07 अक्तूबर 2011

दुनिया एक रंगमंच है

सूचना और तकनीक के इस दौर में रंगमंच की महता कम हो गयी. वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर अगर दृष्टिपात करें तो यह महसूस होता है कि मानव ने भौतिक विकास के कई आयाम हासिल किये हैं. भौतिक विकास की दृष्टि से मानव ने काफी उपलब्धियां हासिल की हैं और वह इन उपलब्धियों को निरंतर हासिल कर भी रहा है. विज्ञान ने मानव के सामने भौतिक विकास के कई आयाम प्रस्तुत किये हैं और मानव निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है. इस भौतिक प्रगति में उसकी मेहनत, लगन, दूरदृष्टि, और सहनशीलता का बहुत बड़ा हाथ है. आज जितने भी सुख-सुविधा के साधन हमारे सामने हैं,  यह मानव की लगन और मेहनत का ही परिणाम हैं. मानवीय सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न अंग होते हैं, यह सब और मानवीय विकास का परिचय भी हमें इन साधनों से मिलता है. आज भी जब हम किसी सभ्यता और संस्कृति को जानने की कोशिश करते हैं तो हमारे सामने भौतिक विकास भी एक पैमाना होता है किसी सभ्यता और संस्कृति को समझने का, जानने का, उसके विकास का, उसकी परंपराओं का, रीति रिवाजों का, आचार व्यवहार का, और इसलिए मानव निरंतर कोशिश करता है कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को निरंतर जीवित रखा जाए और उसे हर परिस्थिति में सरंक्षित किया जाए. मानवीय प्रगति के लिए संस्कृति और सभ्यता आधार होते हैं. उन्हीं के बल पर वह आगे बढ़ता है और प्रगति करता है.

सृष्टि के प्रारंभ से लेकर ही आज तक मानव नित नया ज्ञान अर्जन करता रहा है, नित नयी उपलब्धियां हासिल कर रहा है और विकास के नए आयामों को छु रहा है. लेकिन जब इस सृष्टि के हर पहलु पर नजर डाली जाती है तो महसूस होता है कि यह सब कुछ जो हम हासिल कर रहे हैं वह स्थायी नहीं है. आज है तो कल नहीं और जो कल था वह आज नहीं, तो फिर हम क्योँ इतराते हैं अपनी क्षणिक भौतिक उपलब्धियों पर, क्षणिक भौतिक सुखों पर. हम अपने जीवन में देखते हैं कि हमारी कोई आवश्यकता या इच्छा जब पूरी हो जाती है तो हम ख़ुशी से चहक उठते हैं. लेकिन जिस ख़ुशी को प्राप्त करने के लिए हमने वर्षों मेहनत की, इन्तजार किया वह ख़ुशी हमारे पास आई और फिर चली गयी, फिर हमने  ख़ुशी के लिए नया साधन ढूंढ़ लिया हमारी ख़ुशी उसके साथ जुड़ गयी इसी तरह हमने जीवन व्यतीत किया और अंततः हम संसार से विदा हो गए . लेकिन विदा होने से पहले हम अपनी खुशियों को ढूंढ़ते रहे भौतिक चीजों में जो कि स्वयं परवर्तनशील हैं और उन्हीं परिवर्तनशील वस्तुओं में हमने जीवन की वास्तविकता को खोजने की कोशिश की, लेकिन हम उस वास्तविकता के करीब तो क्या, हम उसकी तरफ बढ़ ही नहीं पाए तो फिर जीवन का मकसद क्या रह गया. जीवन के विषय  में तो यह अकाट्य सच्चाई है "आये हैं सो जायेंगे राजा रंक फकीर, एक सिहांसन चढ़ चले एक बाँध जंजीर" सिहासन पर चढ़ कर कौन जायेगा और कौन जंजीर में बंध कर जाएगा यह सोचने वाली बात है , और यहीं से हमारा विश्लेषण शुरू होता है, जीवन की वास्तविकता को हमें यही से पहचानना होता है. जहाँ तक भौतिक चीजों की बात है वह भी स्थायी नहीं है. उनका बजूद कितना है उसके विषय में कहा गया है " जो कुछ दीसे सगल बिनासे, ज्यौं बादल की छाहीं" बादलों की छाँव में हम अगर यह महसूस करें की सूरज है ही नहीं तो यह हमारी अज्ञानता होगी. इसी प्रकार भौतिकता में रम कर अगर हम यह सोचें कि जीवन की वास्तविकता यही है तो यह भी हमारी अज्ञानता ही है. हमें  संसार में  रहते हुए जीवन के वास्तविक सत्यों की तरफ बढ़ना होता है और जितना हम इन सत्यों की तरफ बढ़ते हैं उतना ही हम  संसार में अपनी भूमिका के प्रति सजग हो जाते हैं और जितना हम अपनी भूमिका के प्रति सजग होते हैं उतना ही हम बेहतर जीवन जी पाते हैं.

अभी कल ही सारे भारत में रावण के पुतले जलाए गए सभी ने एक दूसरे को विजयदशमी की बधाईयां दी
और असत्य पर सत्य की जीत का पर्व बड़ी ख़ुशी से मनाया. लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या रावण के पुतलों को जलाने से  वास्तविक रावण मर गयाऐसा नहीं है, कहीं पर तो यह सब पात्र (राम-रावण, कृष्ण-कंस) हमें अपने जीवन में विश्लेषण का अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन हम कहाँ विश्लेषण कर पाते हैं. आज तो रावण का पुतला जलना या जलाना एक औपचारिकता बन चुका है, बस हम उसी धर्म का निर्वाह हर वर्ष बड़ी धूम धाम से करते हैं और भूल जाते हैं वास्तविक रावण को जलाना, उसे पूर्णतः मिटाया तो नहीं जा सकता लेकिन उस पर कुछ अंकुश तो लगाया जा सकता है. हमारे जहन में जो (काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार) की वृतियां हैं, यह वृतियां हमारे जीवन का आधार हैं. इनके बिना हम जीवन को नैसर्गिक रूप से नहीं जी सकते. हम मात वहां पर खाते हैं जब हम इनका दुरूपयोग करते हैं. अगर इनका सदुपयोग किया जाये तो जीवन ईश्वर प्रदत वरदान बन जाता है और ऐसा जीवन संसार के लिए कल्याण का कारण बनता है. हमें ऐसे जीवन को जीने की चेष्टा करनी चाहिए जिसमें मानवीय भावनाएं पूरी तरह भरी हों और मन-वचन और कर्म में एकरूपता हो. 

हम अपने जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं, बेशर्त कि हम जीवन की वास्तविकता के प्रति सचेत रहें. जन्म से लेकर मृत्यु तक हम ना जाने कितने पड़ावों से गुजरते हैं. जन्म जब होता है तो माता-पिता के लिए हम पुत्र या पुत्री, फिर थोडा बड़े होते हैं तो विवाह रूपी संस्कार  के बाद पति-पत्नी और फिर माता पिता की भूमिका, यह तो पारिवारिक भूमिका है, हमारा समाज और देश भी हमारे लिए महत्वपूर्ण होता है, उसके लिए भी हमारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सी भूमिकाएं होती हैं. अब इन भूमिकाओं को हमें निभाना होता है. इस सृष्टि में हमारी भूमिका एक अभिनेता की तरह है. जो परमात्मा रूपी निर्देशक के निर्देशों पर अभिनय करता है. जितना खूबसूरती और लगन से हम इस अभिनय को निभा पाते हैं उतनी ही हमारे जीवन की सार्थकता बढ़ जाती है. हम जितने बेहतर तरीके से अपनी जिम्मेवारियों को निभाते हैं उतनी ही हमारी शक्ति और महता बढ़ जाती है, जितनी-जितनी हमारी शक्ति और महता बढती है उतना ही जीवन में हमें सजग होकर चलना पड़ता है.

वास्तविकता में यहाँ न कोई किसी का माँ-बाप है न कोई किसी का पुत्र या पुत्री. सब में एक  खुदा की अंश आत्मा है, सबका अपना-अपना बजूद है. लेकिन सृष्टि का निर्माण हुआ ही ऐसे है तो हमें इसे सहर्ष स्वीकार भी करना होगा, और हम इसे स्वीकार करते भी हैं. जो अपने बजूद को हमेशा याद रखता है वह सही ढंग से अपनी भूमिका का निर्वाह भी करता है. बस उसे यह याद रहना चाहिए कि वह जो कुछ भी कर रहा है वह एक अभिनय ही है इसलिए इसे जितनी खूबसूरती से निभाया जाये उतना ही बेहतर है. अगर यह सोच हमारी बन जाती है तो हम न तो किसी का हक़ छीनेंगे, न ही किसी से हमें गिला होगा. हम पृथ्वी रूपी रंगमंच पर अपनी भूमिका जितनी सार्थक और सकारात्मक तरीके से निभाएंगे उतना ही हमारा यश होगा उतनी ही कीर्ति, और इसी यश और कीर्ति के लिए तो इंसान तरसता है. लेकिन तरीका अपना-अपना सोच अपनी-अपनी.

35 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

बिल्‍कुल सही कहा ...बेहद सार्थक व सटीक लेखन .।

वाणी गीत ने कहा…

हम जितनी बेहतर तरीके से अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं , हमारे जीवन की सार्थकता बढ़ जाति है ...
प्रेरक और सार्थक विचार!

mahendra srivastava ने कहा…

पूरी तरह सहमत।
बहुत सुंदर

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

रावण तो हर साल मारा जाता है, पर रावणी प्रवृत्ति ज्यों की त्यों कायम रहती है।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

और हम सब कठपुतलियाँ।

shikha varshney ने कहा…

सीख तो बहुत कुछ सकते हैं और सीखना भी चाहते हैं पर रह जाते हैं जिंदगी के हाथों की कठपुतली बनकर.
सटीक सार्थक आलेख.

anju(anu) choudhary ने कहा…

बहुत सार्थक लेख ......

शब्द अपने ...सोच अपनी
जीवन में आर्दश अपने अपने
रावन अपना ,मन का राम अपना
फिर किसे है जीना
ये निश्चय जीवन में
अपना क्यूँ नहीं ?

anu

ALVARO GÓMEZ CASTRO ने कहा…

Hi, I have been visiting your blog. ¡Congratulations for your work! I invite you to visit my blog about literature, philosophy and films:
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Greetings from Santa Marta, Colombia

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

अच्छी पोस्ट भाई केवल राम जी बधाई

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

अच्छी पोस्ट भाई केवल राम जी बधाई

रचना दीक्षित ने कहा…

अपने वजूद को संस्थापित करना और अपनी भूमिका का सतत सुलभ रूप से जीवन भर निर्वाह स्वयं जीवन की सार्थकता सिद्ध कर देगा.

सुंदर आलेख और सुंदर विचार.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सदुपदेश ।
सच कहा , समस्या रावण की नहीं , रावण प्रवृति की है ।

Dr Varsha Singh ने कहा…

बेशक,यही सच्चाई है....

Saru Singhal ने कहा…

What you wrote in the post is truth and it's all what perceive. Nicely written post!
Saru

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

पूरी तरह सहमत ..... बेहतरीन चिंतनपरक पोस्ट ....

Maheshwari kaneri ने कहा…

बिल्‍कुल सही कहा ...बेहद सार्थक व सटीक लेखन .।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

.... और हम सब इसके कलाकार :)

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

हम सब इसके पात्र हैं.

Patali-The-Village ने कहा…

सच कहा समस्या रावण की नहीं, रावण प्रवृति की है| प्रेरक और सार्थक विचार|

Murari Pareek ने कहा…

rawan ko marne ke liye raam nahi hai??

POOJA... ने कहा…

raavan ko nahi pravitti ko maarna zaroori hai... raam aur raavan dono ham mei hi samaahit hai...
bahut hi saarthak aur sateek lekhan... hamesha ki tarah...

Atul Shrivastava ने कहा…

क्‍या सच में रावण का वध होता है..... या सिर्फ रावण के पुतले का ही दहन होता है... हमारे भीतर का रावण तो जिंदा ही रहता है।
अच्‍छा लेख।
आभार।
विजयादशमी की शुभकामनाएं....

संध्या शर्मा ने कहा…

हमें ऐसे जीवन को जीने की चेष्टा करनी चाहिए जिसमें मानवीय भावनाएं पूरी तरह भरी हों और मन - वचन और कर्म में एकरूपता हो . पृथ्वी रूपी रंगमंच पर अपनी भूमिका सार्थक और सकारात्मक तरीके से निभाने की कोशिश करना चाहिए चाहे तरीका कोई भी हो.. सटीक और सार्थक विचार...पूर्ण रूप से सहमत हूँ..

Sunil Kumar ने कहा…

सार्थक पोस्ट आभार ......

***Punam*** ने कहा…

हम पृथ्वी रूपी रंगमंच पर अपनी भूमिका जितनी सार्थक और सकारात्मक तरीके से निभाएंगे उतना ही हमारा यश होगा उतनी ही कीर्ति , और इसी यश और कीर्ति के लिए तो इंसान तरसता है . लेकिन "तरीका अपना-अपना सोच अपनी-अपनी."

सुन्दर और सार्थक लेख....

सतीश सक्सेना ने कहा…

यह पोस्ट कुछ अलग सी रही ...अनूठी !
शुभकामनायें केवल राम !

कविता रावत ने कहा…

sach rangmach hi to yah duniya jismein ham sab apne-apne kirdar nibhate chale jaate hai...
bahut badiya saarthak chintansheel prastuti..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बड़ा दार्शनिक मामला है भाई.... बढिया पोस्ट.

विशाल ने कहा…

प्रिय भाई केवल जी,
बहुत ही गंभीर विषयों का चयन करते हैं.
टिप्पणी करने से पहले सौ बार सोचना पढता है कि समझ में आ गया कि नहीं.
दुनिया रंग मंच तो है भाई,पर पुतलियाँ सोचती भी हैं,अपने किरदार को बदलने की कोशिश करती हैं.
लेकिन हर बार बदलने में सफल नहीं हो पाती.
यह असफलता ही उनको असली खिलाड़ी की तरफ ले जाती है.

लेकिन सवाल उठता है कभी कभी मन में ,कि हम से वो खेलता क्यों है.
चलिए, कुछ सवालों के जवाब नहीं होते.

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

हमें संसार में रहते हुए जीवन के वास्तविक सत्यों की तरफ बढ़ना होता है और जितना हम इन सत्यों की तरफ बढ़ते हैं उतना ही हम संसार में अपनी भूमिका के प्रति सजग हो जाते हैं और जितना हम अपनी भूमिका के प्रति सजग होते हैं उतना ही हम बेहतर जीवन जी पाते हैं .

aapne bilkul sahee kaha..sundar abhivyakti ke lie aapko hardik dhanyavaad.

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

जितना खूबसूरती और लगन से हम इस अभिनय को निभा पाते हैं उतनी ही हमारे जीवन की सार्थकता बढ़ जाती है

wahhhhhhhhhh!!!!!!!!!! Ramji......kis

khoobsoorati se paribhashit kiya hai

jeevan ko.is avismarneeya lekh ke lie
aap sach-much badhai ke patra hain.

केवल राम : ने कहा…

आदरणीय विशाल जी यह सब तो आपकी नजर है कि आपको मेरा एक सामान्य सा विषय भी गंभीर लगता है ....लेकिन जहाँ तक सवालों की बात है हर सवाल का जबाब तो नहीं मिल सकता, अगर हर सवाल का जब मिलता होता तो फिर उस निर्देशक ( ईश्वर) की क्या आवश्यकता होती जिसके इशारों पर हम ना चाहते हुए भी नाचते हैं ....और यही तो तुलसीदास जी ने भी कहा था :-
पहले बनी प्रारब्ध , पाछे बना सरीर
तुलसी यह अचरज है , मन नाहिं बांधे धीर
आपकी इस प्रेरणादायी टिप्पणी के लिए आपका शुक्रिया ...!

"पलाश" ने कहा…

a very good article which a read after a long. it seems that there is a lot of work behind this writing..
it not only a reading metirial, but also a learning lesson for us.

बेनामी ने कहा…

जीवन के सत्यों को बहुत गहराई से उद्घाटित किया है आपने !

बेनामी ने कहा…

You truly outdid yourself today. Great work