालाँकि यह विषय एक स्वतन्त्र विश्लेषण की अपेक्षा रखता है और निकट भविष्य में इस पर भी आपसे अपने अनुभव सांझा करने का प्रयास रहेगा. 
क पुस्तक के पाठक तक पहुँचने के आयामों की कहानी बड़ी रोचक और गतिशील है और उस पुस्तक के माध्यम से व्यक्ति की जीवन में परिवर्तन बड़ा अद्भुत है. यह किसी चमत्कार से कम नहीं. यूं देखने में तो पुस्तक निर्जीव लगती है लेकिन अगर उसकी अंतरात्मा को हम समझ पाए तो वह हमारे लिए जीवन से कहीं बढ़कर है . पुस्तक की महता का कोई पैमाना शायद आज तक निश्चित नहीं हो पाया है कि वह कितनी महत्वपूर्ण है, लेकिन एक संकेत देता चलूँ कि आज जिन रचनाकारों के सामने हम नतमस्तक होते हैं उन चिंतन और व्यक्तित्व अगर किसी माध्यम से हमारे सामने आया है तो वह हैं 'पुस्तकें' ....!

12 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा से ही पुस्तकों का साथ अच्छा लगा है..... किताबों के महत्व को समझाता सुंदर चिंतन

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  2. पुस्तकों में डूब जाने के बाद लगता है कि लेखक के साथ बैठकर बतिया रहे हैं।

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  3. संवाद अर्थात व्यष्टि से समष्टि की यात्रा . प्रभावी आलेख.

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  4. बहुत खूब . सुन्दर प्रस्तुति .किताबों के महत्व को समझाता सुंदर चिंतन

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  5. पुस्तके खाली समय के लिये सबसे अच्छी साथी है

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर...

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (9-2-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  7. एक बौछार था वो शख्स - ब्लॉग बुलेटिन ग़ज़ल सम्राट स्व॰ जगजीत सिंह साहब को समर्पित आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. संवाद की तहों तक पहुँचने का गंभीर प्रयास

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  9. हमारे लिए बचपन से सच्ची मित्र रही हैं, ये पुस्तकें.... बहुत अच्छा प्रयास...

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  10. सच है पुस्तकें हमेशा साथ देती हैं बस उनका महत्त्व समझ आना जरूरी है ...

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  11. खालीपन की सबसे बेहतर साथी है ये पुस्तके :)

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जब भी आप आओ , मुझे सुझाब जरुर दो.
कुछ कह कर बात ऐसी,मुझे ख्वाब जरुर दो.
ताकि मैं आगे बढ सकूँ........केवल राम.